मंगलवार, 29 सितम्बर 2009

गाँधी


दीवा राति स्वपन एक देखल
गाँधी जी सिरमा में ठार
वस्त्र लंगोटी हाथ में डंडा
बिना मांस के काया हार
बौया हमरा स्वर्गलोक में
आत्मा करैया सत्तत धित्कार
स्वर्ग समान छल जे भारतवर्ष
के करत आब ओकर रखवार
कि भेल हमर खादी, चरखा
गीता, लंगोटी, लोटा आ खरपा
कि भेल हमर सपनाक रामराज
के चोरेलक टैगोरक 'ताज'
किया उठल अहिंसा सँ विश्वास
गृह हिंसा सँ बिछल आई लाश
प्लास्टिक सँ आई बनैया तिरंगा
नेतोक देह पर नहि खादीक अंगा
टी-सर्ट नीकर में घुमैया नाड़ी
नहि पहिरैत कियो खादी साड़ी
फेर फिरंगीक भय गेल राज
MNC के नाम पर चलबैया काज
घुश देब कर्तव्य आ लेब अधिकार
मानवता के केलक धिक्कार
कोना रहत भारत अछुन्न
हर प्रदेश के अलगे धुन्न
के बनत सीमाक रक्षक
देशही में बसैया भक्षक
खून से लथपथ नेताक हाथ
देशद्रोहक करैत ओ काज
करय फसाद मिली नेता 'आला'
हर महिना कोनो नव घोटाला
जमाखोर के बढ़ी गेल पेट
मिलावट कय कटैया घेट
धर्मक नाम पर होइया ब्यपार
सब मजहब के अलग ढीकेदार
हमरा नीदक भेल विराम
दुने के मुह से निकलल 'हे राम'

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पंकज जी पर गर्व करू.

मैथिल आर मिथिलाक समस्त लेखक,पाठक आर शुभेच्छु से निवेदन अच्छी की पंकज- गोष्ठी से जुडू.पंकज जी से सम्बंधित सामग्री एत उपलब्ध ऐछ.पंकज जी मिथिला मूल के राष्ट्रीय धरोहर छलाह. सब मैथिल क ई बात क अभिमान होबाक चाहि.आई मिथिला के पैघ लेखक सब भी पंकज जी क बारे में किछु ने किछु जनबे करैत छैथ.पंकज जी पर शोध होबाक छाही.हुनकर व्यक्तित्व के आंच से दड्लाक कारने तत्कालीन किछ पैघ आलोचक हुनकर उपेक्षा केने चित.किंतु इतिहास बनावे वाला इतिहास पुरूष की बिस्रायल जाय सके छैथ?पंकज जी इतिहास क पत्र बनी चुकल छित. अतः निवेदन छे की सब गोटा मिली के पंकज जी पर योगदान करू.हुनका से सम्बंधित विवरण ई वेब-साईट पर उपलब्ध ऐछ-http://www.pankajgoshthi.org/

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राजकमल चौधरी - सीता मृत्यु: अहिल्याक जन्म

प्रस्तावना
बिना कएने धरम-समाजक लोक-लाजक कोनो परवाहि
वृद्ध पितामह अनने छथि खोड़षीकें बिआहि...

परिस्थिति
पंडित सुधाकरजीक धर्मपत्नी द्वितीया, स्वकीया
आ हमर नवजात वासना परकीया
दुन्नू अछि बान्हल कुल-शील ससरफानीसँ
वैवस्वत मनुक महावाणीसँ
परनारीक नाम नहि लिअ’
परपुरुषकें दिअ’ देह नहि छूअ’
मनेच्छाक करू जुनि गप्प, हृदयधारकें राखू सम्हारि
देखू काटए नहि, बिखधरकें पहिनहि दिअ’ मारि
मोनक वातायन पर टाँगू मोट-मोट कारी-कारी परदा
खाइत रहू कामनाक माटि, फँकैत रहू निवृत्तिक गरदा
द्रवित, दुखित, भ्रमित रहू होइते आत्माक क्रन्दनसँ
बान्हल छेकल रहू स्मृति-पुराण संहिताक बन्हनसँ
लक्ष्मण-रेखासँ
नियतिक व्यंग्यपूर्ण लेखासँ...
कथा
मुदा, (ई ‘मुदा’ अछि कतेक नग्न, अछि कतेक भग्न)
अर्थार्जनमे सदिखन रहै छथि सुधाकरजी मग्न
जमीन्दर (पहिने छलाह। आब नेता) देशक द्वार पर प्रति राति
करैत गप्प शप्प ओएह जे जमिन्दारिनीकें सोहाति
बँचै छथि पुराण
बँटै छथि धर्मक ज्ञान, त्याग, बलिदान
जे एहेन छलाह राजा शिवि, एहेन छलाह दधीचि
कर्तव्य-रक्षार्थें अपने सोनितसँ धरा देलनि सींचि
एहेन छलीह गार्गी, मैत्रोयी, सीता, अनुसूया, सावित्राी
अपन शक्तिसँ केलनि गौरवान्वित ई धरित्राी
एहेन छलाह पूर्णपरब्रह्म श्रीकृष्ण भगवान
केलनि गोपिकाक रूप-गंगामे भरिपोख स्नान
... सुधाकरजी बँटै छथि मर्मज्ञान
आ, एम्हर हुनकर द्वितीया, बनि पूर्णिमाक चान
गबै छथि मधुर स्वरें कोनो नटुआसँ सूनल गान--
केहेन चतुर भौजाइ रे
मोन होइ छै दिअर संगें जाइ रे
कनकलता सन देहक कंचन फल छै
कतबो जतनहुँ आँचर तर ने समाइ रे...
सत्य
गबै छथि मधुर स्वरें गान, भ’ खिड़की लग ठाढ़ि
हमरा हृदयमे उठै’ए जेना कोसिकाक बाढ़ि
उफनै’ए कामनाक धार
(की हएत अनर्गल जँ रोकी नइं मोन-सागरक फेनिल ई ज्वार?)
उपसंहार
फूसि थिक मनुदेवताक स्मृति, फूसि थिक व्यासदेवक गीत
आइ थिक कलियुग, त्रोतामे मरलीह सीता
मरि गेलाह एक पत्नीव्रतधारी पुरुषोत्तम राम
नइं मरल मुदा, शिवक तृतीयो नेत्रा ज्वालासँ काम
भेलै नइं संसारक कोनो क्षति
सीताक मरनइं की, जीविते छथि एखन लक्ष-लक्ष रति
मरलीह एखनऊँ नइं गौतमक पत्नी अहिल्या सुकामा
मरलाह श्रीकृष्ण, जिबते अछि रूपभिक्षुक हमरा सन सुदामा
आ,
जनमिते रहती नितप्रति अगणित अहिल्या सुकुमारी
(ताकत अवस्से स्वस्थ वृक्ष, माधवी लता थिक नारी)
जावत अछि जीवित एक्कोटा बूढ़ बोको गौतम
नइं हटि सकत ई तम
गबिते रहती नारी परपुरुखक सहगान
करिते रहत पुरुख-जाति सहस्त्रा अहिल्याक धेआन...

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सोमवार, 28 सितम्बर 2009

रामकृष्ण झा ‘किसुन’ - खिस्सा-पिहानी



ह’
उखड़ि गेल गाछ
अतिवृद्ध, जर्जर
डारि सभमे कठपिल्लू
घोरन छल लुधकल
टुस्सी सभमे बाँझी आ कोंकराहा
जाला छलै छाड़ल
बेस उँचका डीह पर
इतिहासक जीह पर
दोहराओल जाइ छल ओकर नाम
फल्लाँ बाबूक घड़ारी परक गाछ
(हड़ाशंख गाछ)
जनम’ नहि दै छलै छाहरि तर किछु
उच्च वंशावतंस पीपरक गाछ
बैसाख नहाबए बाली सभ
ओकरा जड़िमे पानि ढारि
गोसाँइक नाम सुनैत छलि
पुण्यलोभें ओकर खिधाँस सुनि
आँखि-कान मुनैत छलि
कतेकोकें बेटा
बेटाकें नोकरीक जोगार
फल्लाँ गामबालीक जमायक भातिज
आ कि भागिनक सार
भरिसक ओहि गाछक कृपासँ पौने छल
खुशफैल रोजगार
तें सब लुबधल छलि
पसरल आँचर
हे भगवान
रखिहह एहि पर ध्यान
ज’ड़ि लग बह्मक घोड़ा
फुनगी पर बह्मराक्षस
की लेब?
की ले...ब...?
ब’र आब नहि छलै
दर्प छलै छाहरिक
नवका छौंड़ा सभ ढेलमौस चलबै छल
कोनो फुनगीकें निशाना बनबै छल
वृद्ध जरद्गवकें कनबै छल
उखड़ि गेल पुरना से गाछ
बिहाड़िये छल जोरगर
उखड़ल अछि, तैयो जड़ि छै लगले
तंे पारू कोदाड़ि
खूनि दियौ चकरगर क’ चैर
चलाउ कुड़हरि
काटू एकर मुसरा
जे हँटए ई ढेंग
जमीन हो साफ
पुरनाकें आब कहू के करतै माफ?

