सोमवार, 29 जून 2009

अफरल पेट- मनीष झा "बौआ भाइ"

सजल धजल बड़ सुंदर लागल
दरबज्जा सगरो
बरियाती स'
तकलौ त' तकिते रहि गेलौं
सघन समाज आ सरियाती स'

उचित व्यवस्थाक प्रश्न नहि पूछू
कहैत लगैइयै मोन गदगद
पैर धोआय कुर्सी बैसोलन्हि
बाँट' लगला चाह आ शरबत

बिग्जी,मिठाई के हाल नै पूछू
ऐल गेल कत्तेको प्लेट
भोजन करब त' बांकिये छल
ताबतहि में अफ़रि गेल पेट

किछु क्षण केलहुं विश्राम ओतय
कुरुड़ क' लेलहुं भक तोड़ि
भोजनक वास्ते आग्रह केने
व्यक्ति एक ठाढ़ छलाह कर जोड़ि

सभ बरियाती क्रम-क्रमशः
ग्रहण केलहुं बैसक आसन
भोजन परसथि युवक सदस्यगण
वृद्ध ठाढ़ करै छथि शासन

एक कात बैसल नवयुवक सब
दोसर कात बुजुर्गक पाँत
युवक लोकन्हि बक ध्यान लगौने
बुजुर्गक मुँह में बान्हल जाँत

खाइत देखि बरियात के कहलन्हि
अपनेंक घर पर नहि अछि खर
एतबहि सुनि युवक एक बजलाह
अपनेंक कृपा स' की कहू सर
बन्हने छी खाली पक्के के घर

देलन्हि ठहक्का सब बरियाती
संग देलन्हि सम्पूर्ण समाज
वाह वाह क' गूँजि उठल स्वर
ओ युवक सबहक बचौलन्हि लाज

विविध प्रकारक भोजन केलहुं
तरूआ, तरकारी, मांछ, मिठाई
पत्र शुद्धि दही केर जोग स'
पेट अफ़रि गेल मोन अघाई

भोजनोपरांत प्रस्थानक तैयारी
लेलौं विदा जनऊ-सुपारी पाबी
सभा मध्य में अपन ई रचना
परसै छथि "मनीष जी" लाबि
ग्राम+पोस्ट- बड़हारा
भाया - अंधरा ठाढी
जिला -मधुबनी (बिहार)
पिन-८४७४०१
http://www.manishjha1.blogspot.com/

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रविवार, 28 जून 2009

स्वार्थ और प्रेमार्थ - मदन कुमार ठाकुर


स्वार्थ और प्रेमार्थ एक माय - बाबु के दू शन्तान एगो स्वार्थ रूप में जे केवल अपने ही टा सब किछ बुझैत आ जानैत अछि - दोसर प्रेमार्थ रूप में जे प्रेम के अलाबा किछ और नै जानैत अछि , नही धन सम्पत्ति से मतलब राखैत अछि , ई शब्दक भावर्थ हर मनुष्य में पायल जायत अछि , जकर हम उदाहरन मैथिल आर मिथिला के जरिय पाठक गन के सामने लके हाजिर छि ---
स्वार्थ - हमरा में अनेक प्रकार से अनेक रूप समायल अछि ,
प्रेमार्थ - हमरा में शिर्फ़ एगो सत्य प्रेम रूप समायल अछि ,
स्वार्थ - हमरा लोग कलंक नाम से जानैत अछि,
प्रेमार्थ - हमरा लोग सत्य धर्म से जानैत अछि ,
स्वार्थ - स्वार्थ रूप में एक दोसर से आगू -अगु कदम बढ़बैत अछि ,
प्रेमार्थ - हम प्रेम रूप से मिलके कदम बढ़बैत छि ,
स्वार्थ - हमरा घमंड ता में महंता प्राप्त अछि ,
प्रेमार्थ - ई घमंड रावण में देखलो जाह कारण ओकर सर्ब नास भागेल ,
स्वार्थ - स्वार्थ रूप के कारण हिसा में सुई नोक के बराबर से मतलब राखैत छि ,
प्रेमार्थ - से महाभारत में दुर्योधन के देखलो जाही कारण कौरव बांस के अंत भगेल ,
स्वार्थ - स्वार्थ रूप के कारण हम अलग रहब ख़ुशी से जियब हमर ई धरना अछि,
प्रेमार्थ - हम दुःख दर्द सहब मिलके रब हमर ई कामना अछि,
स्वार्थ - स्वार्थ रूप में हिंसा आ धर्म के कुन् मोल नहीं ,
प्रेमार्थ - प्रेम में आस्था के कारण हर जीव् - जंतु से एक अलगे मोल रहित अछि,
स्वार्थ - स्वार्थ रूप में के वल दिखाबती मात्र रहैत अछि ,
प्रेमार्थ - प्रेम में केवल एगो असली रूप जकरा बस्तिविकता कहैत अछि ,
स्वार्थ - एक दोसर से ठकनाय या गलत बतेनाय ,स्वार्थ के प्रथम रूप छि ,
प्रेमार्थ - एक दोसर से मिलेनाय आ आत्मा के शांति देनाय प्रेम के प्रथम रूप छि ,
स्वार्थ - स्वार्थी सदिखन अपन शारीरक सुख से \ में लिप्त रहैत अछि ,
प्रेमार्थ - प्रेमार्थी सदिखन जगत कल्याण सुख के लेल ब्याप्त रहैत अछि ,
स्वार्थ - स्वार्थ के अन्तो गत्व पराजय निहित अछि ,
प्रेमार्थ- प्रेम के सदा विजय लिखित अछि ,
स्वार्थ - स्वार्थ रूप के कारण प्रेम तत्व से घिर्ना राखैत अछि ,
प्रेमार्थ - प्रेम रूप में घिर्ना या नफरत सब एक में समेटल रहैत अछि ,
स्वार्थ - अधिक बोली अधिक वचन , अधिक अभिमान , अधिक बैमान, अधिक शैतान, स्वार्थ के चरमशीमा अछी,
प्रेमार्थ - प्रेम में कुनू शीमा लिखित नाहिअछि,
स्वार्थ - स्वार्थ रूप के कारण ज्ञान से परिपूर्ण रहितो शही उपयोग नै त् ज्ञान स्वार्थी भेल ,
प्रेमार्थ - ज्ञान प्रेम के अहम भूमिका निभाबैत अछि , जकरा लोग निस्वार्थी भाब कहैत अछि ,
स्वार्थ - स्वार्थ रूप एगो विशुद्ध आत्मा अछि, जकरा अंत केनाय हर जीव् -जन्तु के हर रूप में सम्भब अछि , प्रेमार्थ - प्रेम एगो शुद्ध आत्मां में बिराज मन रहैत अछि ,
स्वार्थ - स्वार्थ रूप में धन के लालच रखनाय ब्यर्थक निहित अछि ,
प्रेमार्थ - खली हाथ एनाय खली हाथ जेनाय प्रेम भाब में लिखित अछि स्वार्थ - स्वार्थ भाब से \ में सेवा केनाय पाप के भागी होयत अछि ,
प्रेमार्थ - प्रेम भाब से \ में सेवा केनाय पुन्य के भागी होयत छैथ ,
स्वार्थ - स्वार्थ , कच्ची मैट के बर्तन जेका होयत अछि , जे बारिस के बाद पैन में बिलीन भ जैत अछि ,
प्रेमार्थ - प्रेम पाथर जेका कठोर आ मजबूत होयत अछि , स्वार्थ -स्वार्थ रूप - के फल करू होयत अछि ,
प्रेमार्थ - प्रेम रूप - के फल मीठ होयत छैक,
जय मैथिल जय मिथिला
मदन कुमार ठाकुर
पट्टीटोल , भैरब स्थान , झंझारपुर ,मधुबनी , बिहार ,भारत -८४७४०४
mo- 9312460150E -mail - madanjagdamba@yahoo.com

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मायानन्द मिश्र-मानवता




मुँहमे एखनहुँ पड़ल छै अधचिबाओल
हरित, कोमल आस्था केर शस्य,
कानमे एखनहुँ गुँजै छै तानसेनक गीत
किन्तु
दुष्यन्तक देखि भीषण रथ
धनुष आ तीर
भयाकुल अछि हरिन-दल
संत्रास्त
द’ रहल चकभाउर ठामहि ठाम।

एसगर
डुबैत जा रहल अछि हमर ‘आवाज’
एहि माथाहीन भीड़क असम्बद्ध कोलाहलमे
हमर ‘आवाज’ डूबल चल जा रहल अछि
असहाय
विवश
ओकर लहराइत हाथ एखनहुँ देखबामे आबि रहल अछि
सब ताकि रहल अछि
मूक, असमंजसमे।
कहियो जागत पौरुष(?)
ता कतेको डूबि गेल रहत।

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शनिवार, 27 जून 2009

कविता-जननी-आशीष अनचिन्हार

जननी


एखन
लोकक आपकता बेसी घनहन भएगेलैक अछि
ओहू सँ बेसी
बेगरता
आब अहाँ जे बुझिऔ
जे कहिऔ
अहाँ कहि सकैत छिऐक
बेगरता अविष्कारक जननी थिक
मुदा हम नहि
हमर कहब अछि
अविष्कारक नहि
बेगरता
आपकताक जननी थिक.

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नताशा 13 (चित्र-श्रृंखला पढ़बाक लेल नीचाँक चित्रकेँ क्लिक करू आ आनन्द उठाऊ।)

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बुधवार, 24 जून 2009

प्रज्वलित-प्रज्ञा


अहाँ सबके कोटि-कोटि धन्यवाद जे उत्साह-वर्धन कयैल...हम प्रयत्न करब जे किछु रचि सकि मैथिलि में तखन अवश्य प्रकाशित करब...


आई हम 'प्रज्वलित-प्रज्ञा' केर जिल्द के चित्र भेज रहल छि, संगे पुस्तक प्राप्ति के एड्रेस सेहो संलग्न अछि...
डॉ नित्यानंद लाल दास
अवकाश प्राप्त वि वि प्राचार्य
आचार्यपुरी, फारबिसगंज, बिहार
०६४५५-२२२६५६
एही पुस्तक के मूल्य १५० टका अछि आ इ पुस्तक निम्न लिखित पता पर भेट सकैत अछि...
१.श्री एस के मोहन
एम-११, बरियातू हाऊसिंग कालोनी,
बरियातू, रांची, झारखण्ड।
२.श्री डी कुमार
महिला कालेजक सामने,
मधुबनी।
३.श्री अरविन्द कंठ
ऐ-२०१, श्री एन्क्लावे,
शिल्प चौकक नजदीक,
सेक्टर-१३, खर घर
नवी मुंबई-४१०२१०.

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एक विलक्षण प्रतिभा जिनका हम सदिखन याद करैत छी (बारहम कड़ी )

बोमडिला आबय समय हम सोचनहुँ नहि माय जे एतेक जल्दी हिनका सs भेंट होयत। हिनका देखि हमरा अत्यन्त प्रसन्नता भेल मुदा व्यक्त करय मे संकोच होयत छलs। इहो हमरा देखि कम खुश नहि छलथि आ नहि हिनका अपन प्रसन्नता व्यक्त करय में देरी लागलैन्ह। बौआ के जायत देरी अपन खुशी व्यक्त कs देलाह।

हम हिनका सs गप्प करैत छलियैन्ह आ हिनक कॉलेजक विषय मे पुछति छलियैन्ह कि अचानक इ कहि उठलाह " हम सोचि लेने छी, सब मास अहाँ लग आबय के लेल छुट्टी लेब, ताहि सs नीक जे अहाँक नाम हम मुजफ्फरपुर मे लिखवा दी। प्रकाश(बौआ के नाम) एहि बेर सs बाबा लग रही कs पढिये रहल छथि। हम अहाँ कs बाबुजी सs गप्प करैत छियैन्ह। ओनाहुँ अहाँक काका कs बदली राँची सs भs रहल छैन्ह आ निर्मला कॉलेज मे अहाँ के हॉस्टल मे नहि लेत, कियाक तs ओ सब बियाहल के हॉस्टल मे नहि लैत छैक। द्विरागमन होयबा मे एखैन्ह कम सs कम डेढ़ साल छैक, अहाँक बाबुजी के कतय बदली होयतैन्ह नहि जानि। हम आब बेसी दिन अहाँ सs अलग नहि रहि सकैत छी। मुजफ्फरपुर मे भेंट तs होयत, आ बदली के चक्कर से नय रहत"। हम चुप चाप सुनि लेलियैन्ह, सोचलहुँ कॉलेज तs मुजफ्फरपुर मे राँची सs नीक नहि होयत मुदा हिनकर छुट्टी आ ऐबा जयबा वाला चक्कर समाप्त भs जयतैन्ह।

भोर मे बौआ के देखलियैन्ह जल्दी जल्दी तैयार भs गेलाह आ हिनकर खुशामद करय छलाह। हमरा मना कs देने छलथि हिनका सs सीढी के विषय मे गप्प करबाक लेल वा बतेबाक लेल जे कतेक सीढी छैक। जलखई के बाद हम, बौआ आ इ तीनू गोटे घुमय लेल निकलहुँ।जाड़ छलैक हम सब अपन अपन गरम कपडा पहिर लेने रही। सबस पहिने बाबूजी के ऑफिस पहुँचलहुँ ओ देखलाक बाद बौआ कहलाह चलु हम सब आओर नीचा चलैत छी। हम सब नीचा चलैत गेलहुँ, नीचा जाय मे तs बड नीक लागल। एक तs सीढ़ी नीक छलैक दोसर ढलांग पर उतरय मे ओनाहु नीक लागैत छैक। उतरय समय मे हम सब बुझबे नहि केलियैक जे कतेक नीचा जा रहल छी। हम सब मौसम आ प्रकृति केर आनंद लैत कखनहु कs बाजी लगा कs दौड़ति आ कखनहु कूदति नीचा उतरति गेलहुँ। अचानक इ कहलाह आब आगू नहि , आब एतय सs आपिस चलु। सड़क नजरि आबय लागल छलैक हम सब विचारि केलहुँ सड़क सs आपिस भेल जाय आ हम सब पहिने सड़क सs आ बीच बीच मे सीढी सs चढैत ऊपर जाय लगलहुँ।

ऊपर चढय समय सेहो शुरू मे तs नीक लागल मुदा जलदिये थाकि गेलहुँ। ततेक गरमी लागल जे एक एक कs अपन अपन स्वेटर उतारय परि गेल। ओकर बाद हम सब रुकि रुकि कs चलय लागलहुँ। घर पहुँचति पहुँचति हम सब ततेक थाकि गेल रही जे घर पहुँचति देरी इ तs सीधे बिछौन पर परि रहलाह। किछु समय बाद जखैंह इ भोजन करय लेल उठलाह तs बौआ हँसैत पुछलथिन "केहेन लागल बोमडिला "। सुनतहि हँसय लगलाह आ कहलाह "अरे अहाँ तs हमरा मारि देलहुँ आ पुछति छी केहेन लागल बोमडिला, हम आब किनहु अहाँ दुनु भाई बहिन संग पैरे घुमय नहि जायब "।

बाहर वाला घर में बैसला सs गेट ओहिना नजरि आबैत छलैक आ गेट लग सीढ़ी छलैक जाहि सs ऊपर चढि आ फेर नीचा उतरि कs झरना लग जाय परैत छलैक ।झरना के बाद दाहिना दिस सीढ़ी छलैक जाहि सs नीचा उतरि बाबुजी केर ऑफिस जाय परैत छलैक । बाबुजी सब दिन भोर में जायत समय आ खेनाई खाय लेल जखैंह आबैत छलाह तखैन्ह दुनु बेर ऑफिस पैरे जायत छलाह आ आपिस आबैत छलाह। इ सब दिन बाबुजी के ऑफिस जाय समय बाहर वाला घर में जा कs बैसि रहैत छलाह। जाय समय बाबुजी हमरा कहैत गेलाह जे हम सब तैयार रही ओ ऑफिस जाय कs जीप पठा देताह आ हम सब सलारी जे कि बहुत नीक जगह छलैक ताहि ठाम सs आजु घुमि आबि। बाबुजी केर ऑफिस जाय समय हम जखैन्ह बाहर वाला घर मे गेलहुँ तs इ आ बौआ पहिनहि सs ओहि घर मे छलाह। जहिना हम पहुँचलहुँ बाबुजी गेट लग पहुँचि गेल छलाह, ओ जहिना गेट सs ऊपर गेलाह इ तुंरत कहि उठलथि , देखू आब बाबुजी घुरताह, हम मजाक बुझि हँसय लगलहुँ मुदा सच मे बाबुजी किछुए आगू जा फेर आपस घर आबि गेलाह आ अपन कोठरी मे जा फेर ऑफिस गेलाह। हम पुछलियैन्ह अहाँ कोना बुझलियय जे बाबुजी आपस अओताह, तs हमरा कहलाह ओ तs सब दिन एक बेर ऑफिस जाय समय मे आपिस आबि कs जाय छथि। हम जहिया सs अयलहुं अछि हम देखि रहल छियैन्ह। बाबुजी के किछु नय किछु सब दिन छुटैत छैन्ह आ ओ आपिस आबि कs लs जायत छथि। हमरा हँसी लागि गेल आ कहलियैन्ह अहाँ के अहि ठाम कोनो काज नहि अछि तs यैह सब देखति रहैत छियैक।

आजु बाबुजी ऑफिस सs अयलाह तs आबिते सुनेलाह जे हुनक बदली के आदेश आबि गेल छैन्ह आ आब जलदिये हुनका जमशेदपुर जा कs ओहि ठामक कार्य भार सम्भारय परतैन्ह । इ सुनि हमरा बड खुशी भेल, संगहि देखलियैक बिन्नी सोनी बौआ सब खुश छलथि आ सब सs बेसी माँ खुश छलीह।

जहिया सs बाबुजी कहलथि जे हुनक बदली केर आदेश आबि गेल छैन्ह ओहि दिन के बाद सs बौआ हम आ इ सब दिन घुमय निकली, बीच बीच मे कोनो कोनो दिन सोनी बिन्नी सब सेहो सँग जायत छलिह। बोमडिला मे घुमय लेल एक सs एक जगह छलैक मुदा प्रदूषण नामक कोनो वस्तु नहि। दूर वाला जगह सब तs जीप सs जाइत छलहुँ मुदा लग वाला सब पैरे जाइत रही। एकटा बातक ध्यान इ सदिखन राखथि जे चलैत चलैत बेसी दूर नहि जाई।

हमरा लोकनि कs बोमडिला मे एक डेढ़ मास घुमति फिरति कोना बीति गेल से बुझय मे नहि आयल। जएबाक दिन लग आबि गेल छलैक, बाबुजी कहलथि जे सब गोटे एकहि सँग चारद्वार तक जायब। ओहिठाम सs ठाकुर जी आ बौआ मुजफ्फरपुर चलि जयताह आ बाकी हम सभ जमशेदपुर चलि जायब।

