शुक्रवार, 31 जुलाई 2009

गरहाँक जीवाश्म- बुद्धिनाथ मिश्र




बाबू पढ़ने छलाह --
‘अ’सँ अदौड़ी
‘आ’सँ आमिल
तें ने दौड़ सकलाह
ने मिल सकलाह
सौराठक धवल-धार सँ।
जिनगी भरि करैत रहलाह
पुरहिताइ
खाइत रहलाह चूड़ा-दही
बान्हैत रहलाह
भोजनी, अगों आ सिदहाक पोटरी
पूजा वला अंगपोछामे।

हम पढ़लहुँ--
‘अ’सँ अनार
‘आ’सँ आम
तहिया नहि बुझना गेल
जे ई वर्णमाला पढ़िते
खाससँ आम भ’ जायब।
एहि देसक
आरक्षित शब्दकोशमे
फूलक सहस्रो पर्याय भेटत
मुदा फलक एकोटा नहि।
बून-बूनसँ
समुद्र बनबाक प्रक्रियामे फँसल
हम ओ भूतपूर्व बून छी
जकरा समुद्र कहएबाक अधिकारसँ
वंचित राखल गेल छै।
आब हमर नेना
पढ़ि रहल अछि --
‘ए’सँ एपुल
‘बी’सँ बैग, ‘सी’सँ कैट
आ धीरे-धीरे उतरि रहल अछि
हमर दू बीतक फ्लैटमे
बाइबिलक आदम, आदम क ईव
आ ईवक वर्जित फल।
हमरा परदेसकें मात करत
बौआक बिदेस
हमर लगाएल आमक गाछी
बाबुओ देखलनि, बौओ देखलथि
मुदा बौआक लगायल सेबक गाछ
समुद्र पारक ईडन गार्डेनमे फरत
जत’ ने हेतै आमक वास
ने हेतै अदौड़ीक विन्यास।
लिबर्टीक ईव पोति रहल अछि आस्ते-आस्ते
मधुबनीक चित्रित भीतकें।
देसी गुरुजीक एक्काँ-दुक्काँ
सबैया-अढ़ैया आ
गरहाँ जा रहल’ए भूगर्भमे
जीवाश्म बनबा लेल।


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मंगलवार, 28 जुलाई 2009

गामसँ पत्र-विद्यानन्द झा





माँ हमरा लिखै छथि पत्रा
टेढ़-मेढ़ आखरें
एकटा कार्ड आ कि अन्तरदेसी
छोट भाइ वा पितियौत
(वत्र्तमानसँ खौंझाएल
तैयो भविष्यक प्रति आशावान)
खसबै छथि ओकरा
बेचन ककाक दलान पर टाँगल
लाल डाकबला बक्सामे
जे कैक सालसँ
धान आ कि गहूमक बोझक बीच ठाढ़ रहला उत्तरो
बिसरल नहि अछि अपन साहेबी
आ दैत रहैत अछि हरदम
एकटा नागरीय मुस्की

शिबू भाइ लगबै छथि
मोहर ओहि पत्रा पर
(सियाही कने सुखाएल जकाँ छै तैयो)
चिन्तनमे लीन
ख’ढ़क जोगारमे
अबैत बरखा कोना काटब राति
बिचारैत शिबू भााइ
लगबै छथि मोहर हल्लुकेसँ
जानकी एक्सप्रेस आ कि पैसंेजरमे चढ़ि
प्रारम्भ करैत अछि
एकटा सुदीर्घ यात्रा
पत्रा
कैक टा नव-पुरान पोस्टमैन
कैक टा चिन्ता आ आशाक वाहक
आ भण्डार पोस्टमैनक हाथें
कैक टा नगर-गाम
बाध-बोन
धार आ पहाड़ टपैत
पहुँचैत अछि हमरा लग अंततः
ई पत्रा
आ हमरा शंका होब’ लगैछ जे
माँ पठौलनि अछि
पत्रा नहि
कोनो पार्सल।

किऐ गमकैछ
नव धान जकाँ
ई पत्र?


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सोमवार, 27 जुलाई 2009

देश भक्ती गीत - मदन कुमार ठाकुर

कारगील युद्ध क याद में -- २६-०७ -१९९९
आईगो क जेका , मेघओ क जेका , तुफ्फान जेका - --
हमहू तिरंगा ल्हरायब हम --
तुफ्फान जेका - --हमहू तिरंगा ल्हरायब हम --२
नेता बदलते अछी , भाषण बदलते अछी -२
लेकिन हमरो राष्ट्रो क बदल नहीं पायब यो -२
तुफ्फान जेका - --हमहू तिरंगा लहरायब हम --२
आसमानओ से ऊपर हमरो तिरंगा लहरात यो
तुफ्फानो से आगू हमरो कदम त बढ़त यो -२
कारगिल पर चाहे जाय परे , शरहद पर चाहे मरै परे -2
नैय सर झुकाय्ब हम , सर कट्टयब हम -2
हमरो ई वादा छी --
तुफ्फान जेका - --हमहू तिरंगा ल्हरायब हम --२
जखन -2 जुल्मक होयत सामना ,
हम वीर जबान करव सामना -२
आज़ाद अछी हमरो देश , स्वतंत्र हमर ई देश ,
आजादी नै मीटायब यो -------
शहिदो क हम सदा नही भुलायब हम ----
तुफ्फान जेका - --हमहू तिरंगा ल्हरायब हम --२
नाचब और े गायब हम , खुशियाँ मनायब हम ---2
हर पन्द्र्ह अगस्त के दिंन ,---
तिरंगा लहरायब हम ---2
तुफ्फान जेका - --हमहू तिरंगा ल्हरायब हम --२

मदन कुमार ठाकुर
पट्टी टोल , कोठिया , भैरव स्थान , झांझरपुर , मधुबनी , बीहार , भारत
- मेल - madanjagdamba@yahoo.com
mo - 9312460150

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शनिवार, 25 जुलाई 2009

बिन्नीक फोटोग्राफी जुलाई अंक ०९

तीज के अवसर पर मेहँदी भरल हाथ .....०८/२८/2008

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नताशा 17 (चित्र-श्रृंखला पढ़बाक लेल नीचाँक चित्रकेँ क्लिक करू आ आनन्द उठाऊ।

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शुक्रवार, 24 जुलाई 2009

अहां कोना रहै छी भौजी....

लक्ष्मी आई आठवां क्लास में चल गेलि। मिडिल स्कूल के हेटमास्टर यादवजी ओकर अंग्रेजी के बड्ड प्रशंसा करैत छथिन्ह। कहैत छथिन्ह जे अगर एकरा मौका भेटैक त जरुर किछु करत ई बचिया। ओहिदिन जिलास्तरीय नाटक प्रतियोगिता के लेल रिहर्सल में बौआरानी के सलेक्शन स्कूल सं भेलैक। कहने रहय-कका यौ...मेन रोल नहि भेटि सकल, लेकिन हम अपना दिस सं खूब कोशिश केलियै। हम ओकर अंग्रेजी के टेस्ट करयैक लेल ओकरा सं रीडिंग दैक लेल कहैत छियैक। बौआरानी धुरझार अंग्रेजी पढ़ैत अछि आ ओकर माने सेहो बतबैत अछि। हम सोचैंत छी जे एकटा प्रतिभा के फेर अकाल मृत्यु भ जैतैक की...? लेकिन के जनैत अछि प्रारब्ध में ककरा की लिखल छैक।

हमरा दस साल पहिने के बात मोन पड़ैत अछि। शैलेन्द्र भैया के ससूर गाम आयल रहथिन्ह आ बड़का कका सं कहलखिन्ह- आब हमरा अहां के संबंधक कड़ी खत्म भय गेल। बड़का कक्का पहिने नहि बुझलखिन्ह, लेकिन कनिये कालक बाद हुनका आंगन में कन्ना रोहटि उठि गेल। पूरा गामक लोग जमा भ गेल। पता चलल जे शैलेन्द्र भैया नहि रहलाह। बड़का कक्का के जीवन में पहिल बेर कनैत देखने छलियन्हि, 65 साल के अवस्था में अंगना में ओ ओगरनिहया मारि का कानि रहल छलाह।

लक्ष्मी तहिया छोट छल, प्राय चारि या पांच साल के। ओकर छोटकी बहिन रागिनी 2 साल के हेतैक। शैलेंद्र भैया एखन रहितथि त 44-45 के रहितथि। भैया के कका हुनका एनटीपीसी में नौकरी लगा देने रहथिन्ह। ओ जमाना छलै जहिया एडहाक पर बहाली होईत छलैक आ बाद में हाकिम ओकरा किछु दिनुका बाद परमानेंट कय दैक। शैलेंद्र भैया ताबत परमानेंट नहि भेल छलाह, इम्हर घर पर घटक सबहक लाईन लागि गेलन्हि। हाय रे मिथिला के बेटी सब, आई हुनका परमानेंट नौकरी रहितन्हि त भौजी के ई दिन थोड़े देखय पड़ितन्हि। शैलेंद्र भैया के बियाह नीक परिवार में भेलन्हि। भौजी के बाप ततेक धड़फडेल रहथिन्ह जे बेटी के मेट्रिक के परीक्षेक साल बियाहि देलखिन्ह। भौजी आ भैया के अबस्थो में बढ़िया अंतर छलन्हि...लेकिन सबकिछु के दरकिनार करैत बियाह भ गेल। आब सोचति छी, त बुझायत अछि जे ई एकटा मैथिल पिता के विवशता स बेसी किछु नहि छल।

शैलेन्द्र भैया आ भौजी अनपरा चलि गेला..जतय एनटीपीसी में ओ क्लर्क छलाह। जमाना बदैल रहल छल। दिल्ली में नब आर्थिक व्यवस्था लागू भ रहल छल, उदारीकरण के नाम पर कयकटा नियम बनायल आ हटायल जा रहल छल।