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गोविन्द झा - युग-पुरुष


कत’ उघने जाइ छह हे युग-पुरुष ई
पर्वताकृति माथ?
अरे कोन पदार्थसँ छहु गर्भिणी ई मगज-पेटी?
बहै छहु अविराम एहिमे पर्मिं काष्ठक ह’र
तीक्ष्ण बुद्धिक फार, ज्ञानेन्द्रियक बसहा
विकट नियमक रासि
अकट तर्कक नाथ।
एहि सभकें गर्भमे कएने जरायु समान
पर्वताकृति माथ
कत’ उघने जाइ छह हे युग-पुरुष तों?
जा रहल छह आइ जोतै लेल नबका चास
दूर, अतिशय दूर?
जोति चुकलह घ’र लगक चैमास?
जोति चुकलह बाध-बोनक चास?
जोति चुकलह चीन ओ जापान?
रूस, अमेरिका, अरब, ईरान?
खूब तेज हँकै छह तों अपन मगजक ह’र।
बाह रे हरबाह!
जाह, जत्ते दूर जेबह, जाह।
शिवास्ते पन्थाह!
कते उपजौलह एखन धरि?
कए अरब टन? कए खरब टन?
ताहिसँ की भेलह नहि सन्तोष जे तों
आइ जोतए जा रहल छह दूर, अतिशय दूर
बढ़ि गेलहु अछि गृð दृष्टिक भूर
घ’रे बैसल देखि लै छह लाख योजन दूर।

दूर लटकल जे गगनमे चान
आइ हस्तामलकवत् से भ’ रहल छहु भान
देखि रहलह अछि जोत’ तों लहलहाइत चास
जा रहलह अछि ओतहि तों, अरे लोभक दास।
ल’ अपन ई पर् िंकाष्ठक ह’र!
वाह रे हरबाह
जाह, जत्ते दूर जएबह, जाह।
शिवास्ते पन्थाह।

अपन माथक भारसँ अपनहि पिचाइत
रेलवेक कुली जकाँ बेजान दौड़ल जा रहल
हे पर्वताकृति माथ
सर्षपाकृति माथ केर सम्वाद किछु सुनि लएह
गर्वसँ क’ उच्च मस्तक ताल-वक्ष-समान
जा रहलह अछि गगनसँ आइ आनए चान
हाल की धरतीक छै; नहि ताहि दिस छहु ध्यान
लगौने छह मात्रा ऊपर टकटकी बड़ जोर
कहि देतहु मुँहफट कोनो मैथिल अकास-काँकोड़
भेल नहि अछि आइयो धरतीक पीड़ा शान्त
होअह जँ, विश्वास नहि तँ चलह हमरा संग
भ’ जेतहु ‘स्पुतनिक युग’क अभिमान क्षणमे भंग
जखन देखबह अपन दुनू आँखिसँ प्रत्यक्ष
दूध बिनु म्रियमान शत-शत बाल
अन्न बिनु म्रियमान नर-कंकाल
वस्त्रा बिनु म्रियमान माइक लाज
धाँगि चुकलह अपन सप्तद्वीप धरती
मथि गेलह अगाध सातो सिन्धु
किन्तु नहिएँ कतहु भेटलहु एकर औषध हाय!
जा रहलह तें गगनमे आइ संजीवनी जोह’
जाह हे युगपुरुष, सुखसँ जाह
शिवास्ते पन्थाह!
कहह हमरा लेल अनबह कोन-कोन सनेस?
सर्षपाकृति माथकें चाही न किछु विशेष
भरल बाटी दूध लाबह भरल थारी भात
आर लाबह वस्त्रा टा भरि गात।
जाह हे युगपुरुष, सुखसँ जाह
शिवास्ते पन्थाह!

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डमरुक नादसँ भागत कुसंस्कार ?
















जितेन्द्र झा
मैथिली लोकरंग(मैलोरंग) रविदिन नयां दिल्लीमे जल डमरु बाजे नाटक मन्चन कएलक । कोशी नदीक बाढ़िक विभीषिका आ मिथिलाक सामाजिक कुरीतिके एक्कहिटा मालामे गांथके काज भेल अछि - जलडमरु बाजेमे ।
कोशीक बाढ़िमे सभ किछु दहा गेलाक बादो विचारक कुसंस्कार नई धोआइ छै कोशीक पानिसँ । जातीय कुसंस्कृति, कुसंस्कार र वर्गीय भेदभाव केनाक' लोकके जकडनहि रहैत छै से ई नाटकमे निक जकाँ देखाओल गेल अछि । पैघ जाति- छोट जाति, बडका छोटकासं उपर उठबालेल ई नाटक प्रेरित करैत अछि । कोशीमें पानि अबैत छैक आ चलि जाइत छैक मुदा नर्इं जाईत छैक परम्परागत रुढिवादी विचार, सामन्ती सोच आ बाह्र आडम्बर ।
नाटकमे कोशी बाढ़िसं पीडित अपन बासलेल भटकैत भुखला-भुखली, रामभरोसे, मुंहचीरा, सुप्पी, रामकली, गहना, डोमा, प्यारे सहितके पात्र मिथिलाक जमीनी यथार्थके चित्रण करैत अछि ।
रामे·ार प्रेम लिखित एहि नाटकके निर्देशक छथि प्रकाश झा । हिन्दीमे लिखल एहि नाटकके मैथिलीमे प्रकाश झा आ पवन अनुवाद कएने छथि । नया दिल्लीक मण्डी हाउसक श्री राम सेन्टरमे मे मन्चित नाटक देखबालेल मैथिली अनुरागीक बेस जमघट छल ।
दशमीमे अपन गामसं दुर रहल मैथिलके मैलोरंगक नाटक मात्र मनोरंजन नहि अपन गामघर याद आ कोशीक कोप सेहो याद दिया देने रहैक । मैथिली रंगकर्ममे निरन्तर सकृय मैलोरंग ई नाटक मन्चनसं प्रशंसाक पात्र बनल अछि ।

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रविवार, 27 सितम्बर 2009

पत्राहीन नग्न गाछ/ हे तिरहुत” हे मिथिले” ललाम !- यात्री


पत्राहीन नग्न गाछ
लगै’ए कारी बस कारी, ठूठाकृति
अन्हार गुज्ज रातिमे
स्पन्दनहीन, रूक्ष, तक्षक शिशिर
पसरल अछि सबतरि ऊपर-ऊपर
नीचाँ किन्तु, तरबा तर दूबिक मोलाएम नवांकुर
बाँटि रहल रोमांचक टटका प्रसाद सौंसे शरीरकें
मोन होइ’ए, गाबी अन्हरिओमे वसन्तक आगमनी
आउ हे ऋतुराज,
नुकाएल छी कालक कोखिमे अनेरे!
दिऔ निश्छल आशीर्वाद
तकै’ए अहींक बाट घासक पेंपी
आउ हे ऋतुराज!




हे तिरहुतहे मिथिलेललाम !

मम मातृभूमिशत-शत प्रणाम !

तृण तरु शोभित धनधान्य भरित

अपरूप छटाछवि स्निग्ध-हरित

गंगा तरंग चुम्बित चरणा

शिर शोभित हिमगिरि निर्झरणा

गंडकि गाबथि दहिना जहिना

कौसिकि नाचथि वामा तहिना

धेमुड़ा त्रियुगा जीबछ करेह

कमला बागमतिसँ सिक्त देह

अनुपम अद्भुत तव स्वर्णांचल

की की न फुलाए फड़ए प्रतिपल

जय पतिव्रता सीता भगवति

जय कर्मयोगरत जनक नृपति

जय-जय गौतमजय याज्ञवल्कय

जय-जय वात्स्यायन जय मंडन

जय-जय वाचस्पति जय उदयन

गंगेश पक्षधर सन महान

दार्शनिक छलाऽछथि विद्यमान

जगभर विश्रुत अछि ज्ञानदान

जय-जय कविकोकिल विद्यापति

यश जनिक आइधरि सब गाबथि

दशदिश विख्यापित गुणगरिमा

जय-जय भारति जय जय लखिमा

जय-जय-जय हे मिथिला माता

जय लाख-लाख मिथिलाक पुत्र

अपनहि हाथे हम सोझराएब

अपनेक देशक शासनक सूत्र

बाभन छत्री औऽ भुमिहार

कायस्थ सूँड़ि औऽ रोनियार

कोइरी कुर्मी औऽ गोंढि-गोआर

धानुक अमात केओट मलाह

खतबे ततमा पासी चमार

बरही सोनार धोबि कमार

सैअद पठान मोमिन मीयाँ

जोलहा धुनियाँ कुजरा तुरुक

मुसहड़ दुसाध ओ डोम-नट्ट।।।

भले हो हिन्नू भले मुसलमान

मिथिलाक माटिपर बसनिहार

मिथिलाक अन्नसँ पुष्ट देह

मिथिलाक पानिसँ स्निग्ध कान्ति

सरिपहुँ सभ केओ मैथिले थीक

दुविधा कथीक संशय कथीक ?


ई देश-कोश ई बाध-बोन

ई चास-बास ई माटि पानि

सभटा हमरे लोकनिक थीक

दुविधा कथीक संशय कथीक ?

जय-जय हे मिथिला माता

सोनित बोकरए जँ जुअएल जोंक

तँ सफल तोहर बर्छीक नोंक !

खएता न अयाची आब साग !

ककरो खसतैक किएक पाग ?

केओ आब कथी लै मूर्ख रहत ?

केओ आब कथी लै कष्ट सहत ?

केओ किअए हएत भूखैं तबाह ?

केओ केअए हएत फिकरें बताह ?

नहि पड़ल रहतभेटतैक काज !

सभ करत मौजसभ करत राज !

पढ़ता गुनता करता पास-

जूगल कामतिछीतन खवास

जे काजुल से भरि पेट खएत

ककरो नहि बड़का धोधि हएत

कहबओता अजुका महाराज

केवल कामेश्वरसिंह काल्हि

हमरालोकनि जे खाइत छी

खएताह ओहो से भात-दालि


अछि भेल कतेको युग पछाति

ई महादेश स्वाधीन आइ

दिल्ली पटना ओ दड़िभंगा

फहराइछ सभटा तिनरंगा

दुर्मद मानव म्रियमाण आइ

माटिक कण कण सप्राण आइ

नव तंत्र मंत्र चिंता धारा

नव सूर्य चंद्र नवग्रह तारा

सब कथुक भेल अछि पुनर्जन्म

हे हरित भरित हे ललित भेस

हे छोट छीन सन हमर देश

हे मातृभूमिशत-शत प्रणाम !!