चारद्वार गेस्ट हाउस तक सब गोटे सँग अयलहुँ आ ओहि ठाम आबि एक बेर फेर बिछरय के आभास भेल मुदा एहि बेर दोसर तरहक छलs। मोन मे भेल आब तs किछुए दिनक गप्प छैक तकर बाद तs सब ठीक भs जायत। हमर पढ़ाई आ हिनका अयबा जयबा मे सेहो कोनो तरहक दिक्कति नहि होयत। हिनकर ट्रेन पहिने छलैन्ह, जाय समय मे हमरा उदास देखि इ कहलाह " आब तs अहाँ जमशेदपुर मे रहब ओहि ठाम जाय मे हमरा कोनो दिक्कत नहि होयत। किछु दिन बाद हमर पढ़ाई सेहो खतम भs रहल अछि"।

जमशेदपुर पहुँचि बाबुजी के रहय लेल एकटा खूब पैघ सरकारी बंगला भेट गेल छलैन्ह जे कि किछु दिन सs खाली छलैक। जतबा पैघ घर छलैक ततबे पैघ ओहि मे बगीचा मुदा खाली कियाक छलैक से तs बाबुजी के नहि बुझय मे अयलैन्ह, मुदा माँ के ओहि घर मे रहय मे डर होयत छलैन्ह आ कहलथि "एहि घर मे बेसी दिन नहि रहल जा सकैत अछि। जाबैत कोनो दोसर नीक घर नहि भेटय छैक ताबैत एहि बँगला मे रहल जाय"। माँ सब के कहि देने रहथि जरूरी सामान मात्र खोलबाक अछि। ओहि बंगला मे कम सs कम छौ सात टा कोठरी छलैक जाहि मे सs दू टा कात वाला कोठरी आ भनसा घर खोलि हम सब रहय लगलहुँ। बाकी सब कोठरी बंद रहैत छलैक।

हम सब जमशेदपुर अयलहुँ ओकर दू तीन दिन बाद काका भेंट करय लेल अयलाह, हुनका देखि हम तs आश्चर्यचकित रहि गेलहुँ। एतबहि दिन में ततेक कमजोर लागैत छलाह जे देखतहि माँ पुछलथिन "अहाँ के किछु होयत अछि की फूल बाबू"। काका कहलथि कोनो ख़ास नहि, बीच बीच मे पेट मे गैस भs जायत अछि जाहि के चलते दर्द होयत रहैत अछि।काका जाय लगलाह तs माँ काका के कहलथिन जे राँची जा कs सबस पहिने नीक सs डॉक्टर से देखाऊ, बराबरि दर्द भेनाई ठीक नहि छैक ।

हम सब ठीक दुर्गा पूजा सs पहिने जमशेदपुर पहुँचल रही । एक तs नब जगह ताहि पर तेहेन घर छलैक जे कतहु घुमय जाय मे से डर होयत छलैक, मुदा हम सब जमशेदपुरक पूजा देखलहुँ। दिवाली सs एक दू दिन पहिने इ पहुँचलाह। हिनका देखि कs सब भाई बहिन सब खुश भs जाय गेलथि आ इहो सब संग मिली कs दिवाली के पटखा कs तैयारी करय मे लागि गेलाह ।

दिवाली दिन साँझ मे पूजाक बाद सभ गोटे बाहर मे बैसि कs प्रसाद खाइत छलहुँ प्रसाद खेलाक बाद इ उठि कs पाछू गेलाह आ सँग सँग चारू भाई बहिन सेहो हिनके पाछू चलि गेलथि। माँ भानस मे लागल छलिह बाहर मे मात्र हम आ बाबुजी बचि गेलहुँ। अचानक पाछू वाला घर मे बुझायल जेना बम फुटैत छैक। बाबुजी आ हम दूनू गोटे दौरि कs भीतर गेलहुँ। माँ से भनसा घर स दौरि क अयलीह। जाहि दिस सs आवाज अबैत छलैक ओहि दिस घरक भीतरे सs हम सब गेलहुँ। बाबुजी घर सब खोलैत जओं बीच वाला हॉल लग पहुँचलाह तs सामने मे इ ठाढ़, संग मे बिन्नी, सोनी , अन्नू आ छोटू सब पटाखा छोरि थपरी पारि खुश होयत छलथि। असल मे इ, सब बच्चा के लs कs बीच वाला हॉल मे पटखा छोरैत छलाह। बीच वाला हॉल ततेक टा छलैक आ ताहि पर खाली जे छोटका पटाखा सेहो बुझाइत छलैक जे बम फुटल छैक। हिनका देखि बाबूजी किछु नहि बजलाह आ हँसैत आपिस भs गेलाह।


क्रमशः ....................

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मंगलवार, 23 जून 2009

सोमदेव-एकटा अदना सिपाही




अपन सकेत कोठलीमे बैसल
जम्बूद्वीपक एकटा अदना सिपाही
सकेतमे अपन टाँगो नहि पसारि पबै-ए
मुदा खुशफैलमे गोली खूब चलबै-ए
मुइलकें मारैत। मारलकें मालक चाम जकाँ
घीचैत। चामकें
भान पर लदैत...। अपन सकेत कोठलीमे अपन माथ
उतारि क’ राखि आएल बेचारा एकटा अदना सिपाही
चिन्ताक मुरेठा कहुना खलिया पर लपेटने। बेचारा
एकटा अदना सिपाही
हृदय आ हाथ। यन्त्राक दू गोट असम्बद्ध पुर्जा
राजनीति शतरंजक प्यादा। चैबटियाक पेंचसँ कसल
विशेषणहीन। पाइ ओसूलैत। बहादुर। रिक्शा पर।
डण्टा बजारैत। बेचारा सिपाही
अपन सकेत सौंस कोठली बाहु पर उठौने
अशोक वनमे सीता दिस अँखियबैत

अइँठ-कूठि-निंगहेस पेटमे कोंचैत। त्रिजटाकें पछुअबैत
बाल-बच्चाकें लतिअबैत
दुनू मोंछ दुनू तरहत्थी पर रखने। विस्मित। बेचारा
जम्बूद्वीपक एकटा अदना सिपाही
बहीर साँप सभक सुखनीनक वास्ते
सकेत कोठलीवाला गलीक कण्ठ पर पदचाप दैत
‘टेप’ बजा रहल अछि। राति पर बारूदी
लेप सजा रहल अछि।

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प्रथम परिचय

पहिने हम अपन परिचय द रहल छी।
हमर नाम
नीरज कुमार अईछ... डखराम, दरभंगा हमर पैतृकगाम ऐछ...एखन दिल्ली में छि...

हम एहन मिथिला-पुत्र छि जे सब मैथिलि बाजए छे मुदा लिखय अओर पढयमें लगभग असमर्थ होयत छथीन...एहि कारण जे त्रुटी होय हमर लेखन में , अहाँ सब क्षमा करब आशा करैत छि...

एहि ठाम पोस्ट करै के अनुमति भेटल एहि लेल आभार प्रकट करै छि...

हम काल्हि डॉ कलाम के 'Ignited Mind' केर मैथिलि अनुवाद पढ़त छलिये, डॉ नित्यानंद लाल दास द्वारा 'प्रज्वलित प्रज्ञा' पुस्तक के रूप में प्रकाशित कयल गेल ऐछ... डॉ दास हमर मामा छथिन्ह... ई पुस्तक के विमोचन आओर प्रचार में हम हुनकर संगे छलिय, मुदा मैथिल समाजो में मैथिलि पुस्तक क लेल कोनो उत्साह नहि दिखल...कारण जे मैथिलि भाषा के पाठक बड़ कम भेटत...

ओहि समय हमर मोन में ई विचार उत्पन्न भेल, जे अहाँ सब के सम्मुख प्रकट करै छि...

हम दोसर भाषा के अनेक पुस्तक या रचना सबहक मैथिल अनुवाद पढि चुकल छि मुदा मैथिलि पुस्तक वा कथा- कहानी-कविता के कोनो आओर भाषा में अनुवाद देखनो नहि छि... ऐना कियैक ...

मिथिला के अनेक लोक बाहर रहै छथिन्ह... मिथिला के संस्कृति, संस्कार आओर साहित्य स' दूर

छथिन्ह... यदि हिन्दी वा अंग्रेजी में ई सब उपलब्ध होय त शायद नव पीढी मिथिला, मैथिलि अओर मैथिल दिस आकर्षित होथिन्ह...
मिथिला के लेखक लोकनि स आग्रह ऐछ जे एही दिशा में अपन योगदान देथुन्ह जाहि स हम सब अपन इतिहास स पुनः परिचित होइ... एही तरहे मैथिलि के backlink हेते हिन्दी आओर अंग्रेजी स , जेकर महत्ता अंतरजाल स परिचित लोक खूब समझै छथिन्ह...
आशा ऐछ अहाँ लोकनि हमर 'मैथिलि स अनुवादित पुस्तक' क विषय में हमर ज्ञान वृद्धि करब...

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शनिवार, 20 जून 2009

पता नहि घुरि कए जाएब आकि-गजेन्द्र ठाकुर


“पता नहि घुरि कए जाएब
आकि एतहि मरि-खपि
बिलायब

घर आँगन बहारि
गाममे
आबी दुआरि
दए दूभि गाएकेँ
मालक घरमे घूर लगाय

फेर पैंजाबमे
चाहक स्वाद कतेक नीक
दिन भरि खटनीक बादो
नहि थाकए छलहुँ मीत
आब सुनैत छियैक जे चाहमे हफीम रहैत छल मिलाओल”

तखने ओहि बच्चाक सोझाँ
घोरनक छत्ता खसल
मोन पड़लए गाम

घुरि चलू देश बजाओल
मिथिलाक माटिक वास
आमक आएल अछि मास

गाछक पात खसि रहल
लजबिज्जी सभ पसरल होएत
गाछक जड़िक चारूकात

नहिए गाछक जड़ि बनेलहुँ
नहिए पोखरिक घाट
एक पेरियोपर जनमल होएत
अक्खज दूभि आ काँट

तरेगणक तँ दर्शनो नहि होइए
प्रदूषण किदनि एतए
रोकलक चन्दमामाकेँ
थारीयोमे आबएसँ

हमरा ई सभ किदन बिहारी कहैए
क्यो लए चलू देश घुरा कए
मोन नहि एतए लगैए

माएक बरतन टिनही जहिया किनाएल
कतेक हँसल रही प्रसन्न भए सभ भाए
बेरा-बेरी खाइत ओहि थारीमे

एहि दिल्ली नगरियामे
स्टीलक बरतन बासन
मुदा स्वाद ओहि टिनही थारीक
जे स्वादि-स्वादि खयने रही
पता नहि घुरि कए जाएब
आकि एतहि मरि-खपि
बिलायब


बकड़ीक भेराड़ी
खरड़इत सुखाएल पात
पोखरिक महारपर
बबूरक काँट
उज्जर सपेत बिखाह

मुदा एहि दिल्ली नगरियाक
उज्जर सपेत लोकसँ बेशी बिखाह नहि
जतेक बिखाह बोल
ओहूसँ बेशी मारूख घृणायुक्त दृष्टि

बिहारी ! बिहारी ! स्वरक बीच !
बेचैत छी ककबा पापड़ मसाजर

जाड़क राति
ठिठुरैत ई गाछ
बसात सेहो ओहने चण्डाल

सोझाँमे एकटा गाछमे अछि छह मारल
निकलैत अछि ओकरासँ खून
उज्जर-ललौन
मुदा फेर बनैए थलथल ठोस लस्सा

जाड़मे सुखाएल सन
गरमीमे झरकल सन
ई गाछ-पात
सिखबैए रहनाइ असगर आ एकेठाम
बिनु भेने अकच्छ
सालक साल

ददिया जे दैत रहए अर्घ्य दिवाकरकेँ
पाछूमे खसबैत रहथि पानि तड़ाक
बौआ माने हम
पएर पटकि कूदए छलहुँ छपाक छपाक

पता नहि घुरि कए जाएब
आकि एतहि मरि-खपि
बिलायब

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आत्मिक संतुष्टि - जगदम्बा ठाकुर



आत्मिक संतुष्टि

हमर समस्त ज्ञान व् प्रयाश , शारीरिक किछ हद तक , मानसिक आ किछ अहि ज्ञान बुधि स्तर तक केवल मात्र सिमित रहैत अछि अंतर में जतय हमार विशुद्ध आत्मा या सुरत ( नेचर ) मात्र रहैत अछि , ओताहि तक हम जीवन भर नही पहुंच पावैत छि क्याकि हमरा ओही सब्द के भेद बतावै बाला गुरू नही मिलला
यदि ककरो पूर्ण रूप से गुरू भेटलें त ओ ओकर उपयोग नही क दुरोपयोग बैब्हर केलैन आ बाहरी गुरू सब के इहा कोशिस रहैत छैन की ओ अपन शिष्य के अंतर आत्मा में जे गुरू विराज मान अछि से ओकर भेद बता दै मुदा गुरू के पास अहि भेद के जनय के लेल सब जयत अछि , सब के सब दिखाब्ती दुनिया में विस्वाश आ इच्छ पूर्ति करेक लेल गुरू के पास जायत अछि और गुरू हुनकर इच्छ पूरा करैत छथिन लेकिन असली भेद जे ओबताव चाहैत छैथ से ओ नही बता पावैत छैथ , क्याकि ओही हिशाब से हुनका निक ग्राहक नही भेटैत छैन संसारिक इच्छा ता पूरा होयत छैन जे हुनका पर श्रधा और विस्वाश क लैत अछि और जे हुनकर बात के अपन बुईध क डिक्सनरी में से नीकाली के संशय करैत अछि या ओही पर बहस करैत अछि

एगो बात हमरा दिमाग में आबैत अछि की , गुरू ओ एगो तत्व थिक जे मनुष्यक शरीर से प्रकट होयत अछि , जकरा ओ स्वं चुनैत छैथ गुरू नहीं पैदा होयत छैथ नहीं ओ मरैत छैथि अहि दुवारे बाहरी गुरू जिनका अन्दर ओ तत्व प्रकट होयत छैन ओ मालिक के रूप में होयत छैथि , लेकिन हम ओही मनुस्यक मायन के बरका टा भूल करैत छि
कवीर दास कहैत छैथ ----
गुरू को मानुस जानते ते नर कहिए अन्ध ,
दुखी होय संसार में आगे जम का फंद

गुरू किया है देह को सत गुरू चीन्हा नहीं ,
कहें कवीर ता दास को तीन ताप भरमाही

गुरू नाम आदर्श का गुरू हैं मन का इस्ट ,
इस्ट आदर्श को ना लाखे समझो उसे कनिस्ट

चेला तो चित में बसे सतगुरू घट के आकाश ,
अपने में दोनों लाखे वही गुरू का दास

गुरू जे अपन साधन अभ्यास अपन शिष्य के दैत छथिन ओ हुनकर मंजिल नही छियन , आ ने हुनकर ओहिसे आबाग्मन छुट तैन , वल्कि ओत अहिद्वारे देल जायत अछि की जे अहि से शिष्य क मन काबू में आबिजय आ स्थिर भ जाय , ताकि आगू के जीवन सीढ़ी चढाई में आसानी होय अहिदुवरे गुरू के दुवारा बतायल गेल तरीका से अभ्यास केनाय बहूत जरूरी होयत छैक , लेकिन अहि के मंजिल मय्न लेनाय बहूत पैघ भूल होयत अछि जिनका अभ्यास नही होयत छैन हुनका नीरास होयके जरूरत नही होयत छैन हाँ मगर प्रयास करैत रहैत ई हुनका लेल जरूरत अछि क्याकि ऐना नही केला सं गुरू के आज्ञा के उलंघना होयत छैन , जे मालिक क बरदास्त नही होयत छैन
जिनका अभ्यास नही बनल छैन हुनका लेल जरूरी अछि की ओ ककरो से जरूर प्रेम करैथ , लेकिन प्रेम एहन होय जाही में काम-वासना या स्वार्थ बिलकुल नै होय और ई प्रेम - प्यार गुरू के प्रति भ जाय त सबसे निक बात अछि , अन्य था ककरो से निस्वार्थ रूप से प्रेम क सकैत छि } हां अगर अहा गुरु के परम तत्व मणिके प्रेम करब त सोना पे सुहागा बाली बात कहाबत सावित भ जायत अछी अगर निस्वार्थ प्रेम भाब नहि बैन पबैत अछी त कूनू व्यक्ति के प्राप्ति समर्पण क दियो या ककरो सरण में चली जाऊ अगर इ समर्पण गुरु के प्रति भ जय त अति उतम अन्य -अन्य के प्रति समर्पण भेनाय कूनू बरई नहि , मुदा समर्पण एहन होय जहि में सबटा अंहकार पिघैल क पैन जेका बहि जाय , क्याकि मालिक के और नोकर के सुरत (नेचर ) के विच में अहंकारे टा एगो मोट पर्दा अछि जे एक दोसर से मिलान नही हूव देत अछि
जखन ककरो ई विस्वास भ जायत छैक जे हमर इस्ट हरदम अंग - संग में रहैत अछि त हुनका जिनगी में कहियो गलत काज और नही हुनका से कुन्नु संसारिक या परम्परिक काज कहियो नही रुकी सकैत अछि अभ्यास बनल या बनेला से जीवन के कर्म से और किछ अपने ही पराबंध कर्म से प्रभवित होयत रहैत अछि लेकिन लगातार प्रयास करैत रहला सं मन एक दिन कबू में आवी जायत अछि और अपन ई प्रयास जीवन के मूल खता में लिखल जायत अछि , भले ही ओ चंचल मन से क्याक नही होय
कियो ई नही समझू की गृहस्था जीवन में रहला से अभ्यास नही होयत छैक , गृहस्थ में रहिके मन सदिखन बेकाबू में रहैत छैक और ओही से छुट करा पाबाई के एक मात्र साधन अछि सन्यास , ई धारणा गलत अछि क्याकि एक त संतमत के गुरु गृहस्थी रूप भेल छैथि , क्याकि गृहस्ती में एक दोसर पर उपकार करैय के जतेक अवसर भेटैत छैक ओ एगो सन्यासी के नही मिलैत उल्टे सन्यासी त स्वम् अपन आबस्य्कता के लेल गृहस्थ पर निर्भर रहैत छैथ, तेसर सन्यासी क असली मतलब संत में न्यास केनाय या संत में रहनाय, लेकिन असली सत्य त
एकटा अछि ओ अछि मालिक के कुल में लाय भेनाय जे ब्यक्ति हरदम अपन इस्ट के चिंतन - मग्न ध्यान में लागल रहैत छैथि ओहय सच्चा सन्यासी भेला , भलेही ओ कुनौ नाम के जाप करैत या नही , सत्य धर्म जरूर करैत और ओही धर्म के पालन करैत -
ईहा आत्मिक संतुस्ट कहल जायत अछि ,