भैया के परमानेंट होई के संभावना दिन पर दिन क्षीण हुअय लगलन्हि। आब त एडहाक के दरमाहो कम पड़य लगलन्हि जहिया स बियाह भेल छलन्हि। ताबत लक्ष्मी आ रागिनी दुनिया में आबि गेल छल। भैया शराब पिबय लगला। पति-पत्नी के बीच संबंध खराब हुअय लगलन्हि। धीरे-2 शराब हुनकर स्वास्थ्य के प्रभावित केरय लगलन्हि। हुनकर किडनी खराब भय गेलन्हि। ओ छुट्टी लय क गाम आबि गेलाह। ओ छुट्टी पर छुट्टी लेने जाईथ। लेकिन एडहाक के नौकरी में लंबा छुट्टी-कतेक दिन चलितन्हि। गामों में हुनकर शराब के नशा नहि छुटलन्हि। पाई नै रहन्हि त अन्न पैन बेच क पी लथि। पोलीथीन आ सस्ता शराब सेहो। कखनो पोखरिक महार पर त कखनो नहरिक कात में। जन हरवाह सब देखय, त कक्का के कहनि। जहि खानदान में एकोगोटे भांग आ बीड़ी सिगरेट नहि पीबय ओहि आदमी के बेटा के बारे में शराबी होई के चर्चा कतेक अपमानजनक आ लज्जास्पद हेतैक-ई हमरा सबके ओतेक छोट अवस्था में नहि बुझे पड़े। लेकिन आब कल्पना करैत छी, त मोन केना दनि कर लगैत अछि।

भौजी के सासु के व्यवहार दिन पर दिन भौजी के प्रति बिपरीत भेल जाईन्ह। आब त ओ खुलेआम कहय लगलीह जे अही मौगी के पेरे हमर बेटा के मोन खराब भेल जाईये। बात-2 पर रक्षिसिया आ गारि भौजी के नियति बनि गेलन्हि। एकटा कुलीन घर के कन्या-जकर कुलशील के गवाह मिथिला के तमाम पंजीकार छलाह-जे पारंपरिक मिथिला के सर्वोत्तम गांव में स आयल छलीह-हुनकर ई हाल हमर मोन के विदीर्ण कय दिए। ओहि समय हम पटना में छलहुं। मैट्रिक पास कय मेडिकल के तैयारी करी, कहियो काल गाम जाई। मोबाईल के जमाना नहि छल। मां स चिट्टी-पर बात हुए या गाम जाई तखने। एतेक नहि बुझियै।

साल 2001 के पितरपक्ष में गामे में रही। शैलेन्द्र भैया के अंगना में हमरा नोत रहै। हम खा क उठले रही की, भैया के ससूर अयलाह। तकर बाद कन्ना रोहटि उठि गेल।

तकर बाद के कहानी भौजी के दुख, अपमान, मानसिक यातना आ संघर्ष के कहानी छन्हि। तीन साल तक भौजी कोनो तरह कटलीह। लक्ष्मी आ रागिनी के चमकैत चेहरा मलीन भेल गैलैक। ओ आब पूर्ण ग्रामीण वाला लागय। लेकिन लक्ष्मी तीन साल तक अनपरा के पब्लिक स्कूल में इसाई टीचर सं अंग्रेजी पढ़ने रहय। ओकर अंग्रेजी एखनो नीक रहै। दूनू बहिन आब गामें में बिहार सरकार के स्कूल में जाई।

कोनो तरहे समय बीतल। भौजी के शिक्षा मित्र में भय गेलन्हि। डेढ़ हजार महीना पर। नबका युवा मुखिया शैलेन्द्र भैया के दोस्त रहन्हि। ओ भरल पंचायत में बाजल जं एकटा वेकेंसी हेतैक त शैलेन्द्रक कनिया के हेतैक।

आई अहि बात के चारि साल बीत गेल। आई नीतीश सरकार शिक्षा मित्र सबके दरमाहा साढ़े सात हजार कय देलकैक। आब ओकर नाम पंचायत शिक्षक भय गैलैक आ ओ परमानेंट सेहो भय गैलेक। आब भौजी के सासु के व्यवहार बदलि गेलन्हि। भौजी घर चलबै छथि। आब ओ सोचैत छथि जे ओ त बेसी नहि पढ़ि पेली लेकिन दूनू बेटी के जरुर इजिनियरिंग करेती। ओ हमरा स पूछैत रहैथ, जे अहां सब त पत्रकार छी-कतेक जान पहचान हेत,कनी देखबै।

हमरा लक्ष्मी के आंखि में ओज देखा रहल अछि। ओकरा अगर मौका देल जाई त ओ जरुर किछु करत। हेडमास्टर यादवजी के कथन सही छन्हि...। लेकिन की ई कहानी एतय खत्म भय जेबाक चाही ? की लक्ष्मी आ रागिनी के भविष्य सुनिश्चित भय गेनाई अहि खिस्सा के सुखद अंत मानल जाई ?

भौजी के अवस्था एखनो 31 साल छन्हि। जहिया बियाह भेल छलन्हि तहिया 17 साल के छलीह। हुनकर की हेतन्हि...?? .हुनकर के छन्हि.?? .की हुनकर सुखदुख के कोनो मोल नहि...?? ई सवाल मुंह बौने ठाढ़े अछि...मिथिला के समाजक समाने...आ हर साल सैकड़ों मैथिलानी अहि सवालक सामने हारि जाइत छथि....जे हमर के अछि...?? की हमर सुखक कोनो मोल नहि...?

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बुधवार, 22 जुलाई 2009

सभ दिन रातिमे-अविनाश



सभ दिन रातिमे चारि टा लोक घरक देबाल
सभ दिन रातिमे ताशक कोटपीस
की कतहु किछु भ’ रहल छै गड़बड़
से के कहत?
सभ दिन रातिमे सजमनि सोहारी
सभ दिन रातिमे निन्नक खुमारी

विविध भारतीक छायागीतमे डूबल अछि लोक
ओ समय नहि जे
लोकमे डूबल अछि लोक
जीवनक पुरबा-पछबामे सदाबहार रेडियो
आ नेनपनक झिझिरकोना

बुचनूक घरमे क्यो नइं खेलकइ आइ
हम की क’ सकै छी भाइ?
क्यो की क’ सकैछ?
जखन देशक दुर्भाग्य
गाम-गाम
आत्मा बनि भटकि रहल हो
हम अपन सुखमे कते क’ सकैत छी बाँट-बखरा
हम अपन दुखकें कतेक पोसि सकै छी एकसर

हम एकसर पड़ल दुखी नागरिक
भयक बहन्ना छी बनौने
साँझमे बन्न क’ दै छी देशक दुर्दशाक विरुद्ध युद्ध
जेना युद्ध हो कोनो आॅफिसियल काज

सभ दिन रातिमे चकल्लस
सभ दिन रातिमे रंग-रभस

की हम सभ कोनो भोरक प्रतीक्षा क’ रहल छी?


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बुधनी- सतीश चंद्र झा


घुरलै जीवन दीन - हीन कें
बनलै जहिया टोलक मुखिया।
नव- नव आशा मोन बान्हि क’
सगर राति छल नाचल दुखिया।

घास फूस कें चार आब नहि
बान्हब कर्जा नार आनि क’।
नहि नेन्ना सभ आब बितायत
बरखा मे भरि राति कानि क’।

माँगि लेब आवास इन्दिरा
काज गाम मे हमरो भेटत।
जाति - जाति कें बात कोना क’
ई ‘दीना’ मुखिया नहि मानत।

भेलै पूर्ण अभिलाषा मोनक
भेट गेलै आवास दान मे।
दुख मे अपने संग दैत छै
सोचि रहल छल ओ मकान मे।

की पौलक की अपन गमौलक
की बुझतै दुखिया भरि जीवन।
मुदा बिसरतै बुधनी कहिया
बीतल मोन पड़ै छै सदिखन।

पड़ल लोभ मे गेल सहटि क’
साँझ भोर मुखिया दलान मे।
होइत रहल भरि मास बलत्कृत
विवश देह निर्वस्त्रा दान मे।

जाति- धर्म, निज, आन व्यर्थ कें
छै बंधन जीवन मे झूठक।
जकरा अवसर भेटल जहिया
पीबि लेत ओ शोणित सबहक।

सबल कोना निर्बल कें कहियो
देत आबि क’ मान द्वारि पर।
कोना बदलतै भाग्य गरीबक
दौड़त खेतक अपन आरि पर।

भाग्यहीन निर्धन जन जीवन
बात उठाओत की अधिकारक।
नोचि रहल छै बैसल सभटा
छै दलाल पोसल सरकारक।

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सोमवार, 20 जुलाई 2009

मिथिलाक बेटीक ब्रिटेनमे सम्मान


ब्रिटेन द्वारा मिथिलाक बेटीकेँ मान देल गेल अछि। अप्रवासी भारतीय शिक्षाविद् आशा खेमकाकेँ देशक प्रतिष्ठित सम्मान आर्डर आफ ब्रिटिश एंपायर देल जएत। ई सम्मान ब्रिटिश महारानी दिशसँ देल जाइत अछि । आशा एहि सम्मानकेँ प्राप्त केनिहारि पहिल एशियाई महिला छथि । बिहारक सीतामढ़ीमे जनमल आशा खेमका वेस्ट नाटिंघमशायर कालेजमे प्रधानाचार्य आ मुख्य कार्यकारी अधिकारी छथि । मात्र 15 सालक उमरिमे हुनकर विवाह मोतीहारीक 19 सालक मेडिकल छात्र शंकर खेमकासँ भेलन्हि । डा. शंकर वरिष्ठ आर्थोपेडिक सर्जन छथि । ओ 1978 मे आशाकेँ लंदन अनने रहथि। तखन आशा नीक जेकाँ अंग्रेजी सेहो नहि बजैत रहथि । एहि सप्ताह महारानीक हाथसँ ई सम्मान ग्रहण करए वाली आशा रवि केँ कहलन्हि , आर्डर आफ ब्रिटिश एंपायर सम्मान पाबि हम स्वयंकेँ गौरवान्वित अनुभव कए रहल छी । ई सम्मान शिक्षाक क्षेत्रमे हमर योगदानकेँ बढ़ाओत। शिक्षाक क्षेत्रमे आशाक उल्लेखनीय योगदानक लेल हुनका मई 2008 मे एशियन वूमेन आफ अचीवमेंट अवार्ड आ जुलाई 2007 मे नेशनल ज्वेल अवार्ड फार एक्सीलेंस इन हेल्थकेयर एंड एजुकेशन सेहो प्रदान कएल गेल अछि।