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शनिवार, 26 सितम्बर 2009

नताशा 26 (चित्र-श्रृंखला पढ़बाक लेल नीचाँक चित्रकेँ क्लिक करू आ आनन्द उठाऊ।)

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झालि- सुभाष चन्द्र यादव



दिन लुकझुक करैत छै। रामा धान काटि क’ सबेरे आबि गेलै। ओना बोझ खरिहान लगबैत-लगबैत राति भ’ जाइत छै। आइ ओ हरे रामकेँ खेतमे छोड़ि देलकै। धाप पर खूब मोटगर क’ पुआर बिछएलक। बरहका भैया सरजुग कहलकै त’ घूरमे करसी सेहो द’ देलकै। रामाकेँ आइ नहा नइं भेलै तैं एतेक अगते जरौन लाग’ लागलै। धाप आ पुआर जबदाह छै। पिन्हनामे डोरिया पैंट रहलासँ तरबा लोह भ’ गेलै आ जाँघ-हाथक रोइयाँ भुटकल छै। चद्दरि नइं छै। भानस हेबा धरि घूर तापैत अछि। राति क’ हरे राम, गंगबा, बरहका भैया, आ ओकरा लेल एकटा मोटिया छै। सब एक पतियानीसँ ओंघरा जाइत अछि, त’ माइ एकटा पटिया ऊपरोसँ द’ दैत छै।
बिन्दुआ आ सुनरा कतहुसँ आबि पुआर पर बैसैत छै। सरजुग कहैत छै-कोने, कोनेसँ रे...
-एह, अहिना घुरिते-फिरते की।-बिन्दुआ कहैत छै।
-घूरमे आगि दही ने रामा रे।-सुनरा आग्रहक स्वरमे कहैत छै।
रामा कोनो उत्तर नइं दैत छै, आ पुआर खड़रैत रहै छै।
-हइ इएह गंगबाकेँ कहक ने।-देबलरयना अबैत-अबैत कहैत छै।
-लाबि ने दही गंगबा रे।-रामा हाथ बारि गंगबा पर तमसाइत छै।
-लाबि ने दही तोंही। हमहीं टा देखल रहै छियौ, नइं?-गंगबा खूब जोरसँ चिकरैत अछि।
-भने अइ सालाकेँ खेनाइ काल्हि बन्न क’ देने छलै। किछु कहलक तँ काने-बात नइं देलक।-रामा फेर दमसाबैत छै।
-माल छै की?-देबलरयना सरजुगसँ पुछैत छै।
सरजुग बुझैत अछि जे माल ककरा कहैत छै-डेढ़ टाकाके लेलियै रहए। सबटा सठि गेलै। आब जेबी झाड़ैत छियौ। निकलि जाउ तँ निकलि जाउ।
-ओएह त’ छौ एकटा जट्टा।-बिन्दुआकेँ भरोस होइत छै। गंगबा आगि लाबि घूरमे दैत छै। देबलरयना फूकि क’ सुनगाबए लगैत अछि।
-सरजुग एकदम भकुआएल अछि।-बिन्दुआक एहि बात पर सभ सरजुगकेँ देखैत अछि, आ हो-हो क’ हँसि दैत अछि।
रामा हाथ-गोर धो क’ अबैत छै।-हे रे, हँट-रामा गंगबाकेँ घुसकाबैत घूर पँजेठि लेब’ चाहैत अछि। ओकर टाँग आ हाथसँ भाफ उड़ैत रहै छै।
-हमरा की केलकै, वीरपुरमे अड़तालीस टाकाके पटुआ खरीद आ छिआलीसेमे बेचि लेलकै आ अइ ठिन छै बाबन।-देबलरयना गुल पजारैत कहैत छै।
-रौ तोरी, से किऐ?-सुनराकेँ परौसरामक बेकुफी पर छगुनता होइत छै।
-से नइं बुझलहक? हम घोड़ा ल’ क’ चलि एलिऐ आ अइ ठिन हमरा अरजुन पकड़ि लेलकै बियाहमे। चारि दिन बरदा गेलिऐ। आ जा-जा ओत’ गेलिऐ ता तक बेच देने रहै। हम कहि देलिऐ-हम हिस्सा-तिस्सा नइं देबौ।
-बेसी खैनी नइं दहक। कड़ा भ’ जाइ छै।-बिन्दुआ सरजुगकेँ बरजैत छै।
-गाजा कड़े ठीक होइ छै।-सरजुग लटबैत कहैत छै।
-बाप रे, पिरथी जे कड़ा पीबैत छै! पीलहक ए ओकर लटाएल?-सुनरा अतीतमे भटकि जाइत अछि।
-भाइजी, दुसधटोलीमे जे एक दिन लरमाहा पिलिअ’ रहए! मरदे, कचहरीसँ चोटाएल घुरल रहिऐ, चारि चिलम फूकि देलिऐ। से कहै छियह तुरन्ते ल’ क’ उड़ि गेलै। सनजोगसँ ओइ दिन संगमे एकटा पचटकिया रहए। सोचलिऐ साला उड़ि जो। लगले-लागल चारि कप चाह ढारि देलिऐ। से कहै छियह घुमरा कात अबैत-अबैत लागए जे चित्त भ’ जाएब। आबि क’ सूति रहलिऐक। भाइ उठबए एलै जे टिशन पढ़ब’ नइं जेबही? कहलिऐ, आइ नइं जेबै। बड़ थाकि गेल छियौ।-बिन्दुआ कहैत रहै छै आ सभ सुनैत रहै अछि।
-एह उ दुसधटोलियो कमाल छै-सुनरा कहैत छै तँ सभ हँसि दैत छै।
-दुसधटोली! दुसधटोली के की बिजनेस छै से सुनलहक? मौगी-छौंड़ी सभ, दिन आ भिनसुरको क’ कोइला बिछैत छै। मरद सभ दिनमे गाजा बेचैमे रहत आ छौंड़ी सभ राति क’।
सभ एके बेर भभा क’ हँसि दैत छै। बिन्दुआ हँसीमे जोग देलाक बाद कहैत छै-एकदिन दुसधटोलियेमे रहिअ’ भाइजी, आकि ओनएसँ छिनरो भाइ दरोगा पहुँचि गेलह। सबकेँ सर्च करए लगलै। हमरा पुछलक तँ हम कहलिऐ जे हमरा रुपैया बाँकी है, सो ही माँगने आए हैं।-तब पुछलक जे कैसा रुपैया? कहलिऐ सरबेमे काम किया था।-तब हमरा नइं किछु कहलक। दुसधाकेँ कनिएँ टा पकड़लकै, से छिनरो भाइ पचास टाका चट सिन ल’ लेलकै।
-ओइमे एकेटा छौंड़ी नीक छै, की हौ बिन्दु?-सुनरा एक सोंट मारैत कहैत छै।
-हँ, उ गोरकी छौंड़ी। उ सैनियाँक सारि छिऐ।
चिलम तीन-चारि रौन चलैत छै।
-जट्टा बाला गाजामे निशाँ बड़ जल्दी चढ़ैत छै।
बिन्दुआ चिलम दैत कहै छै-हे लैह!
तँ देबलरयना कहैत छै-ई तँ कुबेरक खजाना भ’ गेलह।
-तह-सरजुग पुष्टि करैत छै। कने काल सभ दार्शनिक जकाँ भ’ जाइत अछि।
-आइ-काल्हि घूरे लोककेँ जान बचबै छै।
-त, घूर नइं रहए तँ लोक कठुआ क’ मरि जाए!
-ठार खसब अखनेसँ शुरू भ’ गेल छै। सगरे धुइयाँ जकाँ पसरल छै।
कुहेसक पछारी नुकाएल चिन्ता कुहेस फाड़ि क’ निकलैत छै-केना चलतै, आँइ बिन्दुआ?-सरजुग टूटल स्वरमे पुछैत छै।
-बिन्दुआकेँ की छै? केहन टीशन पढ़बै-ए।
-नइं हौ, आइ-काल्हि बड़ा मुसकिल छै। बाबू ओतएसँ लिखलकै, जेना-तेना परिवार चला। पढ़ौनीबला एक डेढ़ मोन धान तसिललिऐ। लोक सभ देबे ने करैत छै हौ।-बिन्दुआ कहैत छै।
-आइ पढ़बए जेबही की?-सरजुग पुछै छै।
-हँ, हँ।-बिन्दुआ तेजीमे कहैत छै।
-रबियोकेँ बन्दी नइं?
-रबि-तबि बूझैत छै ओ सभ?
ता ओनयसँ छेदी चैधरी अबैत छै। ओकर अगिला दू-तीन टा दाँत टूटल छै। दाढ़ीक नमहर-नमहर खुट्टी सभ कोना दनि लगैत छै। घूर लग बैसिते ओ देबलरयनासँ पुछैत छै-अच्छा बोल, बेचबिही घोड़ा तों?
-हाय रौ बा, बेचबै नइं? बेगरता छै तँ।
-अच्छा एक्के बेर निस्तुकी दाम बोल।
-हमहुँ एक्के बेर निट्ठाह दाम कहि दैत छियह, पचपन टाका।
-बहुत कहै छिही। सुन! घोड़ाकेँ भरि पीठ घा छौ, आ चलै छौ त’ लापट लगै छौ। लोगो देखत तँ हँसत। कहतै घोड़ा झालि बजबैत छै।
गंगबाकेँ सभसँ पहिने हँसी लागि जाइत छै। ओकरे संगे सभ ठहाका लगबैत अछि।
-हम लगा देलियौ पैंतीस टाका। हँटा। भ’ गेलौ।-छेदी दाम पटएबामे तेज छै।
-ओतेमे नइं हेतह।
-सुन, हमरा उ घोड़ा नइं बिकत। कोइ लै ले जल्दी तैयारे नइं हेतै। पैंतीस वाजिब कहलियौ-ए। सरजुग, घोड़ाकेँ भरि पीठ घा छै।
-हे, घोड़ाकेँ घा कत’सँ एलै। कनियें टा पपड़ी ओदरल छै। उ जे कहबहक कोनो तरका घा छिऐ से नइं छै।
-अच्छा घा चोखेलै-ए की ओतबे छै?
-एह, आब कहाँ छै। एक्के रत्ती रहि गेलै-ए।
-घोड़ा अलगसँ देखैमे नीक लगै छै, मगर चीज नइं छै। हमरा तों द’ देबें ने, आ नहिओ बिकत तँ बुझबै दुआरे पर छै।
-खूब बढ़िया चीज छै। हम तँ कहै छियह दू-अढ़ाइ मन धरि लादि दै छिऐ।
-अच्छा, दामक-दाममे द’ दही। कतेमे नेने रही? पैंतालीसमे? छेदी! पैंतालीस द’ दहक आ ल’ लैह।-सरजुग तसफिया क’ दैत छै।
-अच्छा, जे ई सभ कहि देलकौ से भ’ गेलौ। हमरा भोरेमे घोड़ा द’ दे। जिनिस लादि क’ ल’ जेबौ आ बेचि क’ टाका द’ देबौ।
-नइं, से नइं हेतह। टाका भोरे द’ दहक। हमरा ओतए जाइके नइं रहितिए त’ हम घोड़ा बेचितिऐ कथी ले।-देबलरयनाकेँ शंका होइत छै जे ओ जल्दी टाका नइं देत।
-त तब कोना हेतै?
-सुनह, तों हमरा पहिने कहने रहित’ ने, तँ हम टाका पनरहो दिन छोड़ि देतिअ’। तों हमरा हटिया करए दैह आ ताबै टाकाक कोनो बनोबस करह।
-अच्छा तों काल्हि हटिया अबै छ’ ने?
-हँ-हँ, काल्हि हटिया नै करबै तँ काम चलतै?
-अच्छा तों हटिए पर आ।-छेदी कहैत चलि जाइत छै।
बात फरिछेलै नइं, से बिन्दुआ, सुनरा आ सरजुगकेँ बोझ-सन बुझाइत रहलै। घूर पझाएल जाइत छै। करसीमे खाली माँटिए छै। तरका गोइठामे एखन नइं धेलकै-ए।
-भूख लागि गेलै। कने मुरही-तुरही रहितै, नइं हौ भाइ जी?-बिन्दुआ कहैत छै।
-गाँजा पीने छहक तैं बुझाइ छ’। आन दिन बेरहट नइं खाइत रहक तइयो बुझाइत रह’ भूख?
-हँ, से ठीके कहै छहक।
बिन्दुआ उठि जाइत छै। सरजुग पुछैत छै-चलि देलें। बन्दी नइं?
-जाह, खरहू सब लग तोहूँ झालि बजबिहह।-गंगबा चैल करैत छै।