प्रेम से कहु जाय मैथिल जाय मिथिला

जगदम्बा ठाकुर
पट्टीटोल , भैरव स्थान , झांझरपुर, मधुबनी , बिहार
ई मेल - madanjagdamba@rediffmail.com
mo -9312460150

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नताशा 12 (चित्र-श्रृंखला पढ़बाक लेल नीचाँक चित्रकेँ क्लिक करू आ आनन्द उठाऊ।)

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रविवार, 14 जून 2009

गजल- आशीष अनचिन्हार


एना जे धड़ के नेड़ा बैसल छी
जिनगीक अर्थ के हेड़ा बैसल छी

नहि होइन्ह अन्हार हुनक कोबर मे
तँए अपन करेज जरा बैसल छी

उराहल इनारक पानि सँ कब्ज होइए
गंगोजल के सड़ा बैसल छी

भेटबे करत केओ ने केओ कहिओ
एही उम्मेद पर अपना के जिया बैसल छी

करोट फेरब के परिवर्तन कहल जाइए
जखन की आत्मे के सुता बैसल छी

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शनिवार, 13 जून 2009

नताशा 11 (चित्र-श्रृंखला पढ़बाक लेल नीचाँक चित्रकेँ क्लिक करू आ आनन्द उठाऊ।)

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बृहस्पतिवार, 11 जून 2009

बिन्नी क फोटोग्राफी ( जून अंक )

स्नो फाल बल्तिमोरे , मेरीलैंड ( ०४/०५/०९)