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रविवार, 19 जुलाई 2009

उलटबाँसी- रमण कुमार सिंह




कृषि प्रधान एहि देशमे
किसान निरन्तर क’ रहल अछि आत्महत्या
जनकल्याणकारी राज्यक संसदमे
रोज बनैत अछि कानून मुदा
बनिया आ विदेशी सौदागरक लेल
स्कूल-काॅलेजमे आब चरित्रा
निर्माणक नहि
दोसराक जेबी सँ अपना जेबीमे पाइ
झटकबाक देल जाइत अछि शिक्षा
न्यायालयमे अभियुक्तक हैसियत
देखि क’ होइ छै फैसला
आ पमरियाक तेसर जकाँ
लोकतन्त्राक तथाकथित चारिम खाम्ह
अपन अस्तित्व लेल करैत
अछि नित्तह दिन संघर्ष
बाबा कबीर!
उलटबाँसी अहींक समयमे नहि
हमरो समयमे अछि
मुदा कतएसँ लाउ हम
अहाँ सन भाषा आ
अहाँ सन अपन शब्दमे असर
ईहो एक टा उलबाँसीए अछि, माफ करब कबीर!


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शनिवार, 18 जुलाई 2009

नताशा 16 (चित्र-श्रृंखला पढ़बाक लेल नीचाँक चित्रकेँ क्लिक करू आ आनन्द उठाऊ।

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बृहस्पतिवार, 16 जुलाई 2009

भारतक बजट (२००९-१०) आ नेपालक बजट(२००९-१०, वि.स.२०६६-६७)

वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी द्वारा ६ जुलाइ २००९ केँ प्रस्तुत भारतीय बजट २००८-०९ मे आर्थिक विकास दर ६.७ प्रतिशत रहल होएबाक सम्भावना व्यक्त कएल गेल अछि। एहि बेर करदाता लेल बेसिक छूट एक लाख ५० हजार टाका सँ बढ़ाकऽ एक लाख ६० हजार कएल गेल अछि। आयकर पर दस प्रतिशत सरचार्ज हटा लेल गेल अछि। सरकार नोट छापिकऽ निवेश करत। रोजगार गारंटी योजनामे विस्तार कएल जएत, २५ किलो अनाज तीन टाका प्रति किलोक दरपर उपलब्ध कराओल जएत। किसान आ लघु उद्योगकेँ सस्ता कर्ज भेटत। निर्यात दबावमे रहने अर्थव्यवस्थामे सुस्ती अछि। खाद आ डीजल पर राहत देल जएत। प्रत्येक राज्यमे एक केंद्रीय विश्वविद्यालय स्थापित करबाक योजना अछि। नव आई.आई.टी. आ एनआईटी लेल ४५० करोड़ टाका खर्च करबाक योजना अछि। आयमे कृषिक हिस्सा जे १९४७ मे ५६ प्रतिशत छल से आइ १८ प्रतिशत भऽ गेल अछि। बजटक आर मुख्य विशेषता एहि प्रकारेँ अछि:-लॉ फर्मपर सर्विस टैक्स, आयकर छूटक सीमा महिला लेल भा.रु. १,९०,०००/- आ वरिष्ठ नागरिक लेल भा.रु.२,४०,०००/- कएल गेल, ग्रामीण सड़कक लेल १२,००० करोड़ रु. आबंटित, हृदय रोग सम्बन्धी दवाइ सस्ता हएत, बायो-डीजलपर कस्टम ड्यूटी घटत आ सोना-चानीपर बढ़त, कॉमनवेल्थ गेम लेल १६,३०० करोड़ रु. देल गेल, राष्ट्रीय गंगा प्रोजेक्ट लेल ५६२ करोड़ रु. आबंटित, यू.आइ.डी.(यूनीक आइडेन्टिफिकेशन प्रोजेक्ट) नंदन नीलेकनीक अध्यक्षतामे शुरू कएल जएत, अप्रैल २०१० सँ गुड्स आ सर्विसेज टैक्स प्रारम्भ आ पुनः ९% आर्थिक विकास दर प्राप्त कएल जएत।

नेपालमे सेहो वित्तमंत्री सुरेन्द्र पाण्डेय १३ जुलाई २००९ केँ प्रस्तुत अपन बजट(२००९-१०, वि.सं.२०६६-६७) मे किसान लेल ५००० लाख ने.रु. सब्सिडी लेल देलन्हि। मैथिली, भोजपुरी, थारू, लापचा, लिम्बू आ धीमाल भाषायी क्षेत्रमे कला-गामक विकास करबाक योजना अछि। २५०० लाख ने.रु. जनकपुर, राजबिराज, हुमला, मुगु, कालीकोट आ डोलपा हवाइ अड्डाक विकासार्थ देल गेल अछि। नव संविधानक ड्राफ्ट तैयार करबामे सभक सहयोग लेबाक आ शान्ति प्रक्रिया आगू बढ़ेबाक संकल्प सेहो व्यक्त कएल गेल। बिराटनगर रिंग रोड आ जनकपुर परिक्रमा (रिंग रोड) सड़ककेँ नीक बनाओल जएत। जनकपुरमे राजश्री जनक विश्वविद्यालयक स्थापना कएल जएत। धालकेबार-जनकपुर रोड अगिला वित्त वर्षधरि पूर्ण कऽ लेल जएत। डोम, मुसहर, चमार, दुसाध, खतबे आ गरीब मुस्लिम लेल सिरहा, सप्तरी आ कपिलवस्तु जिलामे एक-एक हजार घर (पूरा ३००० घर) बनाओल जएत। दलित आ गरीब मुसलमानक अठमा पास बालिका लेल (परसा, बारा, रौतहट, सरलाही, महोत्तरी, धनुषा, सिरहा आ सप्तरी जिलामे) स्कॉलरशिप देल जएत जाहिसँ ओ अपन पएरपर ठाढ़ भऽ सकथि। जाहि कोनो तकनीकी इंस्टीट्यूटमे ओ नामांकन लेमए चाहतीह ओहिमे हुनकर एडमिशन कम्पलशरी रूपेँ लेल जएतन्हि। उत्तर दक्षिण हाइवे (कोशी, कंकाली आ गंडकी कोरीडोर)क निर्माण कएल जएत। सिरहा, सप्तरी, उदयपुर आ सुनसरीमे कृषिक विकासक संग शिवालिक आ चूड़ पर्वत श्रृंखलाक संरक्षणपर ध्यान देल जएत। मैथिली भाषा, साहित्य आ संस्कृतिक विकासक लेल काज केनिहारकेँ पुरस्कृत करबाक लेल एक करोड़ ने.रु.क योगसँ महाकवि विद्यापति पुरस्कार गुथीक स्थापना कएल गेल अछि।

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बुधवार, 15 जुलाई 2009

बाणवीर- कथा- गजेन्द्र ठाकुर


साढ़े तीनसँ चारि फीटक बीच लेटराक लम्बाइ छल। सभ कहैत छैक जे ओकर माए-बाप दोसराक बच्चाकेँ देखि कए भुट्टा-भुट्टा कहैत रहैत छलथि।से पता नहि की भेलैक लेटरा तकरा बादसँ बढ़िते ने अछि, ओकर लम्बाइ एकदम्मेसँ बढ़ब रुकि गेलैक।
“धुर! माए-बापक कतहु नजरि लगैत छैक बच्चाकेँ”।
“नञि यौ, माएक तँ लगिते छैक, देखियौ ने लेटराकेँ”।
गौआँ सभ आपसमे गप करथि। जे से, सभ बच्चा पैघ भेल। बढ़ए लागल । मुदा लेटरा घुटमुटाएले रहल। सभ क्यो ओकरा परोक्षमे लेटरा आ मुँहपर लेटरबम कहए लगलाह।
लेटरबमक माए-बापकेँ जमीन-जाल ततेक नहि। से महीसेपर निर्भर छलन्हि हुनकर सभक जीवन। लेटरा महीसक सेवामे भोरेसँ लागल रहैत छल। भोरमे भोरहा कातमे रगड़ि-रगड़ि कऽ चिक्कन बना दैत छल महीसकेँ। पुआरक नूरीसँ साफ करैत काल गोट-गोट अठौरी निकालि दैत छल। बेरू पहर बौआ-चौड़ीमे महीस चरबैत काल निसभेर भऽ सूति रहैत छल महीसक पीठपर।
लोक सभ हँसीमे कहितो रहए जे लेटरबम बौआ-चौड़ी हाइ स्कूलसँ मैट्रिक पास कएने अछि। महीसो लक्ष्मी रहए ओकर। आन माल-जाल सिंह लड़ाबए तँ लेटरबमक महीस घास चरबामे लागल रहए। से साँझमे घर-घुरैत काल जखन आन सभ गोटेक महीसक पेट पाँजरमे धसल रहैत छल, लेटराक महीसक दुनू पेट दुनू दिसन फूलि कए लटकि जाइत छल। बिना परिश्रम पन्हाइत छलैक महीस।
लेटरा अपन माए-बापकेँ तैयो प्रसन्न कए सकल की? ओ दुनू गोटे लेटराक गुजर कोना चलतैक, ओकरासँ बियाह के करतैक- एहि बात सभकेँ लऽ सोचिते रहैत छलाह।


