रविवार, 30 अगस्त 2009

विद्यापतिक शिवसिंह- रमानाथ झा

विद्यापतिक शिवसिंह



अपन अनुपम कृति कीतिलताक प्रस्तावनामे विद्यापति कहने छथि जे



तिहुअन खेत्तहिं काञि तसु कित्ति-वल्लि पसरेइ।

अक्खर खम्हराम्भ जइ मञ्चा-बन्धि न देइ।।



आशय स्पष्ट अछि। संस्कृतमे कहबी छैक जे "कीर्त्तिरक्षरसम्बद्धा"। ताहिमे कीर्त्तिमे
वल्लीक आरोप कए कवि साज़् रूपकक विच्छित्ति दए अपन उक्तिकें कविताक स्वरूप देल

अछि। एहिमे सन्देह नहि जे काव्यप्रतिभा जन्मजात होइत अछि ओ कविक ह्यदयक उमड़ैत भाव
स्वतः भावानुकूल वाणी द्वारा कवितारूपें निःसृत होइत अछि। भवभूति कहने छथि जे "पूरोत्पीड़े
तड़ागस्य परीवाहः प्रतिक्रिया" ओ शोक एवं क्षोभमे भलहिं प्रलापहिं ह्यदय धैर्य प्राप्त करओ परन्तु
कविता-रूप परीवाह अनायास ओहि ह्यदयक हेतु होइत छैक जे आनन्दक भावसँ उमड़ल रहैत
अछि। बहुजनसुखाय बहुजनहिताय अवश्ये कविताक रचना होइत अछि मुदा ई मानए पड़त जे
ओकर प्रथम लक्ष्य रहैत अछि स्वान्तः-सुखाय। तें ई मानबामे कोनो विप्रतिपत्ति नहि जे विद्यापति
अपन बहुविध कविताक रचना अपनहि आनन्दक अतिरेकमे कएल। तथापि ओहि स्वान्तःसुखाय
लाभक सज़् सज़् अपन आश्रय, अपन मित्र, अथवा अपन हितैषीकें अमरत्व प्रदान करब सेहो
हुनका उद्देश्य अवश्य छलैन्हि, नहि तँ अपन गीतक भनितामे एतेक व्यक्तिक नाम दए दए ओहि
सबहुँ व्यक्तिक कीर्त्तिवल्लीकें पसरबाक हेतु ओ अक्षरक खाम्ह बनाए मचान नहि बान्हि जैतथि।



मिथिलाक इतिहासमे शिवसिंह ओ विद्यापतिक साहचर्य बड़ मधुर प्रसज़् अछि। शिवसिंह
जँ राजकुलमे

उत्पन्न भेल छलाह तँ विद्यापति राजमन्त्रीक कुलमे, ओ सए वर्षसँ अधिक दिन धरि मिथिला-
राज्यक शासनसूत्र ओ मैथिल समाजक नेतृत्व हिनकहि घरमे छलैन्हि। महाराज शिवसिंहक ओ
बालसखा छलाह, अन्तरज़् मित्र छलाह, वि•ास्त सचिव छलाह,महाराज-पण्डित छलाह,
राजकवि छलाह। शिवसिंह बड़ प्रतापी राजा भेलाह। मिथिलामे कहबी छैक जे



पोखरी रजोखरि आ'र सब पोखरा।

राजा शिवैसिंह आ'र सब छोकरा।।



परन्तु शिवसिंहक सभटा प्रताप विस्मृतिक गर्तमे गड़ि गेल रहैत ओ ई फकड़ा मात्र
हुनक प्रतापक गौरवकें ख्यापित करैत हुनक नामकें मन पाड़ैत रहैत यदि विद्यापति अपन
अनेकानेक रचनामे हुनका अमर नहि कए गेल रहितथि। पुरुष-परीक्षाक अवसन्न-बिद्य-कथामे
विद्यापति राजा ओ कविक सम्बन्धक प्रसज़्मे कहैत छथि जे सृष्टिक आदिकालहिसँ जे राजा
लोकनि वाक्कलागौरवक हेतु कवि लोकनिकें आराधि आराधि गैल छथि



तेषां नाम सरस्वती-परिणतावद्यापि संगीयते।

जाताः के न मृता न के तदितरे ज्ञाता न गेहाद् बहिः।।



वस्तुतः "यशसां स्थापनस्थानं कविभाषितं" ई कथा जतेक शिवसिंह-विद्यापतिक प्रसज़्मे
चरितार्थ भेल अछि ततेक आओर कहाँ देखैत छी?



ओना तँ विद्यापति अपन प्रभु शिवसिंहक कीर्तिकपताका सएह फहराए गेल छथि परन्तु
कीर्त्तिपताका नष्ट भए गेल लुप्तप्राय अछि। कीर्त्तिपताका कहि जे ग्रन्थ प्रकाशित भेल अछि
तकर प्रस्तावनामे "जगतसिंह"क कीर्तन अछि! परन्तु जतबओ विद्यापतिक रचना उपलब्ध अछि,
निश्चित रूपसँ विद्यापतिक रचना प्रमाणित होइत अछि, ततबहुसँ शिवसिंहक सम्बन्धमे बहुतो
ज्ञातव्य विषय ज्ञात भए जाइत अछि। आश्चर्य होइत अछि जे शिवसिंह जे किछु विद्यापतिक हेतु

कएने होइथिन्ह ताहिसँ ओ बुझने होएताह जे ओ अपन बाल-सखाकें उपकृत करैत छथि, कवि
अपनहु एकरा उपकारे मानने होएताह, ओ सबसँ बेसी तँ ओहि समयक लोक सब--कतोक तँ
ईष्र्यालु समेत भए--इएह कहने होएताह जे महाराज अपन बालसङ्गीतकें धन ओ सम्मान सब
कथूसँ परिपूरित कए देल। परन्तु आइ जखन दुहू महापुरुषक परस्पर सम्बन्धक दिशि दृष्टिपात
करैत छी तँ स्पष्ट प्रतीत होइत अछि जे उपकार तँ विद्यापति कएलथिन्ह शिवसिंहक जे हुनका
अमर कए गेलथिन्ह। राजा जे किछु देलथिन्ह से अनित्य छल, नष्ट भए गेल, लोक बिसरि
गेल, परन्तु कवि जे किछु हुनका दए गेलथिन्ह से नित्य अछि, एखन पर्यन्त ओ ओहिना अछि
वा ई कहू जे जँ जँ लोककें ओहि समयक स्मृति क्षीण भेल जाइत छैक तँ तँ अन्धकारक प्रकाश
जकाँ महाकविक वाणीमे उपनिबद्ध शिवसिंहक कीर्त्ति आओर तीक्षणतासँ आलोकित भए रहल
अछि।



विद्यापतिक रचनामे शिवसिंहक प्रसज़् यावतो वर्णनक संग्रह कए ओकर क्रमबद्ध अध्ययन
एक गोट बड़े रोचक ओ उपादेय विषय होइत परन्तु ताहि हेतु एक गोट क्षीणकाय निबन्ध
पर्याप्त नहि होएत। पुरुष-परीक्षामे अनेक ठाम शिवसिंहक प्रशंसा अछि, स्तुति अछि। कमसँ कम
दू गोट गीत केवल शिवसिंहक वर्णनमे उपलब्ध अछि। परन्तु सबसँ चमत्कारक अछि
विद्यापतिक ओ गीत सब जाहिमे भनितामे शिवसिंहक नामतः उल्लेख अछि। विद्यापतिक भनिता
केवल विधि-रक्षार्थ टा नहि अछि, कवि ओहिमे केवल अपन नाम वा उपाधि अथवा अपन आश्रय
किंवा जनिक प्रमोदार्थ ओहि गीतक रचना भेल तनिक नामक कीर्तन मात्रे कएकें नहि छोड़ि देने

छथि, अपितु ओहिमे बहुधा ओ अपन उक्ति बड़े मार्मिक रूपसँ अभिव्यक्त कएने छथि।
गोविन्ददासहुक रचनामे भनिता एहिना सार्थक अछि, साभिप्राय अछि। हुनक परवर्ती कवि
लोकनि भनिताकें केवल व्यवहार बनाए लेल। ताही कारणें विद्यापति वा गोविन्ददासहुक
भनिताक महत्त्व साधारणतया लोककें आकृष्ट नहि कए सकलक ओ विद्यापतिक भनिताक
स्वतन्त्र रूपसँ अध्ययन एकन पर्यन्त नहि भेल अछि। केवल श्रद्धेय डाक्टर श्रीविमानविहारी
मजुमदार साहेब एकर महत्त्वकें बुझलैन्हि अछि। हुनक एक गोट लेख एहि प्रसज़् बिहार रिसर्च
सोसाइटीक जर्नलमे 1942 मे प्रकाशित भेल छल तथा विद्यापतिक गीतक जे संग्रह ओ
सम्पादित कएल अछि ताहिमे भनिताक क्रमसँ गीतक वर्गीकरण कए एक भनिताक सबटा गीत
ओ एकत्र संगृहीत कए देल अछि तथा ओकर विस्तृत भूमिकामे एहि भनिता सबहिक विचार
सेहो ओ बड़े वैज्ञानिक रीतिसँ कएल अछि। यद्यपि ओ विचार सर्वाशें पूर्ण नहि अछि, केवल
भनिताक विचारक दिग्दर्शन मात्र कराए देल गेल अछि, मुदा एहिमे कोनो सन्देह नहि जे
श्रीमजुमदार साहेब जे काज कएल अछि ताहिसँ विद्यापतिक भनिताक स्वतन्त्र रूपसँ अध्ययन
करबाक केवल सामग्री मात्रे संकलित नहि भेल अछि, अपितु ओकर अध्ययन ओ अनुशीलनक
प्रकार सेहो प्रदर्शित भेल अछि।



ई कथा आब सर्वविदित अछि जे राधाकृष्ण विषयमे सख्यभाव मानि महाप्रभु चैतन्यदेव
विद्यापतिक श्रृङ्गारक गीतकें भक्तिक भावसँ देखथि। महामना ग्रिअरसन साहेबकें एहि गीत
सबमे जतए कतहु माधवक नाम नहिओ अछि तथापि केवल नायकहुसँ परमात्मा एवं राधा किंवा
नायिकासँ जीवात्मा प्रतिभासित होइन्ह। एही देखाउसिमे आब अन्यान्यो कतेक जन विद्यापतिक
श्रृङ्गारक गीतमे मधुर रसक परिपाक मानए लगलाह अछि। परन्तु श्रीमजुमदार साहेब एहि
गीत-सबहिमे भनिताक सज़् शेष पदक समन्वय कए ई देखाओल अछि जे शिवसिंह-नामबला