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बुधवार, 10 जून 2009

मन्दाकिनी- प्रभास कुमार चौधरी

सुतली रातिमे गर्द मचल छलै।
बरबज्जी ट्रेनक पुक्की गामक लोक सुनने छलै, तकर कनियेँ कालक बाद रातुक निस्तब्धताकेँ चीरि पिहकारी आ ठहक्काक स्वर सभ चारू कात पसरऽ लगलै। ओही गर्दमगोल पर मनोजक निन्न टूटि गेलै।
बीच आँगनमे चैकी पर चितंग पड़ल छल। गुमार बेसी छलै। आँगनमे राखल चैकिये पर माइ बिछौन करबा देने छलै। गुमारक द्वारे सभक बिछौन आँगनेमे लागल छलै। आँगनक मड़बाक उतरबारी कात ओकर चैकी छलै जकर पौथान लग राखल चैकी पर ओकर माइक संग दीयर आ सुधा सूतल छलै-ओकरासँ छोट बहिनक बेटा-बेटी। मड़बाक पुबारी कात राखल चैकी पर प्रदीप सूतल छलै। पाँच भाइमे ओएह टा गाम रहै छै आ गामेसँ कॉलेज जाइत छै। छोटकी बहिन मुन्नीक बिछौन पुबारी घरक पछबरिया ओसारा पर छै आ मड़बाक माँटि पर निभेर सूतल छलै ओकर चरबाह गेनमा। उतरबरिया घरमे काका रहै छथिन, जकर पछबरिया अलंग झड़ि गेल छै। आ मात्रा एकटा कोठली फूसक कहुना ठाढ़ छै। दछिनबरिया घरक तीन कोठलीमे भाइक परिवार रहै छनि।
आँगनमे इजोरिया छिड़िया गेल छै। मनोज जखन आँगन आएल छल, नीक जकाँ अन्हरिया जमकल रहै। सभ सूति रहल छलै। खाली माइ जागल छलै, मुदा ओंघाइत एकटा चैकी पर बैसल छलै। थारी परसैत कहलकै-बड़ राति भऽ गेलौ। कतऽ छलऽ अन्हारमे?
माइक ओइ बात पर ओकर मोन पाछाँ... बहुत पाछाँ उधिआए लगलै। छोट... बहुत छोट होइत चल गेल ओ। अधिक काल साँझ पड़लो पर आँगन घुरबामे देरी भऽ जाइक। मुदा, गामक जइ कोनो आँगनमे रहए आ चाहे जतबा अबेर होइ, आँगन दिस जएबा लेले जखन बिदा होबऽ लागए... लालटेम नेने चरबाह ठाढ़ रहै। ओकरा देखि अनेरो मनोजक मोन लोहछि जाइ। चरवाह ओकर मोनक बात जेना बुझि जाइ।-हमरा पर किए बिगड़ै छी बौआ? मालिक नइं मानलनि। कहलनि-ताकि लबहुन जतऽ होथि। अन्हारमे कोना घुरताह?
आ, तामसें मुँह धुआँ कएने जखन मनोज अपन घर दिस विदा होअए, दरबज्जे पर लालटेम नेने टहलैत भेटि जाथिन दादा(पिता)। हुनका देखि ओकर क्रोध आर बढ़ि जाइ। दादा ओकर मोनक बात नइं जानि कोना बुझि जाथिन-अनेरो तमसैलासँ की हेतऽ? समय पर नइं घूरि सकैत छऽ तऽ कम सँ कम टाॅर्च लऽ कऽ जा। सेहो नइं होइ छऽ तऽ कहि कऽ जा जे कोन आँगनमे रहबऽ? घरे-घर ताकऽ तऽ नइं पड़तैक एना।
अही घरे-घर तकनी पर ओकर मोन लोहछि जाइ। जेना ओ कोनो दुध-पिब्बा नेन्ना रहए। प्रात भेला पर ओकर तामस आर बढ़ि जाइ। जेम्हरे जाए, सभ पूछऽ लगै-राति कहाँ चल गेल रही मनोज! चरवाह हमरो आँगन ताकऽ लेल आएल रहौ।
मुदा मनोज कतबो तमसाए, दादाक व्यवस्थामे कोनो अन्तर नइं होइत छलनि। साँझक बाद गामक कोनो आँगनमे रहए वा धार पार पेठिया-बजारमे अँटकि जाए, जखने विदा होइत छल लालटेम नेने चरबाह ठाढ़ रहै छलै। आ, अपन दलान लग दोसर लालटेम नेने दादा टहलैत रहै छलखिन। माइक बात पर मनोजकेँ ओ पुरना बात मोन पड़ि गेलै। आब ने ओ गाममे रहै अछि, ने घरे-घर क्यो लालटेम नेने ठाढ़ रहै छै। दलान-दरबज्जा सुन्न रहै छै। दादा नइं छथिन आब। ओकर संग ओकर छोटका भाइ सभ सेहो बाहरे रहै छै, गाममे रहै छै-माइ, एकटा छोट भाइ, एकटा छोट बहिन आ भागिन-भगिनी...
आइ दिनेमे गाम पहुँचल छल। दलान सुन्ने छलै। आँगनमे पैसि गेल छल। भनसा घरमे व्यस्त माइ देखिते दौड़ि कऽ आँगन आएल छलै आ हाथ पकड़ि शम्भूनाथकेँ भगवतीक घर लऽ गेल छलै। ओकरा खाली हाथ प्रणाम करैत देखि ओकर आँजुरमे किछु फूल आ दूटा टाका राखि देने छलै। भगवतीक बाद माइकेँ प्रणाम कऽ आँगन आएल ता उतरबरिया घरसँ काका बहार भेलखिन-कखन अएलऽ? ने कोनो समाद, ने चिट्ठी। कुशल-क्षेम कि ने!
ओ पैर छूबैत कहलकनि-आॅफिसक काजसँ दरभंगा आएल रही। एक दिन लेल गामो चल अएलहुँ।
-एक्के दिन लेल?-काकाक स्वर उदास भऽ गेलनि-एतुक्का हाल तऽ देखिते छी। पचहत्तरि बरखक बूढ़ आ जीर्ण रोगी। आब ई बबासीर एक्को क्षण चैन नइं लेबऽ दैत अछि।-एतबा कहि ओ शोणितसँ भीजल धोती देखबऽ लगलखिन।
ताबत माइ पछबरिया ओसारा पर बिछौन कऽ देने छलै। चैकी पर आबि कऽ जहिना बैसल, गेनमा पंखा हौंकऽ लगलै। कनेटा हाथपंखा। ओकरा फेर एकटा पुरना गप्प मोन पड़लै। दादाक व्यवस्था आ हुनकर नियम। जहिना शहरसँ क्यो आएल कि बड़का पंखा लऽ गेनमाक पित्ती टुनमा ठाढ़ भऽ जाइत छलै। अढ़ाइ हाथक डण्टा लागल बड़का पंखा! टुनमाक हाथ तैयो लगातार चलैत छलै-घण्टो।
पछबरिया घरक ओसारा परक चैकी पर जखन चाह पीबि, आ जलखै कऽ पड़ि रहल, बहुत रास पुरना बात मोन पड़लैक। भाइ गाममे नइं छलखिन। दक्षिणबरिया घर जा भौजीकेँ प्रणाम कऽ अएलनि। धीया-पूता सभ स्कूल-कॉलेज चल गेल छलै। माइ भनसाघरमे भानस-भातमे व्यस्त छलै। असगर चैकी पर पड़ल ओकर मोन बौआइत रहलै।
आँगनक सभटा चीज चीन्हल, मुदा तैयो नवे सन लगै। ओना, नव होएबाक सती सभ चीज पुरनाए गेल छलै आँगनमे। पछबरिया कोठे टा नव छलै, जकर ओसारा पर राखल चैकी पर ओ पड़ल छल। मुदा, ओकरो दुनू कोठली आ सौंसे ओसारामे एखनो माँटिए-माँटि छलै। कोठली ओसाराक संग भनसाघरकेँ सेहो सीमेन्ट करबा देबाक दादाक बड़ इच्छा रहनि, आ ओहू सँ पैघ इच्छा रहनि पछबरिया घरक कोठा पर चढ़बा लेल सीढ़ी बना देबाक। माइ कहियो काल दाबल स्वरेँ बजैत छै-एतबो नै पार लगैत छऽ तोरा सभकेँ। अपना नइं काज छऽ, मुदा बापक आत्माकेँ शान्ति भेटतह, हुनको लेल तऽ एतबा करबा लैह। ओ एकसर एतेक कऽ गेलखुन, तोरो लोकनि तँ पाँच छऽ...
सत्ते, ओकरा बुते किछुओ कहाँ सम्भव भेल छै? पछबरिया घरक सीढ़ी आ सीमेन्टक कोन कथा, पुबारि घरक मरम्मति पर्यन्त पार नइं लागल छै। चारू कोठली बरसातमे पोखरि बनि जाइत छै-एक्को बुन्न बाहर नइं। ओहो पक्के देबाल छै, मुदा छतमे टीन पाटल छै।
दादा सभ वर्ष ओकर नट-बोल्ट बदलि, पोलटिस लगबा दैत छलखिन... बीच-बीचमे कोनो चदरा बदलबा दैत छलखिन। आब वर्षक वर्ष भऽ जाइत छै। पुबारि घरक उतरबरिया आ दछिनबरिया कोठलीक देबाल वर्षाक पानिसँ अलगि गेल छै। देबाल टेढ़ भऽ गेल छै, कहियो खसि सकैत छै! दुनू बिचला कोठलीक आसमानी रंगक देबाल पर पानिक टघारसँ विचित्रा-विचित्रा रेखाकृति बनि गेल छै। पुबारी कातक ओसारा जे दलानक काज करैत छै, एकदम बदरंग भेल छै। किरमिची रंग धोखड़ि गेल छै आ फर्श परक सिमटी ठाम-ठाम उखड़ि गेल छै।
मुदा, माइ आब एकर सभक चर्चा नइं करैत छै ओकर गाम अएला पर। पहिने करैत छलै। ओइ चर्चा पर ओ उत्साहित भऽ सभटा बजट बना लैत छल। सीढ़ीक बजट, सिमटीक बजट, मरम्मतिक बजट। फेर गामसँ चल जाइत छल। अगिला बेर फेर बजट बनैत छलै। मुदा आब ओकर चर्चा नइं होइत छै। माइकेँ दोसरे चिन्ता छै-जेहो खेत बाँचल छऽ, परतिए रहतह। तोरा लोकनि देखबह नइं, तऽ हम आँगनसँ कतेक की देखबइ! एकटा बड़दसँ कतहु खेती भेलै अछि? भाँजवला बड़ झँझट करैत अछि। गाममे पाइयो देला पर आब हऽर लेल क्यो बड़द नइं दैत छै। दाउन करबा लेल बड़द नइं होइत छै। सभ झरबा लैत अछि बोझाकेँ।
माइक इहो बात कैक बेर सुनने छल मनोज आ ओकरो बजट बनल छलै। तकर बाद तीन खेप गाम आएल अछि। ने माइ चर्चा करैत छै, ने ओ मुँह खोलैत अछि।
पछबरिया घरक ओसारा पर पड़ल-पड़ल मनोज इएह सभ सोचि रहल छल। माइ एक बेर आरो चाह दऽ गेलै। ओ तैयो ओहिना पड़ल छल। दोसर बेर भनसे घरसँ माइ टोकलकै-एना पड़ल किए छऽ! नहा-सोना कऽ गामक लोक सभसँ भेट कऽ आबऽ।
तैयो ओ ओहिना पड़ल रहल। नहएला-खएलाक बादो बिछौने पर पड़ल रहल। किम्हरो जएबाक इच्छा नइं भेलै खएला-पीलाक बादो। माइयो आबि कऽ ओही ओसारा पर पटिया बिछा बैसि गेलै। ओकरा ओहिना पड़ल देखि पुछलकै-नोकरक कोनो इन्तजाम भेलऽ की नइं।
ओ मूड़ी डोला देलकै। माइ चिन्तित होइत कहलकै-तखन तऽ बड़ झँझट होइत हेतनि। चिलकाउर छथि, दुनू नेन्ना छोट छनि। ऊपरसँ एतेकटा परिवारक भानस-भात। ऐ गाममे तऽ आब आगि लागल छै। क्यो छोटका लोक बाते नइं सुनैत अछि। क्यो तैयारो भेल जएबाक लेल तऽ ओकर पट्टीक मालिक झट बहका दैत छथिन-खबरदार जौं गेलें। बसबें हमर जमीनमे आ काज आन पट्टीक। एहन-एहन पट्टीदार सभ छथुन। तोहर पट्टी तऽ सफाचट छऽ। लोके कम्म, ओ जेहो छऽ से बाहर जाइ लेल तैयार नइं। गाममे भुखले रहत, मुदा बाहर नीक-निकुत नइं जुड़तैक। एकटा तैयार भेल छथुन। छथि तऽ ब्राह्मणे, मुदा भानसक संग अइंठ-कूठ सेहो करऽ लेल तैयार छथि। पछिलो बेर तोरा कहने रहिअऽ।
-ककरा दऽ कहै छें?-मनोज मोन पाड़ैत पुछलकै।
-ओएह, मन्दाक बेटा...।
मनोजकेँ मोन पड़ि गेलै। पछिला बेर माइ चर्चा कएने छलै। मन्दाक नाम सुनि ओ चैंकल छल। मन्दाकिनी ओकरे गामक छलै, ओकर संग खेलाएल छलै। ओकरा बेटाक नाम सुनि ओकरा आश्चर्य भेल छलै-मन्दाक बेटा किऐक भनसीयाक काज करतै! ओकर वर तऽ कलकत्तामे कमाइत छै। सासुरोमे खेत-पथार छै।
माइ कने घृणासँ कहलकै-सभटा अपन चालि आ कर्म। वर छोड़ि देने छै, घरोसँ निकालि देने छै। चारिटा धीया-पूता छै। वर्ष दिनसँ बापक लग पड़ल अछि। गरीब बाप-माइ अपने बेटा सभ पर आश्रित छै। चारि गोटेक पेट कोना भरतैक? दुनू जेठका मजूरी करैत छै-अपनो ढहनाएल फिरैत अछि, चालि सुधरै तखन ने?
सूनि कऽ आश्चर्य आ दुःख भेलै। मन्दा ओकरासँ जेठ छल वयसमे। कनियाँ-वरक खेलमे कहियो काल ओ ओकरो कनियाँ बनैत छल। ओना बेसी काल ओकर कनियाँ बनैत छल मोना। ओ जेहने सुन्नरि छल, तेहने शान्त। कनियाँ बनि खपटाक बासन सभमे काँच बालु आ तरकारीक बतिया सभ राखि ओकरा लेल भानस करैत छल आ फेर स्कूलक कोठलीक माटिमे ओकर कनियाँ बनि चुपचाप ओकरा संग सूति रहै छल।
मन्दा सुन्दर नइं छल। रंग ओकर कारी नइं, तऽ गोरो नइं छलै। केश भुल्ल छलै जकरा कतबो तेल-कूड़ दैत छलै, भुल्ले रहै छलै। आँखि छोट-छोट छलै, मुदा शैतानीसँ नचैत। ने बेसी दुब्बर, ने मोट। चालि फुर्तिगर छलै, हरदम बुझाइ जेना पड़ाएल जाइत होअए। गाल फूलल-फूलल आ लाल पातर ठोर रहै, जकरा अधिक काल ओ बिचकाबैत रहै छल। ओ जहिया ओकर कनियाँ बनैक, अकच्छ करऽ लगै। जाहि कोठलीमे सभ कनियाँ-वर पड़ल रहै, ततऽ नइं सुतैक। कहियो कोनो झोंझमे, तऽ कहियो कोनो कोनटामे लऽ जाइ आ बुझनुक जकाँ बजैक-वर-कनियाँ कतौ सभक सामने सुतलैक अछि संगे!
मुदा संग सुतैत देरी ओ तंग करऽ लगैक-एना कल्ल-बल्ल की पड़ल छें! वर-कनियाँ एना नइं पड़ल रहै छै चुपचाप।
-तऽ गप्प करऽ ने कोनो! मोना तऽ कतेक रास गप्प करैत अछि।
-ओ बकलेल अछि। वर-कनियाँ खाली गप्पे करैत रहि जाएत तऽ बिआह कथी लेल करत, संगे किऐ सुतत?-मन्दा बुझनुक जकाँ बजैक।
-तऽ तोहीं कह, वर-कनियाँ की करैत छै!
झिक्का-झोरी होबऽ लगै। कहुना अपन पैण्ट सम्हारैत ओ उठि कऽ पड़ाए तऽ मन्दा खूब हँसैक-लाज होइ छै मौगाकेँ।
पड़ाइत मनोजकेँ मोना भेटैक तऽ मुँह कनौन आ आँखिमे नोर-हम नइं बनबैक कमलेशक कनियाँ! नंगरियाबऽ लगै अछि। ओकर कनियाँ मन्दा बनतैक। हम तोरे कनियाँ बनबौक।
मुदा बीच-बीचमे मन्दा शैतानी करैक आ मोनाकेँ कमलेश लग पठा दै आ अपने मनोजक संग लागि जाइ-हम एकरे कनियाँ बनबै, मौगाकेँ लाज होइत छै।
आ, एकसर होइत देरी ओ झट पैण्ट खोलि, फ्रॉक उनटि लैक आ मनोज लंक लऽ कऽ पड़ाए।
मुदा, ओही फ्रॉक उनटाबऽवाली मन्दाक जखन विवाह भेलै, चारिटा मौगी टांगि कऽ कोबर घर लऽ गेलै आ सभक नूआ चिरी-चोंत कऽ देलकै आ मुँह-कान नछोड़ि लेलकै।
आ, ओहि मन्दाकेँ वर घरसँ निकालि देलकै आ बेटा मजूरी करैत छै, से सुनि ओइ दिन मनोज स्तब्ध रहि गेल छल। माइकेँ तत्काल कोनो जवाब नइं दऽ सकल छल। साँझ खन मन्दा अपने आएलि छलै। माइ कोम्हरो गेल छल। मन्दा लग आबि ठाढ़ि रहलै, कहला पर बैसलै नइं। एकटा फाटल नूआमे सौंसे देह झाँपल। दोसर कोनो वस्त्रा नइं। आंगियो नइं। शरीर सुखाएल, आँखिक नीचाँ कारी छाँह आ ठोरो करिआएल। मनोजकेँ मोन पड़लै जे मन्दाक ठोर कतेक पातर आ लाल रहै। ओकरा एकटक देखैत देखि मन्दा कहलकै-की देखै छें एना! अनचिन्हार लगै छियौ हम?
-नइं... से बात नइं! देखै छलियौ जे तोहर ई हाल किऐ भेलौ? केहन तऽ सुखी छलें अपन घरमे!
मन्दा हँसलकै-से तों कोना जानऽ गेलें जे सुखी रही। विवाहक बाद की पहिनो घुरि कऽ कहियो पुछलें जें कोना छें मन्दा? नेनामे पैण्ट खोलि दैत छलियौ, ताहि डरेँ जे पड़ाइत छलें, से डर भरिसक लगले रहि गेलौ।
मनोजकेँ लाज भेलै। मन्दा ठीके कहैत छै। ओकरा नइं जानि मन्दासँ किऐ बाजि नइं होइत छलै। मन्दा जखन कने पैघो भेलै, ओकर चारू कात घण्टो बौआइत रहै छलै। पोखरिक जाहि घाट पर ओ नहाइत छल, ठीक ओकरे नहएबाक समय सभ दिन ओ पानिमे पैसि घण्टो चुभकैत रहै छलै। मनोज हेलि कऽ जाठि लगसँ भऽ आबए, मुदा ओ ओहिना छाती भरि पानिमे डूबल घण्टो ठाढ़ि रहै। जाहि आँगनमे ओकर ताश-कौड़ीक अड्डा जमए, मन्दा ओही ठाम भेटि जाइ। मुदा वर-कनियाँक खेलमे जे ओकरासँ डेराएल, से डेराएले रहल मनोज।
मन्दा ओही बात पर हँसी कएलकै आ मनोजकेँ लाज भेलै। अपनाकेँ स्वभाविक बनएबाक चेष्टा करैत कहलकै-से बात नइं छलै मन्दा। तोहर हाल तऽ बुझिते छलियौ, जा धरि गाममे रही। आब तऽ अपने गाम अनचिन्हार भेल जाइए। कहियो काल अबै छी। मुदा तोरा दऽ सुनि कऽ बड़ दुख भेल। मिसरक मति एना किऐ खराब भेलनि? एहि वयसमे, धीया-पूताक संग किऐ त्यागि देलखुन तोरा? झगड़ा भेल छलौ?
मन्दा फेर हँसलै-संग रहिते कहिया छलौं जे झगड़ा होइत? ओ कलकत्ता, हम गाम। कहियो काल वर्षमे एक बेर, पाँच-सात दिन आबि जाइत छलाह। झगड़ो करबाक बेर कहाँ भेटेत छल?
-तखन की भेलौ?-मनोजक प्रश्न पर ओ फेर हँसल, गामक लोक एखन धरि नइं कहने छौ? सभकेँ बूझल छै। जकरेसँ पुछबही, सएह कहि देतौ-हम कुलटा छी, किदन छी। एही कलंकक संग घरसँ विदा कएने छथि। मुदा हम तऽ कहियो नइं कहने रहिअनि जे पतिवरता आ सदवरता छी।
मनोजकेँ अवाक देखि ओ आगू बाजलि-तोरा कहबामे लाज नइं! तोरा लगमे नेन्नेमे अपन फ्रॉक उघारि लैत रही आ तों पड़ा जाइत रहें। सभ पुरुष तोरे सन नइं होइत अछि। जहिया गामक सभ स्त्राीगण उठा कऽ हमरा कोबरामे ठेलि देने छल, तोहर मिसरकेँ बड़ हड़बड़ी भऽ गेल रहनि। जहिया कहियो वर्ष दू वर्ष पर गाम अबैत छलाह, एक्के क्रियाक हड़बड़ी रहै छलनि। तकर बादे किछु।
मनोज रोकैत कहलकै-तऽ एहिमे कोन हर्ज छलै! स्वामीक अधिकार छलै ओ। एहिमे घरसँ निकालबाक कोन बात भेलै?
मन्दा फेर हँसलि-बात तकरे बाद भेलै। ओ सटल रहि पाँच-सात दिनमे चल जाइत छलाह। आँगनमे एकसर हम स्त्राीगण! ने सासु, ने ननदि। कतेक बेर कहलिअनि-हमरो कलकत्ता लऽ चलू, मुदा नइं लऽ गेलाह। लऽ कोना जैतथि? बापक माथ पर भार छलिअनि। कहुना छुट्टी पौलनि। जमाइ अनलनि मूर्ख, आॅफिसमे दरबान। घर रहनि तखन ने लऽ जैतथि कलकत्ता! मास-दू मास पर मनीआर्डर पठा निश्चिन्त भऽ जाइत छलाह।
मनोज फेर टोकलकै-ई तऽ भेलै नौकरीक विवशता। टाका तऽ पठा दैत छलखुन, तखन फेर की भेलौ?
मन्दाक हँसी आर बढ़ि गेलै-तखने तऽ असली बात भेलै। सुन्न आँगनमे एकसर मौगीक खोज-खबरि लेबऽवला, सहानुभूति देखाबऽवलाक संख्या बढ़ैत गेलै। पहिने अएलाह एकटा पितिऔत देयोर। भौजी-भौजी करैत एक दिन नइं छोड़लनि। फेर परकि गेला। हमहूँ परकि गेलहुँ। मुदा हुनका रोकलकनि अपने स्त्राी। तखन आएल गामक सम्बन्धे एकटा जाउत। काकी-काकी करैत ओहो ओहने...।
मनोज बीचमे रोकि देलकै-आ तोरा नीक लगैत गेलौ, परिकल गेलें। तखन तऽ वाजिबे निकालि देलखुन तोरा। कोनो पुरुष सैह करैत!
ओकर आँखि क्रोधसँ भभकि उठलै-ठीके कहै छें! सभ पुरुष एहिना करैत अछि। ओकरा दूरि कऽ किम्हरो चलि दैत अछि, आ मौगी एकसर ओकर बाट देखौ, अपनाकेँ झाँपि-तोपि कऽ राखौ। हमहूँ झाँपि-तोपि कऽ रहै रही। मुदा चारू कातसँ हाथ लपकल। मुदा से उघार होएबा लेल तऽ नइं निकललहु ँ ओइ घरसँ। निकलल छी ओइ घरमे पच्चीस वर्ष बिता कऽ, जखन हमरा संग रहबाक इच्छा तोहर मिसरकेँ नइं होइत छनि। ओ एकटा नव राखि नेने छथि, कलकत्तेमे। कमाइयो बढ़ि गेल छनि। आब हमर काज नइं छनि। चालीसक वयस पार भेलाक बाद, पन्द्रह वर्षक बेटाक माइ बनलाक बाद हम छिनारि बनि गेल छी। आब चारूमे कोनो सन्तान हुनकर नइं छनि, ओ ककरो बाप नइं छथिन। सभ अनजनुआक जनमल आ टूअर अछि। बड़काकेँ राखि लही तों, सभ काज कऽ देतौ। ने तऽ हमरे राखि ले, भानस-भात, टहल-टिकोरा सभ कऽ देबौक, तोहर नेन्नो सभकेँ खेला-खुआ कऽ पोसि देबौक।
मनोज कोनो उत्तर नइं दऽ सकलै। तावत माइ आबि गेलै। ओ माइयोकेँ एक बेर फेर विनती कएलकै आ चल गेल। माइ ओकर जाइते पुछलक-की कहैत छलऽ तोरा?
-ओएह अप्पन बेटाकेँ, चाहे अपने राखऽ दऽ कहैत छल। भानस-भात, टहल-टिकोरा सभ गछैत छल।
माइ एकदम्म निषेध कएलकै-एहन काज किन्नहु ने करिहऽ! बेटाकेँ रखबह तऽ राखि लैह। मुदा अपना नइं। प्रमोद लऽ गेल छलखिन अपना संग धनबाद। भारी काण्ड मचि गेलनि। बड़का अड्डा बनि गेलनि डेरा। कनियाँसँ नित्य झगड़ा होबऽ लगलनि। हारि कऽ पठा देलखिन।
आ अइ बेर गाम अएला पर माइ फेर कहलकै-ओ जाएब गछैत छथि, ओएह मन्दाक बेटा।
माइकेँ तखनो कोनो जवाब नइं दऽ सकलै। साँझ धरि ओहिना पछबरिया घरक पुबरिया ओसारा पर पड़ल रहल। धीया-पूता सभ स्कूलसँ घुरि गोड़ लगलकै।
आँगनसँ बाहर आएल तखन अन्हार नइं भेल रहै। उतरबरिया घरक दरबज्जा पर काकाक संग लाल काका बैसल छलखिन। गोड़ लगलखिन तऽ आशीर्वाद दैत कहलखिन-अखन रहबऽ ने!
-नइं काका। काल्हिए चल जाएब। छुट्टी नइं अछि।
मनोजक जवाब पर लाल काका पैघ साँस लैत कहलखिन-नीके करैत छऽ। ई गाम आब रहबा जोगर छऽहो नइं! हमरा लोकनि बूढ़-अथवल, जकरा कोनो उपाय नइं अछि, पड़ल रहै छी। लऽ चलऽ हमरो सभकेँ! दू साँझ खएबह आ धीया-पूताकेँ खेलबैत पड़ल रहबह। किताब-पत्रिका जमा कऽ दिहऽ पढ़ैत पड़ल रहब।
मनोज हँसैत कहलकनि-तऽ चलू ने लाल काका! अहाँ तऽ सब बेर एहिना कहैत छी, मुदा माया छोड़ैत अछि? अबितो छी कहियो काल, तऽ दोसरे दिनसँ मोनमे हल्दिली पैसि जाइत अछि-गाममे कोना की हैत! पड़ा अबै छी लगले।
लाल काका ओहिना पैघ साँस लैत कहलखिन-ठीके कहै छऽ हौ! कहाँ छोड़ैत अछि माया? ई गाम रहबा जोगरक अछि आब? नर्कसँ बत्तर। ने सभ्यता, ने शिष्टाचार। नवका छौंड़ा सभक उद्दण्डताक कथे कोन, बुढ़बो लोकनिक आचरण देखि दंग रहै छी। इएह, मोन नइं लगैत अछि तऽ भाइ लग आबि बैसैत छी। आर कतहु जाइ छी हम! देयर आर ब्रोथेल्स इन योर भिलेज नाउ!
लाल काकाक बात पर मनोज चैंकल नइं छल। ओकरा पछिलो बेर ई बात सुनल छलै। उतरबारि भीड़ पर घरे-घर रातिकेँ अड्डा जमैत छै। सेठ मुरली मिसरकेँ सभ घर नोत होइत छनि। अही गाममे रहै छथि आब मुरली। अपन घर नइं जाइत छथि। भोला झाक विधवा बेटी हुनका स्वामी मानि नेने छथिन, गामो मानि नेने छनि, मुदा खाली भोला झाक बेटीसँ सेठ मुरलीक मोन नइं भरैत छनि। टोलक सभ घरमे हुनकर अड्डा जमैत छनि। गामक नीक-नीक लोक ओइ बैसारमे शामिल होइत छथि। लाल काकाकेँ बर्दाश्त नइं होइत छनि।
मुदा, गामक लोककेँ सभटा रुचैत छै! बूढ़ सभक संग छौंड़ो सभ ओइ बैसार सभमे हुलकी दैत अछि। सभ भोरका ट्रेनसँ दरभंगा जाइत अछि कॉलेज, आ कहियो सतबज्जी, तऽ कहियो बरबज्जी गाड़ीसँ गाम अबैत अछि। छुट्टी आ शानि-रविकेँ गामेमे हल्ला-गुल्ला कएलक, पिहकारी मारलक आ राति-विराति चोर-चाहर आ छिनरपन कएलक! कथूक लेहाज नइं छै। लाल काका पछिलो बेर कहने छलखिन।
ओकरा कोम्हरो जएबाक मोन नइं भेलै। बेसी ठाम एहने गप्प, ने तऽ गोलैसी आ पाटा-पाटीक गप्प! ओ सोझे लाइब्रेरी दिस गेल। ओतऽ साँझसँ ब्रिजक खेलाड़ी सभ जुटैत अछि! पेट्रोमेक्स जरा कए, ने तऽ लालटेमो लेसि कऽ ओहो बाजी पर बाजी खेलाइत चल गेल।
जखन घुरल, सौंसे गाम निसबद छलै। आँगनोमे कोनो सुगबुगी नइं। खाली एकसरे जागलि माइ ओंघाइत बैसल छलै! परसि कऽ थारी आगूमे दैत कहलकै-बड़ अबेर भेलऽ। कतऽ चल गेल छलऽ अन्हारमे?
आ, ओकरा बहुत रास बात मोन पड़लै। दादा मोन पड़लै आ मोन पड़लै आँगने-आँगन लालटेम लऽ कऽ तकैत अपन चरवाह। ओही स्मृतिमे भोतिआएल आँखि लागि गेलै।
बरबज्जी टेªनक पुक्कीक किछुए कालक बाद गाममे कचबच-कचबच होबऽ लगलै। ओकर निन्न नीक जकाँ टूटि गेलै। बीच आँगनमे चैकी पर चितंग पड़ल छल। ऊठि कऽ आवाजक अख्यास कएलक। बुझएलै जेना बहुत रास लोक पुबारी दिस आबि रहल होइ। ओ ऊठि कऽ आँगनसँ बाहर आएल।
भीड़ ओकरे दरबज्जा दिस आबि रहल छलै। बड़का ठहक्का लागि रहल छलै आ बीच-बीचमे पिहकारी। मनोजक उत्सुकता बढ़िते गेलै।
भीड़ लगले नइं पहुँचलै ओकर दलान पर। सभ आँगनमे गेलै आ अन्तमे ओकर दरबज्जा दिस बढ़लै। दृश्य देखि ओ अवाक रहि गेल।
दू टा छौंड़ा दुनू दिससँ मन्दाक बाँहि मोड़ि पकड़ने छलै। ओ ओकरा धकिया-धकिया आगू ठेलि रहल छलै। मन्दाक आँखिमे ने नोर छलै, ने याचना। एकटा विचित्रा सन पथराएल दृष्टि, जेना जे किछु भऽ रहल छलै, तकर कोनो ज्ञान नइं होइ ओकरा। कोना यंत्राचालित पुतला जकाँ भीड़क संग आगू ठेला रहल छल। छौंड़ा सभक संख्या गोड़ दसेक। तकरा पाछाँ किछु गामेक लोक भीड़क तमाशा देखबा लेल संग भेल।
मन्दाक हाथ मोड़ने ठाढ़ रमेश आ दीनूकेँ मनोज डँटलकै-छोड़ि दहक हाथ! एना क्यो स्त्रिागणक संग व्यवहार करैत अछि! लाज नइं होइत छौ तोरा लोकनिकेँ?
दुनू ओकर हाथ छोड़ि देलकै आ आर आगू आबि दीनू बाजल-हमरा सभकेँ किऐ लाज हैत? लाज तऽ एकरा हेबाक चाही। अपना संग गामक इज्जति बजारमे नीलाम करैत अछि। आइ हमरा सभकेँ सतबज्जी ट्रेन छूटि गेल। बरबज्जीक आसामे रही कि देखैत छी एकरा प्लेटफार्म पर एकटा मोछियल बुढ़बाक संग टहलैत। दुनू एकटा घरमे पैसल। हमहूँ सभ पछोड़ धऽ लेलिऐ। पकड़ि लेलिऐ ठामहि। ओतहिसँ सभकेँ कहैत आएल छिऐक। गामोमे घरे-घर सभ ठाम लऽ जा कऽ कहलिऐ। मुदा, देखू, एकरा। लाज छै कोनो गत्रामे? एक्को बुन्द नोर छै पश्चात्तापक कतहु?
सत्ते, से नइं छलै कतहु! मुदा जे छलै से देख्ेिा मनोज डेरा गेल। ओ सर्द... भावनाहीन आँखि दिस देखैत ओ सिहरि गेल। तैयो साहस कऽ कहलकै-किऐ करै छें एना मन्दा? तोरा कनियो लाज नइं होइ छौ सत्ते?
ओकर बात पर मन्दाक स्थिर आँखिक पुतली कने हिललै! सोझे मनोजक आँखिमे तकैत कहलकै-सत्त कहियौ! ठीके हमरा कनियो लाज नइं होइए। ओ तऽ कहिया ने मरि गेल। मरि गेल देहक भूख! सभटा सुखा गेल। मुदा पेटक भूख नइं मरल। ओ अखनो लगैत अछि। तखन ई देखबाक फुरसति कहाँ रहै अछि जे बुढ़बा मोछियल अछि कि निमुच्छा छौंड़ा? नइं होइ छौ विश्वास तोरा? हम करा देबौ विश्वास तोरा, लाज हमरा कनियो नइं होइत अछि। एही छौंड़ा सभमे देख ने! बेसी हमर बड़कासँ कनिये छोट पैघ हैत! मुदा हमरा एकरो सभक संग लाज नइं। भूख हमरा अखनो लागल अछि। पाइ आ अन्न हमरा चाही। जकरासँ ई हमरा भेटत, तकर नाम-धाम, मुँह-कान नइं देखैत छिऐ हम। ठाम-कुठामक ध्यान नइं रहै अछि। हमरा लेल बन्न कोठली आ गामक एहि बाटमे कोनो अन्तर नइं। आबि जो, जकरा मोन होउ!
आ, सभकेँ आश्चर्यसँ विस्मित करैत मन्दा ओही ठाम माँटि पर चित्ते पड़ि रहलि। बहादुर छौंड़ा सभ भागऽ लागल। भागि गेल! मुदा मन्दा ओहिना पड़लि छल, सुन्न अकाशक नीचाँ, गामक सड़क पर छिड़िआएल इजोरियामे ओ चितंग पड़लि छल! निर्विकार! ओकर आँखिमे कोनो भाव नइं छलै! ने वासना, ने आमंत्राण, ने कातर-याचना। सम्पूर्ण भावविहीन छलै ओकर आकृति आ आँखिक पुतली स्थिर छलै-ऊपर आकाश दिस उठल।
मनोजक मोन कोनादन कऽ उठलै। ठेहुनियाँ दऽ ओकर मुँह लग बैसैत कहलकै-उठ मन्दा! झाँपि ले अपन देह! सभ पड़ा गेलौ, खाली हमही टा छियौ।
मन्दाकेँ जेना होश भेलै! स्थिर पुतली हिलऽ लगलै आ नइं जानि कहाँसँ बाढ़ि आबि गेलै ओइमे? अपन देह झँपैत उठि बैसल। मनोजक आँखिमे नोर देखि हँसबाक चेष्टा करैत कहलकै-तों कोना ठाढ़े रहि गेलैं रौ? तों तऽ हमरा एना देखि कऽ नेन्नोमे पड़ा जाइत छलैं।
मनोज कोनो जवाब नइं देलकै! कने काल दुनू आमने-सामने ठाढ़ छल-निःशब्द! तखन मनोज कहलकै-तों अपन आँगन जो मन्दा! भोरमे बड़काकेँ पठा दियहि। अपना संग पटना लऽ जएबै।