गाममे बैतरणी नाटक आएल रहैक। कठपुतली सभ, मनुक्खक मरलाक बाद बैतरणी धार पार करबाक दृश्य, जे भयावहे-भयावह छल, खूब नीज जेकाँ प्रदर्शित करैत छलाह।
लेटरबम सेहो माए-बापक संग नाटक देखि अएलाह। आ एतहिसँ लेटराक जीवन एकटा दिशा लए लेलक। लेटराक बाबूक पाछाँ बैतरणी नाटक कम्पनीक मालिक लागि गेल। धरोहि दऽ देलक, साँझ-भोर ओकर घरपर पहुँचए लागल।
लेटरा अपन महिसबारीमे मगन रहैत छल। मुदा ओ अनुभव करए लागल जे आइ-काल्हि माए-बाप ओकरापर किछु बेशीए ममता राखए लागल छथि। सभ कहैत रहओ जे लेटराक जीवन कोना के चलतए, से की ओकर माए-बाबूपर आब कोनो असरि थोड़बेक पड़तए।
मुदा बैतरणी नाटक कम्पनीक मालिक लेटराक बापक पाछाँ पड़ि गेल। कहए लागल जे ओ तँ लेटराकेँ नीक नोकरी दियबा रहल अछि। लेटरबमक बाबू सभसँ पुछथि जे की करी? सभ यैह कहैत रहन्हि जे ओ लेटराकेँ कीनि रहल अछि, नोकरी नहि दऽ रहल अछि। ई नाटक कम्पनी सभ बणवीर सभकेँ गामे-गाम तकने फिरैत अछि आ शहरी सर्कस कम्पनी सभकेँ बेचि दैत अछि। फेर एक बेर जे बेटा जएत तँ की घुरिकऽ अएत? बेटा धन छी, बाणवीरे सही!
अकश-तिकश करैत एक दिन माए-बाप लेटरसँ पुछलन्हि- “भगवानक इच्छा सर्वोपरि। भगवान पेट दइ छथिन्ह तँ ओकरा पोसबाक जोगार सेहो करैत छथिन्ह। लोक सभ कहैत रहल जे लेटराक गुजर कोना चलतए तँ ककरो गपक हम मोजर नहि दैत छलियैक। मुदा ई बैतरणी नाटक कम्पनी बला तँ पाछूए पड़ि गेल अछि। लोकसभ कहए-ए जे ई सभ शहरी सर्कस कम्पनीक लेल बाणवीर सभक ताकिमे गामे-गाम फिरैत अछि आ ओहि कम्पनी सभमे ओकरा सभकेँ बेचि दैत अछि। मुदा ई कहए-ए जे से नहि छैक। सभ दिनुका दिनचर्जा छैक। शहरे-शहरे घुमैत अछि ई सभ। जखन कतहु सर्कस नहि लगैत छैक तँ छुट्टिओ भेटिते छैक। आर के नोकरी देत एतेक कम लम्बाइ बलाकेँ? से हम अहींसँ पुछैत छी जे की कएल जाए”।
लेटराक तँ आँखिसँ दहो-बहो नोर खसए लगलैक। गौआँ सभ ठीके कहैत रहए। माए-बाप तँ लागैए निर्णय कऽ लेने छथि।
“माए-बाबू। हमरा बुझल अछि जे हमर बियाह-दान नहि होएत। मुदा अपन पेट तँ कोहुना हम गाममे भरिये लैत छी। गुजर तँ कइए लैत छी। लोक सभ कहैत रहए जे तोहर माए-बाप तोरा बेचि देलकउ, से ठीके अछि की”?
आब तँ कन्नारोहट उठि गेल। माए-बापक संग लेटराक कानबसँ अँगनामे अनघोल मचि गेल।
जेना सुति कऽ उठलाक बाद ढेर-रास गप महत्त्वपूर्ण कोटिसँ उतरि कऽ अमहत्वपूर्ण वा ततेक महत्वपूर्ण नहि रहि जाइत अछि, तहिना दिन बितैत लेटरा सेहो अपन मोन मना लेलक। कनी देखियैक बाहरक दुनियाँ केहन होइत छैक। माए-बाप तँ बेचिए लेने छथि, ओतेक सिनेह रहितन्हि तँ बेचबे करितथि? तँ हमहीं किएक अधभगिया सिनेह राखी?



बैतरणी कम्पनीबला लेटराकेँ एकटा सर्कस बला लग लऽ गेल।
ओतए ई लगैत रहए जे जेना सभ बाणवीरक नोकरीक ओतए जोगार होअए। दुनियाँक सभ बाणवीरक नोकरी ओकरा लग पक्का रहए। लेटरा जेना बाणवीरक देशमे पहुँचि गेल छल। मोँछबला, निमोछी, पातर-मोट, नव-बूढ़- मुदा सभ धरि बाणवीर।
लेटरा ओकरा सभक बीच रहए लागल। किछु दिन धरि तँ ओकरा लगैत रहए जे ओ कोनो विशिष्ट व्यक्ति अछि आ तेँ बेशी दुखी अछि आ दोसर बाणवीर सभ तँ अही योग्य अछि। मुदा आस्ते-आस्ते जखन संगी-साथी सभसँ ओकरा गप होमए लगलैक, तखन ओकरा बुझबामे अएलैक जे सभक एक्के खेरहा छैक।
फेर ओहि जेलरूपी घरमे हँसी-खुशीसँ, छोट-छीन झगड़ा-झाँटी आ मान-मनौअलक संग ओ आगाँ बढ़ए लागल। अपन जिनगीक ई रूप ओकरा एहन सन लगैत छलैक जेना ओ नोकरिहारा होअए। ओहो घुरि जएत गाम आ फेर आपस अएत नोकरीपर। गामक दोसर नोकरिहारा सभकेँ ओ देखैत छल। गाम अबैत काल जतबे उल्लसित रहैत छलाह, नोकरीपर घुरैत काल सभक घुघना लटकि जाइत छलन्हि।
धुर, माए-बाप हमरा बेचलक थोड़बेक अछि। हमरा सन बाणवीरकेँ एहिसँ नीक आर कोन नोकरी भेटतैक। सर्कसमे जखन हम कला देखबैत छी तँ बच्चा सभ कोना पेट पकड़ि हँसैत अछि, कतेक थोपड़ी पड़ैत अछि। थोपड़ीक अबाज तँ निसाँ आनि दैत अछि। काल्हि ओ दु जुट्टी बला बचिया, केहन लगैत रहए जेना अपने लोक रहए। गाममे बड़का कक्काक बेटीक बियाह नौगछिया भेलन्हि तँ हुनको दिआ तँ लोक सभ उरन्ती उड़ेने छल जे बेटी बेचि लेलन्हि। कतेक दुरगर बियाह करा देलन्हि!
ई लोको सभ, बुझु इनारक बेङ सभ छी। दिल्ली-मुम्बइ घुमत गऽ तखन ने बुझबामे अओतैक जे भागलपुर-नौगछिया कोनो ततेक दुरगर नहि छैक। माए-बाप हमरा बेचि लेत?....आ ई सोचिते लेटराक कंठ सुखा गेलैक आ आँखि पनिया गेलैक।
“रे भाइ, चल । तैयारी करबा लेल घण्टी बाजए बला छैक। ओहिसँ पहिने किछु खा-पीबि ली”।

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शनिवार, 11 जुलाई 2009

गजल- आशीष अनचिन्हार

गजल
इजोतक दर्द अन्हार सँ पुछियौ
धारक दर्द कछेर सँ पुछियौ


नहि काटल गेल हएब जड़ि सँ
काठक दर्द कमार सँ पुछियौ


समदाउनो हमरा निर्गुणे बुझाएल
कनिञाक दर्द कहार सँ पुछियौ


सभ पुरुषक मोन जे सभ स्त्री हमरे भेटए
अवैध पेटक दर्द व्यभिचार सँ पुछियौ


करबै की हाथ आ गला मिला कए
अनचिन्हारक दर्द चिन्हार सँ पुछियौ

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नताशा 15 (चित्र-श्रृंखला पढ़बाक लेल नीचाँक चित्रकेँ क्लिक करू आ आनन्द उठाऊ।)

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मृतकक बयान- अजित कुमार आजाद

पहिने हमर नाम पूछल गेल
ओ नहि पतियाएल

फेर ओकर नजरि
हमर गरदनि दिस गेलै
ओ नहि परखि सकल जे ओतए
बद्धी छै कि ताबीज

तखन ओ हमरा नाँगट क’ देलक सरेआम
ओकरा तैयो विश्वास नहि भेलै

अन्ततः ओ हमरा मारि देलक
मुदा आश्चर्य
एकर बादो ओ निश्चिन्त कहाँ अछि?