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भक्ति गीत - दयाकांत

हे जगत जननी दुर्गा माता
हम दीन-दुखी के नहीं बिसरू |

हम छी मुरख बड़ अज्ञानी
नहीं जप-तप-पूजा पाठ जानी
बस आस अहींक अछि अम्बे
मुरख बुझी सबटा माफ करू

हे जगत जननी दुर्गा माता
हम दीन-दुखी के नहीं बिसरू |

हम फसल छी बीच भ्रमर माता
नहि अछि कोनो एकर अता-पता
अहि बिपत्ति सं आब अहीं माता
अबला जानी उधार करू |

हे जगत जननी दुर्गा माता
हम दीन-दुखी के नहीं बिसरू |

छी मायाजाल में हम ओझरल
नहि जपि अहांक नाम बिरल
यदि अहाँ माय बिसरी जेबै
और ककर हम आस करू|

हे जगत जननी दुर्गा माता
हम दीन-दुखी के नहीं बिसरू |

पुत कपूत ते होय माता
नहि मात कुमाता होय कौखन
अहि पातकी पुत के हे माता
आब अहि बेरा पार करू |

हे जगत जननी दुर्गा माता
हम दीन-दुखी के नहीं बिसरू |

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शुक्रवार, 25 सितम्बर 2009

वक्त्त नञि - मदन कुमार ठाकुर


सबटा ख़ुशी अछि दमन पर ,
ऐगो हशी के लेल वक्त्त नहीं

दिन - राएत दोरते -दोरते दुनिया में ,
जिनगी के लेल वक्त्त नही

माय के लोरी के एहाशास त् छैन ,
मुद्दा माय कहैय के लेल वक्त्त नहीं

सब रिश्ता के त छोरी गेला ,
मुद्दा अंतिम संस्कार करैय लेल हुनका वक्त्त नहीं

सबटा नाम मोबाईल में छैन ,
मुद्दा दोस्तों से बात करैय वक्त्त नहीं

मन मर्जी व फर्जी के की बात करी ,
जिनका अपनोहु लेल वक्त्त नहीं

अखियों में बसल त् नींद बहुत ,
मुद्दा नींद से आराम करैय लेल वक्त्त नहीं

दिल अछि गमो से भरल ,
मुद्दा कानैय के लेल वक्त्त नहीं

टका - पैसा के दौर में एहन दौरी ,
की मुरीयो के तकय लेल वक्त्त नहीं

जे गेला हुनकर की कदर करी ,
जखन अपनही सपनों के लेल वक्त्त नहीं

आब अहि बताऊ हे जिनगी ,
अहि जिनगी के लके की हेतय

की ? हरदम जिनगी से मरेय बाला ,
जिबैय के लेल अछि वक्त्त नहीं


मदन कुमार ठाकुर
कोठिया , पट्टीटोल भैरब स्थान , झंझारपुर , मधुबनी , बिहार , ८४७४०४

Madanjagdamba@yahoo.com मो 9312460150

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बुधवार, 23 सितम्बर 2009

जाती

जाति
उच्च जातिक बात सुनिते
आँखि मे किछु गड़ि रहल छै।
हम रहब चुपचाप तैयो
लोक अपने जड़ि रहल छै।
की केलहुँ हम कर्म अनुचित
जन्म भेटल उच्च कुल मे।
धैर्य स्व अभिमान भेटल
आत्मबल संतोष मन मे।
रक्त मे शुभ संस्कारक
बहि रहल अछि धार निर्मल।
प्रज्ज्वलित अछि भाल एखनहुँ
तेज सँ परिपूर्ण प्रतिपल।
कर्म मे विश्वास सदिखन
के हमर पुरषार्थ कीनत।
धर्म मे अछि आस्था ओ
के हमर अधिकार छीनत।
राजनीतिक स्वार्थ के ई
नीति आरक्षण उपज अछि।
योग्य जन छथि कात लागल
ज्ञानहीनक उच्च पद अछि।
अछि उचित नहि कर्म एखनहुँ
ज्ञान के पथ द्वेष बाँटब।
जाति के सीढ़ी बना क’
दान मे सम्मान बाँटब।
किरिण फुटतै फेर अपने
भोर के प्रतिबद्धता सँ।
हम रहब बढ़िते , अहाँ नहि
रोकि पायब दुष्टता सँ।
सतीश चन्द्र झा, राम जानकी नगर,मधुबनी

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मंगलवार, 22 सितम्बर 2009

गन्ध- हंसराज

गन्ध, गन्ध, गन्ध
ने पुरबा-पछबाक गन्ध
ने कोनो फूल-पातक गन्ध
खाली घामक गन्ध
मनुक्खक चामक गन्ध
सुखा गेल अछि फूल-पात
ठाढ़ अछि बसात
हमहूँ जेना भ’ गेलहुँ अछि बूढ़ आन्हर
झलफलमे सभटा रंग लगैत अछि पीयर।

तैयो सभ नव फूल-पात
नबका बसात अनबामे सक्रिय अछि अपस्याँत
नव लोक, नब आलोक पएबा लेल
एहि, घाम-गन्धक कोठा पर भेटत नव लोक,
नव आलोक
फुलाएत फूल
नाचक पात, बहत शीतल बसात!
सुखाएल फूल-पात नहि
थाकल बसात नहि
हमरा आँखिमे अछि एकटा आभास
एकटा नव आकाश
अथच हमरा नीक लगैत अछि गन्ध
मनुक्खक चामक, घामक ई गन्ध।

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रविवार, 20 सितम्बर 2009

क्षणिका-प्रशांत मिश्र

हड़ाहि

एकटा हड़ाहि जे राति मे पटकलन्हि साँए के

तोड़लन्हि चौकी

भोरे-भोर पड़ोसनी के गरिअबैत कहलखिन्ह

हँ,चुप्प रह गे सत्तबरती

राँड़ी, छुच्छी, सँएखौकी

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शनिवार, 19 सितम्बर 2009

नताशा 25 (चित्र-श्रृंखला पढ़बाक लेल नीचाँक चित्रकेँ क्लिक करू आ आनन्द उठाऊ।)


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बुधवार, 16 सितम्बर 2009

आरक्षीत सीट -दयाकांत

बस में सुई ससरवाक जगह नहि छल ड्यूटी के टाइम जे छलैक ओहो में हप्ताहक पहिल दिन लागैत छल जेना विदेश्वरक मकर के मेला लागल अछि | हरेक स्टैंड के एके हल बस लाजपत नगर सँ नागलोई जायत छलैक ब्लू लाइन बस बाला के संतोष ते हेबे नहि करैत छैक, चाहे जतेक सवारी चढ़ी जाय ओकरा कम बुझना जायत छैक सवारीक के जानवर जेना ठुसैत रहैत अछि आओर ओकरा संग जनवारे जँका ब्यबहारो करैत अछि | हमहू ओही बस पछिला गेट के पाछू दुबकल रही |

एतबा में बस सफदरजंग में रुकल और सवारीक संग ओही में एकटा बृद्ध लगभग ७०-७५ के उम्र के चढ़ल देखवा में लागैत छल जे शायद कतेको महिना सँ अस्पताल में भर्ती छल | बेचारा कहुना कय ते गेट पर लटकल अन्दर हेवाक शाहस नहि होयत छलैक मुदा कि कैरता दोसर रास्ता नहि छलैक | कतेक निहोरा पांति केलाक बाद कंडक्टर सीट तक पहुचल कंडक्टर के हाथ जोरी के निहोरा विनती केलक जे हम बहुत दिन सँ बीमार छी अपना सीट पर हमरो बैसा ले मुदा ओ कान नहि सुनलक उल्टे बाजय लागल "धरतीक बोझ चढ़ क्यों गया मरने को यही बस सूझी" नीचा में ते पायर रखवाक जगह नहि छल बैसता कोना एकटा सीटक लोहा पकरी के ऊपर माथ राखी देलकैक | एतवाक में बस अगिला स्टैंड में रुकल ओतय एकटा १८-१९ सालक लड़की चढ़ल जे अर्ध वस्त्र में छल ओकर चुस्त टी-सर्ट आओर जींस बेर-बेर एक-दोसराक संग मिलवाक कोशिस करैत छलैक मुदा दुनु के मिलन नहि भय पबैत छलैक ओकरा देखतहि कंडक्टर बाजी उठल आओ मैडम आपके लिए ही सीट रखा हूँ आओर मैडम आराम से ओही बृद्ध के धक्का दैत सीट पर बैस गेल और पुरा बस तमासा देखैत रहल |

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मनभरनि डूबि मरलैए-रूपेश कुमार झा 'त्योंथ'