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ताराकांत झाकेँ 2008 क साहित्य अकादमी मैथिली अनुवाद पुरस्कार



श्री ताराकान्त झाकेँ २००८ केर साहित्य अकादेमी मैथिली अनुवाद पुरस्कार "संरचनावाद उत्तर-संरचनावाद एवं प्राच्य काव्यशास्त्र"-गोपीचन्द नारंग, उर्दूसँ मैथिली अनुवादपर प्रदान कएल गेल छन्हि।

श्री ताराकान्त झा पत्रकारितासँ जुड़ल छथि। पत्र-पत्रिकामे निबन्धक अतिरिक्त बंगलासँ हिन्दी आ बंग्लासँ मैथिलीमे एकाधिक पोथी प्रकाशित भेल छन्हि।

श्री ताराकान्त झा संप्रति मैथिली दैनिक "मिथिला समाद"क सम्पादक छथि।


साहित्य अकादेमी मैथिली अनुवाद पुरस्कार

१९९२- शैलेन्द्र मोहन झा (शरतचन्द्र व्यक्ति आ कलाकार-सुबोधचन्द्र सेन, अंग्रेजी)
१९९३- गोविन्द झा (नेपाली साहित्यक इतिहास- कुमार प्रधान, अंग्रेजी)
१९९४- रामदेव झा (सगाइ- राजिन्दर सिंह बेदी, उर्दू)
१९९५- सुरेन्द्र झा “सुमन” (रवीन्द्र नाटकावली- रवीन्द्रनाथ टैगोर, बांग्ला)
१९९६- फजलुर रहमान हासमी (अबुलकलाम आजाद- अब्दुलकवी देसनवी, उर्दू)
१९९७- नवीन चौधरी (माटि मंगल- शिवराम कारंत, कन्नड़)
१९९८- चन्द्रनाथ मिश्र “अमर” (परशुरामक बीछल बेरायल कथा- राजशेखर बसु, बांग्ला)
१९९९- मुरारी मधुसूदन ठाकुर (आरोग्य निकेतन- ताराशंकर बंदोपाध्याय, बांग्ला)
२०००- डॉ. अमरेश पाठक, (तमस- भीष्म साहनी, हिन्दी)
२००१- सुरेश्वर झा (अन्तरिक्षमे विस्फोट- जयन्त विष्णु नार्लीकर, मराठी)
२००२- डॉ. प्रबोध नारायण सिंह (पतझड़क स्वर- कुर्तुल ऐन हैदर, उर्दू)
२००३- उपेन्द दोषी (कथा कहिनी- मनोज दास, उड़िया)
२००४- डॉ. प्रफुल्ल कुमार सिंह “मौन” (प्रेमचन्द की कहानी-प्रेमचन्द, हिन्दी)
२००५- डॉ. योगानन्द झा (बिहारक लोककथा- पी.सी.राय चौधरी, अंग्रेजी)
२००६- राजनन्द झा (कालबेला- समरेश मजुमदार, बांग्ला)
२००७- अनन्त बिहारी लाल दास “इन्दु” (युद्ध आ योद्धा-अगम सिंह गिरि, नेपाली)
२००८- ताराकान्त झा (संरचनावाद उत्तर-संरचनावाद एवं प्राच्य काव्यशास्त्र-गोपीचन्द नारंग, उर्दू)

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मंगलवार, 9 जून 2009

समीक्षा श्रृंखला 8 - गजेन्द्र ठाकुरक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पर डॉ. उदय नारायण सिंह नचिकेता

गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डमे विभाजित कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एकहि संग कठिनसँ कठिन विषयपर सुचिन्तित विश्लेषण भेटत आ उपन्यासक जटिल कथा केर गुत्थी सेहो भेटत सुलझाएल आ संगहि प्रेमक कविता आ प्रकृतिक गीत सेहो। सात खण्ड एहि प्रकार छन्हि-

खण्ड-१ प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना
खण्ड-२ उपन्यास-(सहस्रबाढ़नि)
खण्ड-३ पद्य-संग्रह-(सहस्त्राब्दीक चौपड़पर)
खण्ड-४ कथा-गल्प संग्रह (गल्प गुच्छ)
खण्ड-५ नाटक-(संकर्षण)
खण्ड-६ महाकाव्य- (१. त्वञ्चाहञ्च आ २. असञ्जाति मन )
खण्ड-७ बालमंडली किशोर-जगत

सभसँ महत्वपूर्ण बात ई जे सभ विषयक पाठकक आ पाठिकाक लेल एतए किछु ने किछु भेटबे करत । पुछलियन्हि जे एहन संरचना किएक तँ जे किछु कहलन्हि ताहिसँ लागल जे ई हिन्दी केर तार-सप्तक आ तमिलक कुरुक्षेत्रम् केर बीच मे कतहु अपन जगह बनेबाक प्रयास कऽ रहल छथि । फराक एतबे जे हिन्दी आ तमिल मे कएक गोटे मिलि कए संकलित भेल छथि एकटा जिल्दमे, आ एतए कएक लेखकक द्वारा विभिन्न विधा केर रचना नहि रहि हिनके अपन रचना पोथीमे उपलब्ध कराओल गेल अछि ।


कतेको पंक्ति भरिसक पाठकक मोनमे ग्रंथित-मुद्रित भऽ जएतन्हि, जेना कि


“ढहैत भावनाक देबाल
खाम्ह अदृढ़ताक ठाढ़

आकांक्षाक बखारी अछि भरल
प्रतीक बनि ठाढ़
घरमे राखल हिमाल-लकड़ीक मन्दिर आकि
ओसारापर राखल तुलसीक गाछ
प्रतीक सहृदयताक मात्र”
अथवा , निम्नोक्त पंक्ति-येकेँ लऽ लिअ :

“सुनैत शून्यक दृश्य
प्रकृतिक कैनवासक
हहाइत समुद्रक चित्र

अन्हार खोहक चित्रकलाक पात्रक शब्द
क्यो देखत नहि हमर ई चित्र अन्हार मे
तँ सुनबो तँ करत पात्रक आकांक्षाक स्वर”

मिथिलेक नहि अपितु भारतक कतेको संस्कृतिक प्रभाव देखल जा सकैछ हिनक कथा-कवितामे। एहिसँ मैथिली क्रियाशील रचनाक परिदृश्य आर बढ़ि जाइछ, आ नव-नव चित्र, ध्वनि आ कथानक सामने आबि जाइत अछि ।

कवि कोन मन्दाकिनी केर खोजमे छथि जे कहैत छथि-

“मन्दाकिनी जे आकाश मध्य
देखल आइ पृथ्वीक ऊपर...”


अपन विशाल भ्रमणक छाप लगैछ रचनामे नीक जकाँ प्रतीत होइत अछि । आ आर एकटा बात स्पष्ट अछि कोषकार गजेन्द्र ठाकुर आ रचनाकार गजेन्द्र ठाकुर भिन्न व्यक्ति छथि, व्यक्तित्वमे सेहो फराक... जतए कोशकारितामे सम्पादकत्व तथा टेक्नोलोजी –सँ सम्बन्धित व्यक्तिक छाया भेटिते अछि, मुदा सृजनक मुहुर्तमे से सभटा हेरा जाइत छथि ।

एहिमे सँ कतेको टेक्स्ट ओ रखने छथि इन्टरनेटमे मैथिलीक बढ़ैत
पाठककेँ ध्यानमे राखि, जेना कि विदेह-सदेह अछि http://videha123.wordpress.com/ मे, आ देवनागरी आ तिरहुता दुन्नु लिपिमे । जे क्यो मिथिलाक्षरक प्रेमी छथि तनिका सब लेखेँ तँ ई विरल उपहारे रहत ।
अनेको रचनामे मात्र गोल-मटोल कथे नहि, राजनीतिक भाष्य सेहो लखा दैत अछि। ताहिमे हिनका कोनो हिचकिचाहटि नहि छन्हि। ओना देखल जाए तँ कुरुक्षेत्र क कतेको महारथी छलाह = प्रत्येक वीर-योद्धा अपन-अपन क्षेत्र आ विधाक प्रसिद्ध पारंगद व्यक्ति छलाह,–क्यो कतेको अक्षौहिणी सेनाक संचालनमे, तँ क्यो तीरन्दाजीमे, आदि आदि । सभ जनैत छलाह जे धर्म आ अधर्मक भेद की होइछ मुदा तैयो सभ क्यो जेना आसन्न विपर्यायक सामने निरुपाय भऽ गेल छलाह। आजुक सन्दर्भमे सेहो कथा मे तथा व्याख्यामे एहन परिस्थितिक झलक देखल जाइत अछि । सैह एहि महा-पाठ –क (मेटाटेक्सट) खूबी कहब। नहि तँ ओ कियेक लिखताह- –

“देखैत देशवासीकेँ पछाड़ैत
मंत्र-तंत्रयुक्त दुपहरियामे जागल
गुनधुनी बला स्वप्न
बनैत अछि सभसँ तीव्र धावक
अखरहाक सभसँ फुर्तिगर पहलमान
दमसाइत मालिकक स्वर तोड़ैत छैक ओकर एकान्त

कारिख चित्रित रातिक निन्न
टुटैत-अबैत-टुटैत निन्न आ स्वप्नक तारतम्य
...”


एहि महापाठकेँ एकटा एक्सपेरीमेन्ट केर रूपमे देखी तँ सेहो ठीक , आ सप्तर्षि-मंडलक निचोड़ अथवा सप्त-काण्डमे विभाजित आधुनिक महा काव्य रूपमे देखी तँ सेहो ठीक हएत। जेना पढ़ी , सामग्री एहिमे भरपूर अछि, भरिसक किछु अत्युच्च मानक लागत , आ किछु किनको तत्तेक नहि पसिन्न पड़तन्हि । मुदा एहि ग्रन्थ निचयकेँ पाठक अवश्य स्वागत करताह , आ नवीन लेखक वर्गकेँ एकटा नव दिशा सेहो भेटतन्हि।



मैसूर, ९ जून २००९ उदय नारायण सिंह “नचिकेता”
निदेशक,
भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर

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रविवार, 7 जून 2009

एक विलक्षण प्रतिभा जिनका हम सदिखन याद करैत छी ( एग्यारहम कड़ी )

बोमडिला पहुँचलहुं तs साँझ भs गेल छलैक। जीप सs उतरि कs माँ हमरा सब के लs आगू बढि गेलिह आ बाबुजी सामान सब उतरवाबय लगलाह। हम जहिना सीढी पर चढि ऊपर अयलहुं, लकडी के घर सब देखाई परय लागल। बाहर सs सब घर देखय मे एकहि जेना बुझि परैत छलैक। सब घरक छत हरियर, मुदा दू घर सs बेसी एक समतल जमीन पर नजरि नहि आयल। ऊपर आ नीचा सब ठाम जएबाक लेल सीढी बनल रहैक।ऊपर नीचा करैत हम सब अपन घर पहुँचि गेलहुँ।

हम सब ततेक थाकल रही जे चाय आ जलखई केलाक बाद कखैन्ह नींद आबि गेल, हम नहि बुझलियैक। माँ के बोली पर हमर नींद खुजल। माँ कहि रहल छलथि " उठु नय भोजन केलाक बाद फेर सुति रहब"। उठलहुँ तs, मुदा जारक चलते हमरा भोजनो करबाक मोन नहि भs रहल छलs।माँ हमरा बिछोना सs उतरय लेल मना कs देलथि आ हमर भोजन बिछाओन लग मँगा देलिह। भोजनक बाद हम कोहुना उठि कs हाथ धोए लेल बिछाओन सs उतर कs गेलहुँ।

हमर आँखि खुजल तs माँ बाबुजी आ एक आओर व्यक्ति के अपना सोझा मे देखि हम हरबरा कs उठय लगलहुँ। माँ कहलिह "किछु नहि भेल अछि परल रहू। असल में अहाँ हाथ धोअय लेल गेलहुँ तs ओहि ठाम बेहोश भs खसि परल रही। की भेल छलs? डॉक्टर साहेब कहैत छथि ऊंचाई के चलते भेलैक अछि। एके बेर ओतेक नीचा सs ८ हजार फीट पर पहुँचि गेलहुँ ताहि केर असर छैक आओर किछु नहि"। तखैन्ह हमरा याद आयल जे हमरा चक्कर जेना बुझायल छलs आओर किछु याद नहि छलs। डॉक्टर इ कहि चलि गेलाह जे आराम करू भोर तक एकदम ठीक भs जायत।

बेर बेर उठि मुदा बुझाइत छल एखैन्ह भोर नहि भेलैक आ फेर सुति जाइत छलहुँ। मोन मे आयल जे घड़ी देखि लेत छी। जओं घड़ी दिस नजरि गेल तs आठ बाजैत छलs, हरबरा कs उठलहुँ आ बाहर दिस निकलि गेलहुँ। राति मे एक तs ठंडा आ ताहि पर ततेक थाकल रही जे घर मे घुसलाक बाद बाहर निकलबाक हिम्मत नहि भेल। बाहर आबितहि बुझि गेलहुँ जे हमरा कियाक होयत छलs जे भोर नहि भेलैक अछि। धुंध तेहेन छलैक जे अपन घर छोरि कs सामने वाला घर सेहो नहि देखाइत छलs। किछुए कालक बाद बौआ सेहो बाहर पहुँचि गेलाह। धुंध बेसी काल नहि रहलैक आ हटैत के सँग प्राकृतिक रूप साफ साफ देखाई परय लगलैक।किछु काल तक ठाढ़ भs हम प्रकृतिक ओहि रूप के देखैत रहि गेलहुँ। जतय तक नजरि गेल, सब घरक सोंझा मे सुंदर सुंदर फूल नजरि आयल जे देखि मोन प्रसन्न भs गेल। हम ठाढ़ भs देखैत छलहुँ कि अचानक एक झुंड लड़ाकू विमान (mig) बुझायल जेना हमर घरक ठीक पाछू सs निकलल अछि आ आसमान मे एम्हर सs ओम्हर करय लागल। ओ कखनहु बुझाइत छलs आब खसि परतैक मुदा फेर तुंरत ऊपर आबि जायत छलs। ओहि विमानक झुंड देखैत देरी हम दुनु भाई बहिन अपन बरामदा सs उतरि जओं पाछू गेलहुँ तs पहाड़ के सुन्दरता देखि किछु काल ओहि ठाम ठाढ़ रहि गेलहुँ। बुझाइत छल जेना पहाड़ घरक ठीक पाछू मे अछि। हम आ बौआ घरक चारू कात घुमि घुमि कs सब वस्तु देखय लगलहुँ। एक सs एक सुंदर फूल घरक सामने आ कात वाला फुलवारी मे लागल छलैक।फूलक रंग आ आकर देखि हम आश्चर्य चकित रही गेलहुँ।

बाबुजी ऑफिस जएबाक लेल बाहर अयलाह त हम दुनु भाई बहिन बाहर छलहुँ। ओ बतेलाह जे बोमडिला मे बहुत सैनिक छैक, मुदा ओ सब नजरि नहि आयत कियाक तs सब बंकर(bunkar) मे रहैत छैक। अहि ठाम भारतीय सेनाक जेट,(jet) मिग(mig) आ सब तरहक लडाकू विमान देखय भेटत। सैनिक सब बराबरि अपन अभ्यास करैत रहैत छैक। भारत चीनक बोर्डर सेहो बोमडिला सs लग १४ हजार फीटक ऊंचाई पर एकटा जगह छैक सेलापास ताहि ठाम छैक। ओतय तs आओर बेसी ठंढा रहैत छैक।

जुलाई, अगस्त मास मे एतेक जाड़ हम नहि देखने रहियैक। एक तs अहि ठाम हमरा आ बौआ दुनु गोटे के मोन नहि लागैत छलs ताहि पर जाड। हम आ बौआ सब दिन सोचैत छलहुँ घुमय लेल जायब मुदा जाड़क चलते नहि जायत छलहुँ। बाबुजिक ऑफिस घर सs बहुत नीचा रहैन्ह आ सीढी सs उतरय आ चढ़य परैत छलैन्ह जे १०० सs बेसी छलैक। एक दिन हम आ बौआ बिचारि कs स्वेटर पहिरि घुमैत घुमैत बाबुजी के ऑफिस देखय लेल गेलहुँ। जाइत काल मे उतरय के छलैक, ओ तs बड नीक लागल आ दुनु गोटे सीढ़ी पर कूदैत कूदैत उतरि गेलहुँ। चढ़ैत काल दुनु गोटे के हालत ख़राब भs गेल। आपस अयलाक बाद बौआ कहलाह "ठाकुर जी अओताह तs हम हुनका अवश्य बाबुजी के ऑफिस लs जयबैन्ह"।