गीत सबमे जतहु माधव ओ राधाक नाम अछि ततहु कवि हुनका नायक ओ नायिकाक च्र्न्र्द्रड्ढ
क रूपमे, आदर्श जकाँ, देखैत छथि, भक्तिभावसँ नहि। गीत-संख्या 164मे नायिका विलाप करैत
छथि जे "सखि हे कतहु न देखिअ मधाई" ओ भनितामे विद्यापति हुनका आ•ाासन दैत छथिन्ह
जे "लखिमा-देविपति पुरहि मनोरथ आबहि शिवसिंह राजा"। गीतसंख्या 175 मे विरहिणी
नायिकाक मनोरथ जे जखन आओब हरि रहब चरन गहि चान्दे पुजब अरविन्दा। कुसुम सेज
भलि करब सुरत केलि दुहु मन होएत सानन्दा। इत्यादिक अन्तमे ओकरा आ•ाासन दैत कविक
उक्ति भनितामे द्रष्टव्य थिक जे



भनहि विद्यापति सुन वर जउवति अछ तोकें जिवन अधारे।

राजा शिवसिंह रूपनराएन एकादस - अवतारे।।

गीतसंख्या 177 मे

"माधव कठिन - ह्यदय परवासी

तुअ पेयसि मोयँ देखलि वियोगिनि" इत्यादि

सखी नायकसँ नायिकाक विरहावस्थाक करुण वर्णन कए अन्तमे कहैत अछि जे

"राजा शिवसिंह रूपनराएन करथु विरह उपचारे"।।

एहि गीत सबमे मधाइ, हरि वा माधवसँ परमात्मा तँ नहिए अभिप्रेत छथि, साधारण
नायकक द्यन्र्द्रड्ढ "प्रतिनिधि" सेहो नहि, प्रत्युत अभिप्रेत छथि स्पष्टतः राजा शिवसिंह जनिका हेतु
"एकादश अवतारा" विशेषतः विचारणीय थिक। अतएव श्रीमजुमदार साहेब एहि विषयक विचार
तँ कएल निष्पक्ष भावसँ, वैज्ञानिक रीतिसँ, परन्तु निष्कर्ष हुनक आंशिके सत्य प्रकट भेल, पूर्ण
सत्य धरि की तँ ओ नहि गेलाह अथवा वैष्णव सिद्धान्तक संस्कारक प्रभावसँ से कण्ठतः
स्वीकार नहि कएलैन्हि।



मिथिलाक संस्कृति ओ परम्परामे विद्यापतिक श्रृङ्गारक गीत कहिओ भक्ति-भावसँ नहि
देखल गेल। मधुर रसक कल्पनासँ मिथिलाकें कहिओ परिचय नहि। मिथिलामे विद्यापतिक
श्रृङ्गारक गीत विशुद्ध

श्रृङ्गाररसक गीत बुझल जाइत छल ओ एखनहु बुझल जाइत अछि। गीतमे राधा ओ कृष्णक
लीलाक वर्णन अछि तें एकर रसमे कोनो अन्तर नहि बुझल गेल वा मानल गेल। गाथा-सप्तशती
पर्यन्तमे (काव्यमाला 447) "कान्ह"क प्रयोग साधारण नायकक हेतु भेल-अछि ओ मिथिलहिमे
नहि बङ्गालहुमे जे लोकगीत प्रचलित अछि ताहिमे केओ रमणी अपन रसिक स्वामीकें कान्ह,
मधाई प्रभृति शब्दें उल्लेख करैत अछि। एहि परम्परागत संस्कारक पुष्टि हमरा विद्यापतिक
गीतसबसँ, विशेषतः हुनक गीतक भनितासँ होइत रहल अछि, ओ तें अपन सम्पादित पुरुष-
परीक्षाक भूमिकामे हम एहि कथाक प्रतिपादन कएने छी जे विद्यापतिक कुष्ण ओ राधाकें
परमात्मा ओ जीवात्मा तँ नहिए बुझबाक थिक; प्रत्युत हमरा तँ इएह प्रतीत होइत अछि जे
विद्यापति कृष्ण ओ राधाक रूप ओ लीलाक व्याजें शिवसिंह ओ लखिमाक रूप ओ लीलाक
वर्णन कएने छथि, विद्यापतिक कान्ह थिकथिन्ह शिवसिंह ओ राधा थिकथिन्ह लखिमा। हम
बुझैत छी जे एहि प्रसज़् हमर जे दृष्टि अछि से ओएह जे श्रीमजुमदार साहेबक छैन्हि; भेद एतबे
जे हम निस्संकोच पूर्ण सत्यक प्रतिपादन कएल अछि परन्तु श्रीमजुमदार साहेब जेना सशङ्क

रहथि, गेलाह अछि तँ सत्यक दिशामे अवश्य परन्तु पूर्ण सत्य प्रकाश नहि कएल।



परन्तु हमर सम्पादित पुरुषपरीक्षाक भूमिकाक समालोचनामे श्रद्धेय श्रीमजुमदार साहेब
हमर एही कथाक सज़् अपन वैमत्य प्रकट कएल अछि। श्रीमजुमदार साहेब बड़ पैघ विद्वान
छथि, इतिहास विचक्षण छथि ओ विद्यापतिक प्रसज़् हुनक पाण्डित्य देशमे ककरहुसँ न्यून नहि
कहल जाए सकैत अछि, अतएव हमरा अत्यन्त आश्चर्य अछि जे हुनक सदृश निष्पक्ष विचारक
हमर ओहि उक्तिक सज़् अपन वैमत्य प्रकट कएलैन्हि अछि जाहि हेतु हमरा प्रचुर प्रमाण अछि
ततवे नहि, किन्तु जाहि प्रसज़् हमरा सबसँ बेशी बल स्वयं श्रीमजुमदार साहेबक विचारसँ भेटल
छल। तें हम एहि विषयक पुनर्विचारमे प्रवृत्त भेल छी ओ एहिमे हमर विचारसरणि ओएह रहत
जे श्रीमजुमदार साहेबक रहलैन्हि अछि तथा आधार रहत श्रीमजुमदार साहेबहिक संगृहीत ओ
सम्पादित विद्यापतिक गीतावली।



एहि संग्रहमे विद्यापतिक रचित कहि गोट हजारेक गीत अछि जाहिमे प्रायः आधा
भनिता-रहित अछि। नेपालक पोथीक लेखक महोदय तँ भनिताक महत्त्व बुझबे नहि कएलथिन्ह
ओ अन्तमे भनइ विद्यापतीत्यादि लिखि भनिताक अध्ययनक मार्गे अवरुद्ध कए देल। हमरा ई
वि•ाास नहि होइत अछि जे विद्यापतिक कोनो गीत भनिता-विहीन छल, ई केवल लेखकक
अनभिज्ञता ओ अपाटव सूचित करैत अछि जे गीतमे भनिताक पदकें निष्प्रयोजन बूजि ओकरा
छोड़ि देल गेल। तथापि एहि गोट हजारेक गीतमे दू सएसँ किछुए अधिक गीत अछि जाहिमे
भनितामे शिवसिंहक नाम अछि। एहिमे एक सए सत्ताइस गोट गीतमे शिवसिहंक सज़्-सज़्
लखिमाक नाम सेहो अछि तथा सात गोट गीतमे शिवसिंहक सज़्-सज़् हुनक पाँचो अन्यान्य स्त्री,
मधुमति (18) सुषमा सोरम (95) रूपिनि (166) ओ मोदवती (169)क नाम अछि जाहिमे
सुषमाक नामक गीत तीनि गोट (51, 102, 205) अछि ओ चारिम (148) मे सुषमाक सज़्
लखिमाक नाम सेहो अछि। एकर प्रामाणिकता एहीसँ सिद्ध अछि जे पञ्चीमे सेहो शिवसिंहक
छओ गोट विवाह उल्लिखित अछि ओ एहि छबो महादेवीक परिचय उपलब्ध अछि।



ई हमर कहबाक तात्पर्य ने पहिने छल ने एखनहु अछि जे विद्यापतिक सब गीतक
भनिता साभिप्राये अछि अथवा शिवसिंह नामबला सब गीतमे हुनकामे कृष्णत्वक आरोप अछि।
तकर तँ प्रयोजनो नहि अछि। एकहु दु ठाम विद्यापति यदि स्पष्ट शब्दें शिवसिंहकें कृष्ण कहल
अछि अथवा मानल अछि तँ ई कथा सिद्ध भए गेल। ओ से विद्यापति एक दू ठाम नहि अनेक
ठाम, अनेक प्रकारें, अनेक भङ्गिमासँ कहल अछि। केवल कान्ह वा माधव, कन्हाइ वा मधाइ
प्रभृति शब्दक प्रयोगहिसँ हम एकर आरोप नहि मानि लेब, कारण, जे कथा हम पूर्वहुँ कहल
अछि केओ नायिका अपन ह्यदयज़्म स्वामीकें अपन "कान्ह" कहैत अछि, सब रमणीकें अपन

रसिक प्राणे•ार कृष्णाहिक अवतार होइत छथिन्ह। हमरा तँ स्पष्ट शब्दें शिवसिंहमे कृष्णाक
आरोप चाही ओ तकर दृष्टान्त हम एहिठाम श्रीमजुमदार साहेबक संस्करणसँ उपस्थित करैत
छी।



सबसँ पूर्व शिवसिंहक रूप-सौन्दर्यक वर्णन देखल जाए। शिवसिंह

पुहबी नव पचवाने (39)

तीनि भुवन महि अइसन दोसर नहि (50)

रूपे अभिमत कुसुमसायक (92)

पुहविहि अवतरु नव पँचवाने (127)

परतख पँचवाने (139)

जनि ऊगल नवचन्द (113)

मेदिनि मदन समाने (151) इत्यादि शब्दें वर्णित छथि। हुनक रसिकताक वर्णन अछि :-

रतन सनि लखिमा कन्त। सकल कलारस जे गुनमन्त (48)

सकल कला अवलम्ब (104)

रायनि मह रसमन्ता (109)

राय रसिक (122)

केलि कलपतरु सुपुरुष अवतरु नागर कुरुवर रतने (185)

रस आधार (93)

रसवन्ता गुणानिवास (127) इत्यादि।

"सिंह सम शिवसिंह भूपति" (9) सँ हुनक शौर्यक वर्णन कए हुनक वदान्यताक कीर्तन
कएल गेल अछि यथा

महोदार (20)

सकल जन सुजन गति (111)