दू दिन पर अयलहुं
मधुबनी सं गाम त' देखै छी-
आइ गाम लगैछ
सुन्न-मसान
नहि क्यो अछि कतौ
भम्म पडैछ सभक दलान
कखनो काल क' सुनय मे अबैछ
कुकुरक कटाउझ
छोट हड्डी टुकडी लेल
सभ अछि हरान
दाइ-माइक सेहो पता नहि
लगैछ गाम आइ मरघट समान
कखनो काल क' सुनय मे अबैछ
कनिया-मनियाक फुसफुसायब
कोनो विषय पर कनफुसकी
सीमा तोडि भेल हल्ला
सुनि हल्ला भेल झ'ड़ कान
कतय गेलाह पुरूष ओ
दाइ-माइ , नेना-भुटका
कोना बुझब जे भेलैछ की ?
हम भेलहुँ फिरेसान
नजरि पडिते एकटा नेना पर
पुछलियै की भेलैए ?
मनभरनि डूबि मरलैए
कहलक ओ अबोध जान
सुनीते पड़ऐलहुं पोखरि दिस
पहुँचलहुं ओतहि, जतय
लोकक लागल छल करमान
देखि लागल हमरा ठक-बक
भीड़क बीचो-बीच राखल
मनभरनिक देह बेजान
मायक रूदन ओ तड़पब
देखल नहि गेल हमरा
मुदा बाप भेल छल कठोर
लगै छल जेना मरल हो क्यो आन
किएक ने लगै ?
भेल छलैक बेटी गराक घेघ
सर्वगुण संपन्न रहितो
नहि होइत छलैक बियाह
द' सकै छल ने ओ मोटगर दहेज़
नहि छलैक ओकरा नगदी-नरायन
द्वारे-द्वारे क'ल जोडैत
थाकि गेल छल ओ
कएक थम त' सहय पडैक अपमान
बेटी कें देखल नहि गेलैक
बापक फिरेसानी
गेल दुनिया सं निश्चिंत क' बाप कें
अपने हाथे तेजि प्राण


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रविवार, 13 सितम्बर 2009

कथा- बिसाँढ़- जगदीश प्रसाद ‍मं‍डल


पछिला चारि-सालक रौदी भेने गामक सुरखिये बेदरंग भऽ गेल। जे गाम हरियर-हरियर गाछ-बिरीछ, बन्न स लहलहाइत खेत, पानि स इनार-पोखरि, सैकड़ो रंगक चिड़ै-चुनमुनी, हजारो रंगक कीट-पतंग स लऽ कऽ गाय, महीसि, बकरी स भरल रहैत छल ओ मरनासन्न भऽ गेल। सुन-मसान जेँका। बीरान। सबहक (गामक लोकक) मन मे एक्के टा विचार अबैत जे आब इ गाम नै रहत। जँ रहबो करत त सिर्फ माटिये टा। किऐक त जहि गाम मे खाइक लेल अन्न नहि उपजत, पीवैक लेल पानि नहि रहत, तहि गामक लोक कि हवा पीबि कऽ रहत। जहि मातृभूमिक महिमा अदौ स सब गबैत अएलाह ओ भूमि चारिये सालक रौदी म पेटकान लाधि देलक। मुदा तइओ लोकक टूटैत आशाक वृक्ष मे नव-नव फुलक कोढ़ी टुस्साक संग जरुर निकलि रहल अछि। किऐक त आखिर जनकक राज मिथिला छिअए की ने। जहि राज्य मे बाहर-बर्खक रौदीक फल सीता सन भेटल तहि राज मे, हो न हो, जँ कहीं ओहने फल फेरि भेटए। एक दिशि रौदीक (अकालक) सघन मृत्युवाण चलैत त दोसर दिशि स आशाक प्रज्वलित वाण सेहो ओकर मुकावला करैत। जेकर हसेरियो नमहर। ऐहनो स्थिति मे दुनू परानी डोमनक मन मे जीबैक ओहने आशा बनल रहल जेहने सुभ्यस्त समय मे। कान्ह पर कोदारि नेने आगू-आगू डोमन आ माथ पर सिंही माछ आ बिसाँढ़ स भरल पथिया नेने पाछु-पाछु सुगिया, बड़की पोखरि स आंगन, जिनगीक गप-सप करैत अबैत। चाइनिक पसीना दहिना हाथ स पोछि, मुस्कुराइत सुगिया बाजलि- ‘जकरा खाइ-पीबैक ओरियान करैक लूरि बुझल छैक ओ कथीक चिन्ता करत?’ पत्नीक बात सुनि डोमन पाछु घुरि सुगियाक चेहरा देखि बिनु किछु बजनहि, नजरि निच्चा कऽ आगू डेग बढ़बै लगल। किऐक त खाइक ओते चिन्ता मन म नहि, जते पीबैक पाइनिक। डोमन कऽ अपन खेत-पथार नहि मुदा दुनू बेकती तेहन मेहनती जे नहियो किछु रहने नीक-नहाँति गुजर करैत। गिरहस्तीक सब काजक लूरि रहितहुँ ओ कोनो गिरहस्त स बन्हायल नहि ओना समय-कुसमय, अपना काज नहि रहने, बोइनो कऽ लइत। अपना खेत नहि रहने खेती त नहिये करैत मुदा दस कट्ठा मड़ुआ, सब साल बटाइ रोपि लइत। जहि स पाँच मन अन्नो घर लऽ अबैत। मड़ुआ बीआ उपजबै मे बेसी मिहनत होइत अछि किऐक त सब दिन बीआ पटबै पड़ैत अछि। शुरुहे रोहणि मे बड़की पोखरिक किनछरि मे डोमन बीआ पाड़ि लइत। लग मे पानि रहने पटबैयोक सुविधा। आरु बीरार, तेँ बीओ नीक उमझैत। पनरहे दिन मे बीआ रोपाउ भऽ जायत। मिरगिसिया मे पानि होइतहि अगते मड़ुआ रोपि लइत। मुदा अहि (एहि) बेरि से नइ भेलइ। बरखा नहि भेने बीआ बीरारे मे बुढ़हा गेल। एक्को धुर मड़ुआक खेती गाम मे नहि भेलइ। आने कियो अखन धरि धानक बीरार क खेत जोतलक आ ने बीआ वाओग केलक। रौदीक आगम सबहक मन मे हुअए लगल। मुदा तइओ ककरो मन मे अन्देशा नहि! किऐक त ढ़ेनुआर नक्षत्र सब पछुआइले अछि।



जहिना रोहणि-मिरगिसिया फांेक गेल तहिना अद्रो। समय सेहो खूब तबि गेलइ। दस बजे स पहिनहि सब बाध स आंगन आबि जायत। किऐक त लू लगैक डर सबहक मनमे। मड़ुआ खेती नहि भेने दुनू परानी डोमनक मन मे चिन्ता पैइसै लगल। बड़की। पोखरि स दुनू परानी पुरैनिक पातक बोझ माथ पर नेने अंगना अबैत। बाट मे सुगिया बाजलि- ‘अइ बेरि एक्को कनमा मड़ुआ नइ भेल। बटाइयो केने आन साल ओते भऽ जायत छल जे सालो भरि जलखै चलि जाय छल। अइबेरि ते जलखइओ बेसाहिये कऽ चलत।’


माथ परक पुरैनिक पातक बोझ स पानि चुवैत। जे डोमनो आ सुगियो कऽ अधभिज्जु कऽ देने। नाक परक पानि पोछैत डोमन उत्तर देलक- ‘कोनो कि हमरे टा नइ भेल आ कि गामे मे ककरो नै भेलइ। अनका होइतइ आ अपना नै होइत तखन ने दुख होइत। मुदा जब ककरो नै भेलइ तऽ हमरे किअए दुख हैत। जे दसक गति हेतइ से हमरो हैत। अपना त रोजगारो (पुरैन-पातक विक्री) अछि आ जेकरा इहो ने छै?’ डोमनक उत्तर सुनि मिरमिरा कऽ सुगिया बाजलि- ‘हँ, से त ठीके। मुदा ठनका ठनकै छै ते कियो अपने माथ पर ने हाथ दइ अए। तखन तऽ इ (रौदी) इसरक (ईश्वरक) डाँग छी, लोकक कोन साध।’


अखन धरिक समय कऽ कियो रौदी नहि बुझलक। किऐक त सबहक मन मे यैह (अइह) होइत जे इ त भगवानक लीले छिअनि। जे कोनो साल अगते स पानि (बरखा) हुअए लगैत त कोनो साल अंत मे होइत। कोनो साल बेसिओ होइत त कोनो साल कम्मो। कोनो-कोनो साल नहिये होइत। जहि साल अगते बिहरिया हाल भऽ जायत ओहि साल समय पर गिरहस्ती चलैत मुदा जहि साल पचता पाइन होइत तहि साल अधखड़ू खेती भऽ जायत। मुदा जखन हथिया नक्षत्र धरि पानि नहि भेलि, तखन सबहक मन मे अबै लगल जे अइबेरि रौदी भऽ गेल। ओहिना जोतल-बिनुजोतल खेत स गरदा उड़ैत। घास-पातक कतौ दरस नहि। मुदा तेँ कि लोक हारि मानि लेत। कथमपि नहि। सब दिन स गामक लोक मे सीना तानि कऽ जीबैक अभ्यास बनल अछि ओ पीठि कोना देखाओत? भऽ सकैत अछि जे भगवान (दन्द्र) कोनो चीजक दुख भऽ गेल हेतनि। जहि स बिगड़ि कऽ ऐना केलनि। तेँ हुनका वौंसब (बओसबे) जरुरी अछि। जखने फेरि सुधरि जेताह तखने स सब काज सुढ़िया जायत। अइह (यैह) सोचि कियो अन्न दान (भुखल दुखल कऽ खुऔनाइ) त कियो कीर्तन (अष्टयाम, नवाह) त कियो यज्ञ-जप (चंडी, विष्णु) त कियो महादेव पूजा (लिंग) इत्यादि अनेको रंगक वौंसैक ओरियान शुरु केलक। जनिजाति सब कमला-कोशी कऽ छागर-पाठी कवुला सेहो करै लगलीह। किऐक त जँ हुनकर महिमा जगतनि त बिनु बरखोक बाढ़ि अनतीह। बाढ़ि आओत पोखड़ि-झाखड़ि स लऽ कऽ चर-चैरी, डोह-डावर सब भरत। रौदी कमत। अधा-छिधा उपजो हेबे करत।