अन्नू आ छोटू तs बहुत छोट छलथि, सोनी आ बिन्नी दिन मे स्कूल चल जाइत छलिह, बौआ आ हम दुनु गोटे बेसी घर मे रहैत छलहुँ। साँझ मे बाबुजी अयलाह, हम सब बैसि कs बोखारी लग चाह पिबति रहि आ गप्प सप्प होयत छलैक। गप्प के बीच मे माँ बाबुजी सs कहलिह "मुन्नी बौआ के कतहु कतहु घुमा दियौक नञ। इ सब कतहु नहि जायत छथि भरि दिन घर में रहैत छथि। दुनु गोटे के मोन नहि लागि रहल छैन्ह"। इ सुनतहि बाबुजी कहलाह"बुझाइत अछि आब हमर बदली जल्दिये भs जायत। आजु हम ठाकुर जी के लेल परमिट बनवा कs पठा देलियैन्ह आ जल्दिये आबय लेल लिखि देने छियैन्ह। हुनको आबि जाय दियौन्ह तs तीनू गोटे एकहि संग घूमि लेताह। बाद मे तs एहि ठाम आबय मे थोरेक झंझट छैक"। इ सुनी हमरा नीक लागल, सच मे हमरा मोन नहि लागि रहल छल।

जहिया सs बाबुजी कहलाह ओ हिनका लेल परमिट पठा देने रहथि ताहि दिन सs हम आ बौआ सब दिन हिनक बाट देखैत छलियैन्ह। बौआ सब दिन बैसि कs हमरा सs गप्प करैथ जे हिनका अयला पर हम सब कतय कतय घुमय लेल जायब। ओ सब पता कs कs राखने रहथि जे कोन कोन ठाम घुमय वाला छैक।

बोमडिला बड छोट जगह छलैक आ ओहि ठाम बाबुजी के ऑफिस(CPWD) केर लोक सब के छोरि किछु प्रशानक लोक आ केंद्रीय विद्यालय के किछु शिक्षक सब सेहो रहैत छलथि। माँ सब के किछु लोक के घर एनाई गेनाइ छलैन्ह हमरा अयला सs सांझ मे बराबरि कियो नहि कियो भेंट करय के लेल आबैत छलथि या नहि तs हमरा सब के लs कs माँ, बाबुजी भेंट कराबय लेल जायत छलथि।

बोमडिलाक मोसमक एकटा विशेषता देखय के लेल भेंटल। ओहि ठाम जोर सs पानी नहि परैत छलs मुदा भरि दिन झिसी होइत रहैत छलैक आ बीच बीच मे थोरे थोरे समय के लेल रोउद निकलैत रहैत छलैक। बाबुजी के ऑफिस केर एक गोटे भेंट करय लेल आयल छलथि आ हुनका सब के पानि के चलते जेबा मे देरी भs गेल छलैन्ह। हुनका सब के गेलाक बाद माँ जल्दी जल्दी सतमन(नौकर) सs खेनाई के व्यवस्था करवाबय मे लागि गेलिह। पूरा बोमडिला के लोक के पनबिजली (hydroelectricity) द्वारा बिजली भेटति छलैक आ राति के १२ बजे के बाद सs बत्ती नहि रहैत रहैक। माँ के प्रयास रहैत छलैन्ह जे १० बजे तक रतुका भोजन भs जाय, मुदा आजु किछु देरी भs गेल छलैक। माँ भोजनक व्यवस्था मे लागल छलिह। हम आ बौआ बिछाओन मे घुसि कs अपन गप्प करैत छलहुँ, बाकी चारु भाई बहिन सब खेलाइत रहथि आ खूब हल्ला करैत छलथि। बाबुजी अपन ऑफिसक काज करैत छलाह। अचानक बुझायल जेना कियो केबार खट खटा रहल छथि। सोनी बिन्नी बाहर वाला घर मे खेलाइत छलिह केबारक आवाज सुनी दुनु गोटे केबार खोलय लेल दौड़ गेलिह। केबार खोलैत के सँग ओहि ठाम सs ठाकुर जी ठाकुर जी करैत भागि कs भीतर आबि गेलिह। हिनक नाम सुनैत देरी माँ बाबुजी सब बाहर वाला घर दिस आबि जाय गेलथि।

हिनका अयला सs माँ आ सतमन के आओर काज बढि गेलैक। ओ सब जल्दी जल्दी आओर किछु किछु खेनाई मे बनाबय लगलथि। चाह पिलाक बाद माँ हिनका कहलथिन "इ जल्दी स तैयार भs जाओथ थाकल हेताह, भोजनक बाद गप्प करिहैथ"। कोहुना भोजन बिजली जाय सs पहिने भs गेलैक आ सब कियो सुतय लेल चलि गेलथि।

बौआ हम आ इ बैसि कs गप्प करैत छलहुँ। इ अपन यात्राक वर्णन करैत कहलाह "आइ तs हम बचि गेलहुँ। चारद्वार पहुँचि पता केलहुँ तs लोक सब सs पता चलल आब बोमडिला के लेल एकहि टा बस छैक जे बेसी राति मे पहुँचायत। दिन वाला बस के लेल चाराद्वर मे राति भरि रहय परत इ सोचि चलि देलहुं। एहेन खतरनाक आ भयावह सड़क पर बस ड्राईवर तेनाक चला कs आनलक अछि जे हमर तs प्राण उपरे छल। बोमडिला आबि कs सेहो नीचा मे दुकान लग छोरि देलक। ओहि ठाम एकटा लोक नजरि नहि आबैत छल। संयोग सs एक गोटे भेंट गेलाह जे बाबुजी के ऑफिस के छलाह। ओ हमरा झरना लग पहुँचा कs गेलाह। झरना के बाद ऊपर चढि पहुँच तs गेलहुँ घर तक, मुदा होयत छल एहि राति मे ग़लत घरक केबार नहि खट खटा दियैक। पहिने घर लग आबि किछु काल ठाढ़ भs कs भीतरक गप्प सुनबाक प्रयास कयलहुँ। हल्ला सs बुझि गेलहुँ यैह घर हेबाक चाहीं मुदा मोन आगु पाछु होयत छल केबार खट खटाबी कि नहि कि अचानक मैथिलि मे बाजय के आबाज आयल आ तुंरत हम केबार खट खटा देलहुं"। हिनकर गप्प सुनि बौआ खूब हँसलाह आ कहलाह "बिना खबरि केने अहाँ बोमडिला आयब तs अहिना होयत नञ"। राति बड भs गेल छलैक हम सब उठि सुतय लेल आबि गेलहुँ।

हम हिनका सs कहलियैन्ह अहाँ तs कालिदास भs गेलहुँ। इ हमरा दिस देखि हँसैत बजलाह "कि करितौंह अचानक अहाँ सs भेंट करबाक मोन भs गेल आ बिना किछु सोचनहि चलि देलहुं। राति मे मोन भेल आ भोरे तैयार भs हम निकलि गेलहुँ। हम स्टेशन के लेल निकलति रही ओहि समय मे हमरा बाबुजी के चिट्ठी भेंटल जाहि मे परमिट भेजने रहथि। परमिट के एतेक महत्व छैक हमरा से नहि बुझल छलs। ओ तs संजोगे सs हमरा परमिट भेंट गेल नहि तs बड दिक्कत होइत। टिकट से, स्टेशन पर आबि कs लेलहुँ ओहो संयोगे सs भेंटल"।

क्रमशः

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शनिवार, 6 जून 2009

नताशा 10 (चित्र-श्रृंखला पढ़बाक लेल नीचाँक चित्रकेँ क्लिक करू आ आनन्द उठाऊ।)

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सोमवार, 1 जून 2009

कथा- नबी बकस- गजेन्द्र ठाकुर

नबी बकस

“एकटा प्लम्बर, एकटा पेन्टर आ तीन टा जोन लागत। सात दिनमे घर चमका देब। अहाँक काजमे कमाइ नहि करबाक अछि हमरा। अहाँक अहिठाम एतेक रास लोक अबैत छथि, लोक देखत तँ पूछत ई काज के कएने अछि। तहीसँ हमरा चारि ठाम काज भेटि जाएत तेँ। अपन एरियाक लोक दिल्लीमे कतए पाबी”। नबी बकस नाम रहए ओकर।


“अपन एरियाक लोक छी, कतए घर अछि”?


“कटिहार। हम तँ कहब जे बाथरूम आ किचनक काज सेहो करबाइए लिअ”।


“अहाँ तँ पोचारा आ पेन्ट करैत छी, संगमे राजमिस्त्रीक काज सेहो करैत छी की”?


“हम नहि करैत छी मुदा हमर गौआँ ई काज करैत अछि। ओ कहैत रहए जे साहबसँ पुछू काजक लेल। ओना ओकर काज बड्ड ठोस होइत छैक। हम बजबैत छी, मात्र भेँट कऽ लियौक। नहि तँ हमरा कहत जे तूँ साहबसँ पुछनहिये नहि हेबहुन्ह”।


ओ मोबाइलपर फोन मिलेलक आ कोनो सर्फुद्दीनकेँ बजेलक।


सर्फुद्दीन किचेन बाथरूम सभक मुआएना केलक आ करणीसँ देबालपर मारलक तँ प्लास्टर झहरि कऽ खसि पड़लैक। नलक टोटीकेँ घुमेलक तँ ओ टूटि कऽ खसि पड़लैक। फेर ओ बाजल-


“सरकारी काज छियैक। नीव तँ मजगूत होइत छैक मुदा फिनिसिंग नहि होइत छैक। आ भइयो गेलए २० साल पुरान ई सभ। देखू एहि देबाल सभक हाल। सभटा अन्डरग्राउन्ड पाइप सभ सरि-गलि गेल अछि। तकरे लीकेजसँ देबाल सभक ई हाल अछि। सभटा पाइप बदलए पड़त से सीमेन्ट तँ झाड़इये पड़त। ओना सीमेन्टमे कोनो जान बाँचलो नहि छैक। तखन देबालमे पाथर सेहो लगबाइये लिअ। ई बम्बइया-मिस्त्री गणेशीसँ जे अहाँ बरन्डा रिपेयर करेने छलहुँ तकर बालु देखियौक कोना झड़ि रहल अछि। टेस्ट करए लेल एहि सीमेन्टकेँ हम झाड़ि कऽ नव सीमेन्ट लगबैत छी, पाथर नहि बनि जाए तँ कहब। तखन मोन हुअए तँ काज देब आ नहि तँ नहि देब”। से कहि ओ बरन्डाक किछु हिस्साक सीमेन्ट झाड़ि कऽ करिया सीमेन्ट लगा देलक आ चलि गेल।





“ई नबी बकसक छोट भाए छियैक। बड्ड काजुल। दिन भरि लागले रहैत अछि, नाम छियैक ओकील। नबी बकस तँ आब ठिकेदार भऽ गेल अछि, करणीकेँ हाथो कहाँ लगबैए। ओकील बुझु मजदूरी करैए अपन भाए लग। आ ठीकेदारक भाएक ओहदासँ आन मजदूर सभपर नजरि सेहो रखैए”।


फेर कनेक काल धर, ई जे प्लम्बर मिस्त्री रहए, खलील जकर नाम रहैक, से चुप रहल। ई हरियाणाक रहए आ बुझू जे नबी बकसकेँ हमरासँ भेँट करेनिहार ईएह रहए। एकटा छोट भङ्गठी करेबाक रहए ताहि द्वारे एकरा बजेने रही।


“दुनू गोटे नबी बकस आ सर्फुद्दीन संगे राज-मिस्त्री रहए। मुदा नबी-बकस लाइन बदलि लेलक। आ आब एक-दोसराकेँ काज दिअबैत रहैत अछि”।



फेर खलील हमरा दिस ताकि बाजल-


“अहाँ दिसका लोक सभमे बड्ड एकता होइत छैक”।


ओकील आ खलीलमे काजक बिचमे गप-शप होइत रहैत छलैक।


“हमरा सभक पुरखा मुसलमान बनबासँ पूर्व राजपूत रहथि मुदा ई सभ राजमिस्त्री रहए-धीमान, एखनो हरियाणामे होइत अछि”। खलील इशारासँ ओकील दिस देखैत हमरा सुना कए कहलक।


“हम सभ तँ धीमान छलहुँ मुदा तोरा सभ के छलँह से तोरा एतेक फरिछा कए कोना बुझल छौक”। बहुत कालसँ ओकील बिन बजने काज कए रहल छल। मुदा पहिल बेर ओकरा उत्तर दैत सुनलियैक। ओकर सभक बीच गप आ हँसी ठट्ठा चलैत रहैत छल।



हमर घरमे बरंडाक एकटा कोनक मरम्मतिसँ काज शुरु भेल रहए। खलीलकेँ कहलियैक तँ ओ एकटा गणेशी मिस्त्री, जकरा सभ बम्बइया कहैत रहए, केँ बजा कए काज करा देलक। फेर पोचारा बला आकि पेंटबला नबी बकसकेँ ई बजेलक। आब ई पोचारा-पेन्टबला नबी बकस ओहि सर्फुद्दीन राज-मिस्त्रीकेँ बजा लेने अछि। सर्फुद्दीन पाइप सभक काज खलील प्लम्बरकेँ दिआ देलक से खलीलकेँ बिन मँगने काज भेटि गेलैक। आ एक दोसराकेँ परिचय करबैत आब तँ लकड़ी बला आ बिजली मिस्त्री सेहो घरमे पैसि गेल चल।


एक दिन सर्फुद्दीन मुँह लटकेने आएल। कहलक जे गणेशीसँ झगड़ा भए गेल।


“से कोना”?


“कहैए जे तोँ साहेबक घरक काज हमरासँ छीनि लेलँह, इलाकाक लोकक नाम पर। बुझू अहाँ हमर काज देखि कऽ ने हमरा काज देने छलहुँ। आ ई तँ छोड़ू, ईहो कहैत रहए जे...”।


“की? कहू ने”।


“कहैत रहए जे मुसलमानपर कहियो विश्वास नहि करबाक चाही”।


हमर तँ तामसे देह लहरि गेल। कहलियैक जे तुरत ओकरा बजा कए आनू गऽ। मुदा ओ थोम्ह-थाम्ह लगा देलक। फेर बादमे एक दिन गणेशीकेँ बजा कए हम बुझा देलियैक।


“एहि महानगरमे हम आ सर्फुद्दीन एके भाषा बजैत छी, ई मात्र एकटा संजोग अछि। एकर काज देखियौक आ अपन काज देखू फेर अहाँकेँ बुझा पड़त जे सर्फुद्दीनसँ अहाँ किएक पाछाँ रहि जाइत छी”।



ओम्हर एक गोटे वूडेन फ्लोरिंग केर विचार देलक ताहिपर सर्फुद्दीन ओकरासँ झगड़ि गेल जे नीचाँ मे पाथरे नीक होएत, बाथरूम आ किचनमे पाथर अछि तँ सभ ठाम ईएह रहबाक चाही। रूममे किएक वूडेन फ्लोरिंग होएत? मुदा वूडेन फ्लोरिंग बला कहलक जे एक दिनमे लगा देब आ पाइयो सस्त कहलक से हम ओकरे हँ कहि देलियैक।



भरि दिन अनघोल होइत रहैत छल। नीचाँ फ्लोर बलाक बेटाक बारहम कक्षाक परीक्षा रहए से ओ जे राजमिस्त्री सभक आबाजाही देखलक तँ कहए लागल जे रूम सभमे तँ पाथर नहि लागत? हम कहलियन्हि जे नहि वूडेन फ्लोरिंग काल्हि कए जाएत तँ हुनका साँसमे साँस अएलन्हि।


”पाथर लगाबएमे तँ माससँ ऊपर ई सभ लगबितए, हमर बेटाक परीक्षा अछि, से हम तँ पाथर सभ पसरल देखि कए चिन्तित भए गेल रही”।


“नहि मात्र बाथरूम आ किचेन लेल ई पाथर सभ अछि”।






सर्फुद्दीन, खलील आ नबी बकससँ अबैत जाइत काजक अतिरिक्त घर-द्वारक गप सेहो होमए लागल। नबी बकस कटिहारसँ दिल्ली आएल , छह भैयारीमे सभसँ पैघ, एकटा बहिन सेहो रहैक। अपन हमशीरा(बहिन)क वर आ ओकर सासुरक विषयमे नबी बकस प्रेमपूर्वक सुनबैत रहैत छल। सर्फुद्दीनक शागिर्दीमे राज मिस्त्रीक काज सिखलक। आस्ते-आस्ते सभ भाँएकेँ दिल्ली बजा लेलक। ओकील तँ ओकरे संग रहैत छैक, आन भाए सभ बियाह करैत गेल आ अलग होइत गेल। मुदा ओहो सभ आसे-पासमे रहए जाइए। बियाह तँ ओकीलोक भेल छैक मुदा अछि ओ सुधंग। से आन भाए सभ कहैत-कहैत रहि गेलैक जे नबी बकस मँगनीमे खटबैत रहैत छौक, अलग भए जो गऽ मुदा ओ तँ भाएक भक्त अछि। भाएक सोझाँमे एको शब्द की बाजल होइत छैक?


एक दिन ओकीलकेँ बोखार भेल रहए आ दोसर भाए सभ ओकरा काजपर अएबासँ मना कएने रहैक। मुदा ओ नहि मानलक। ओकर सुधंगपना देखि हमर माँ, पत्नी, बच्चा सभ ओकरा खूब मानए लागल रहथि। ओहि दिन काजक बीचमे ओ खएबा लेल माँगलक आ बालकोनीमे सूति रहल। फेर बेरिया पहरसँ काज शुरू कएलक। साँझमे घर जएबाक बेरमे जखन हम कहलियैक जे डेरा जएबाक बेर भए गेल तँ कहलक जे नहि, आइ काज लेटसँ शुरू कएने रही से खतम कइये कऽ जाएब। आ आस्तेसँ बड़बड़ाइत बाजल जे देखैत छियैक जे आइ क्यो बजबए लेल आबैए आकि नहि।


आठ बजे करीब मोटरसाइकिलपर दू गोटे आएल। ओकील कहलक जे ई दुनू ओकर छोटका भाए सभ छैक। दुनू गोटे तेसर तल्ला स्थित हमर फ्लैटपर आएल आ ओकीलकें गप करबा लेल बजेलक। ओकर सभक गपमे आपकता मिश्रित क्रोध रहैक। ओकील ओकरा सभकेँ कहैत रहए जे ओहेन कोनो गप नहि छैक, आइ आधा दिन सुतल रहए तेँ सोचलक जे काज पूरा कइए कए जाइ। तावत नबी बकस सेहो ओतए पहुँचि गेल आ ओकीलकेँ लए गेल।


दोसर दिन नबी बकस भोरे-भोर आएल।


“देखियौक ई भाए सभ।...