सकल अभिमत सिद्धिदायक (93) इत्यादि।

ताहि सज़् हिनक पिताक नामक कीत्र्तन--

देवसिंहनरेन्द्रनन्दन (8)

गरुड़नराएननन्दन (52),



हिनक छबो पत्नीक उल्लेख, तिथिक उल्लेखक सज़् हिनक पिताक मृत्यु ओ हिनक
सिंहासनाधिरोहणक वर्णन (8), हिनक विजयक वर्णन (9) इत्यादि सब कथाकें मिलाए
शिवसिंहक व्यक्तित्वक एक गोट सुन्दर चित्र अङ्कित भए जाइत अछि। ताहि सज़् हिनक
शरीरक श्याम वर्ण अनेक ठाम अनेक रूपें कहल अछि, यथा,

राजा शिवसिंह रूपनराएन साम सुन्दर काय (34)

सपन देखल हम शिवसिंह भूप

बतिस वरस पर सामर रूप (920)

जकरा पुरुषपरीक्षमे "चारुपाथोदनील", सजलजलदवर्णसुन्दर, कहल गेल अछि।



एहिसँ स्पष्ट अछि जे शिवसिंह श्यामवर्णक सुन्दर कान्तिक नवयुवक छलाह जनिक रूप
मनोमोहक छल अतएव जखन हुनका रसिकशिरोमणि कहबाक भेलैन्हि तखन विद्यापति एहि
वर्णसाम्यसँ बलित कहबाक भए हुनका श्रृज़्र-रसक अधिष्ठातृ देवता वृन्दावन-विहारी कृष्णहिक
अवतार कहि देल। शिवसिंहकें ओ कहल अछि

परतख देव (180)

कान्हरूप सिरि शिवसिंह (77)

अभिनव कान्ह (101)

अभिनव नागर रूपे मुरारि (90);



जनिका केवल ओएह टा नहि समस्त संसार हरिक सदृश बुझए "हरि सरीसे जगत
जानिअ" (41) ओ तें विद्यापति वारंवार हुनका "एकादस अवतारा" (89, 175, 197) कहि कहि
अपन भक्ति प्रदर्शित करैत छथि तथा हुनक रसिकता, श्रृङ्गार प्रवणता, कामकला-कुशलता
व्यञ्जित करैत छथि। ई सब ततेक स्पष्ट अछि, व्यक्त अछि जे एहि प्रसज़् आओर किछु कहब
व्यर्थ।



तथापि एक गोट गीत आओर विचारणीय थिक। गीत संख्या 35 मे केओ रमणी अपन
स्वप्नक समाचार अपना सखीसँ कहैत अछि।



हरि हरि अनतए जनु परचार।

सपन मोए देखल नन्दकुमार।।



परञ्च भनितामे विद्यपति ओहि नागरीकें बुझबैत कहैत छथिन्ह जे

.................अरे वर जउवति जानल सकल भरमे।

शिवसिंह राय तोरा मन जागल कान्ह-कान्ह करसि भरमे।।

आओर ई वरयुवती स्वप्नमे जे स्वरूप देखल (जकरा ओ नन्दकुमार बुझलक) तकर
वर्णन अछि--

नील कलेवर पीत वसन धर चन्दनतिलक धवला।

सामर मेघ सौदामिनि मण्डित तथिहि उदित शशिकला।।

ओहि स्वरूपकें वरयुवती नन्दकुमार मानल से ओकर भ्रम छल। श्यामवर्ण, पीताम्बर,
•ोतचन्दनतिलक-त्रिपुण्डलसित भाल ओ स्वरूप राजा शिवसिंहक छल। केहन मार्मिक रूपसँ
भ्रान्ति प्रदर्शित अछि, केहन चमत्कारक व्यङ्ग्य स्फुट होइत अछि से सह्यदयसंवेद्य अछि,
कहबाक प्रयोजन नहि।



एकर पुष्टि पुरुष-परीक्षासँ सेहो होइत अछि। ओहिमे शिवसिंह वीर लोकनिमे मान्य,
सुधी लोकनिमे वरेण्य, विद्वान् लोकनिमे अग्रविलेखनीय कहि वर्णित छथि जाहिसँ "वीरः सुधीः
सविद्यश्च" ई जे पुरुषक लक्षण एहि ग्रन्थमे प्रतिपादित अछि ताहि तीनूक प्राशस्त्य हिनकामे
कहल अछि तथा हिनक शौर्यक प्रसज़् कहल अछि जे गौड़े•ारक सज़् युद्धमे ओ से यश अर्जित
कएल जे चारू दिशि कुन्दकुसुम सदृश शुभ्र आलोकित छल। परन्तु सबसँ महत्त्वपूर्ण अछि
ओहि ग्रन्थक तृतीय परिच्छेदक अन्तमे उपलब्ध ओ श्लोक जकरा ग्रन्थसँ कोनो सम्बन्ध नहि,
छैक, केवल शिवसिंहक गुणकीर्तन थिक :-



लक्ष्मीपती सर्वलोकाभिरामौ चन्द्रननौ चारुपाथोदनीलौ।

द्वौ पुरुषौ लक्षणौस्तैरुपेतौ नारायणो रूपनारायणो वा।।



एकर प्रथम दुहु चारणमे चारि गोट पद अछि जे चारि गोट लक्षण थिक ओ श्लोकक

उत्तरार्धमे कहल अछि जे एहि चारू लक्षणसँ युक्त दुइए गोट पुरुष छथि, एक तँ पुरुषोत्तम
नारायण ओ दोसर शिवसिंह रूपनारायण। चारू गोट लक्षण श्लेषसँ युक्त अछि जे दुहूमे
चरितार्थ होइत अछि। यथा नारायण छथि लक्ष्मीक पति ओ शिवसिंह 'लखिमादेइरमाने" वारंवार
वर्णित छथि। दुहू सब लोकमे अथवा सब लोकक हेतु सुन्दर छथि

जे कथा गीतमे "परतख देव" वा "परतख नव पँचवाने" वा "तीनि भुवन महि अइसन दोसर
नहि" शब्दें कहल अछि। चन्द्रमाक सदृश लोकलोचनाह्लादकर दुहूक मुख अछि जे कथा गीतमे
"जनि ऊगल नव चन्द" शब्दें कहल अछि अथवा जे कथा दोसर गीतमे ऊपर प्रदर्शित अछि,
शुभ्रत्रिपुण्डक उपमा चन्द्रमासँ, नवचन्द्रसँ देल गेल अछि। तथा घनश्याम तँ नारायणक नामे
अन्वर्थ थिकैन्हि ओ शिवसिंहक "सामर रूप" "साम सुन्दर काय" एहिसँ अभिव्यक्त अछि।
अतएव पुरुष-परीक्षाक एहि श्लोकसँ ओही कथाक पुष्टि होइत अछि जे भनितामे "हरि सरीसे
जगत जानिअ" "अभिनव नागर रूपें मुरारि" "अभिनव कान्ह" अथवा "एकादश अवतारा" इत्यादि
शब्दें कहल अछि। शिवसिंहक रसिकताक प्रसज़्, तहिना, पुरुष-परीक्षाक विदग्धकथामे
विक्रमादित्यक वैदग्ध्यक कथा कहि अन्तमे विद्यापति कहैत छथि जे "साम्प्रतमपि"--एखनहु,
कलावती कविता अथवा कलावती कामिनीक वेत्ता राजा शिवसिंह छथि--"तां वेत्ति राजा
शिवसिंहदेवः"।



एहि कथाक पुष्टि कीर्त्तिपताकासँ सेहो होइत तथा ओहिसँ सम्भवतः ई कथा निर्विवाद
सिद्ध भए जाइत, परन्तु कीर्त्तिपताका जाहि रूपमे उपलब्ध अछि ताहिसँ कोनो प्रयोजन सिद्ध
नहि भए सकैत अछि। हमरा जे कीर्त्तिपताका उपलब्ध अछि तकर श्रृंज़्र भागमे एक गोट श्लोक
जे हमरा सम्पूर्ण पढ़ल भेल अछि तकर आशय अछि जे रामावतारमे भगवानकें सीता-विश्लोषक
कष्ट भोगए पड़लैन्हि तें कृष्णावतारमे भगवान श्रृङ्गारक मूर्त्ति भए अवतीर्ण भेलाह। से जेहने
द्वापरमे भगवान् कृष्ण, तेहने सम्प्रति अहाँ छी। सत्ये



संसारे भोगसारे स्फुटमवनिभुजां श्रीफलं वा किमन्यत्।



एहि श्लोकक "साम्प्रतं तादृशस्त्वम्" मे "त्वं" सँ ककर अभिप्राय से तँ बुझल नहि होइत
अछि--जे पाठ उपलब्ध अछि ताहिसँ शिवसिंहक धरि नहि--परन्तु एतबा तँ स्पष्टे अछि जे
रसिक राजाकें कृष्णाक अवतार कहब विद्यापतिक हेतु कोनो अभिनव कथा नहि भेल। तें
अन्यथा उपलब्ध-प्रमाणक बल पर कहि सकैत छी जे स्वरूपतः, स्वभावतः, चरित्रतः, शिवसिंहकें
कृष्णक अवतार मानि लेब कनेको अत्युक्ति नहि भेल।



एहि प्रसज़् ई शङ्का नहि कत्र्तव्य थिक जे नररूप शिवसिंहकें नारायणक सदृश कहब,
हुनका भगवानक एगारहम अवतार मानि स्तुति करब अनुचित थिक, मिथ्या-स्तुति थिक, धार्मिक
किंवा नैतिक दृष्टिसँ धृष्टता थिक। शिवसिंह साधारण मनुष्य तँ छलाह नहि, ओ राजा छलाह
ओ मनु कहैत छथि जे "महती देवता होषा नररूपेण तिष्ठति"। स्वयं भगवान् गीतामे कहने छथि
जे :



यद्यत् विभूतिमत् सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।

तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंशसम्भवम्।।



राजा शिवसिंह निश्चय विभूतिमान् छलाह, श्रीमान् छलाह, ऊर्जिततम छलाह। हुनका
"प्रत्यक्ष देव" कहब आर्यजातिक राजत्व-भावनाक अनुकूल बुझबाक चाही, प्रतिकूल तँ कहिओ
नहि, विरुद्ध तँ ओ नहिए भेल। ओ तखन एहि "केलि-कल्पतरु" "रायनि मह रसमन्ता" "सकल
कला अवलम्ब" "पुहुबी नव पँचवाने" शिवसिंहकें यदि कोनहु देवताक अवतार कहबाक भेल,
हुनक चरितक समता कोनहु देवताक लीलासँ देखएबाक भेल तँ कृष्णासँ विशेष सज़्त दोसर
कोन देवता भए सकैत छलाह।