बरखाक मकमकी देखि नेंगरा काका महाजनी बन्न कऽ लेलनि। किऐक त ओ बुझि गेलखिन जे अइ बेरक रौदी अगिला साल विसाइत। मुदा सोझ मतिया बौकी काकीक सब चाउर सठि गेलनि। ओना बौकी काकीक लहनो छोट। सिर्फ चाउरेक। सेहो पावनिये-तिहार धरि समटल। हुनकर महाजनी मातृ-नवमी, पितृपक्ष (खाइन-पीउन) स शुरु होइत। पाहुन-परकक लेल दुर्गापूजा, कोजगरा होइत दिवाली परवेब (गोवर्धनपूजा) भरदुतिया, छठि होइत सामा धरि अबैत-अबैत सम्पन्न भऽ जायत छलनि। किऐक त सामा केँ सब नवका चूड़ा खुआबैत। खुऐबे टा नहि करैत संग भारो दइत। ताधरि कोला-कोली धानो पकि जायत। मुदा से बात बौकि काकी वुझवे ने केलखिन जे अइबेर रौदी भऽ गेल। तेँ अपनो खाई ले किछु नहि रखलथि। जहिना बोनिहार, किसान तहिना महाजन वौकियो काकी भऽ गेलीह।


अगहन अबैत-अबैत सबकेँ बुझि पड़ै लगलैक जे अपने की खायब आ माल-जाल कऽ की खुआएब। किऐक त कातिक तकक ओरियान (अपनो आ मालो-जालक लेल) त अधिकांश लोक पहिनहि स कऽ कऽ रखैत। जे नेंगरा काका छोड़ि सबहक सठि गेलनि। धानोक बीआ सब कुटि-छाँटि कऽ खा गेल। धानक कोन गप जे हालक दुआरे रब्वियो-राई हैब, कठिन। सभहक भक्क खुजल। भक्क खुजितहि मन मे चिन्ता समाइ लगल। जना-जना समय बीतैत तना-तना चिन्तो फौदाइत। एक त ओहिना चुल्हि सब बन्न हुअए लगल तइ पर स सुरसा जेँका समय मुह बाँबि आगू मे ठाढ़। चिन्ता स लोक रोगाइ लगल। भोर होइतहि धिया-पूताक बाजा सौंसे गाम बजै लगैत। मौगी पुरुख कऽ करमघट्टू त पुरुख मौगी कऽ राक्षसनी कहै लगल। जहि स धिया-पूताक बाजाक संग दुनू परानीक (पति-पत्नीक) नाच शुरु भऽ जायत। मुदा ऐहन समय भेलो पर दुनू परानी डोमनक मन मे एक्को मिसिया चिन्ता नहि। किऐक त जूरे-शीतल स पुरैनिक पातक कोरोवार शुरु केलक। कोरोबार नमहर। बावन बीधाक बड़की पोखिरि। जहि मे सापर-पिट्टा पुरैनिक गाछ। बजारो नमहर। निरमली, घोघरडिहा, झंझारपुर स्टेशनो आ पुरनो बजार। असकरे सुगिया कते बेचत। किऐक त पुरैनिक पात कीनिनिहार हलुआइ स लऽ कऽ मुरही-कचड़ी वाली धरि। तइ पर स भोज-काज मे सेहो विकायत। तेँ आठ दिन पर पार लगौने रहए। भरि दिन डोमन पत्ता तोड़ि-तोड़ि जमा करैत। एक दिन कऽ सुगिया पत्ता सरिअवैत (गनि-गनि) तेसरा दिन भोरुके गाड़ी स वेचइ ले जायत। जे पात उगड़ि जाय ओकरा डोमन सुखा-सुखा रखैत। किऐक त सुखेलहो पातक बिक्री होइत।


निरमली स पात बेचि क सुगिया आबि पति (डोमन) कऽ कहलक- ‘रौदी भेने अपन चलती आबि गेल।’


चलतीक नाम सुनि मुस्की दइत डोमन पुछलक- ‘से की?’


‘सब बेपारी (पात बेचिनिहार) थस ल लेलक। सब गामक पोखरि सुखि गेलइ जहि (जइ) स सबहक कारे-बार बन्न भऽ गेलइ। अपने टा पात बजार पहुँचै अए। आइ त जहाँ गाड़ी स उतड़लहुँ कि दोकानदार सब सब पात छानि लेलक। टीशने पर छुह्हका उड़ि गेलि।’


डोमन- ‘अहाँ कऽ लूरि नइ छले जे दाम बढ़ा दीतिऐ एक क दू होइत।’

सुगिया- ‘अगिला खेप स सैह करब।’ आब त बड़िड़्यो जुआइत हैत की ने?’

डोमन- ‘गोटे-गोटे जुआइल हेँ। मुदा बीछि-बीछि तोड़ै पड़त। तेँ पाँच दिन आरो छोड़ि दइ छिअए।’

तेसर साल चढ़ैत-चढ़ैत गामक एकटा बड़की पोखरि आ पाँच टा इनार छोड़ि सब सुखि गेल। नमहर आँट-पेटक बड़की पोखरि। किऐक त दइतक (दैतक) खुनल छी कीने? लोकक खुनल थोड़े छिअए। देव अंश अछि। तेँ ने गामक सब अपन बेटा कऽ उपनयनो आ विआहो मे ओही पोखरि मे नहबै अए। ततबे नहि, छठि मे हाथो उठबै अए। हमरा इलाकाक पृथ्वियोक (धरतियोक) बनाबटि अजीव अछि। बुझू ते माइटिक पहाड़। पाँच स फुट निच्चा धरि ने बाउल (बौल) अछि आ ने पानि। शुद्ध माटि। जहि स ने एक्कोटा चापाकल आ ने बोरिंग गाम (इलाका) मे। पाइनिक दुआरे गामक-गाम लोक कऽ पराइन लगि गेल। माल-जाल उपटि गेल। चाहे त लोक बेचि लेलक वा खढ़ पाइनिक दुआरे मरि गेल। अधा स बेसी गाछो-विरीछ सुखि गेल। चिड़ै-चुनमुनी इलाका छोड़ि देलक। जे मूस अगहन मे अंग्रेजी बाजा बजा सत-सत टा विआह करैत छल, ओ या त बिले मे मरि गेल वा कतऽ पड़ा गेल तेकर ठेकान नहि। अधा स बेसिये लोक हमरो गामक पड़ा गेल। मुदा तइओ जिबठगर लोक गाम छोड़ै ले तैयार नहि। पुरुख सब गाम छोड़ि परदेश खटै ले चलि गेल। मुदा बालो-बच्चा आ जनि-जातियो गामे मे रहल। पोखरि-इनार कऽ सुखैत देखि, पानि पीवैक लेल बड़किये पोखरिक कतबाहि मे कुप खुनि-खुनि लेलक। अपन-अपन कुप सभकेँ। पाइनिक कमी नहि। तीनि सालक जे रौदी इलाकाक (परोपट्टाक) लेल वाम भऽ गेल ओइह डोमनक लेल दहिन भऽ गेल। काज त आने साल जेँका मुदा आमदनी दोबर-तेबर भऽ गेलइ। गामक जमीनोक दर घटल। जहि स डोमन खेत कीनए लगल। ओना सुगियाक इच्छा खेत (जमीन) कीनैक नहि। किऐक त मन मे होय जे एहिना रौदी रहत आ खेत सब पड़ता रहत। तेँ, अनेरे खेत ल कऽ की करब। मुदा मालो-जाल त, घास-पाइनिक दुआरे, नहिये लेब नीक हैत। मुदा डोमनक मन मे आशा रहए जे जहिना लुल्हियो कनियाँ बेटा जनमा कऽ गिरथाइन बनि जायत, तहिना त पानि भेने परतियो खेत हैत की ने।

योगी-तपस्वीक भूमि मिथिला, अदौ स रहल। जे अपन देह जीवि-जन्तुक कल्याणक लेल गला लेलनि। ओ कि एहि बात कऽ नहि जनैत छलथिन। जनैत छलथिन। तेँ ने गाम मे अट्ठारह गण्डा (72) पोखरि, सत्ताइस गण्डा (108) इनार क संग-संग चैरी मे सैकड़ो (सइओ) कोचाढ़ि (बिरइ) खुनि पाइनिक बखारी बनौने छलाह। सोलहो आना बरखे भरोसे नहि, अपनो जोगार केने छलाह।

तीनि साल त दुनू परानी डोमन चैन स बितौलक। मुदा चारिम साल अबैत-अबैत बेचैन हुअए लगल। किऐक त गामक सब पोखरि-इनार त पहिनहि सुखि गेलि छल। ल दऽ कऽ बड़की पोखरि टा बँचल। तहू मे सुखैत-सुखैत मात्र कठ्ठा पाँचे मे पानि बचल। सुखल दिशि पुरैनियो उपटि गेल। बीच मे जे पानि, ओही मे पुरैनिक गाछ रहए, मुदा जाँध भरि स उपरे गादि। पैसब महा-मोसकिल। किऐक त पाएर दइते सर-सरा कऽ जाँघ भरि गड़ि जायत। के जान गमबै पैसत। निराशाक जंगल मे डोमन वौआ गेल। मन मे हुअए लगलै जे जहिना गामक लोक चलि गेल तहिना हमहूँ चलि जायब। जानि कऽ परानो गमाएव नीक नहि। जिनगी बचत, समय-साल बदलतै त फेरि घुरि कऽ आयब नहि त कतौ मरि जायब। जहिना गामक सब कुछ बिलटि गेल, समाजक लोक बिलटि गेल, तहिना हमहूँ बिलटि जायब।

पति कऽ चिन्तित देखि सुगिया- ‘किछु होय अए? ऐना किअए मन खसल अछि?’ पत्निक प्रश्न सुनि डोमन आंखि उठा कऽ देखि पुनः आंखि निच्चा कऽ लेलक। आंखि निच्चा करितहि सुगिया दोहरा कऽ पुछलक- ‘मन-तन खराब अछि?’ नजरि उठा डोमन उत्तर देलक- ‘तन त नहि खराब अछि, मुदा तनेक दुख देखि मन सोगायल अछि। जइ (जहि) आशा पर अखन धरि खेपलहुँ ओ त चलिये गेल। जे अगिलोक कोनो आशा नहि देखै छी। की करब आब? सुगिया- ‘अपना केने किछु ने होइ छै। जे भगवान जन्म देलनि, मुह चीड़ने छथि अहारो त वैह ने देताह। तइ ले एत्ते चिन्ता किअए करै छी?’