“बेटा जेकाँ बुझलियैक एकरा सभकेँ आ हमरापर आरोप लगबैत अछि जे तूँ दू रंग करैत छह। तीनू भाँए काल्हि हमरासँ खूब झगड़ा करए गेल जे तोँ ओकीलकेँ नोकर जेकाँ रखैत छहक। बुझू! ई ओकील अछि सुधंग। कतबो कहैत छियैक जे नीकसँ कपड़ा लत्ता पहिर तँ ओहो झोलंगे जेकाँ रहैत अछि।


- काल्हि हमरा तँ ओकीलसँ भेँटो नहि अछि। सर्फुक काज दोसर साइटपर चलि रहल छैक, ओतहि गेल छलहुँ जे कोनो स्कीमसँ काज भेटि जइतए तँ अहाँक एहिठाम काज खतम भेलापर ओतहि लागि जएतहुँ। बिल्डर अंसल बलाक ऑफर आएल रहए जे हमरा एहिठाम आबि जाऊ मुदा भाए सभक द्वारे हम मना कए देलियैक। आ ई सभ.. ओना ई सभटा हमर पटना बला भाए मंडलक करतूत छी”।


“मंडल!!”, हमरा किछु पुरान गप मोन पड़ल।


- अहाँक गाममे एकटा जयशंकर सेहो छथि की”?


“हँ! हँ! अहाँ कोना चिन्हैत छियन्हि हिनका सभकेँ। ओना असली नाम तँ हमर भाएक सलीम छियैक। ऑफिसक नाम मंडल। घरक सलीम। सरकारी ड्राइवर अछि। घरमे सलीम कहने ओकर अहलिया (कनियाँ) घबड़ाइ छैक”।


“सभटा बुझल अछि हमरा”।


अपन विद्यार्थी जीवनक एकटा घटना मोन पड़ि गेल हमरा।


पटनामे पढ़ैत रही। पड़ोसमे एक गोटे जयशंकर रहैत छलाह। भाइ-भाइ कहैत छलियन्हि। दू बियाह। पहिल बियाहक हुनकर बेटा भागि गेल छलन्हि। ओना दोसर बियाह पहिल पत्नीक मुइलाक अनंतर भेल छलन्हि। किछु दिन दिल्ली-बम्बइ घुमि पहिल बियाहक ओ बेटा आपस अएलन्हि। सभ ओकरा पुछलकै जे की करमे? ओ कहलक जे सभ काज हमरासँ होएत मुदा पढ़ाइ छोड़ि कए। फेर सभ मिलि कए ओकरा ड्राइवरीक लाइनमे जएबाक लेल कहलक। ओकरो मोन रहैक ड्राइवरी सिखबाक। भोरे-भोर एक दिन जयशंकर कहलन्हि जे आइ एक ठाम चलबाक अछि।


“बेटा कहैत अछि जे ड्राइवरी सीखब। ड्राइविंग स्कूल बड्ड महग। एक गोटे गौआँ सलीम अछि ड्राइवर, सरकारी ऑफिसमे। गाममे एहि बेर छुट्टीमे भेटल रहए। ओकरो सभक ईद पाबनि छलए, से आएल रहए गाम। कहलक जे रवि दिन कऽ ओकरा छुट्टी होइत छैक ऑफिसमे आ आन दिन पाँच बजे भोरेसँ सिखा सकैत अछि। दू सए टाकामे एकटा सेकेंड हैंड साइकिल बेटाकेँ कीनि देने छियैक। ओकर डेरा ऑफिसे लग छैक। ऑफिस बजेने अछि, ओतहिसँ घर देखाओत”।


“ऑफिस देखल अछि?”

“हँ, कताक बेर गेल छी”।


ऑफिसक बेरमे हम सभ गाँधी मैदानक बगलक कचहरी सन ऑफिस पहुँचैत गेलहुँ।


“मं‍डलजी ड्राइवर साहेब छथि?” जयशंकर एक गोट हाकिमक ऑफिसक बाहर ठाढ़ चपरासीसँ पुछलन्हि।


“हँ , ओम्हर छथि”।


हम जयशंकरकेँ पुछलियन्हि जे हमरा सभ तँ सलीमसँ भेँट करबा लेल आएल छी, ई मंडल के छथि?


ओ इशारामे हमरा चुप रहए लेल कहलन्हि आ ईहो मुखर रूपमे कहलन्हि जे एहिमे कोनो बात छैक, बादमे कहताह।


आब जे मंडलजीसँ हुनका गप होमए लगलन्हि तँ बीच-बीचमे ओ सलीम भाइ, सलीम भाइ कहि हुनका सम्बोधन करैत रहलाह। फेर हुनका संगे हम सभ हुनकर डेरा पहुँचलहुँ। फेर बिदा होइत काल सलीम भाइ जयशंकरकेँ हमरा दिश इशारा करैत कहलन्हि जे हिनका कहि देलियन्हि ने। जयशंकर कहलखिन्ह जे कहि देबन्हि।



ओतए सँ निकललाक बाद जयशंकर कहलन्हि जे कटिहार लग जयशंकरक गाम छन्हि। मारते रास भाइ बहिन छैक सलीमक। सलीम हुनकर लंगोटिया यार, संगे पढ़लन्हि। फेर रोजगारक क्रममे दुनू गोटे दूर चलि गेलाह। सलीम कोनो हाकिमक घरपर काज करए लागल। ड्राइवरी कहिया कतए सँ ओ सीखि लेने छल, से हुनरबलाकेँ नोकरीक तँ ओहुना दिक्कत नहि होइत छैक। बादमे एकर स्वभाव देखि कए ओ हाकिम एकरा कोनो दोसर आदमी जकर नाम मं‍डल रहए, आ कतहु मरि-खपि गेल रहए, केर नामपर टेम्परोरी राखि लेलकैक। फेर किछु दिनमे ओ पर्मानेन्ट भए गेल।


जयशंकर हमरासँ कहलन्हि- एकर ऑफिसमे वा एकर संगी साथी लग- ओना अहाँसँ फेर कहिया एकर भेँट हेतए- एहि गपक धोखोसँ चरचा नहि करब। ओना पर्मानेन्ट भए गेल छैक मुदा लोक सभ केहन होइ छैक से नहि देखइ छियैक। क्यो किछु लिखि पढ़ि देतैक तँ मंगनीमे बेचारकेँ फेरा लागि जएतैक।




मोनमे घुमरल एहि गपकेँ नबी बकसकेँ हमारा कहलियैक। ताहिपर ओ बाजल-


“ओहो स्कीम धरेनिहार हमहीं छी। एकटा कम्प्लेन कऽ देबैक तँ जाहि नोकरीपर एतेक फुरफुरी छैक से घोसरि जएतैक। मुदा सोचैत छी जे ओकर नोकरी जएतैक ते हमरे माथपर आबि खसत। तेँ अल्ला पर सभटा छोड़ि देने छियैक”।


नबी बकस ओना तँ बड्ड व्यस्त रहैत छल मुदा ओहि दिन लागैए हमरे सँ गप करबा लेल समय निकालि कए आएल रहए। जखन लोक मानसिक फिरेशानीमे रहैत अछि तँ अपन दुखनामा दोसराकेँ सुनबए चाहैत अछि। मुदा तकर श्रोता भेटब मोश्किल। मुदा हम अपन मानवविज्ञानक कॉलेजिया पढ़ाइक प्रभावक कारण सभ काज छोड़ि अनायास श्रोता बनि जाइत छी से नबीकेँ बुझल रहैक। भदबरिया लधने छल से हमहूँ कतहु बाहर जएबाक हरबड़ीमे नहि छलहुँ। से ओ अपन खिस्सा ओ शुरु कएलक।


“कतेक कष्ट कटने छी से की बयान करू। आ मदति के सभ कएलक ? एकटा खालू-खाला (मौसा-मौसी) आ खलेरा भाए आ खलेरी बहिन मोन पड़ैए आर क्यो नहि। अब्बूक मरलाक बाद बड़ा अब्बू (बड़का काका), छोटा अब्बू (छोटका काका) सभ पराया भए गेल। शौहरक मरलाक बाद अम्मीक हालत की रहैक से ई सभ की बुझत-गमत?


-खाला दिल्लीमे रहैत रहथि। अम्मीक मृत्युक बाद हमर पढ़ाइ छुटि गेल। कटिहारमे पढ़ैत रहितहुँ, फूफीजाद भाए (पिसियौत) कहनहियो रहए जे तोरा जतेक पढ़बाक छौक पढ़, मुदा ई सभ तखन गाममे ईँटा उठबितए से हमरा देखल होइतए? आ ई गप एकरा सभकेँ हम बुझैयो नहि देने छियैक।




-आ ई सभ की कहैये जे हम अपन अहलिया (स्त्री) आ सारि-हमजुल्फ(सारि-साढ़ू)क पाछाँ एकरा सभपर ध्यान नहि दऽ रहल छियैक? दू रंग करैत छियैक?


-दिल्लीमे आएल रही गाम छोड़ि कए तँ पहिने नोएडामे पितरिया बर्त्तनक दोकानमे ब्रासोसँ बर्तन साफ करैत रही। अल्लाहक करमसँ सर्फू भेटि गेल। खालाजाद भाए (मौसेरा भाए) केर संगी रहए सर्फू। ओकरेसँ सभ ईलम सिखलहुँ। मुदा ई कहि दिअए जे हम कहियो ओकरा दगा देने होइयैक। सर्फूक स्वभाव तँ अहाँकेँ बुझले अछि। कनियो अन्याय आ बेइमानी ओकरा पसन्द नहि छैक, सभसँ बतकही भेल छैक, मुदा हमरासँ आइ धरि कोनो मोन मुटव्वल नहि भेल छैक। हमर से नीयत रहितए तँ ओकरो संग ने हमर संबंध टुटितए। आ एहि शहरमे ओ आन भए हमरा अप्पन बुझलक आ ई सभ। ओ तँ गौआँ छी, मुदा खलील? ओकरोसँ पुछियौक।


-माएक मोन पड़ि जाइए जहिया ई भदवरिया लाधैए। मोन नहि पाड़ए चाहैत छी, आ ताहि लेल व्यस्त रहैत छी। मुदा आइ माएक ओ मृत्यु रहि-रहि कोढ़ तोड़ि रहल अछि।


नबी बकसक कंठ कहैत-कहैत भरिया गेलैक। मुदा कनेक पानि पीबि फेर ओ माएक स्मरण करए लागल।


“नबी साहेबजादे, कनेक ओहि कठौतकेँ खुट्टाक लग कए दिऔक। बड्ड पानि चूबि रहल छैक ओतए। ई बादरकाल सभ साल दुःख दैत अछि। सोचिते रहि गेलहुँ जे घर छड़ायब। मुदा नहि भए सकल। घरोक कनी मरोमति कराएब आवश्यक छल, मुदा सेहो नहि भए सकल। ठाम-ठाम सोंगर लागल अछि। फूसोक घर कोनो घर होइत छैक? ठाम-ठाम चुबि रहल अछि, ओतेक कठौतो नहि अछि घरमे। खेनाइ कोना बनत से नहि जानि। ओसारापरक चूल्हिपर तँ पानिक मोट टघार खसि रहल अछि। एकटा आर अखड़ा चूल्हि अछि मुदा जे ओ टूटि जाएत, तखन तँ चूड़ा-गुड़ फाँकि कए काज चलबए पड़त। समय-साल एहेन छैक जे चूल्हि बनाएब तँ सुखेबे नहि करत। जाड़नि सेहो सभटा भीजि गेल अछि। भुस्सीपर खेनाइ बनाबए पड़त”।


पइढ़िया उजरा नुआक आँचर ओढ़ने, थरथराइत करीमा बेगम चौदह बरखक अपन बेटाक संग, कखनो सोंगरकेँ सोझ करथि तँ कखनो कठौतकेँ एतएसँ ओतए घुसकाबथि। जतए टघार कम लागन्हि ओतएसँ घुसकाकए, जतए बेशी लागन्हि ओतए दए दैत छलीह। सौँसे घर-पिच्छर भए गेल छल। कोनटा लग एक ठाम पानि नञि चूबि रहल छल। ततए जाए ठाढ़ भए गेलीह।


“कतेक रास खढ़ चरमे अनेर पड़ल छल। पढ़ुआ काकाकेँ कहलियन्हि नहि। घर छड़बा लेने रहितहुँ”।


“यौ बाबू। घर छड़एबाक लेल पुआर तँ भेटनिहार नहि। आ गरीब-मसोमातक घर खढ़सँ के छड़ाबए देत”।


हमरा खढ़सँ आ पुआरसँ घर छड़बयबामे होमयबला खरचाक अन्तर तहिया नहि बुझल छल।


“से तँ अम्मी, खढ़सँ छड़ाएल घरक शान तँ देखबा जोग होइत छैक। पढ़ुआ काकाक घर देखैत छियन्हि। देखएमे कतेक सुन्दर लगैत अछि आ केहनो बरखा होअए, एको ठोप पानि नहि चुबैत अछि”।


“से तँ सभसँ नीक घर होइत अछि कोठाबला”।


“एह, की कहैत छी? गिलेबासँ आ सुरखीसँ ईँटा जोड़ेने कोठाक घर भए जाइत अछि? आ नेङराक घर तँ सीमेन्टसँ जोड़ल छैक, मुदा परुकाँ ततेक चुबैत छल से पूछू नहि”।


“से?”


“हँ यै अम्मी। सभ बरख जौँ छड़बा दी, तँ ओहिसँ नीक कोनो घर होइत छैक?”


“चारिम बरख जे छड़बेने छलहुँ तकर बादो पहिल बरखामे खूब चुअल छल”।


“पहिलुके बरखामे चुअल छल ने आ फेर सभ तह अपन जगह धऽ लेने होएत। तखन नहि चुअल ने बादमे”।


“हँ, से तँ तकरा बाद तीन साल धरि नहि चुअल”।


तखने काकी बजैत अएलीह-


“जनमि कए ठाढ़ भेल अछि आ की सभ अहाँकेँ सिखा रहल अछि। कनेक उबेड़ जेकाँ भेलैक तँ सोचलहुँ जे बहिन-दाइक खोज पुछाड़ि कए आबी”।


बुन्नी रुकि गेल छल। नबी, काकाक घर दिस गेलाह आ दुनू दियादनीमे गप-शप शुरू भए गेल।


साँझक झलफली शुरू भेल, भदबरिया अन्हारक तँ काकी बहराइत कहैत गेलीह-


“बहिन दाइ, आगिक जरूरी पड़य तँ हमर घरसँ लए जाएब”।


“नञि बहिनदाइ। सलाइमे दू-तीन टा काठी छैक। मुदा मसुआ गेल छैक। हे, ई डिब्बी दैत छियन्हि, कनेककाल अपन चुल्हा लग राखि देथिन्ह तँ काजक जोगर भए जाएत। नबी दिआ पठा दिहथि”।


“देखिहथि। उपास नञि कऽ लिहथि से कहि दैत छियन्हि, बच्चा सभ तँ हमरा एहिठाम खा लेत”-दियादिनी कहैत बिदा भेलीह।


करीमा बेगम माने हमर माए ओसारापर खुट्टा भरे पीठ सटा बैसि गेलीह। तावत हमहूँ पहुँचलहुँ।


“की सोचि रहल छी अम्मी। कहू ने”।


“यैह फुसियाही गप सभ, अहाँक अब्बूक पहलमानीक। काका हुनका कहैत रहथिन्ह सैह।



-“खुट्टा पहलमान छथि ई”।


-“से नहि कहू काका। जबरदस्तीक मारि-पीटि हम नहि करैत छी, ताहि द्वारे ने अहाँ ई गप कहि रहल छी”।


-रहमान काका आ हुमायूँ भातिज। पित्ती-भातिजमे ओहिना गप होइत छलन्हि, जेना दोस्तियारीमे गप होइत छैक। अखराहामे जखन हुमायूँ सभकेँ बजाड़ि देथि तखन अन्तिममे रहमान हुनकासँ लड़य आबथि। काका कहियो हुनका नहि जीतए देलखिन्ह।


हुमायूँक कनियाँ माने हम नवे-नव घरमे आएल छलहुँ। कोहबर लहठी सभ होइत छलैक ओहि समयमे। आब ने जानि मुल्ला सभ किएक एकर विरोधी भए गेल अछि, तैयो लोक करिते अछि की। मुल्ला सभक गप जे मानए लागी सभ ठाम तखन तँ भेल!


आ एहि तरहक वातावरण घरमे देखलहुँ तँ मोन प्रसन्न भऽ गेल। घरक दुलारि छलहुँ आ सासुरो तेहने भेटि गेल। समय बीतए लागल। मुदा हुमायूँक विधवा एतेक जल्दी कहाय लागब से नहि बुझल छल तहिया। आब तँ सभ प्रकारक विशेषणक अभ्यास भऽ गेल अछि। झगड़ा-झाँटिक बीच क्यो ईहो कहि दैत अछि- वरखौकी, वरकेँ मारि डाइन सिखने अछि !


-हुमायूँक जिवैत जे सभक दुलारि छलहुँ तकर बाद सभक आँखिक काँट भए गेलहुँ। इद्दतक बाद नैहरसँ दोसर बियाह करएबा लेल सेहो भाए सभ आएल मुदा अहाँ सभक मुँह देखैत रहबाक इच्छा मात्र रहल।


नबी बकस बाजल-“उजरा नूआ, बिन चूड़ी-सिन्दूरक माएक वैधव्य बला चेहरा एखनो हमरा मोने अछि। फेर ओहि भदबरिया रातिमे माए आगाँ कहए लगलीह।

-“रहमान काका हमर पक्ष लए किछु बाजि देलखिन्ह एक बेर, तँ हमर सासु-ससुर कहए लगलखिन्ह जे हमर पुतोहुकेँ दूरि कए रहल छी। आ ईहो जे मुद्दीबा सभक अपना घरमे घटना हेतैक, तखन ने बुझए जाएत।


-“आब तँ ने रहमाने चाचू छथि आ ने सासु ससुर से मरल आदमीक की खिधांश करू। मुदा एकोट झूठ गप ई सभ नहि अछि।


-“लोक कहैत छैक जे सुखक दिन जल्दी बीति जाइत अछि, मुदा हमर दुखक दिन जल्दी बीतैत गेल, सुखक दिन तँ एखनो एक-संझू उपासमे खुजल आँखिसँ हम देखैत रहैत छी, खतमे नहि होइत अछि।


-“विधवा भेलाक अतिरिक्त आन घटनाक्रम अपन नियत समयसँ होइत रहल। हमर अब्बू-अम्मीक मृत्यु भेल, सास-ससुर आ पितिया ससुर रहमान कका तँ पहिनहिये गुजरि गेल छलाह।


-“घरमे जखन बँटबारा होमय लागल तखन सम्पत्तिक आ खेत-पथारक बखरा, चारि भैयारीमे मात्र तीन ठाम होमय लागल। हुमायूँक हिस्सा तीनू गोटे (जिबैत भैयारी सभ) बाँटि लेलन्हि। हम किछु कहलियन्हि जे हमर गुजर कोना होएत, छह टा बेटा आ एक टा बेटी अछि तँ हुमायूँक मृत्युक दोष हमरा माथपर दए हमर मुँह बन्न कए देल गेल।


-“ तीनू भाँएक मुँह हुमायूँक समक्ष खुजैत नहि छलन्हि मुदा हुनकर मृत्युक बाद हुनकर विधवाकेँ हिस्सा नहि देबऽ लेल तीनू भाँय सभ तरहक उपाय केलन्हि। हम नैहर जा कए अपन भायकेँ बजा कए अनलहुँ। पंचैती भेल आ फेर अँगनाक कातमे एकटा खोपड़ी अलगसँ तीनू भाँय बान्हि देलन्हि,


हमरा आ हमर बच्चा सभक लेल। धान, फसिल सभ सेहो जीवन निर्वाहक लेल देबाक निर्णय भेल। हम चरखा काटए लगलहुँ। से कपड़ा-लत्ता ओतएसँ तेना निकलि जाए।


“लिअ सलाइ”। दियादिनी आबि कहलन्हि।


“हँ”। भक टुटलन्हि करीमा बेगमक। दियादिनी सलाइ पकड़ाए चलि गेलीह।


“-एहि बेर बाढिक समाचार रहि रहि कए आबि रहल अछि। बाट घाट सभ जतए ततए डूमि रहल छलए, खेत सभ तँ पहिनहि डूमि गेल छलए। अहाँक पढ़ुआ काकी पहिनहिये सुना देने छथि जे एहि बेर वार्षिक खर्चामे कटौती होएत। काल्हि कहैत रहथि जे कनियाँ सभटा फसिल डूमि गेल, एहि बेर वार्षिक खरचामे कटौती हेतन्हि। हम कहलियन्हि जे एँ यै । जहिया फसिल नीक होइए तँ हमर खरचामे कहाँ कहियो बेशी धान दैत छलहुँ? ई गप अहाँक पढ़ुआ काका सुनि रहल छलाह। बजलाह-राँड़ तँ साँढ़ भए गेल। अहाँक पढ़ुआ काकीक इशारा केलापर ओ ससरि कए दलान दिशि बहरा गेलाह आ हम नोर सोंखि गेलहुँ। आइ गप निकलल तँ.......