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अन्हारक सत्ता-कामिनी

घरमे पसरल अछि
बहुत रास अन्हार
आ बाहर टिप-टिप करैत
बरसि रहल अछि
घमाघट मेघ
सोझाँक उछाल खत्तामे
गाबि रहल अछि मल्हार
मदमस्त ढौसा बेंग
लोक कहैत अछि
एहि बेरुका बरसातमे
टूटि क’ रहतै बान्ह
महार पर जएबाक तैयारी
क’ नेने छै लोक
एक टा आतंक
पसरल अछि चारू कात
भय निराशा आ मोह
घेरने अछि चारू कातसँ
सलाइक काठीसँ
निकालै छै इजोत
आ क्षण भरिमे
अन्हार चाँपि लै छै ओकरा
अपनामे
अन्हारक सम्पूर्ण सत्ता
व्याप्त अछि हमरा चारू कात
आ विलीन क’ लेबए चाहैत अछि
अपनामे
एहि घरक सम्पूर्ण व्यवस्थाकें।

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बुधवार, 8 जुलाई 2009

समीक्षा श्रृंखला 9- सुभाष चन्द्र यादवक कथा संग्रह बनैत बिगड़ैत पर डॉ कैलाश कुमार मिश्र

श्री सुभाषचन्द्र यादव केर कथा संकलन आद्योपान्त पढ़लहुँ। लेखक महोदय अपन भावनाकेँ वेवाक रूपेँ प्रस्तुत कएने छथि। कथा पढ़ब तँ लागत जे केना एकटा निम्न-मध्यम-वर्गीय परिवारमे बढ़ल-पलल एक पढ़ल-लिखल मनुक्ख अपन जीवनक घटना, अनुभव आ सम्वेदनाक वर्णन अक्षरश: कऽ रहल अछि। परम्पराक नीक चीजसँ लेखक अपना-आपकें जोड़ने छथि आ परम्पराक पाखण्डिक विद्रोह करबामे कख़नो नहि हिचकिचाइत छथि। गाम, घर, परम्प रा, परिवेश, खेत, खरिहान, गामघरक आपसी कलह, समन्वय, कोसी नदीक कहर, सौन्दर्य, यात्रा वृतान्त आदिक वर्णन सोहनगर लगैत अछि। सुभाषजीक कथा-संग्रहकेँ हमरा जनैत दू दृष्टिकोण सँ विवेचित कएल जा सकैत अछि:

(क) भाषा विन्यास आ शब्दावलीक दृष्टिकोण सँ ,
(ख) कथा-वस्तुक दृष्टिकोण सँ।

आब उपरलिखित दृष्टिकोण पर विचार करी:
भाषा विन्या स आ शब्दावलीक दृष्टिकोण सँ कथाकार बड्ड प्रशंसनीय कार्य केलन्हि अछि। प्रकाशक सेहो एहि तरहक रचनाकेँ प्रकाशित कए एक नीक परम्पहराक प्रारम्भी केलन्हि अछि।
मैथिली भाषाक सब सँ पैघ समस्या , हमरा एकटा मानवविज्ञानक छात्र हेबाक नाते, ई बुझना जाइत अछि जे जखन ई भाषा लिखल जाइत अछि तँ किछु तथाकथित संस्कृातनिष्ठज ब्राह्मण एवं कायस्थत लोकनिक हाथक खेलौना बनि रहि जाइत अछि। अनेरे संस्कृतक शब्द केँ घुसा-घुसा भाषाकेँ दुरूह बना देल जाइत अछि। छोट जाति, एवं सर्वहाराक शब्दब, विन्यांस, व्यनवहार आदि केँ नजरअंदाज कऽ देल जाइत छैक। सही अर्थमे भाषा माटिक सुगन्ध, आ लोक परम्पवरासँ दूर भऽ जाइत अछि। सर्वहारा वर्गसँ कटि जाइत अछि। एहिना स्थितिमे छोट जाति, स्त्रीोगण आदि अपना-आप केँ भाषाक तागसँ बान्हिल नहि बुझैत छथि। भाषाक प्रति लोकक सिनेह कम भऽ जाइत छन्हि। बाजब धरि तँ ठीक परन्तु् पढ़ब आ लिखब परमपरासँ ई लोकनि अपन नाता समाप्त। कऽ लैत छथि।
मैथिली भाषाक समस्या केवल जाति अथवा समुदाय मात्रसँ नहि छैक। विभिन्नभ सांस्कृनतिक एवं भौगोलिक क्षेत्रक हिसाबे सेहो लोक भाषाकेँ ऊँच-नीच बुझैत छथि। सौराठ (मधुबनी) एवं सौराठ गामक चारु दिशामे पाँच कोस धरिमे उच्चत वर्गक लोकक द्वारा प्रयुक्तं मैथिलीकेँ सर्वाधिक नीक मैथिली , पुन: समस्तीछपुर सँ कनीक दक्षिण दिस आगू गेलाक बाद प्रयुक्तश मैथिलीकेँ निम्नँ श्रेणीक मैथिली बुझल जाइत अछि। दक्षिणमे जे मैथिली बाजल जाइत अछि, तकरा पंचकोसिला लोकनि दछिनाहा , पूबमे व्युवहरित मैथिलीकेँ पुवहा एवं पच्छिम, विशेष रूपसँ सीतामढ़ीमे प्रयुक्त मैथिलीकेँ पछिमाहा भाषा कहि ओकर अपमान करैत छथि।
एहि सभ कारणसँ कुजरा मुसलमान, तेली, सूरी, यादब, बनिया, कोइरी, धानुख आदि अपना आपकेँ मैथिली भाषाक बाजय वला नहि बुझैत छथि। दक्षिण, पच्छिम केर लोककेँ एहन बुझाइ छनि जेना ई लोकनि भाषाक मुख्याधारासँ अलग-थलग होथि। लोकविद्या अथवा फॉकलोर एतेक सम्पयन्नोा होइतो एहि क्षेत्रमे बहुत नीक स्थाेन बनाबयमे मिथिला एखन धरि असमर्थ रहल अछि।
नामकरणक उदाहरण जे ली तँ बुझायत जेना ब्राह्मण एवं कायस्थ् लोकनि संस्कृथतनिष्ठउ नामक प्रयोग करबाक पूरा ठेका लऽ लेने छथि। जरवन कि पंजाबी भाषाक उदाहरण बहुत उल्टा अछि। पंजाबी भाषामे नाम आदि, लोक एवं सामान्यर जनमानस केर हिसाबसँ निर्धारित होइत अछि। गुरु ग्रन्थधसाहेबकेँ एखनहुँ धरि गुरग्रन्थ साहेब, कहल जाइत अछि। स्मररण आइयो सिमरन थीक। फॉकलोर जाग्रत छैक। एकर परिणाम ई होइत छैक जे की स्त्रीण, की पुरुष, की छोट, की पैघ सभ जातिक लोक अपना आपकेँ भाषा, संस्काषर आ संस्कृकतिसँ जुड़ल बुझैत अछि। सब भाषाकेँ अपन हृदयसँ सटेने रहैत अछि।
अतेक सम्प न्नह फॉकलोर रहितहुँ, मिथिलाक फॉकलोरपर किछु विशेष कार्य नहि भऽ सकल अछि। सुभाषजीक कथा-संग्रह एक उल्लेाखनीय कदम थीक। एक तँ सुभाष जी पंचकोसिया नहि छथि आ दोसर ओ ब्राह्मण अथवा कर्ण कायस्थ सेहो नहि छथि। से अपन परिवेशक प्रयुक्त शब्द , वाक्य , परम्प रा, नाम आदिक वेवाक वर्णन कयलन्हि अछि। किताबक सब पन्ना पढ़ि लेलाक बाद अपन ठेठ गाम, गामक परम्पिरा, लोक परिवेश इत्या दि स्मनरण होबय लागत। लोकमे प्रयुक्तप खांटी देसी नाम जेना कि मुनिया, कुसेसर, उपिया, बिहारी, बौकू, सिबननन, रामसरन, रघुनी, नट्टा, नथुनी, बैजनाथ, सकुन आदि पाठककेँ एकाएक गामक ठेठ परिवेशमे मानसिक रूपसँ लऽ जाइत अछि। भाषा सेहो अग्गबब देसी। कुनो बनाबटीपन नहि। जेना सुभाषजी क्षेत्रक लोक बजैत अछि, तहिना ई लिखलन्हि अछि।
एहि तरहक यथार्थवादी परम्पभराक प्रारम्भ, केलासँ मैथिली साहित्यछ सम्पान्ने हैत। वेराइटी बनतैक। पाठकक संख्याप बढ़त। अनेरे संस्कृमतनिष्ठ बनि जेबाक कारण मैथिलीक पाठकक संख्याप लगभग शून्यम जकाँ अछि। स्थिति ई अछि जे लेखक एवं कवि लोकनि स्वभयं किताब छपा मुफ्त बाँटैत छथि। तैयो कियोक पढ़यबला नहि। वेबवर्ल्ड क विकास हेमाक कारणेँ किछु प्रवासी एवं मिथिलासँ बाहर रहनिहार मैथिल आब आइ काल्हि किछु सामग्रीकेँ सर्फ कय देखि लैत छथि। हालांकि इहो लोकनि सब सामग्री मैथिलीमे लिखल पढ़ैत नहि छथि। हिनका सबमे अधिकाधिक लोक अपन कथ्य अंग्रेजीमे व्यखक्त करैत छथि।
सुभाषजी जकाँ अगर आरो लेखक, कवि इत्याेदि आगाँ आबथि तँ यथार्थवादी परम्पजरा समृद्ध हैत। मैथिलीमे नव-नव शब्दा वली विकसित हैत। सब क्षेत्र, सम्प्रीदाय, जाति, वर्गक लोक मैथिलीक संग सिनेह करताह। मैथिली पढ़बाक प्रति जाग्रत हेताह। कोसी, कमला, जीबछ, करेत, गंडक, बूढ़ी गंडक आ गंगाक बीच संगम हैत। मैथिली किछु विशेष केर हाथक खेलौनासँ ऊपर उठि सर्वहाराक भाषा बनत।
आब सुभाषजीक कथा-संग्रहक कथा-वस्तुो पर कनी विचार करब जरूरी। कथा-वस्तुाक दृष्टियें सेहो लेखक अपन परिवेशसँ बान्हरल छथि। कथा सभमे लेखककेँ परम्पसराक नीक तत्वक प्रति सिनेह, पाखण्डबक प्रति विद्रोह, एक निम्नल-मध्यकम वर्गक बेरोजगार शिक्षित युवक केर फ्रर्स्टेिशन, एक युवकक सुन्द र नायिकाक प्रति आकर्षण, कोसीक कहर, गाममे परिवर्तन केर प्रवाह, गामक समस्याँ, यात्रा-वृतान्तो, मोनक अन्तःवद्वन्द, सुन्दसरता आ सुन्दधरताक प्रति मृगतृष्णा आदिक मनोवैज्ञानिक आ सहज वर्णन भेटत।
‘‘बनैत बिगड़ैत’’ कथामे माए-बापक मनोदशा, जकर संतान बाहर रहैत छैक, नीक वर्णन कएल गेल छैक। कथाक मुख्य्पात्र माला टाँहि-टाहि करैत कौवाक आवाजसँ डरैत अछि। ओकरा हकार दैत उड़बै चाहैत छैक। लेकिन ‘‘टोकारा आ थपड़ी सँ नै उड़ै छै तऽ माला कार कौवा के सरापय लागै छै — “बज्जटर खसौ, भागबो ने करै छै”।
परदेसमे रहि रहल संतान सबहिक प्रति मालाक मनोदशा लेखक किछु ऐना लिखैत छथि:
कौका कखनियें सँ ने काँव-काँव के टाहि लगेने छै। कौवाक टाहि सँ मालाक कलेजा धक सिन उठै छै। संतान सब परदेस रहै छै। नै जानि ककरा की भेलैक! ने चिट्ठी-पतरी दै छै, ने कहियो खोज-पुछारि करै छै। कते दिन भऽ गेलै। कुशल समाचार लय जी औनाइत रहै छै। लेकिन ओकरा सब लेखे धन सन। माय-बाप मरलै की जीलै तै सँ कोनो मतलब नै।
“हे भगवान, तूही रच्छा करिहबु। हाह। हाह।”—
माला कौवा संगे मनक शंका आ बलाय भगाबय चाहै छै।”