अतएव श्रीमजुमदार साहेब हमर एहि कथासँ सहमत नहि होथु परन्तु हम तँ जतेक एहि
विषयक विचार करैत छी ततेक हमर वि•ाास दृढ़ भेल जाइत अछि जे विद्यापति केवल अपन
गीतहिटामे नहि, अन्यत्रहु शिवसिंहकें कृष्णाक अवतार मानैत छलाह। शौर्यमे, वीर्यमे, चातुर्यमे,
सौन्दर्यमे, वर्णमे, रसिकतामे,

कामिनीमनोमोहकतामे, कामकेलिप्रवणतामे, श्रृङ्गारिकतामे, अनेकधा, विद्यापति दुहूक समता
प्रदर्शित कएने छथि। ई सत्य जे सब गीतमे, सब गीतक भनितामे, ई नहि भेटत; शिवसिंह-
नामबला गीतहुमे सब ठाम एकर

उल्लेख नहि अछि। परन्तु तकर प्रयोजनो नहि छैक। एकहु ठाम यदि एहि कथाक स्पष्ट
उल्लेख अछि तँ कविक भाव व्यक्त भए गेल ओ तखन अन्यत्र तँ व्यङ्ग्यरूपें ओकर उपलब्धि
सुगम भए जाएत। तें हम कहने छी ओ पुनः कहैत छी जे विद्यापतिक श्रृङ्गारक गीतमे जतए
शिवसिंहक नाम छैन्हि ततए यदि माधवक उल्लेख अछिओ तँ माधवसँ हमरा शिवसिंहक प्रतीति
होइत अछि। तथा ई सर्वथा काल्पनिक नहि अछि किन्तु स्वयं विद्यापतिक अनेको गीतक
भनितामे, कए गोट गीतहुमे, ई कथा स्फुट अछि। विद्यापतिक शिवसिंह वस्तुतः रूपनारायण
छलाह तथा विद्यापति हुनका नर-रूपमे नहि, नारायणक रूपमे प्रत्यक्ष-देव मानैत छलाह,
प्रत्यक्ष-देव आनन्दकन्द कृष्णक एकादश अवतार कहि हुनका अमर कए गेल छथि।

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शनिवार, 29 अगस्त 2009

पद्य कोशी-कमलापर-आशीष अनचिन्हार

संपूर्ण मिथिला एखन बाढ़ि सँ त्रस्त अछि। बाढ़िक प्रकोपक व्यवहारिक दंशक अनुभव हम हरेक साल करैत छी। एहि अनुभव के हम अपन गजल मे सेहो स्थान दैत छिऐक। जाहि बेर जेहन दर्द ताहि बेर तेहन शेर् ।एहि बेर हम अपन पूरा गजल नहि दए पाँच गोट भिन्न-भिन्न गजलक पाँच भिन्न- भिन्न शेर् दए रहल छी । पाँचो शेर् बाढ़ि पर अछि आ हमर व्यत्तिगत अनुभव अछि। मुदा एहि आशा मे अहाँ सभ के इ परसि रहल छी कहीं ने कहीं इ अहूँ लोकनिक इ व्यत्तिगत अनुभव होएत। त लिअ- इ पाँचो शेर्---------


1
कोशी-कमला बान्ह बन्हबौतीह अभियंता लागले रहल
हमरो गाम मे बाढ़ि ने अबितै सेहन्ता लागले रहल
2
नहि कानू चुप्प रहू आएत रीलीफ नेने नेता
तावत् घर-दुआरि बना आगँन बहारि राखब
3
जऽले जिनगी थिक भेटत हरेक पोथी मे लिखल
बाढ़िक मौसम मे तँए चारू दिस जिनगीए देखाइत छैक
4
बाढ़िक इ मौसम अछि धसना समय
मझँधार सँ आएल डुबैत अछि किनार मे
5
पानि सँ बाढ़ि छैक वा बाढ़ि सँ पानि
अपने पानि सँ दहा गेल धार

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नताशा 22 (चित्र-श्रृंखला पढ़बाक लेल नीचाँक चित्रकेँ क्लिक करू आ आनन्द उठाऊ।)

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मकड़ी- प्रदीप बिहारी




सौंसे बजारमे हल्ला पसरि गेलै जे एकटा मौगी अयलैए। सिलाइ-मशीन चलबैत छै। नव-पुरान कपड़ा सीबैत छै। बड़ सुन्नरि छै। एकसरिए छै। ओकरा संगमे केओ नइं छै आ ओ ककरो दिस तकितो नइं छै।
दारू आ चाहक दोकान वाली मौगी सभ अपन संसद शुरू क’ देने रहै। भागि क’ आएल हेतै। घरबला छोड़ि देने हेतै। चोरनी होएत। छिनारि होएत।
एकटा दोसर मौगी बजलै-जरूरी छै जे अधलाहे हेतै। नीक लोक नइं भ’ सकै छै कि? इहो त’ भ’ सकैत छै जे...
मुदा सत्तारूढ़ मौगी ई कहि ओकरा चुप क’ देलकै जे सतबरती रहितै, तँ दिल कुमारीक घरमे किराया नइं लैतै। दिल कुमारी अपने कतेक घाटक पानि पीने अछि! ओकर किरायादार की सैंतल रहतै?
जे, से। समय बीत’ लगलै। सुनीता नवसँ पुरान होम’ लागल। दिल कुमारी ओकर व्यवसाय आ जीवनमे अनेरे कोनो हस्तक्षेप नइं करै।
दिल कुमारीकेँ ओ ‘काकी’ कह’ लागल।
आब किछु स्त्राीगण सेहो ब्लाउज आ साया सियाब’ या भंगठी कराब’ आब’ लगलै। मुदा, बेसी काज जुअनके छौंड़ा सभक ओकरा लग आबै।
ओ अनुभव कएलक जे ओकरा अएलाक बाद जुआन सभक पैन्ट आ अंगा बेसी फाट’ लगलै अछि। सभ ओकरे लग कोनो-ने-कोनो बहन्ने आबि जाए।
मौगी सभक संसदमे प्रस्ताव पारित भ’ गेलै। जँ मीठ नइं छै, तँ चुट्टी किऐ सोहरै छै?
सुनीताकेँ अपन खर्चक योग्य आमदनी भ’ जाइ। आर बेसी ओकरा किऐ चाही? ओकर के छै? ने आगाँ ने पाछाँ।
एकटा गहिंकी आएल छलै। नगरपालिकाक मेहतर। ओ कहलकै सुनीताकेँ-हमर बेटीक बियाहमे किछु कपड़ा सीअएतै। सीबि देबहक बहिन? तोहर सिआइ किछु देबह आ किछु उधार रहि जेतह। अगिला मास देबह।
सुनीताकेँ लगलै जे जीवनमे पहिल बेर क्यो ओकरा बहिन कहलकै-ए। ओ द्रवित भ’ गेल-तोरा बेटीक बियाहमे जतेक कपड़ा सीअएतह, हम एक्कहु टाक पाइ नइं लेब’। जाह! जहिया मोन होअ’ द’ जइह’।