डोमन- ‘गामक सब कुछ बिलटि गेल। ऐहेन सुन्दर गाम छल, सोहो उपटि रहलअछि। सिर्फ माटि टा बँचल अछि। की माटि खुनि-खुनि खायब? बिना अन्न-पानिक कइ-अ दिन ठाढ़ रहब?’

‘चिन्ता छोड़ू। जहिया जे हेवाक हेतइ से हेतइ। अखन त पानियो अछिये आ अन्नो अछिये। जाधरि एहि (अइ) धरती पर दाना-पानी लिखल हैत ताधरि भेटबे करत। जहिया उठि जायत तहिया ककरो रोकने रोकेबै (रोकेवइ)। तइ ले एत्ते चिन्ता किअए करै छी।’

कहि सुगिया भानसक ओरियान करै लागलि। पत्नीक बात सुनि डोमन मने-मन सोचै लगल जे हमरा त मरैयोक डर होय अए मुदा ओकरा (पत्नी) कहाँ होइ छै। ओ त मरैइयो ले तैयारे अछि। फेरि मन मे उठलै जे जीवन-मृत्युक (जिनगी-मौतक) बीच सदा स संघर्ष होइत आयल अछि आ होइत रहत। तहि स पाछु हटब कायरता छी। जे मनुष्य कायर अछि ओ कोन जिनगीक आशा मे अनेरे दुनियाँ कऽ अजबारने अछि। पुनः अपना दिशि तकलक। अपना दिशि तकितहि मन मे एलै जे जीबैक बाट हरा गेल अछि। तेँ एते चिन्ता दबने अछि। तमाकुल चुना कऽ खेलक। तमाकुल मुह मे लइते अपन माए-बाप स लऽ कऽ पैछला पुरखा (जते जनैत) दिशि घोड़ा जेँका नजरि दौड़लै। मुदा कतौ रुकलै नहि। जाइत-जाइत मनुष्यक जड़ि धरि पहुँच गेल। पुनः घुमि कऽ आबि नजरि माय लग अटकि गेल। मन पड़लै माएक संग बितौलहा जिनगी।


मन पड़लै माइयक ओ बात जे दस वर्खक अवस्था मे रौदी बीतौने छल। रौदी मन पड़ितहि बड़की पोखरिक बिसाँढ़ आ अन्है माछ आंखिक सोझ मे आबि गेलइ। कने काल गुम्म भऽ मन पाड़ै लगल। मन पड़लै, अही पुरैनिक (जे सुखि गेल अछि) जड़ि मे त बिसाँढ़ो फड़ैत अछि। अल्हुए जेँका। जहिना माइटिक तर मे अल्हुआक सिरो आ अल्हुओ (फड़) रहै छै तहिना पुरैनिक जड़ि मे सिरो आ बिसाँढ़ो रहैत अछि। अनायास मुह स निकललै- ‘बाप रे, बाबन बीघाक पोखरि मे कते बिसाँढ़ हेतइ। ओकरे खुनै मे माछो भेटत। खाधि बना-बना सिंही-मांगुर रहै अए। एक पथ दू काज। मन खुशी अविते पत्नी कऽ सोर पाड़ि कहलक- ‘भगवान बड़ी टा छथिन। जहिना अरबो-खरबो जीवि-जंतु केँ जन्म देने छथिन तहिना ओकर अहारोक जोगार केने छथिन।’

पतिक बात सुनि सुगिया अकबका गेलि। बुझबे ने केलक। मुह बाबि पति दिशि देखैत रहलीह। पुनः डोमन कहलक- ‘चुल्हि मिझा दिऔ। घुरि कऽ आयब तखन भानस करब।’

पतिक उत्साह देखि सुगिया मने-मन सोचए लगली जे मन ने ते सनकि गेलनि हेँ। अखने मुरदा जेँका पनि-मरु (पनिमरु) छलाह। आ लगले कि भऽ गेलनि। दोसर बात परखैक खियाल स चुप-चाप ठाढ़ रहली।

डोमन- ‘की कहलौ? पहिने आँच मिझा दिऔ। फटक लगा छिट्टा लऽ कऽ संगे चलू।’

सुगिया- ‘कत्तऽ।’

‘बड़की पोखरि।’

‘किअए?’

‘ऐहन-ऐहन सइओ रौदी कटैक खेनाइ (भोजन) पोखरि मे दाबल अछि। आनै ले चलू।’

सवाल-जबाव नहि कऽ सुगिया आगि पझा, फटक लगा छिट्टा लऽ तैयार भेलि। घर स कोदारि निकालि डोमन विदा भेल। आगू-आगू डोमन आ पाछु-पाछु सुगिया।

बड़की पोखरिक महार पर पहुँच डोमन हाथक इशारा स पत्नी कऽ देखवैत बाजल- ‘जते पोखरिक पेट सुखल अछि, ओहि मे तते खाइक वस्तु (भोज्य पदार्थ) गड़ायल अछि जे ने खाइक कमी रहत आ ने पीवैक पाइनिक। जना-जना पानि सुखैत जेतइ तना-तना कुप कऽ गहीर करैत जायब। जते पुरैनिक गाछ सुखायल अछि ओहि मे घुरछा जेँका बिसाँढ़ फड़ल हैत।’

पोखरि धँसि डोमन तीनि डेग उत्तरे-दछिन आ तीनि डेग पूवे पछिमे नापि कोदारि स चेन्ह देलक। एक घुर। उत्तर बरिया पूबरिया कोन पर कोदारि मारलक। माटि तते सक्कत जे कोदारि धँसवे ने कयल। दोहरा कऽ फेरि जोर स कोदारि मारलक। फेरि नै कोदारि धँसल। आगू दिशि देखि हियाबै लगल जे किछु दूर आगूक माटि नरम हैत। खुनै मे असान हैत। मनक खुशी उफनि कऽ आगू खसल- ‘अई ढ़ोरबा माए, हम पुरुख नइ छी। देखियौ हमरा माटि गुदानबे ने करै अए। अहाँ हमरा स पनिगर छी, दू छअ मारि कऽ देखियौ।’ सुगिया- ‘हमर चूड़ी-साड़ी पहीरि लिअ, आ हमरा धोती दिअ। तखन कोदारि पाड़ि कऽ देखा दइ छी।’

मुस्की दइत दुनू आगू मुहे ससरल। एक लग्गा आगू बढ़ला पर माटि नरम बुझि पड़लै। कोदारि मारि कऽ देखलक तऽ माटि सहगर लगलै। एक घुर नापि डोमन खुनै लगल। पहिले छअ मे एकटा विसाँढ़क लोली जगलै। लोल देखितहि उछलि कऽ बाजल- ‘हे देखियौ। यैह छी बिसाँढ़।’

सुगिया- ‘लोल देखने नइ बुझब। सौंसे खुनि कऽ देखा दिअ।’

पत्नीक बात सुनि डोमन कऽ हुअए लगल जे हो न हो कहीं अधे पर स ने कटि जाय। से नहि त लोल पकड़ि डोला कऽ उखाड़ि लइ छी। मुदा नै उखड़ल। कने हटि दमसा कऽ दोसर छअ मारलक। छअ मारितहि एक बीतक देखलाहा आ चरि-चरि ओंगरीक दू टा आरो देखलक। तीनू कऽ खुनि, दुनू परानी निग्हारि-निग्हारि देखए लगल।

उज्जर-उज्जर। नाम-नाम। लठिआहा बाँस जेँका गोल-गोल, मोट। हाथी दाँत जेँका चिक्कन (प्लेन) बीत भरि स हाथ भरिक। पाव भरि स आध सेर धरिक।

सुगिया दिशि नजरि उठा कऽ डोमन देखलक त पचास वर्षक आगूक जिनगी बुझि पड़लै। पति दिशि नजरि उठा कऽ सुगिया देखलक त चूड़ीक मधुर स्वर आ चमकैत मांगक सिनदुर देखलक।’

छिट्टा भरि विसाँढ़ आ सेर चारिऐक सिंही माछ नेने दुनू परानी विदा भेल।

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शनिवार, 12 सितम्बर 2009

नताशा 24 (चित्र-श्रृंखला पढ़बाक लेल नीचाँक चित्रकेँ क्लिक करू आ आनन्द उठाऊ।)

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बुधवार, 9 सितम्बर 2009

एकटा निवेदन- उपेन्द्र दोषी

एकटा निवेदन
हे मिथिला-मैथिलीक उन्नायक-कर्मसाँढ़!
अछि एकटा निवेदन--
राजकमलक स्वरगन्धा आ
अन्य-अन्य कुकीर्तिक छै पसरल दुर्गन्धि,
वातावरण भेल छै विषाक्त आ सड़ाइन,
भ’ ने जाए अहूँंक साँस कतौ दूषित,
तें उनटा क’ खुटिया धोतीक खूट
क’ लिअ’ प्राणायामक कुम्भक
छोड़ि दिअ’ साँस लेब, एहि दूषित--सड़ाइन वायुमण्डलमे।
गरदनियाँ द’ निकालि दिऔ
ओहि दूषित प्राणवायुकें
जे किंचित जान वा अनजानमे
खिंचा गेल अछि साँसमे।
मानि लिअ’ हमर निवेदन आ’ ई सद्यः प्रार्थना--
मुक्ति प्रसंगक यौनाक्रान्त कुण्ठाक
अन्हर-बिहाड़िमे
उड़िया ने जाए अहाँक पाग कतौ
तें धेने रहू कसि क’
(भ’ सकए तँ काँख तर दाबि लिअ’)
मटर भरि गीड़ि लिअ’ बालु-गोबर
करेज पर बामा हाथ द’
मोकि दिऔ कण्ठ अपन साँसक--धुकधुक्कीक,
जे अनुखन करैत अछि--
धक्-धक्-धक्, धक्-धक्-धक्-
राजकमल ! राजकमल !!

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सोमवार, 7 सितम्बर 2009

एलेक्ट्रिक गर्ल-रामानुग्रह झा




भारतक एकटा बुढ़बा जादूगर
अनने छल विश्वक मेलामे
सबकें देखयबाक हेतु फ्री
एकटा एलेक्ट्रिक गर्ल!