आ मालाक बात पर हमरा जनैत लेखक सत्तोंक माध्य मसँ अपन विस्म य व्याक्तब करैत छथि। मायक मनोविज्ञानक तहमे जयबाक प्रयत्ने करैत छथि:
माला सब बेर अहिना करै छै। सत्तो लाख बुझेलक बात जाइते नै छै। कतेक मामला मे तऽ सत्तो टोकितो नहि छैक। कोय परदेस जाय लागल तऽ माला लोटा मे पानि भरि देहरी पर राखि देलक। जाय काल कोय छीक देलक तऽ गेनिहार केँ कनी काल रोकने रहल। अइ सब सँ माला केँ संतोख होइ छै, तै सन्तोंि नै टोकै छै। ओकरा होइ छै टोकला सँ की फैदा ? ई सब तऽ मालाक खूनमे मिल गेल छै। संस्काटर बनि गेल छै।
सन्तो्केँ छगुन्ताक होइ छै। यैह माला कहियो अपन बेटा–पुतौह आ पोती सँ तंग भऽ कऽ चाहैत रहै जे ओ सब कखैन ने चैल जाय । रटना लागल रहै जे मोटरी नीक, बच्चा नै नीक। सैह माला अखैन संतान खातिर कते चिंतित छै।”
अही तरहें अपन खिस्साब ‘कनियाँ-पुतरा’ मे लेखक ट्रेनमे ठाढि़ एक बारह बर्षक लड़की आ लड़कीक निश्छल व्यखवहारसँ आत्मविभोर भय, लड़की सँ एहन सम्बकन्ध़ बना लैत छथि जेना जो लड़कीक भाय अथवा पिता होथि। ट्रेनक व भीर भरल बोगीमे ठाढि़ लड़कीक छाती जखन कथाक सुत्रधारक हाथ सँ सटैत छैक तँ लड़कीक निर्विकार मुद्रासँ एना बुझना जाइत छैक जेना ‘ ऊ ककरो आन संगे नै, बाप-दादा या भाय-बहीन सँ सटल हो।’
लड़कीक भविष्यपर लेखक द्रवित होइत सूत्रधारक माध्य मसँ सोचय लगैत छथि : “ओकर जोबन फुइट रहल छै। ओकरा दिस ताकैत हम कल्पोना कऽ रहल छी। अइ लड़कीक अनमोल जोबनक की हेतै? सीता बनत की दरोपदी ? ओकरा के बचेतै ? हमरा राबन आ दुरजोधनक आशंका धेरने जा रहल ऐछ।”
‘ओ लड़की’ नामक कथामे सुभाष बाबू निम्न वर्गीय दब्बूडपनीक मनोदशाक वर्णन करैत छथि। जखन एक आधुनिका अपन हाथक ऐँठ पात्र नवीनकेँ थमाबय चाहैत छैक, तँ सूत्रधार बाजि उठैत अछि:
“सवाल खतम होइते नवीनक नजरि लड़कीक चेहरा सँ उतरि के ओकर हाथक कप पर चलि गेलै आ ओ अपमान सँ तिलमिला गेल। ओकरा भीतर क्रोध आ धृणाक धधरा उठलै। की ओ ओहि दुनूक अँइठ कप ल’ जायत ? लड़कीक नेत बुझिते ओ जवाब देलकै — ‘नो’। ओकर आवाज बहुत तेज आ कड़ा रहै आ मुँह लाल भ’ गेल रहै। ओकरा ओहि बातक खौंझ हुअए लगलै जे ओकर जवाब एहन गुलगुल आ पिलपिल किए भ’ गेलै। ओ कियैक नहिं कहि सकलै -हाउ डिड यू डेयर?’ तोहर ई मजाल ! मुदा ओ कहि नहिं सकलै। साइत निम्नवर्गीय दब्बूेपनी आ संस्काुर ओकरा रोकि लेलकै।”
- डॉo कैलाश कुमार मिश्र
(कैलाश जी इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्रमे स्कॉलर छथि आ कतेक प्रदेशमे मानवशास्त्रीय फील्डवर्कक क्रममे घूमल छथि। फॉक म्युजिक ऑफ मिथिलापर पी. एच.डी. छथि आ मिथिला चित्रकलापर हिनकर आलेख एहि विषयपर सभसँ नीक प्रबन्ध मानल जाइत अछि।)

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शनिवार, 4 जुलाई 2009

नताशा 14 (चित्र-श्रृंखला पढ़बाक लेल नीचाँक चित्रकेँ क्लिक करू आ आनन्द उठाऊ।)