जानि नइं सुनीताकेँ ओहि राति की भ’ गेलै? निन्ने ने होइत रहै। ओहि गहिंकीक गप्प बेर-बेर मोन पड़ै छलै-हम तँ जानि-बुझि क’ फाटल-पुरान ल’ क’ तोरा लग अबै छी। तोहर रूप हमरा मोहने जाइत अछि। तों एकटा मरद किऐ ने क’ लै छह। असगरे कते खटबह?
सुनीता डाँटि क’ भगा देने छल ओहि गहिंकीकेँ। ओकर कपड़ा सेहो घुरा देने छल।
मुदा, सुनीता बेर-बेर अएनामे अपन मुँह देखैत छल। साँचे, ओ एखनहुँ सुन्नरि अछि। ओकर बयसे की भेलै अछि। बड़का घरक बेटी रहैत तँ एखन बियाहो नइं भेल रहितै। बीस-एकैस कोनो बयस होइत छै? ई बयस तँ पोखरिमे चुभक’ बला होइ छै... साओनक झूला झूल’ बला होइ छै... कोनो राजकुमारक सपना देख’ बला होइ छै। मुदा, पुरुषक प्रतापें सुनीताकेँ एही बयसमे गृहस्थी सम्हार’ पड़ि रहल छै।
ओकरा बियहुआ मोन पड़लै। पहिल बियाह, बियाहे सन भेल रहै। ब’र अएलै, बरियात अएलै। गाजा-बाजा अएलै। खूब धूम-धामसँ ओकर बियाह कएने रहै ओकर बाप। माइ तँ ओकरा अबोधेमे छोड़ि अनका संग चलि गेल रहै। तैं सभ निमेरा ओकर बाप केलकै।
ओहि समय सुनीताक बयसे कतेक रहै? पनरहममे छल। ई कोनो बियाहक बयस होइत छै? मुदा, ओकरा बापकेँ अल्प बयसहिमे विकसित ओकर देह अबूह लाग’ लगलै। दोसर आशंका एहि बातक रहै जे माइए जकाँ इहो ने ककरो संग माया-पिरती जोड़ि लिअए आ...। तेसर स्वार्थ प्रायः ई रहै जे बेटीकेँ बिदा क’ देने दारू पीब’ लए छुट्टा भ’ जायत। क्यो रोकनिहार नइं रहतै।
आ तैं सुनीताकेँ गरदामी पहिरा देलकै ओकर बाप।
मुदा, छओ मास नइं बीतलै कि अनर्थ भ’ गेलै। सुनीताक सीउथ उज्जर भ’ गेलै। चूड़ी फूटि गेलै आ पोते टूटि गेलै। लोक सभ सराप’ लगलै। सालो ने बीतलै कि बियहुआकेँ खा गेल।
सुनीताक चारू कातक संसार सुन्न भ’ गेलै। कतहु किछु नइं। चारू कात अन्हारे अन्हार। कतहु कोनो प्रकाश-पुंज नइं देखाइ छलै ओकरा।
बियहुआक विरासतमे भेटल रहै एकटा देशी गाय, जकर सेवा-सुश्रूषा करए। दूध बेचए आ दिन काटए।
मुदा, बयसकेँ बेसी दिन धरि गारि क’ तँ नइं राखल जा सकैत अछि।
किछु गोटें लोभाएल रहै सुनीता पर, आ किछु धपाएल। मुदा, समय सुनीताकेँ साकांक्ष बना देने रहै। ओ भावावेशमे ककरो जालमे फँस’ बाली नइं छल।
किछु छौंड़ा सभ तँ हाथ धो क’ ओकरा पाछाँ पड़ल छल। ओकरा घर पर अएबाक हिम्मति तँ नइं करै, मुदा साँझ खन क’ जखन घास आन’ बाध दिस जाए, तँ छौंड़ा सभ किछु-ने-किछु टोनैत रहै ओकरा।
जखने काली खोला पार क’ चाहक दोकान दिस मुड़ए आ कि हेम बहादुर टहंकारसँ गीत उठबैक-मानै ने छौंड़ी हमर बतिया... फेरै ने एको बेर अँखिया... होऽऽऽ होऽऽऽ।-आ सुनीताक संगी सभ ओकरा खौंझाब’ लगै-एक बेर फेरही नजरि हेमे दिस। छौंड़ा जुआन छै। सुन्नर छै। तरहत्थी पर रखतौ।-आर-आर बहुत रास बात सभ कह’ लगै, मुदा सुनीता लेल धनि सन।
ओहि दिन सुनीता काली खोला दिस नइं गेल। सतीघट्टा बगान दिस चलि गेल एकसरिए। जानि नइं किऐ बाट भरि हेम बहादुर ओकर मानस पटल पर जगजियार होइत रहलै। आइ ओ छौंड़ा काली खोला लग एकर बाट तकिते रहि जएतै। मुँहक गीत मुँहेंमे रहि जएतै छौंड़ाक।
सतीघट्टा बगानमे निश्चिन्तसँ घास कटैत छल सुनीता। कने कालक बाद एकटा गीत सुनाइ पड़लै माया को बाड़ी ना पिरती को फूल, संभाली राख’ है कुसुमे रुमाल...।
सुनीता चैंकि गेल। ई तँ हेमेक स्वर छिऐ। एम्हरो चलि अएलै छौंड़ा। ई तँ दिक् क’ देलक।-ओ सोचलक’। आइ जे ने झड़ान झाड़त जे...।
पुनः दोसर मोन कहलकै। छौंड़ा, कोनो बेजाए तँ नइं छै। इएह ने कने अहदी छै। एसगरुआ छै छौंड़ा, तैं ने जेना-तेना रहै छै। दोसराति भेटतै, तँ सम्हरि जेतै। ओकरो तँ एकटा पुरुष चाही। दुनू मिलि क’ कमाएत-खटाएत। समय बीतैत रहतै।
मुदा, ओ हेम बहादुरकेँ बोर्डर पर दू-नम्मरी धन्धा नइं कर’ देत। बहुत रास दोसर-तेसर काज छै। नीको काजसँ पेट भरैत छै...।
सुनीताक गफ्फा घा’सँ भरि गेल छलै। गफ्फा दुखएलै तखन अखियास भेलै।-ओह...। ओ की सोच’ लागल छल। धुर जो...।-ओ स्वयं मुस्कियाइत छल।-ई की भ’ रहल छै ओकरा?
आ कि तखने हेम बहादुर जुमि गेल। बाजल-आखिर कहिया धरि अपन कोमल हाथसँ हँसुआ धरैत रहबही, सुनीता?
सुनीता बाजल-देख हेम! बरोबरि जे हमरा पछुअबैत रहै छें, से नीक बात नइं। तोरा मोनमे की छौ? तो अपन बाट किऐ ने बदलै छें?
हेम बहादुर छक्का मारलक-हमरा मोनमे ओएह बात अछि, जे तोरो मोनमे छौ। हम तोरा चाहैत छियौ। हम तोरासँ बियाह कर’ चाहैत छी। हम चाहैत छी जे अपना दुनू गोटें...।
सुनीता बिच्चहिमे रोकलक-अपन मुँह देखलेहें। इह! हमरासँ बियाह करताह। तोरासँ के बियाह करतौ? जकर सभ साँझ कान्छीक दारूक दोकानमे बीतै छै, तकरा बुतें बहु की डेबल हेतै?
मुदा, हेम बहादुर मान’बला नइं छल। ओ बाजल-हम तँ सदिखन तोरे मुँह देखैत रहै छियौ, अपन मुँह की देखिऐ?-कने थम्हैत पुनः बाजल-तों जनिते छें। हमरा माइ-बाप क्यो नइं अछि। एकटा खोपड़ी अछि, ओहीमे रहै छी। ओहीमे तोरो राखबौ। राखबौ मुदा माया-पिरतीक संग। आ जहिया हम आ तों एक मोन-एक परान भ’ जाएब, तहियासँ कान्छीक होटल जाएब बन्न भ’ जेतै।
सुनीताक देह झुनझुना गेलै। रोइयाँ ठाढ़ भ’ गेलै। करेज धरक’ लगलै आ ठोंठ सुखाए लगलै।
ओ प्रश्न दृष्टिएँ हेम बहादुर दिस तकलक।
-सत्ते कहै छियौ सुनीता।
ओ तकैत रहल।
-एकदम सत्त। जे किरिया खुआ ले।
ओ तकिते रहल।
-विद्या नाश।
सुनीताकेँ हँसी लागि गेलै। ओ बड़ी जोरसँ हँसल।
-हँसिते बाजल सुनीता-तों पढ़ले-लिखल कतेक छें जे विद्या नाश बला किरिया लगतौ।
-विश्वास नइं होउ, तँ आर दोसर जे किरिया खुआ ले, मुदा...।-हेम बहादुर सुनीताक मनःस्थिति बुझि चुकल छल। ओ सुनीताक हाथ पकड़ि लेलक-संसारक पैघसँ पैघ किरिया खा सकैत छी हम। खुआ ले।
सुनीताकेँ मात्रा एतबे बाजल भेलै-आब तकर बेगरता नइं छै।
बहुत दूर पच्छिम दिस मेघ हड़हड़ा उठलै। बिजुली चमकि उठलै। लगलै जेना ओत’ दू गोटा नइं, एक्कहि गोटा ठाढ़ होअए।
हेम बहादुरक बाहुपाशमे सुनीताकेँ सुखक अनुभूति भेलै।
मोन्हारि साँझ भ’ गेलै। दुनू बिदा भेल। सुनीता निर्णय नइं क’ पाबि रहल छल जे ओ हारल छल आ कि जीतल।
दुनू दाम्पत्य बन्हनमे बन्हा गेल। टोल-पड़ोसमे फदका होम’ लगलै। नहूँ-नहूँ सभ किछु सामान्य भ’ गेलै।
बियाहक बादो सुनीता अपन घर आ गायक सेवा नइं छोड़लक। हेम बहादुर अपन खोपड़ी, अपन संगी दीपक सुब्बाक हाथें बेचि देलकै।
दुनू कमाए-खाए लागल आ रह’ लागल। घास काट’ लए सुनीता नइं, हेम बहादुर जाए।
समय पर समयक पथार लाग’ लगलै।
मुदा, बहुत दिन धरि एहि तरहें नइं रहि सकल ओ सभ। हेम बहादुरक बहसल मोन छान-पगहा तोड़’ लगलै। ओकर लुत्तुक अकास चढ़’ लगलै। सुनीता अपनामे कमी ताक’ लागल। आखिर ओकर हेम पुनः किऐ बहकि रहल छै।
हेम बहादुर दारू पीबि क’ आब’ लागल आ सभ राति दुनू प्राणीमे झगड़ा होम’ लगलै।
दरुपीबा पुरुष सुनीताकेँ किन्नहुँ पसिन नइं छलै।
नहूँ-नहूँ हेम बहादुरक आन-आन बानि सभ सेहो सुनीताकेँ बुझबामे अएलै। ओ हेम बहादुरकेँ समझाब’ बुझाब’ लागल, मुदा ओकर सभ प्रयास व्यर्थ भ’ गेलै।
स्थिति एत’ धरि पहुँच गेलै जे हेम बहादुर आठ-आठ दिन घरसँ बाहर रह’ लागल। ओकरा लेल सुनीतासँ बेसी महत्वपूर्ण भ’ गेल छलै कान्छी दोकानक दारू... तिनपतिया... पपलू... फलास...।
सुनीता सभ किछु सहैत रहल।
सुनीताकेँ सभसँ बेसी दुःख ओहि दिन भेल रहै जहिया ओकर गाय बिका गेलै। हेम बहादुर दुखित होम’ लागल रहए। ओकरे दबाइ-बीरो लेल सुनीताकेँ गाय बेच’ पड़लै।
सुनीताक गाय दीपक सुब्बा कीनने छल। हेम बहादुरक दोस।
एते दिन सभ किछु बर्दासि कएलक सुनीता। मुदा ओहि दिन हेम बहादुर साफे कहि देने रहै-आब तोरासँ मोन ओंगठि गेल।-ई गप्प सुनीताकेँ सहरजमीन पर आनि देलकै। ओकरा पराजय-बोध भेलै। लगलै जे ओकरा जीवनमे हारिए-हारि छै।
गाय बेचलाक बाद जे टाका भेटलै, ताहिसँ थोड़ेक हेम बहादुरक दबाइ लए खर्च कएलक आ एकटा सेकेण्ड हैण्ड सिलाइ मशीन किनलक। ओएह सिलाइ मशीन ओकरा जीवनक आबलम्ब भ’ गेल रहै।
हेम बहादुर अपन बानि नइं छोड़ि सकल। ओकर रोग बढ़िते गेलै। आब ओ घर आएब सेहो बन्न क’ देने रहए। दीपक सुब्बा कहने रहै सुनीताकेँ-भौजी! दोसक रोग ठीक होम’ बला नइं छौ। सम्पूर्ण विश्व एहि रोगक इलाज लेल अपस्यांत अछि। हम-तों की छी?
अन्ततः हेम बहादुरक जीवन-लीला समाप्त भ’ गेलै। मेचीक कातमे मुइल पड़ल देखलकै लोक सभ। सुनीताकेँ कहलकै। ओ पाथर भ’ गेल। देखहु लेल नइं गेल हेम बहादुरक लहासकेँ।
हेम बहादुरक सेवामे ओ स्वयंकेँ एहि तरहंे समर्पित क’ देने छल जे ओकरा इहो सोह नइं रहलै जे मज्जर कहिया टिकुला भ’ गेलै। सुनीताक हाथ-पैर भारी होम’ लगलै। अन्न-पानिसँ अरुचि होम’ लगलै। देह पीयर भेल जाइत छलै... आदि आदि। आइ जखन हेम बहादुर नइं छै, तखन ओकरा सोह भ’ रहल छै जो ओ माइ बन’ बाली अछि।
दीपक सुब्बाक अबरजात बढ़ि गेलै। मुदा, सुनीता ओकरा अपन उद्देश्यमे सफल नइं होम’ देलकै।
सातम मासमे सुनीताकेँ बच्चा भेलै। बेटा रहै। मुदा छौंड़ा बचलै नइं। जनमि क’ मरि गेलै। दीपक दबाइ-बीरो करौने रहै ओकर।