माएक खिस्सा कहैत-कहैत नबी फेर रुकि गेल। आँखि आ कंठ दुनू संग छोड़ि रहल छलैक ओकर। किछु काल चुप रहि बाजल।

“ई खिस्सा भाए सभकेँ हम कहबो नहि कएने छियैक। सोचलहुँ जे कहबैक तँ मँगनीमे प्रतिशोध जगतैक। जे काज करबाक से नहि कएल होएतैक। आ सुनलियैक अछि जे हमर ओ मंडलबा भाए ओहि पढ़ुआ काकाक कहलमे आबि गेल अछि”।



नबी बकस फेर चुप रहल। भाए सभक प्रति ओकर प्रेम ओकरा सभक विषयमे बेशी बजबासँ ओकरा रोकैत छलैक। फेर ओ माएक खिस्सा शुरू कएलक।


“माए आगाँ बजैत रहलीह।


-“धुत्त दिनमे तँ खेनहिये छलहुँ, एहि अकल-बेरमे केना खेनाइ बनाएब। कनियाँ-मनियाँ छलहुँ तखने विधवा भऽ गेलहुँ आ अहू वयसमे तैँ सभ कनियाँ-काकी कहैत अछि। हुमायूँ कतेक मानैत छल अपन भाए सभकेँ। अपन पेट काटि भागलपुरमे राखि पढ़ओलन्हि छोटका भाइकेँ आ आब ओ पढ़ुआ बौआ एहेन गप कहैत छथि।


-“ सोचिते-सोचिते नोर भरि गेलन्हि माएक आँखिमे।


हमरा संग एकबेर हज करए लेल गेल रहथि। धन्य भारत सरकार जे हमरा सनक गरीब-गुरबाक माए सेहो हज कए आएल। आ अपन बड़की दियादिनीकेँ सुनबैत रहथि खिस्सा जे बहिनदाइ, ततेक भीड़ छलए ट्रेनमे, गुमार ततबे। गाड़ीमे बेशी मसोमाते सभ छलीह। एक गोटे कहैत छलीह जे जतेक कष्ट आइ भेल ततेक तँ जहिया राँड़ भेल छलहुँ तहियो नञि भेल छलए। हवाइ जहाजकेँ अम्मी गाड़ी कहैत छलीह।



-“फेर ओहि भदबरियाक रातिमे हमर अम्मी करीमा बेगमक मुँहपर बाड़ीक हहाइत पानि आ चारसँ टपटप चुबैत पानिक ठोपक आ घटाटोप अन्हारक बीच कनेक मुस्की आबि गेलन्हि। हमरा काकाक दलानपर जाए लेल कहलन्हि जतए आर भाए बहिन सभ छल।

-“ सोचिते-सोचिते खाटपर टघरि गेलीह करीमा बेगम, भोर होइत-होइत बारीक पानि बान्हपरसँ अँगना दिस आबि गेल।तीनू भैयारी अपन-अपन हिस्साक आंगन भरा लेने छलाह से सभटा पानि सहटि कऽ हमर सभक धसल आँगनसँ खोपड़ी दिस बढ़ि गेल। घरमे चारि आँगुर पानि भरि गेल। भोरमे किछु अबाज भेल आ जे उठैत छी तँ खाटक नीचाँ पानि भरल छल, एक-कोठी दोसर कोठीपर अपन अन्न-पानिक संग टूटि कऽ खसल छल। आब की हो, बड़की दियादनीक बेटा सभसँ पहिने आबि कऽ खोज पुछाड़ि केलकन्हि, अबाज दूर धरि गेल छलए। सभटा अन्न-पानि नाश भऽ गेलन्हि। अन्न पानि छलैन्हे कोन? दू-टा छोट-छोट कोठी, ओकरे खखरी-माटि मिलाऽ कऽ दढ़ करैत रहैत छलीह हमर आम्मी।


-“ मुदा भोर धरि ओ हहा कऽ खसल आ मसोमातक जे बरख भरिक बाँचल मासक खोरिस छल तकरा राइ-छित्ती कऽ देलक। करीमा बेगम सूप लऽ कऽ अन्नकेँ समटए लेल बढ़लीह, हमर आँखिक देखल अछि।


-“ मुदा बाढ़िक पानिक संग पाँकक एक तह आबि गेल छल घरमे। सौँसे टोल हल्ला भऽ गेल जे देखिऔ केहन भैंसुर दिअर सभ छै, अपना-अपनीकेँ अपन-अपन अँगना भरि लए गेल अछि। मसोमातक अँगना तँ अदहासँ बेशी धकिआ लऽ गेल छलैहे, जे बेचारीक बचल अँगना अछि से खधाई बनि गेल अछि। बड़की दियादिनी सहटि कऽ अएलीह कारण दिआद टोलक लोक सभ आबए लागल रहथि। करीमा बेगमक सोंगरपर ठाढ़ घरक दुर्दशा देखि सभ काना-फूसी करए लागल रहए। अँगनाक एक कोनसँ दोसर कोन, अपन घरसँ दोसराक घर!


-“पानि पैसबाक देरी रहैक आ आस्ते-आस्ते हमर घरक एक कातक भीतक देबाल ढहि गेल। टोलबैया सभ हल्ला करए लागल जे करीमा बेगम भितरे तँ नञि रहि गेलथि। बड़की दिआदिनी खसल घर देखि हदसि गेलीह। बजलीह जे अल्ला रक्ष रखलन्हि जे सुरता भेल आ नबीक भाइ-बहिनकेँ घर लए अनलियैक नहि तँ दियादी डाह नहि बुझल अछि। सभ कलंक लगबितए अखने।


-“मुदा दियादिनी!


-“दियाद सभ सभ गप बूझि अपन-अपन घर जाए गेलाह। हम अम्मी लग अएलहुँ। मार्क्सवादी विचारक रही, कटिहारमे पढ़ैत छलहुँ। विधवा-विवाह, जाति-प्रथा सभ बिन्दुपर पढ़ुआ काकासँ भिन्न विचार रखैत छलहुँ। घरक नाम नबी छल मुदा स्कूल कॉलेजक नाम नबी बकस। मुदा घरमे कोनो मोजर नहि छल, कहल जाइत रहए जे पहिने पढ़ि-लिखि कऽ किछु करू।


-“ अम्मीसँ कतेक गमछा-झोड़ा भेटैत छल, चरखाक सूतक कमाइक। जय गाँधी बाबा, विधवा लोकनि लेल ई काज धरि कऽ गेलाह।


-“गाममे भोजमे खढ़िहानक पाँति आ बान्हपरक पाँति देखि विचलित होइत छलहुँ। जोन-बोनिहारकेँ बान्हपर बैसा कऽ खुआबैत देखैत छलहुँ आ बाबू-भैयाकेँ खढ़िहानमे। खढ़िहानमे बारिक लोकनि द्वारा खाजा-लड्डू कैक बेर आनल जाइत छल । बान्हपरक पाँतीमे एक बेर आ नहियो।


-“मुदा हमर अम्मी। की भेलन्हि हुनका। भाए बहिन सभ तँ ओम्हर अछि!”


-“अम्मी!!!!!!!!!!!!!!


-“हमर चित्कारसँ सौँसे टोलमे थरथरी पैसि गेल रहए। नहि नबी कानए नहि अछि कानल अछि तँ कोनो गप छैक।


-“नञि अम्मी। ई कोनो गप नहि भेल। किए हमरापर अहाँ भरोस छोड़ि देलहुँ। नबी बकस नाम छी हमर। पाँचो भाए आ छोटकी बहिनक भाए नहि बाप छियैक हम। मुदा अहाँ हमरापर भरोस छोड़ि चलि गेलहुँ। या अल्ला!!!!!!!!!!!”


-“टोल जुटि गेल मैयतक चारू दिश। के की सभ कएलक से नहि बुझलहुँ। अम्मीकेँ गुसुल (नहाओल) कराओल गेल। कफन पहिराओल गेल। जनाजाक खाट आएल। ताहिपरसँ माएक गाँधी चरखासँ बनाओल चादरि ओढ़ाओल गेल। तीनू काका आ हम जनाजाक खाअकेँ कान्ह देलहुँ। कब्रिस्तान लग ठाढ़ भए जनाजाक नमाज पढ़लहुँ आ अम्मीकेँ दफन कएलहुँ।


नबी बकस फेर चुप भए गेल। हम ओकरा टोकए नहि चाहैत छलहुँ। दस मिनट धरि ओ चुप्पे रहल आ हम बैसल रहलहुँ। फेर ओ बाजल।


-“अम्मीक मृत्युक चालीस दिन धरि शोक मनओलहुँ। आ वैह चालीस दिनक आराम हमरा एहो जोग बनेलक जे फेर पएरमे घिरणी लागि गेल। अम्मीक मृत्युक बाद पढ़ाइकेँ नमस्कार कए खाला लग आबि गेलहुँ, दिल्ली नगरियामे ।


नबी बकस अपन आँखि पोछि रहल छल। फेर दस मिनट ओ चुप रहल।


“नबी बकसकेँ अम्मीक इन्तकालक दिन लोक पहिल आ अन्तिम बेर कनैत देखने रहए। मुदा ई सभ आइ फेर हमरा आँखिसँ नोर चुआ देलक। ओकीलक तँ बियाहो नहि होइत रहए। सभ कहैत छल जे बुरबक छैक। मुदा जेना भीष्म पितामह धृतराष्ट्रक बियाह करेलन्हि तहिना हम एकर बियाह करबओलहुँ आ ई सभ कहैत अछि जे हम ओकरा नोकर जेकाँ रखैत छियैक”।


तावत कॉलबेलक घंटी बाजल रहए। ओकील नबी बकसक सोझाँमे आबि ठाढ़ भऽ गेल।


“भैया, सभ कहैत अछि जे हम बुरबक छी। काल्हि अहलिया (कनियोँ) केँ ई सभ यैह गप कहि देलकैक। ओ कहलक जे तोहर चिन्ता ककरो नहि रहए छैक, मुदा हम नहि मानलहुँ। से काल्हि हम कनेक लेट भए गेलहुँ। सरकेँ कहबो केलियन्हि जे देखैत छी जे ओ सभ आबैए आकि नहि। कनियो तँ सुधंगे ने अछि। आइ ओहो दियादिनीक गड़ा पकड़ि कऽ खूब कानल अछि। बुधियार सभ ने अहाँकेँ छोड़ि चलि गेल, मुदा ई बुरबकहा अहाँकेँ छोड़ि कहियो नहि जाएत भाए।

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मिथिलाक खानपान...

मिथिलाक खानपान-नीलिमा चौधरी आ राखी साह... मखानक खीर सामग्री- दूध-१ १/२ किलो, चिन्नी-१०० ग्राम, मखान कुटल- १०० ग्राम, इलाइची पाउडर- स्वाद अनुसार, काजू- १० टा, किशमिश-२०टा बनेबाक विधि- मखानक पाउडर (कनी दरदरा)क पहिने १/२ किलो ठंढ़ा दूधमे घोरि लिअ, शेष दूध केँ खौला लिअ। आब गर्म दूधमे ई घोड़ल मखानक मिश्रण मिला दियौक आर करौछसँ लगातार चलबैत रहियौक जाहिसँ मिश्रण पेनीमे बैसय नहि। .... (आगाँ पढू)

मिथिलांचलक विकास..

मिथिलांचलक विकास... मिथिलांचल क्षेत्र बिहार मे सबस पिछड़ल मानल जाइत अछि, अगर प्रतिव्यक्ति आय , साक्षरता और प्रसवकाल मे जच्चा-बच्चा के मृत्यु के मापदंड बनायल जाय तो मिथिलांचल देश के सबस गरीब आ पिछड़ल इलाका अछि। एकर किछु कारण त अहि इलाका के भौगोलिक बनावट अछि... (आगाँ पढू)

मिथिला अरिपन....

मिथिला चित्रकला- स्त्री आ पुरुषक दशपात अरिपन / स्वास्तिक अरिपन... स्त्रीगणक दशपात अरिपनकन्याक मुण्डन,कान छेदन आ' विवाहक अवसर पर कुलदेवताक घर आकि मण्डप पर बनाओल जाइत अछि।बनेबाक- विधि। एकर बनेबाक विधि सूक्ष्म अछि।ऊपरमे तीन पातक पुष्प, ,ओकरनीँचा पाँच-पातक कमल-पुष्प,ओकर नीचाँ सात-पात युक्त्त कमल, बीचमे अष्टदल कमल अछि। दश पात चारू दिशि अछि। नौ टा माँछक चित्र सेहो अछि... (आगाँ पढू)

एक विलक्षण प्रतिभा...

एक विलक्षण प्रतिभा जिनका हम सदिखन याद करैत छी (प्रथम कड़ी) - कुसुम ठाकुर..... एक बेर हमारा एक पत्रिका में किछु लिखय लेल कहल गेल छल, ई सन् १९९६ क गप्प थिक। हम बस एतबे लिखी सकलौं "हम की लिखी हमर त लेखनिये हेरा गेल"। मुदा आई बुझना जैत अछि जे नै, हमारा एकटा कर्तव्यक निर्वाहन... (आगाँ पढू),
(दोसर कड़ी), (तेसर कड़ी), (चारिम कड़ी), (पाँचम कड़ी), (छठम कड़ी), (सातम कड़ी), (आठम कड़ी), (नवम कड़ी), (दसम कड़ी), (एग्यारहम कड़ी), (बारहम कड़ी), (तेरहम कड़ी), (चौदहम कड़ी), (पन्द्रहम कड़ी )

चिनबारक दीप...

चिनबारक दीप–उषा किरण खान... समस्तीपुर मे गाड़ी बदली कऽ महेसरी अइमे बैसलि सरिया कऽ। आब घर बेसी लग आयल जाइत छैक। चारि टीसन आ छैक, फे तऽ टीसन सऽ एक कोस जमीन हैतै। चारि-पाँच गोटाक हेंज छैक्। बौआइत-बतियाइत गाम पहुँचि जयतै। आठे दिनुका दिन छैक, की सब करतै? एह, करऽक की छैक? सभटा बस्तुजात तऽ कीननहिं जाइत छैक.... (आगाँ पढू)

बिदेसिया (संकल्पित नाटिका)

विद्यापतिक बिदेसिया (संकल्पित नाटिका).... भोजपुरीक साहित्य मैथिलीसँ कम समृद्ध अछि मुदा से अछि मात्र परिमाणमे, गुणवत्ताक दृष्टिमे ई कतेक क्षेत्रमे आगाँ अछि। भोजपुरीक भिखाड़ी ठाकुरक बिदेसियाक सन्दर्भमे हम ई कहि रहल छी। भिखाड़ी ठाकुर कलकत्तामे प्रवासी... (आगाँ पढू)

पाँच पत्र...

पाँच पत्र-हरिमोहन झा... प्रियतमे अहाँक लिखल चारि पाँती चारि सएबेर पढ़लहुँ तथापि तृप्ति नहि भेल। आचार्यक परीक्षा समीप अछि किन्तु ग्रन्थमे कनेको चित्त नहि लगैत अछि। सदिखन अहींक मोहिनी मूर्ति आँखिमे नचैत रहैत अछि। राधा रानी मन होइत अछि जे अहाँक ग्राम वृन्दावन बनि जाइत, जाहिमे केवल अहाँ आ हम राधा-कृष्ण जकाँ अनन्त काल धरि विहार करैत रहितहुँ... (आगाँ पढू)

कथा- माउगि

कथा- माउगि - विभा रानी.... माउगि, माउगि, गे माउगि, गे माउगि! तों माउगि, हम माउगि, ई माउगि, ऊ माउगि - सभ किओ माउगे-माउगि। ऊँहूँ - सभ किओ भला माउगि हुअए। ई तय कर' बाली तों के? अएं गे? तोरा कहिया स' भेटलौ ई हक? ई सभ काज-धंधा हमरा आओरक अछि - हमरे आओर के करे दें। देख त' कने, तोहरो आओर के कतेक रंग-बिरंगा रूप दिया देलियौ! माउगि, गे माउगि.... (आगाँ पढू)

मातृत्व...

डा. मंजू गीता मिश्राक आलेख : मातृत्व.... नारी जीवनक सबसँ गौरवशाली एवं सुखद अनुभव थिक मातृत्व ।ई नारी जीवनक परिपूर्णताक प्रतीक अछि । पूरा नौ मास अपन गर्भमे फलैत-फूलैत एक शिशुक अपन जान सँ बेसी देखभाल करैत छथि । तत्पश्चात एक फूल सन सुन्दर सुकोमल शिशु जन्म लैत अछि, यैह स्त्रीक सबसँ अनमोल उपहार एवं आनन्ददायक क्षण थिक । एहि नौ मासक दौरान गर्भवतीक भोजन एवं वातावरण पर निर्भर करैत अछि.... (आगाँ पढू)