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शुक्रवार, 3 जुलाई 2009

कखन होएत भोर-सुस्मिता पाठक

कखन होएत भोर

आइ काल्हिक राति

बहुत नमहर होब’ लागल अछि

दिनक अपन रातिमे पूछैत अछि

परिचय


हवा आतंकित

अन्धकार स्तब्ध

चुप्पीकें चीरैत

सर्द घामसँ जागल चेहराकें

भिजा दैत अछि

हल्लुक सन आहटि

आ कोनो छोटो सन ठक-ठक

एक क्षणक मृत्युक अनुभव

आँचरमे सटि जाइत अछि


घड़ी भ’ गेल अछि बन्न

अथवा ई राति बितबे नहि करत

नहि जानि कखन चिड़ै अनघोल करत

कखन बाजत घण्टी

भोर कखन होएत

कखन होएत भोर


जे कखन फूल फुलएबाक

बचा लेबाक लेल लहलहाइत फसिल

कखन, कोन राति क्यो गढ़त हथियार

सर्द चुप भेल मृत राति

आ सन्देहास्पद आहटि

ठक-ठक केर विरुद्ध

कि भोर कखन होएत

कखन होएत भोर

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बुधवार, 1 जुलाई 2009

बाल कथा- राजा ढोलन

राजा ढोलन
गढ़ नारियलक राजा दक्ष रहए। ओ राजा बड्ड प्रतापी छल। मुदा ओकरा राज्यमे कोनो हाट-बजार नहि रहए। राजा सोचलक जे हमर राज्यमे हाट कोना लगत? से राजा अपन राज्यमे ढोलहो पिटबा देलक जे हमरा राज्यमे हाट लागत आ जकर जे समान नहि बिकाओत से हम कीनि लेब। सम्पूर्ण राज्यक लोक आबए लागल आ हाट लगबए लागल। एहि प्रकारेँ सभ दिन हाटमे जे समान बचि जाइत छल, तकरा राजा कीनि लैत छल। एहिना कतेक दिन बीति गेल। एक बेर एकटा सूतबला सूत बेचए लेल ओतए आएल मुदा तावत हाट उठि गेल रहए आ ओकर सूता नहि बिकाएल। राजा ओकर सूत सेहो कीनि लेलक।
मुदा जहियासँ राजा सूता किनलक तहियेसँ ओकर अबस्था घटए लागल। किछु दिनुका बाद राजाक हालति गरीब जेकाँ भऽ गेल। राजा अपन स्त्रीसँ कहलक-अम्बिका सुनू। अपन राज्यमे गरीबी पसरि गेल अछि। आब अपन राज्य रहबा योग्य नहि रहल। ओतए सँ राजा बिदा भेल आ जाइत-जाइत कोनो देशमे पहुँचल। ओहि देशक नाम गढ़पिंगल रहए। ओतुक्का राजाक नाम सेहो देशक नामपर छल। गढ़पिंगल राजाक ओही नगरमे गढ़नारियल राजा घुमैत-घुमैत पहुँचि गेल आ कहए लागल जे हे भाइ हमरा कियो नोकरी राखत ? राजा कहलक-हँ। हमरा एकटा नोकरक जरूरी अछि। एकरा राखि लिअ। गढ़पिंगल राजाकेँ एक सए नोकर रहए आ ओकरा एकटा आर नोकरक आवश्यकता रहए कारण ओकरा लग १०१ टा घोड़ा रहए। ओ राजाक एहिठाम रहि गेल आ सभ दिन घोड़ाक घास लेल जाए लागल आ घास छीलि कए आनए लागल। गढ़नारियलक राजा दक्षक स्त्री गर्भवती रहए आ गढ़पिंगलक राजाक स्त्री सेहो गर्भवती रहए। आ संयोग एहन रहल जे दुनू राजाक स्त्री एक्के दिन जन्म दैत अछि। पिंगलक राजा ब्राह्मण बजा कए ज्योतिष देखेलक आ राजा अपन पुत्रीक नाम राखलक आ कहलक जे एकर नाम मडुवन किएक अछि। ब्राह्मण कहलक जे एकर बियाह छठी रातिकेँ होएत। राजा ओही दिनसँ अपन राज्यमे ताकैत-ताकैत थाकि गेलथि मुदा हुनका ओ नहि भेटल। राजाक खबासिनी कहलक जे अहाँ सभ चिन्ता किएक करैत छी। राजा साहब पछिला बेर जे नोकर रखने छथि हुनका एहिठाम एकटा लड़का जन्म लेने अछि। ओकरे संग बियाह करा देल जाए। ओहि बच्चाक नाम राशिक अनुसार राजा ढोलन राखल गेल छल। गढ़पिंगलक राजा सोचलक जे ई बड्ड नीक गप अछि, जखन ई लगेमे अछि तँ ओकरे संग बियाह करा देल जाए। दिन तँ ताकले रहए से ओही छठिक रातिमे बियाह भए गेल। किछु दिनुका बाद राजा दक्ष कहलक जे आब एतए रहबाक योग्य नहि अछि। आब अपन देश जएबाक चाही।
राजा जाहि साढ़ीनपर चढ़ि कए आएल रहथि ओहि साढ़ीनकेँ कहलन्हि जे साढ़िन आब अपन देश चलू। आब साढ़ीपर चढ़ि कए राजा-रानी बिदा भेलाह। किछु दूर रस्तामे गेलाह तँ एकटा बोन भेटलन्हि। ओहि बोनमे रस्ताक कातमे एकटा पोखरि रहए। ओही पोखरिक महारपर दू टा बाघ-बाघिन रहैत छल। राजा सोचलक जे हमर सभक बच्चा जखन एहि रस्तासँ अपन सासुर जएताह, तखन ई बाघ हमर बच्चा सभकेँ खा जाएत। ताहि द्वारे एकरा मारि देनाइ ठीक होएत। राजा बाघकेँ मारि देलक आ आगाँ चलल तँ बाघिन कहलक जे राजा तूँ हमरा जेना राँड़ कए जा रहल छह, ओहिना तोहर बेटा जखन अपन सासुर जेतह तँ गढ़पीपली राजमे ओकर कनियाँकेँ हमहू राँड़ कए देबैक।
बाघिनक ई अबाज मात्र राजा सुनलक। राजा अपन घर पहुँचि कए ई गप ककरो नहि कहलक। ओ अपन साढ़िनकेँ एकटा पैघ खधाइ खूनि कए ओहिमे धऽ देलक कारण बाहर रहलासँ ओ ई गप ओकर बच्चाकेँ सुना दैत। ओही समय छोट बालककेँ अपन फुलवाड़ीक रेखा-पेखा मालिनक संग दए देलक। ओकर दुनू बहिन ओकरा बड्ड नीक जेकाँ सेवा करए लगलीह। एहिना करैत किछु दिन बीति गेल तँ ई बच्चा समर्थ भऽ गेल आ तखनो ओकरा किछु बूझल नहि भेलैक। ओम्हर ओ मड़ुअन कन्याँ सेहो पैघ भऽ गेलि। कन्या युवा भऽ गेलि तँ ओहि सखी सभक घुमैत फिरैत हुनका कोनो संगी कहलक जे हे बहिन। आब अहाँ समर्थ भऽ गेलहुँ। अहाँक पिताजी अहाँक बियाहक विषयमे किछु नहि सोचि रहल छथि। ई बात सुनि कए कन्याँ बड़ चिन्तामे पड़ि गेलीह। अपन महलमे जा कए ओ पलंगपर पड़ि रहलीह आ खेनाइ त्यागि देलन्हि। एहिपर ओकर माए कन्या लग जाए कहलक, बेटी अहाँ खेनाइ किएक नहि खाइत छी ?
कन्याँ बाजलि-माए। सखी सभ बड्ड किचकिचबैत अछि। ताहि द्वारे हमरा भूख नहि लगैत अछि। माए कहलक- अहाँकेँ की कहि किचकिचबैत छथि?
कन्याँ बाजल-ओ सभ हमरा कहैत छथि जे अहाँक पिताजीकेँ कोन चीजक कमी अछि, जे अहाँक पिताजी अहाँक बियाह नहि करा रहल छथि?
माए कहलक- – बेटी अहाँक बियाह छठीक रातिमे भए गेल अछि। अहाँक सासुर गढ़नारियलमे अछि। नहि जानि ओ किएक नहि अबैत छथि?
ई सुनि कन्याँ कहलक जे हमरा जबुनाक कातमे एकटा मकान बना दिअ आ सभ वस्तुक व्यवस्था कए दिअ। हम बारह बरिख धरि सदाव्रत बाँटब। एतेक सुनि राजा ओहिना कएलक। मड़ुवन कन्याँ जबुनाक कातमे सदाव्रत बँटनाइ शुरू कए देलक।
बनिजारा सभ वाणिज्य करबाक लेल गढ़नारियलसँ गढ़-पिन्गल जा रहल छलाह। बनिजारा सभ जखन गढ़-पिन्गल पहुँचलाह तँ जबुना धारक कातसँ होइत आगाँ बढ़ि रहल छलाह। जाइत-जाइत ओ सभ ओहिठाम पहुँचलाह जतए मड़ुवन कन्या सदाव्रत बाँटि रहल छलीह। ओ कन्याँ पुछलक-अहाँ सभ कतए जा रहल छी आ कतएसँ आएल छी। बनिजारा बाजल-हम सभ गढ़नारियलसँ आएल छी आ गढ़पिन्गलमे हीरा-मोतीक वाणिज्य करैत छी। कन्याँ बाजल-अहाँ वाणिज्य कए घुरब तँ हमर एकटा पत्र लए जाएब?
बनिजारा बाजल-अहाँ पत्र लिखि कए राखब, हम जरूर लए जाएब। बनिजारा जखन घुरल तँ ओ पत्र लए चलि गेल आ जखन गढ़ नारियल पहुँचल तँ हरेबा-परेबा जे दुनू बहिन छलि-आ बड्ड पैघ जादूगरनी छलि- ओ जादूक जोरसँ पता लगा कए राजाकेँ खबरि कएलक आ बनिजारासँ ओ पत्र लऽ कऽ ओकरा आगिमे जरा देलक आ ओहि राजाक बेटाकेँ एकर पता नहि चलए देलक। कन्याँक ई पत्र मारल गेल। ओ बेचारी बाट तकैत रहल। किछु दिन बीतल। ओ कन्याँ एकटा सुग्गा पोसने छलीह। ओ सुग्गासँ पुछलक-की तूँ हमर पत्र लए जा सकैत छह। सुग्गा बाजल-हँ। हम पत्र राजाकेँ दए देब। कन्याँ पत्र लिखि कए सुग्गाक गरदनिमे लटका देलक आ कहलक- जाऊ।
सुग्गा ओतएसँ बिदा भेल। सुग्गा आकासमे उड़ि बिदा भेल आ पहुँचल गढ़नारियल राज्य जतए हरेबा-परेबा आ राजा ढोलन रहथि। सुग्गा उड़ि कए ओकर कान्हपर बैसि गेल, ठोंठसँ सूता काटि कए खसेलक। ओहि समय हरेबा-परेबा राजा ढोलनक फुलवारीमे बैसल रहए। ठंढ़ीक मौसम छल। आगि पजारि कए बैसल छल। जखने ओ पत्र खसेलक तखने मालिन ओहि पत्रकेँ आगिमे धऽ देलक। राजा ढोलनकेँ बड्ड तामस उठलैक। दुनूकेँ दू-दू चमेटा मारलक आ कहलक जे तूँ दुनू गोटे एतएसँ चलि जो। दुनू बहिन पकड़ि कए ओकरा मनाबए लागल। कन्याँक ओहो पत्र खतम भए गेल। कन्याँ बहुत चिन्तामे पड़ि गेल। बहुत समय आर बीति गेल।
एक दिन जबुनाक किनारसँ एकटा महात्मा जोगी रूपमे जा रहल छल। कन्याँक नजरि ओहि महात्मापर पड़ि गेल। कन्याँ बड्ड चिन्तित भए कानि रहल छलीह। ओ साधु महात्मा कन्याँक कननाइ सुनि अएलीह आ कारण पुछलक।
कन्याँ सभटा हाल बतेलक ।
महात्मा कहलक जे तूँ एकटा पत्र लिखि कए हमरा दे आ हम ओ पत्र ओतए पहुँचाएब।
कन्याँ पत्र लिखि कए महात्माकेँ देलक। महात्मा ओतएसँ बिदा भेल।
कन्याँ महात्माकेँ गाँजा,भाँग आ हफीम देलक। महात्मा ओकरा खाइत-पिबैत ओतएसँ बिदा भेल। किछु दिनुका बाद महात्मा गढ़नारियल पहुँचल, जतए हरेबा-परेबा आ राजा ढोलन रहए। ओ फुलबारीक बीचमे अपन डेरा खसेलक। रातुक मौसम छल। भोर होइ बला छल। ओही समय महात्मा एकटा मोहिनी बाँसुरी निकाललक आ बजबए लागल। ओहि बाँसुरीक अबाज सुनि राजा ढोलन उठल आ चलबा लए तैयार भेल तँ दुनू बहिन ओहि बाँसुरीपर बहुत रास जादू-गुण चलेलक। मुदा महात्माक किछु नहि बिगड़ल। राजा ढोलन उठल आ दुनूकेँ दू-दू लात मारि महात्मा लग गेल। साधुजी ओहि पत्रकेँ निकालि कऽ राजा ढोलनकेँ देलन्हि। आर से पढ़ि राजा ढोलन तामसे विख-सबिख भए गेल आ ओतएसँ घर गेल आ एकटा तलबार लए पितासँ पूछए लागल जे बताऊ जे ई हमर बियाह कतए भेल अछि ? पिताकेँ ओ बाघिन मोन पड़ि गेलैक से ओ झूठ बाजल आ कहलक जे हम तोहर बियाह नहि करबेने छियहु।
तामसे भेर भए ओ ओहि पत्रकेँ राजाक सोझाँ राखलक। राजा ओ पढ़ि बड्ड चिन्तामे पड़ि गेल।
ओ अपन बेटाकेँ कहलक। देखू बेटा। अहाँक बियाह हम छठीक राति कएने छी आ गौना एहि द्वारे नहि कएलहुँ कारण अबैत काल हम एकटा बाघकेँ मारि देलहुँ। फेर ओ सभटा खिस्सा कहि सुनेलक आ कहलक, जे ओ डरे ओकर गौना नहि करेलक।
ढोलन बाजल-हमर सवारी कतए अछि। हमर सवारी दिअ।
राजा कहलक-साढ़नी तँ तरहाराक नीचाँ अछि। ओ जीवित अछि वा मरि गेल से नहि जानि।
राजा ढोलन तरहराक नीचाँ सँ साढ़िनकेँ बहार कएलक तँ साढ़िनक देहमे पिल्लू लागि गेल छल। ओ ओकरा साफ कएलक आ ओकरा चना-चबेना खुअएलक। खुआबैत-खुआबैत ओ पहिने जेकाँ तन्दरुस्त भए गेल।
राजा ढोलन बाजल-साढ़िन, तोहर पैर बहुत दिनसँ बान्हल छह। तूँ चौदह कोसक रस्ताकेँ एक दिनमे चारि चौखड़ लगा दिअ तँ हम बुझब। हम सभ फेरसँ गढ़पिंगल पहुँचब। साढ़िन अपन चालि एक दिनमे बना लेलक। राजा ढोलन अपन सासुर बिदा भेल। साढ़िनपर स्वार भए अपन कान्हपर बन्दूक लेलक आ बिदा भेल। चलैत-चलैत ओ ओही बोनमे पहुँचल। ओही रस्तासँ ओ सभ जा रहल छल, जतए ओ बाघिन रहैत छलीह। बाघिनकेँ राजा ढोलन देखलक आ ओहि बाघिनकेँ मारि देलक। फेर ओ अपन सासुर गढ़पीपली गेल आ फूल बगानमे डेरा खसेलक। साढ़नीकेँ ओ ओतहि छोड़ि फूल-बगानकेँ तोड़ि-तारि कए तहस-नहस कए देलक। मालिन कहलक जे तोरा राजासँ पिटान पिटबेबउ आ जतेक तोँ बरबादी कएने छँह तकर हरजाना लेबउ। राजा ढोलन बाजल- जो तोरा जे करबाक छौक कर।
मालिन तामसे बिदा भेलि आ राजा लग गेलि। राजासँ कहलक।
राजा पुछलक जे ओ कतुक्का अछि।
मालिन कहलक जे ओ अपन घर गढ़नारियलक बतेलक अछि।
राजा अपन सिपाही सभकेँ पठेलक। ओ सभ ढोलनकेँ पुछलक-अहाँ कतुक्का छी आ कतएसँ आएल छी।
ढोलन बाजल- हमर घर गढ़ नारियल अछि आ हम अपन सासुर गढ़पिंगल- ओतहिसँ आएल छी।
सिपाही सभ ई गप राजाकेँ जा कए कहलक।
राजा प्रसन्नतासँ स्वागत कए डोलीमे बैसा कए ढोलनकेँ अपना घर अनलक। किछु दिनुका बाद राजा अपन बेटी-जमाएकेँ गढ़-पिंगलसँ गढ़ नारियलक लेल बिदा केलक। ओतए सँ राजा ढोलन आ ओ मड़ुवन कन्याँ अपन घर गेल आ अपन राज्य करए लागल।