सुनीताक देहमे सक्क लाग’ लगलै। ओ मशीन चलाब’ लागल छल। दीपक आबै। घंटाक घंटा बैसै आ प्रणय निवेदन क’ चल जाइ।
सुनीताक मोन कोनादन कर’ लगलै। लगै जेना कोनो आवामे जड़ल जाइत होअए... अथाह पानिमे डूबल जाइत होअए... कोनो सड़ल-गन्हाएल डबरामे उबडुब करैत होअए।
सभ पुरुषक आकृतिमे हेम बहादुरक छवि देखए सुनीता, आ ओकर मोन तुरूछि जाइ।
ओ सोचलक। दीपक सुब्बा घर-परिवार बला लोक अछि। ओकरा मात्रा सुनीताक घर आ देहसँ मतलब छै। ओ सुनीताक भ’ क’ नइं रहि सकैछ।
ओ नियारलक-आब बेसी दिन धरि अपन चेतनाकेँ ठकि क’ नइं राखि सकैछ। ओकरा की चाही? ओकरा नइं चाही सिन्नुर आ ने कोनो इलबाइस। ओकरा किछु नइं चाही। मात्रा जीबाक लेल चाही पाँच हाथ वस्त्रा आ पाँच क’र अन्न। से ओ मशीन चला क’ उगाहि लेत। ओकरा कोनो पुरुषक आबलम्ब नइं चाही। ई घर नइं चाही। ई घर ओकरा काटि क’ खा जेतै। एत’ भरि घर हेमे बहादुर देखाइत छै ओकरा।
आ एक दिन सुनीता अपन मशीन आ मोटा-चोटा उठौलक आ आबि गेल बजार। दिल कुमारीक घरमे किरायामे रह’ लागल।

दिल कुमारी केबाड़ पीटलकै, तखन तंद्रा भंग भेलै सुनीताक। ओ हड़बड़ायल। उठल। राति भरि जागबाक उझकी रहै। अंगैठी-मोर कएलक। मोन भेलै जे आइ काज नइं करए। दिन भरि अरामे करए।
मुदा से भ’ नइं सकलै। नगरपालिकाक मेहतर अपन बेटीक बियाह बला कपड़ा आ नाप सभ द’ गेलै। संगहि एकटा समाद सेहो कहने रहै-बहिन गे! प्रधान पंच तोरा बजलकौए। आइए दू बजे। आॅफिसमे।
सुनीता अचरजमे पड़ि गेल। प्रधान पंच ओकरा किऐ बजौतै? ओकरासँ कोनो अपराध तँ ने भ’ गेलै अछि।
एत’ अएलाक बाद कतोक आँखिक प्रहार सहलक अछि सुनीता। बहुतो लोक हुलकी-बुलकी देलकै। एक दिन दीपक सुब्बा सेहो आएल रहै, मुदा ओ ओकरो मुँह दुसि देलकै। ओ अपरतीव भ’ क’ चल गेल। सुनीता अपन निर्णय पर दृढ़ अछि। ओकरा कोनो पुरुषक आबलम्ब नइं चाही।
पुनः एकटा प्रश्न ओकरा मोनकेँ हौंड़ि दैक। प्रधान पंच किऐ बजौलकैए?
ओ कार्यालय पहुँचल। प्रधान पंचसँ बजएबाक कारण पुछलक। प्रधान पंच पुछलकै-तों एकसरिए रहै छें?
-हँ।
-आर क्यो?
-क्यो नइं।
-एकटा काज क’ सकैत छें?
सुनीताकेँ डर भेलै। ओ डेरायल बाजल-कोन काज?
-कोनो खराप काज कर’ नइं कहैत छियौ।-प्रधान पंच एकटा अबोध बच्चा दिस संकेत करैत बाजल-देख! ई अबोध अनाथ छै। तोरो क्यो नइं छौ। एकरा पोस। धर्मो हेतौ। पाछाँ जा क’ ई बुढ़ारीक सहारा हेतौ। नगरपालिकासँ एकर खर्च सेहो भेटतौ, एक सए टाका मास।
सुनीता ओहि छौंड़ा दिस तकलक। देखनुक रहै छौंड़ा। तीन-चारि बर्खक रहल हेतै। ओ सकपका गेल। बाजल-विचारि क’ कहब।
-ककरासँ?
-अपन मोनसँ... काकीसँ।
ताबत ओ अबोध आबि क’ सुनीताक आँचर पकड़ि लेलक। सुनीता पुनः ओहि छौंड़ाकेँ देखलक। ओकर मात्सर्य उमड़ि गेलै। ओकर मोन पिघलि क’ आँखि बाटें बहार होम’ लगलै।
क्षणहिं ओ नोर पोछलक। नइं, ओ एक सए टाकामे एकटा घेघ नइं लेत। स्वयंकेँ कोनो सम्बन्धमे नइं बान्हत। कोनो सम्बन्ध नइं... कोनो सरोकार नइं...।
छौंड़ा आँचर पकड़नहिं छल।
दोसर मोन कहलकै। ई घेघ नइं। कंठी-माला छौ-राम नामा। ई नइं ठकतौ। ई धोखा नइं देतौ। कतहु पड़ा क’ नइं जेतौ।
सुनीताक मोन सकपक कर’ लगलै। ओकर करेज जोर-जोरसँ काँप’ लगलै। ओ किछु निर्णय नइं क’ पाबि रहल छल। लोक सभ देखैत रहलै। करुणा आ ममताक विचित्रा दृश्य उपस्थित भ’ गेलै।
सुनीताकेँ लगलै जेना क्षणहिमे माया, मोह, स्नेह, भूख, प्यास आ ओकर सम्पूर्ण संवेदना जागि उठल हो। ओकरा सकपंज क’ नेने हो। ओकरा हरलै ने फुरलै, ओहि नेना दिस तकलक आ ओकरा कोरामे उठा क’ चुम्मा लेब’ लागल।
मातृत्वक सजीव मूर्ति बनि गेल सुनीता।
सुनीता कागज बनौलक। नगरपालिका दिससँ तीन मासक अग्रिम भेटलै आ छौंड़ाकेँ ल’ क’ डेरा आएल।
सुनीताक निर्णय दिल कुमारीकेँ सेहो नीक लागल रहै।
छौंड़ा बौक छलै। छौंड़ाक बौक होएब, सुनीताकेँ कने झूस बना देने रहै। ओ छौंड़ाकेँ बजएबाक प्रयास कर’ लागल।
ओहि राति लागल रहै सुनीताकेँ, जेना खूब सुखसँ सूतल होअए। बौकाकेँ करेजमे साटि क’ सूतल छल। अपन जनमल नइं भेलै ताहिसँ की? ओकर मातृत्व सजग भ’ गेलै। मातृत्वक सम्पूर्णताक बोध भेल रहै ओहि राति।
छौंड़ा बौके नइं, अखलाह सेहो रहै। मुदा सुनीताक लेल ओ सोन सन रहै। आब सुनीता ओकरा अपना संग, काज बट्टम बला काजमे सेहो लगाब’ लगलै।
शुरुहमे छौंड़ा बड़ तंग करै ओकरा। काज दिस बट्टम लगा दै आ बट्टम दिस काज बना दै। नहूँ-नहूँ सुनीता ओकरा सीखाब’ लागल। छौंड़ा सीखि लेलक।
मुदा छौंड़ाक एकटा बानि एखनो छै। एखनो ओ सुनीताक करेजेमे सटि क’ सुतैत अछि। एक हाथ सुनीताक देह पर, दोसर... आ टाँग सुनीताक दुनू टाँगक बीच घोसिया क’...। निर्विकार भावें सूति रहै बौका। सुनीताक मातृत्व छलकि जाइ। ओहो ओकरा पजिया क’ सूति रहए।
ओना दिल कुमारी एक दिन मना कएने रहै-बौकाक ई आदति नीक नइं छै। एखन ने नेना छौ! आ नेना की? आब तँ सियान भेल जाइत छौ। ओकर एहि आदतिकेँ छोड़ायब जरूरी।
सुनीता बाजि उठल-काकी। तोरो मोनमे पापे उठैत छौ। धुर जो...।
समय बीत’ लगलै। सुनीताक मशीनक चक्का चल’ लगलै। बौका काज-बट्टम कर’ लागल।
समयक संग महगी बढ़लै। मजूरी, दरमाहा बढ़लै। बढ़लै कपड़ाक सिआइ। बाट बढ़लै। पीच रोड बढ़लै। मोटर गाड़ी बढ़लै। उड़ीस-मच्छर बढ़ि गेलै। लबरै-लुचपनी बढ़लै। दू-नमरी धन्धा आकास छूब’ लगलै।
घरक किराया बढ़ि गेलै। सुनीताक दोकान आ सुतबाक कोठरी फराक भ’ गेलै। नगरपालिकासँ भेट’ बला टका बन्न भ’ गेलै।
दिल कुमारीक बयस बढ़ि गेलै।
बौका सेहो जुआन होम’ लागल। सुनीता प्रौढ़ा होम’ लागल।
समय बदललै। राति-दिन मासमे बदलि गेलै। मास बर्खमे। बर्ख युगमे। पंचायती व्यवस्था बदललै। प्रधान पंच बदलि गेलै। मेयर भ’ गेलै। जनमत संग्रह भेलै। आम चुनाव भेलै। प्रजातांत्रिक व्यवस्था भेलै। संविधान बदललै।
मुदा, बौकाक बानि नइं बदललै।
सुनीताकेँ लगै जे ओ डोलि ने जाए। ओ बौकाक ओछाओन फराक क’ देने छल। मुदा बौका राति-राति भरि जागि क’ बिता दै। प्रात भेने जखन काज-बट्टम करै तँ निसभेर भेल बुझाइ, आँगुरमे सुइया भोंकि लै। सुनीताक ममता जागि जाइ।
एते दिन तँ नइं मुदा आब बौका सुनीताक गराक घेघ बनि गेल छै। सुनीता विचित्रा उहापोहमे फँसल छल। बौका ओकरा गरदनिक ढोल बनि गेल छै, ने बजौनहिं कल्याण आ ने हटौनहि शान्ति। कत’ जेतै छौंड़ा?
माघक पाला पड़ैत छलै। बौकाकेँ दोकान बला कोठरीमे ओछाओन क’ देने रहै सुनीता। मुदा छौंड़ा नइं मानलकै। अन्ततः सुनीता अपन कोठरी बन्न क’ लेलक। बौका दोकान बला कोठरीमे ठिठुरैत रहल।
सुनीताकेँ सेहो निन्न नइं भेल रहै। एकटा आशंका जगौने रहै। बौका सुतलै, आ कि जगले छै?
ओ केबाड़ खोललक। बौकाकेँ ठिठुरैत देखि ममता जागि उठलै। ओकरा पुनः अपने लग बजा लेलक। बौका गेल आ सुनीता लग अपन बानिक अनुसारेँ निर्विकार भावें सूति रहल-एकटा हाथ सुनीताक देह पर... दोसर... आ टाँग...। ओ निन्न पड़ि गेल।
ई क्रम पुनः चल’ लगलै। एही क्रममे एक राति डोलि गेल सुनीता। कोन सीमा धरि संयमित रहितै? ओकर संयम टूटि गेलै। सीमा पार क’ गेल। ओकर चेतना मरि गेलै। ओ, घिना गेल।
मुदा, बौकाक लेल धनि सन। ओकरा ने हर्षे होइ, ने विषादे।
प्रात भेने सभ किछु सामान्य रहै। असामान्य मात्रा एतबे रहै जे सुनीता भरि मोन बौकाकेँ देखि नइं पाबए। ओकरा ग्लानि होइ। मोन होइ जे एहि घिनाएल जिनगीसँ मुक्तिए उचित। मुदा बौका? ओकरा बाद बौकाकेँ के देखतै?
आ सुनीता किछु नइं क’ पाबए।
अपन सभटा असमर्थता एक दिन दिल कुमारीकेँ कहने रहै सुनीता। दिल कुमारी सभ किछु सुनि नेने छल आ अन्तमे बड़ निर्दयी भ’ बाजल छल-जाहि दिन एहि छौंड़ाके जिम्मा लेलही, तहिया नइं बुझलही जे नमहर भ’ क’ इहो पुरुषे हेतै।
-मुदा बौकाक की दोष छै, काकी? ओकर कोनो दोष नइं छै। हमहीं...।
एक दिन साँझ खन बौका बजार दिस बहार भेलै, से घुरि क’ नइं अएलै। चारू कात ताका-हेरीमे लागि गेल सुनीता। राति बीति गेलै, मुदा बौका नइं अएलै।
पाँच दिन बीति गेलै। सुनीता कात करोटक सभ शहर-बजार आ गाम घर छानि लेलक, मुदा बौका ने भेटलै आ ने अएलै।
सुनीता हारि क’ बैसि रहल। ओकर मोन हदमदाए लागल रहै। देहमे कोनो सक्के नइं लगै।
दिल कुमारी ओकरा सम्बल देलकै ओहि दिन। ओ सुनीताक माथ अपन जाँघ पर राखि नेने रहै आ ओकर केश पर हाथ फेर’ लगलै। सुनीताकेँ जीवनमे पहिल बेर माइक छाँह सन लगलै दिल कुमारीक स्नेहिल हाथ।
कने कालक बाद दिल कुमारी बाजलि-उठ! आब बौका नइं औतौ। चल अस्पताल। खसबा दैत छियौ।
सुनीता टुकुर-टुकुर दिल कुमारी दिस ताक’ लागल। ओ कोनो निर्णय नइं क’ पाबि रहलि छल। दिल कुमारी बाजल-जा धरि मरैत नइं छें, मशीन चलाबहि पड़तौ। लोकक फाटल-पुरान सीबहि पड़तौ।
सुनीताक सिलाइ मशीन एखनहुँ चलिते छै। कपड़ा सीबि लेलाक बाद ओ एक बेर विराट शून्यमे तकैत अछि... तकैत रहैछ, मुदा तखनहि दिल कुमारी ओकर तंद्रा भंग क’ दैछ-ला! काज-बट्टम क’ दैत छियौ!