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मिथिलाक खानपान...

मिथिलाक खानपान-नीलिमा चौधरी आ राखी साह... मखानक खीर सामग्री- दूध-१ १/२ किलो, चिन्नी-१०० ग्राम, मखान कुटल- १०० ग्राम, इलाइची पाउडर- स्वाद अनुसार, काजू- १० टा, किशमिश-२०टा बनेबाक विधि- मखानक पाउडर (कनी दरदरा)क पहिने १/२ किलो ठंढ़ा दूधमे घोरि लिअ, शेष दूध केँ खौला लिअ। आब गर्म दूधमे ई घोड़ल मखानक मिश्रण मिला दियौक आर करौछसँ लगातार चलबैत रहियौक जाहिसँ मिश्रण पेनीमे बैसय नहि। .... (आगाँ पढू)

मिथिलांचलक विकास..

मिथिलांचलक विकास... मिथिलांचल क्षेत्र बिहार मे सबस पिछड़ल मानल जाइत अछि, अगर प्रतिव्यक्ति आय , साक्षरता और प्रसवकाल मे जच्चा-बच्चा के मृत्यु के मापदंड बनायल जाय तो मिथिलांचल देश के सबस गरीब आ पिछड़ल इलाका अछि। एकर किछु कारण त अहि इलाका के भौगोलिक बनावट अछि... (आगाँ पढू)

मिथिला अरिपन....

मिथिला चित्रकला- स्त्री आ पुरुषक दशपात अरिपन / स्वास्तिक अरिपन... स्त्रीगणक दशपात अरिपनकन्याक मुण्डन,कान छेदन आ' विवाहक अवसर पर कुलदेवताक घर आकि मण्डप पर बनाओल जाइत अछि।बनेबाक- विधि। एकर बनेबाक विधि सूक्ष्म अछि।ऊपरमे तीन पातक पुष्प, ,ओकरनीँचा पाँच-पातक कमल-पुष्प,ओकर नीचाँ सात-पात युक्त्त कमल, बीचमे अष्टदल कमल अछि। दश पात चारू दिशि अछि। नौ टा माँछक चित्र सेहो अछि... (आगाँ पढू)

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एक विलक्षण प्रतिभा जिनका हम सदिखन याद करैत छी (प्रथम कड़ी) - कुसुम ठाकुर..... एक बेर हमारा एक पत्रिका में किछु लिखय लेल कहल गेल छल, ई सन् १९९६ क गप्प थिक। हम बस एतबे लिखी सकलौं "हम की लिखी हमर त लेखनिये हेरा गेल"। मुदा आई बुझना जैत अछि जे नै, हमारा एकटा कर्तव्यक निर्वाहन... (आगाँ पढू),
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चिनबारक दीप–उषा किरण खान... समस्तीपुर मे गाड़ी बदली कऽ महेसरी अइमे बैसलि सरिया कऽ। आब घर बेसी लग आयल जाइत छैक। चारि टीसन आ छैक, फे तऽ टीसन सऽ एक कोस जमीन हैतै। चारि-पाँच गोटाक हेंज छैक्। बौआइत-बतियाइत गाम पहुँचि जयतै। आठे दिनुका दिन छैक, की सब करतै? एह, करऽक की छैक? सभटा बस्तुजात तऽ कीननहिं जाइत छैक.... (आगाँ पढू)

बिदेसिया (संकल्पित नाटिका)

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पाँच पत्र...

पाँच पत्र-हरिमोहन झा... प्रियतमे अहाँक लिखल चारि पाँती चारि सएबेर पढ़लहुँ तथापि तृप्ति नहि भेल। आचार्यक परीक्षा समीप अछि किन्तु ग्रन्थमे कनेको चित्त नहि लगैत अछि। सदिखन अहींक मोहिनी मूर्ति आँखिमे नचैत रहैत अछि। राधा रानी मन होइत अछि जे अहाँक ग्राम वृन्दावन बनि जाइत, जाहिमे केवल अहाँ आ हम राधा-कृष्ण जकाँ अनन्त काल धरि विहार करैत रहितहुँ... (आगाँ पढू)

कथा- माउगि

कथा- माउगि - विभा रानी.... माउगि, माउगि, गे माउगि, गे माउगि! तों माउगि, हम माउगि, ई माउगि, ऊ माउगि - सभ किओ माउगे-माउगि। ऊँहूँ - सभ किओ भला माउगि हुअए। ई तय कर' बाली तों के? अएं गे? तोरा कहिया स' भेटलौ ई हक? ई सभ काज-धंधा हमरा आओरक अछि - हमरे आओर के करे दें। देख त' कने, तोहरो आओर के कतेक रंग-बिरंगा रूप दिया देलियौ! माउगि, गे माउगि.... (आगाँ पढू)

मातृत्व...

डा. मंजू गीता मिश्राक आलेख : मातृत्व.... नारी जीवनक सबसँ गौरवशाली एवं सुखद अनुभव थिक मातृत्व ।ई नारी जीवनक परिपूर्णताक प्रतीक अछि । पूरा नौ मास अपन गर्भमे फलैत-फूलैत एक शिशुक अपन जान सँ बेसी देखभाल करैत छथि । तत्पश्चात एक फूल सन सुन्दर सुकोमल शिशु जन्म लैत अछि, यैह स्त्रीक सबसँ अनमोल उपहार एवं आनन्ददायक क्षण थिक । एहि नौ मासक दौरान गर्भवतीक भोजन एवं वातावरण पर निर्भर करैत अछि.... (आगाँ पढू)
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मैथिल आर मिथिला
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