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शुक्रवार, 28 अगस्त 2009

ब्रजकिशोर वर्मा ‘मणिपद्म' - तखन कोन सोना केर मोल



सोना-बेटा कटए युद्धमे
तखन कोन सोना केर मोल?
रे ‘प्रताप’ जूझए ‘हल्दी’मे
भामाशाह! खजाना खोल
आइ विश्व भरि केर स्वतन्त्राता
माँगि रहल हमरेसँ मोल
दही लेपि क’ माँस चटा दे
उठ दधीचि, निज हड्डी तौल!
कंचनजंघा डगमग-डगमग
मानसरोवरमे तूफान
‘जय जय भैरवि असुर भयाउनि’
अधर-अधर पर गंूजए गान
हमरे गतिमे विश्वक गति छै
ताकि रहल अणु-हत भूगोल
सोना-बेटा कटए युद्धमे
तखन कोन सोना केर मोल?

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वैद्यनाथ मिश्र "यात्री" -ओ ना मा सी धं!


ओ ना मा सी धं!
आहि रे बा, आहि रे बा,
ख्रुश्चेव खसला, चितंग!
क्रान्तिमे थूरल गेला शान्तिक दूत
लोककें लगलै अजगूत
उतारि क’ फेकि देल गेलनि फोटो
अपनो तँ एहिना
रहथिन कएने स्तालिन केर कपाल-क्रिया
सुनने रही कतहु की मुर्दाक ओहन दुर्गति?
आहि रे कप्पार!
दशो प्रतिशत क्षमा नहि पूर्वजक लेल
ऊपर अन्तरिक्षमे चलैत रहौ उड़ानक खेल
क्रेमलिनक मुदा कीदन भ’ गेल
कैक टा खु्रश्चेव ढहनेता मने उसिनल बेल
भारतीय थिकहुँ, सभकें तिल-जल देल...
‘येनास्ता पितरो जाताः, येन जाताः पितामहाः’
सएह गति होउन हिनको
ओं शान्तिः शान्तिः शान्ति !!

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विवेकानन्द ठाकुर-गिद्ध बैसल मन्दिर




सौंसे इलाका गनगना गेल
गिद्ध बैसल मन्दिर छुआ गेल
कोनो पुरखाक बनबाओल मन्दिर
बड्ड पुरान/ने छोट/ने पैघ/घुटमुटार

लखुरिया पजेबाक चारू देबाल
जाहि पर औन्हल गोल गुम्बर
बीच मे गाड़ल बीझ लागल त्रिशूल

शीत-ताप पानि पाथर
झक्कड़-धक्कड़ सहैत-सहैत/कारी सिआह भेल
जेना अगबे छाउरसँ/हो ढौरल

मन्दिर बनल रहल ओंगठन-छाहरि
अनेक लोक लेल अनेक बर्ख धरि
एक्केटा शहसँ मुदा, सभ भ’ गेल मात
मन्दिर पर भ’ गेल पैघ वज्रपात

पपिआहाक बात सभ पतिया गेल
गिद्ध बैसल मन्दिर छुआ गेल
सौंसे इलाका गनगना गेल
गिद्ध बैसल मन्दिर छुआ गेल
मन्दिर छुआ गेल ओंगठन छुआ गेल
छाहरि छुआ गेल

देवता जे छलाह जागन्त
आब भ’ गेलाह आदंक
लोक सभ डेरा गेल पुजेगरी पड़ा गेल
चोरबा सभ कें फबलइ राता-राती
लोहक सिक्कड़ काटि चोरा लेलक
बड़का पितरिया घण्टा, दीप, घण्टी, घड़ी-घण्टा
सभकें बेच आएल ओजनसँ ठठेरी बजारमे
ने बेचनिहारके कोनो ग्लानि
ने किननिहारकें कोनो दुविधा

इलाका भरिक श्रद्धा आ विश्वास
ओजनसँ बिका गेल ठठेरी बजारमे
रहि गेला पाथरक देवता
हुनका नहि पुछलक चोरबा

अन्हार घुप्प मन्दिरमे आब भम पड़इए
केओ ओम्हर कखनो घूरि नहि तकइए
एकटा प्रश्नक मुदा, नहि भेटइए उत्तर
पाथरक देवता फेर भ’ गेला पाथर?
सत्ते भ’ गेला पाथर, सत्ते भ’ गेला पाथर


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अमूल्य बात /- मदन कुमार ठाकुर


अमूल्य बात ----
बेकार नै जिनगी बैतित करू ,
नै समय भेटल अछि गमबैय क
जग में आयल छि अहाँ ,
और सब के कम बनाबैय क
कथनी बरनी से लाभ नै ,
करनी में ध्यान लगा राखू
करनी में शुख आनन्द भेटत ,
कथनी छि मन बहलाबई क
हुनकर जिनगी अछि बातक ,
छैथ जन्मल बात बनाबैय क
पोथी - पत्तरा के ग्ज्ञानी छैथि ,
फुशिये सम्मान क अभिमानी छैथि
नै अनुभव छैन रहन - सहन क ,
भरम में ओ अभिमान सं
जग क ओ मिथ्या कहिते ,
लिकिन जग में आश लगाबैत छैथि
अपन गप्प के शिध्य करै लेल ,
पाबैत नहीं छैथ ठोर- ठिकाना
कथनी से तेज करू करनी क ,
करनी सं बनाबू रहनी क
करनी से चैन मिले रहनी क ,
करनी छी जिनगी सवारै क
आस लगाबी करनी में ,
करनी छी भाव बढा बाई क
अमूल्य बातक ई ध्यान राखी ,
भेटत नहीं ई राज शिखाबई क
राजा रंक फकीरा चाहे ,
अपन जिनगी सफल बनाबाई क

The end

मदन कुमार ठाकुर
पट्टी टोल, कोठिया , भैरव स्थान , झांझर पुर ,मधुबनी , बिहार , ८४७४०४
ई मेल - madanjagdamba@yahoo.com

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बृहस्पतिवार, 27 अगस्त 2009

नेना-भुटका-डॉक्टर

ऊँटनीसँ खेत जोतल जाइ छैक हरियाणामे। आरिपर जालक गाछ सेहो रोपल जाइत छैक। एहि जालक गाछमे लू बहलापर पीअर फर सेहो लगैत अछि।

एहने वातवरणमे एक गोट किसान ऊँटनीसँ हर जोइत रहल छल। हर जोतैत-जोतैत ऊँटनी अपन नमगर गरदनि नमराय जालक गाछसँ पात खा लेलक। मुदा संजोग जे पात गोलठिया कऽ ओकर गरदनिमे अँटकि गेलैक।

तखने एक गोटे जे ओहि खेतक आरि देने कतहु जा रहल छल आएल आ पुछलक जे की भेल।

किसान कहलक जे ओकर ऊँटक गरदनिमे किछु अँटकि गेल छैक आ हर जोतब छोड़ि बेचैन अछि।

ओ व्यक्ति पुछलक जे ई हर जोतैत-जोतैत दहिना कात गेल छल की?

-नञि।

-उत्तर।

-नञि।

-दक्षिण।

-नञि।

-वाम।

-हँ।

-फेर ओ जालक पातपर मुँह मारने रहए की?

-हँ।

-कोनो गप नहि।

ई बाजि ओ व्यक्ति ऊँटक गरदनिपर एक हाथ मारलक। नुरिआएल जालक पात ऊँटक गरदनिसँ बाहर आबि गेल आ ओ निकेना भऽ गेल।

किसान पुछलक जे अहाँ ई करएमे कोना सक्षम भेलहुँ।

ओ व्यक्ति कहलक जे हम डॉक्टर छी। तेँ।

किसान कहलक- अच्छा। तखन तँ हमहुँ डॉक्टरी कऽ सकैत छी।

ओ गाम गेल। ओतए एकटा बुढ़िया सूतल रहए। ओकर मोन खराप रहए।

ई चिकरैत घूमि रहल छल जे हम डॉक्टर छी। ककरो जे इलाज करेबाक होअए तँ हमरा लग आऊ आ इलाज कराऊ।

बुढ़ियाक परिवारजन एहि डॉक्टरकेँ बजा कऽ अनलक।

डॉक्टर पूछब शुरू कएलक।

- बुढ़ी दहिना कात गेल छलीह की?

-नञि।

-उत्तर।

-नञि।

-दक्षिण।

-नञि।

-वाम।

-नञि।

- एक बेर हँ कहि कऽ तँ देखू।

ओकर परिवार बला सभ हँ कहि देलक।

फेर जालक पात खेलन्हि की? एहि प्रश्नक उत्तरमे सेहो परिवार बला सभ आश्चर्य व्यक्त कएलक जे मनुक्ख जालक पात किएक खाएत?

मुदा एहि डॉक्टरक कहलापर ओ सभ हँ कहि देलन्हि।

आब डॉक्टर बुढ़ीक गरदनिपर मारलक। ओ तँ लटकले छलीह। से हुनकर प्राण निकलि गेलन्हि।

आब घरमे मात्र तीन गोटे रहथि से बूढ़ीकेँ कन्हा देबाक लेल डॉक्टरोकेँ जाए पड़लैक, लहास उघि कऽ डॉक्टर बेसुध भऽ गेल। बूढ़ीक अन्तिम क्रिया भेल आ तखन जे डॉक्टर फीस मँगलक तँ ओ सभ ओहि डॉक्टरपर मारि-मारि कए छुटल।

डॉक्टर ओतएसँ भागि दोसर गाम पहुँचल आ फेर इलाज कराऊ, इलाज कराऊ, ई कहि चिकरय लागल।

एक गोटे अएलाह।

-चलू। हमर बाबूजीक मोन खराप छन्हि। इलाज कए दियन्हु।

-इलाज तँ हम कए देबन्हि। मुदा लहासकेँ कान्ह हम नहि देबन्हि।-डॉक्टर बाजल।

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मायानन्द मिश्र-मूल्य/ अपन गाम

मूल्य

दूबर पातर छोट-छीन इजोतक टुकड़ी
महाकाय महादानव अन्हारसँ लड़ैत लड़ैत
थाकि रहल अछि
अंग प्रत्यंग टूटि रहल छै
समर्थन लेल एम्हर ओम्हर तकैत अछि
तकैत अछि दूबर पातर छोट-छीन
एसगर इजोतक एकटा टुकड़ी।
टुकड़ीक मोनमे निश्चयक एकटा विस्तृत आकाश अछि
ई लड़त,
अन्त धरि लड़त
एसगरो लड़त, लड़िते रहत
‘अन्हार’कें परास्त करत
निश्चय करत
दूबर-पातर
छोट-छीन
इजोतक ई टुकड़ी।


अपन गाम

अपन ई गाम अपन गाम सन ने लागैत अछि ।

जीबैत लोक आई बेर बेर मरैत अछि ।

बिसरी गेलै हंसी करब दलान आँगन सँ

हंसी देखैक लेल लोक आई हँसैत अछि ।

ओकनी गेलै मेह्दिक गाछ आँगन सँ

सादिक नोर युगक लेख आई बनैत अछि

कतेक लोक मे कतेक लोक अछि असगर

उदास पल दिनुक निराश राती गनैत अछि ।

छिना गेले हंसी कतेक आई खरिहानक

सिमान गाम केर कते उदास रहैत अछि

अन्हार खोह सँ कते अपन इजोत तकैत अछि

दिनक लहास नेने फेर भोर अबैत अछि ।


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मिथिलाक खानपान...

मिथिलाक खानपान-नीलिमा चौधरी आ राखी साह... मखानक खीर सामग्री- दूध-१ १/२ किलो, चिन्नी-१०० ग्राम, मखान कुटल- १०० ग्राम, इलाइची पाउडर- स्वाद अनुसार, काजू- १० टा, किशमिश-२०टा बनेबाक विधि- मखानक पाउडर (कनी दरदरा)क पहिने १/२ किलो ठंढ़ा दूधमे घोरि लिअ, शेष दूध केँ खौला लिअ। आब गर्म दूधमे ई घोड़ल मखानक मिश्रण मिला दियौक आर करौछसँ लगातार चलबैत रहियौक जाहिसँ मिश्रण पेनीमे बैसय नहि। .... (आगाँ पढू)

मिथिलांचलक विकास..

मिथिलांचलक विकास... मिथिलांचल क्षेत्र बिहार मे सबस पिछड़ल मानल जाइत अछि, अगर प्रतिव्यक्ति आय , साक्षरता और प्रसवकाल मे जच्चा-बच्चा के मृत्यु के मापदंड बनायल जाय तो मिथिलांचल देश के सबस गरीब आ पिछड़ल इलाका अछि। एकर किछु कारण त अहि इलाका के भौगोलिक बनावट अछि... (आगाँ पढू)

मिथिला अरिपन....

मिथिला चित्रकला- स्त्री आ पुरुषक दशपात अरिपन / स्वास्तिक अरिपन... स्त्रीगणक दशपात अरिपनकन्याक मुण्डन,कान छेदन आ' विवाहक अवसर पर कुलदेवताक घर आकि मण्डप पर बनाओल जाइत अछि।बनेबाक- विधि। एकर बनेबाक विधि सूक्ष्म अछि।ऊपरमे तीन पातक पुष्प, ,ओकरनीँचा पाँच-पातक कमल-पुष्प,ओकर नीचाँ सात-पात युक्त्त कमल, बीचमे अष्टदल कमल अछि। दश पात चारू दिशि अछि। नौ टा माँछक चित्र सेहो अछि... (आगाँ पढू)

एक विलक्षण प्रतिभा...

एक विलक्षण प्रतिभा जिनका हम सदिखन याद करैत छी (प्रथम कड़ी) - कुसुम ठाकुर..... एक बेर हमारा एक पत्रिका में किछु लिखय लेल कहल गेल छल, ई सन् १९९६ क गप्प थिक। हम बस एतबे लिखी सकलौं "हम की लिखी हमर त लेखनिये हेरा गेल"। मुदा आई बुझना जैत अछि जे नै, हमारा एकटा कर्तव्यक निर्वाहन... (आगाँ पढू),
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चिनबारक दीप...

चिनबारक दीप–उषा किरण खान... समस्तीपुर मे गाड़ी बदली कऽ महेसरी अइमे बैसलि सरिया कऽ। आब घर बेसी लग आयल जाइत छैक। चारि टीसन आ छैक, फे तऽ टीसन सऽ एक कोस जमीन हैतै। चारि-पाँच गोटाक हेंज छैक्। बौआइत-बतियाइत गाम पहुँचि जयतै। आठे दिनुका दिन छैक, की सब करतै? एह, करऽक की छैक? सभटा बस्तुजात तऽ कीननहिं जाइत छैक.... (आगाँ पढू)

बिदेसिया (संकल्पित नाटिका)

विद्यापतिक बिदेसिया (संकल्पित नाटिका).... भोजपुरीक साहित्य मैथिलीसँ कम समृद्ध अछि मुदा से अछि मात्र परिमाणमे, गुणवत्ताक दृष्टिमे ई कतेक क्षेत्रमे आगाँ अछि। भोजपुरीक भिखाड़ी ठाकुरक बिदेसियाक सन्दर्भमे हम ई कहि रहल छी। भिखाड़ी ठाकुर कलकत्तामे प्रवासी... (आगाँ पढू)

पाँच पत्र...

पाँच पत्र-हरिमोहन झा... प्रियतमे अहाँक लिखल चारि पाँती चारि सएबेर पढ़लहुँ तथापि तृप्ति नहि भेल। आचार्यक परीक्षा समीप अछि किन्तु ग्रन्थमे कनेको चित्त नहि लगैत अछि। सदिखन अहींक मोहिनी मूर्ति आँखिमे नचैत रहैत अछि। राधा रानी मन होइत अछि जे अहाँक ग्राम वृन्दावन बनि जाइत, जाहिमे केवल अहाँ आ हम राधा-कृष्ण जकाँ अनन्त काल धरि विहार करैत रहितहुँ... (आगाँ पढू)

कथा- माउगि

कथा- माउगि - विभा रानी.... माउगि, माउगि, गे माउगि, गे माउगि! तों माउगि, हम माउगि, ई माउगि, ऊ माउगि - सभ किओ माउगे-माउगि। ऊँहूँ - सभ किओ भला माउगि हुअए। ई तय कर' बाली तों के? अएं गे? तोरा कहिया स' भेटलौ ई हक? ई सभ काज-धंधा हमरा आओरक अछि - हमरे आओर के करे दें। देख त' कने, तोहरो आओर के कतेक रंग-बिरंगा रूप दिया देलियौ! माउगि, गे माउगि.... (आगाँ पढू)

मातृत्व...

डा. मंजू गीता मिश्राक आलेख : मातृत्व.... नारी जीवनक सबसँ गौरवशाली एवं सुखद अनुभव थिक मातृत्व ।ई नारी जीवनक परिपूर्णताक प्रतीक अछि । पूरा नौ मास अपन गर्भमे फलैत-फूलैत एक शिशुक अपन जान सँ बेसी देखभाल करैत छथि । तत्पश्चात एक फूल सन सुन्दर सुकोमल शिशु जन्म लैत अछि, यैह स्त्रीक सबसँ अनमोल उपहार एवं आनन्ददायक क्षण थिक । एहि नौ मासक दौरान गर्भवतीक भोजन एवं वातावरण पर निर्भर करैत अछि.... (आगाँ पढू)
© कॉपीराइट सूचना:
मैथिल आर मिथिला
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