‘लोकतन्त्रात्मक’ मन्त्राद्रष्टा
लाठीसँ फोड़ि कपार
नादिरशाह आ हिटलरक
गाड़ि देने छल अहिंसाक कब्र तर

मुदा, ‘सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न’ लोक
उठा देलनि फ्री पास
आ लागू भेल अछि आब
एलेक्ट्रिक गर्लक देखबा लेल चमत्कार
केवल हाइ रेट आ स्टुडेन्ट्स कन्सेशन मात्रा।

अपूर्व अछि लागल मेला
लोक सभक ठेलम-ठेला
भरि रातिमे तीन बेर, तीन शो
तीन खेप बनैत अछि भरि राति
योजना, बजट आ सरकार
सब क्यो चानी काटि रहल अछि।

धन्य हे बुढ़बा जादूगर!
केहन अनलह तों एलेक्ट्रिक गर्ल!

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एकटा चम्पाकली एकटा विषधर- राजकमल चौधरी




दशरथ झाक परिवार बड्ड छोट आ आंगन बड्ड पैघ। पहिने सभ भाइ संगहि रहै छलाह। आब दशरथ झा एहि पुरान, पैघ, उजड़ल, भांग-धथूरक जंगलसँ भरल आंगनमे अपन स्त्राी आ अपन सखा-सन्तानक संगें एकसरे रहि गेल छथि। दशरथक जीविका छनि-महींस। दुन्नू साँझ मिला क’ आठ-दस किलो दूधक प्रबन्ध एही एकटा महींससँ होइत छनि। महींसक अतिरिक्त डेढ़ बीघा खेत, आर किछु नइं। स्त्राी-रामगंजवाली घर-आंगनमे व्यस्त रहैत छनि, एकटा सन्तान स्कूलमे पढ़ैत छनि, दोसर सन्तान महींसमे, अर्थात महींस चरएबामे, आ बारहम बर्खक अन्तिम चरणमे छन्दबद्ध, मुग्ध, सुशील, आज्ञाकारिणी, प्रसन्नमुखी मात्रा एकटा कन्या...
कन्याक नाम थिक, चम्पा।
शशि बाबू अप्पन बासठि बर्खक जीवनमे जखन पहिल बेर, अपन निकटस्थ पड़ोसिया आ दूर-दूरस्थ सम्बन्धी, दशरथ झाक आंगनमे, बीच आंगनमे आबि क’ ठाढ़ भेलाह, तँ चम्पा देबाल पर गोइठा सैंति रहल छलीह। रामगंजवाली छलीह इनार लग... शशि बाबूकेँ देखिते ओ पानिसँ भरल बालटीन उठा क’, भनसाघरमे, सन्हिआ गेलीह। गामक सम्बन्धें शशि बाबू रामगंजवालीक श्वसुर स्थानीय छथि।
दशरथ झा हँसैत स्वरमे, खोशामदक तरंगित स्वरमे, बजलाह-एहन लाज करबाक कोन काज, शशि बाबू तँ अपन परिवारक लोक छथि... चम्पा, माइकेँ कहिअनु, एक लोटा पानिक प्रबन्ध करतीह। पानि माने, गरम पानि।
-गरम पानि किऐ, बाबूजी?-संयत स्वरमे चम्पा प्रश्न कएलनि। नहुँए स्वरमे भनसाघरसँ चम्पाक माइ बजलीह-गरम पानि माने, चाह। चम्पा, अहाँ दोकानसँ चाह आ चिन्नी ल’ आनू। हम पानि चढ़ा दैत छी।
दोकान जएबाक दुखसँ बेसी दुख आन कोनो काजमे चम्पाकेँ नइं होइत छनि। प्रत्येक बेर बजारक कोनो दोकानसँ घुरबा काल चम्पा सप्पत खाइत छथि, जे मरि जाएब, मुदा आब कहियो कोनो वस्तु उधार अनबाक हो, चाहे एक कनमा सुपारी, चाहे एक सेर कड़ ू तेल-चम्पे दोकान पठाओल जएतीह। चम्पा विरोध करतीह-हम नइं जाएब। जुगेसरक सवा टा टाका बाँकी छै। ओ हमरा उधार नइं देत।
मुदा, माइ कहथिन, किंवा दशरथ बजताह-अहाँ नइं जाएब, तँ आन के दोकान जाएत? ...चम्पा, जुगेसरकेँ कहबैक जे ओकर टाका हम पचा नइं जएबैक। काल्हिए हमर अल्लू उखड़त। हम अल्लू बेचि क’ ओकर टाका द’ देबैक।-चम्पाकेँ बूझल छनि, जे बाबूजी एक्को कट्ठा अल्लू रोपने नइं छथि। चम्पाकेँ बूझल छनि, जे बाबूजी एहिना जखन-तखन छोट-छोट बातक लेल मिथ्या बजैत छथि, फूसि बजैत छथि, सरासरि फूसि...।
मुदा, दछिनबारी टोलक सभसँ प्रतिष्ठित लोक आंगन आबि गेल छथि, पहिल बेर आएल छथि-बाबूजीकेँ शशि बाबूसँ निश्चय कोनो आवश्यक बेगरता छनि-चम्पा एतबा गप्प अवश्य बुझि रहल छथि। एतबा गप्प बुझबाक स्त्राी-सुलभ क्षमता हुनकामे छनि। अतएव, चम्पा माइकेँ बिना कोनो उत्तर देने, जुगेसर-बनियाँक दोकान दिस चलि गेलीह-भगवतीक प्रतिमा सन सुन्नरि, अल्प बयसक बुधियारि आ सुशील कन्या, चम्पा! आ शशि बाबूक संगें दशरथ पुबरिया कोठलीमे चलि गेलाह। चम्पा, चम्पाक माइ आ दशरथ एही घरमे रहै छथि।
देवाल पर एकटा पुरान कैलेन्डर टाँगल अछि। कैलेन्डरमे अंकित अछि, द्रौपदी-चीर-हरणक एकटा प्रचलित चित्रा। शशि बाबू जेना दशरथसँ कोनो महत्त्वपूर्ण गप्प सुनबाक लेल प्रतीक्षा करैत, बड़ी काल धरि एहि चित्रा दिस तकैत रहि जाइत छथि। द्रौपदी विवश छथि, विवस्त्रा छथि... क्रोधसँ उन्मत्त दुःशासन, गर्वसँ आन्हर भेल सुयोधन, ग्लानि आ संतापसँ माथ नीचाँ खसौने, लज्जित पाँचो पाण्डव... आ ऊपरसँ द्रौपदीक देह पर थानक थान साड़ी खसबैत श्री कृष्ण...।
राधारमण भगवान श्रीकृष्णक कैलेन्डरक चित्रामे मधुर-मधुर मुस्का रहल छथि।
शशि बाबू सेहो मोने-मोन मुस्कएलाह। बजलाह किछु नइं, मुदा, दशरथकेँ एतबा गप्प बुझबामे कोनो भांगठ नइं, जे हमरा आंगनमे आबि क’, हमरा कोठलीमे एहि पुरान पलंग पर बैसि क’ शशि बाबू प्रसन्न छथि। एही प्रसन्नताक आवश्यकता दशरथ झाकेँ छनि। शशि बाबू किछुए बर्ख पहिने धरि पुर्णियाँ जिला कचहरीमे हेड किरानी छलाह। आब स्थाई रूपें गामे रहै छथि। शशि बाबूक परिवार बड्ड पैघ। दू टा विधवा बहिन, तीन स्त्राीसँ चारिटा पुत्रा, आ चारू पुत्राक अपन-अपन छोट-पैघ परिवार। भिन्न-भिनाउज एखन धरि नइं भेल छनि। शशि बाबू जाबत जीवित छथि बँटवारा असम्भव।
तीन बेर विवाह करबाक उपरान्तो, शशि बाबू सम्प्रति स्त्राी-विहीन छथि। तेसर स्त्राी पाँचे बर्ख पहिने स्वर्गवासी भेलि छथिन। आब शशि बाबू वृद्ध भ’ गेल छथि, तथापि, परिवारक आ टाका-पैसाक सभटा कारबार ओ स्वयं करैत छथि, स्टील-सन्दूकक चाभी ओ एखनो अपने जनौमे रखैत छथि।
अहाँ हमर उद्धार नइं करब, तँ आन के उद्धार करत।-एही प्रेम-वाक्यसँ दशरथ अप्पन गद्य प्रारम्भ कएलनि। शशि बाबू जेबसँ पनबट्टी बहार क’ पान-जर्दा खा रहल छलाह। पनबट्टी बन्द क’ जेबमे रखलाक बाद, बजलाह-हमरासँ जे सहायता भ’ सकत, हम अवस्स करब मुदा, अहाँ स्पष्ट कहू, अहाँकेँ कतबा टाका चाही। ...कमसँ कम अहाँकेँ कतबा टाका...
दशरथ झा मोने-मोन हिसाब लगबैत छथि। चम्पाक विवाहक हिसाब। शशि बाबूसँ कतबा टाका पैंच मंगबाक चाही? कतबा टाका ओ द’ सकैत छथि? पाँच सै? सात सै? एक हजार? दशरथ झाकेँ बेटीक विवाह कोनो साधारण परिवारमे करबाक हेतु अन्ततः दू हजार टाका चाही। हिसाब जोड़ि लेलाक बाद, दशरथ बजलाह-पहिने चाह पीबि लेल जाए। टाका-पैसाक गप्प तकरा बाद कहब। हम की कहब, रामगंजवाली स्वयं अहाँसँ गप्प करतीह। अहाँसँ की नुकाएल अछि... अहाँसँ कोन लाज... अहाँ हमर अप्पन लोक छी।
चम्पाक लेल एकटा परम उपयुक्त वर दशरथ झा टेबने छथि। वरक पितासँ दशरथ झाकेँ मित्राता छनि। भरथपुर गाम, सहरसासँ तीन कोस उत्तर। वर सहरसा काॅलेजमे बी. ए.मे पढ़ैत अछि। रामगंजवाली विवाहक सभटा खर्च मोने-मोन निर्णय कएने छथि। जँ दस कट्ठा बेचि देल जाए, तँ पन्द्रह सै टाका अवश्य भेटत। तीन टा अशरफी घरेमे अछि। जँ शशि बाबू पाँचो सै टाकाक व्यवस्था क’ देथि...
चाह आ चिन्नीक पुड़िया माइ लग राखि, चम्पा ओसार पर ठाढ़ि छथि। साँझ पड़बामे आब कम्मे देरी अछि। आइ दुपहर खन पानि पड़ल छल-मूसलाधार वर्षा। आंगनमे थाल... सड़क पर थाल... चम्पा दोकान जाइत काल पिछड़ि क’ खसि पड़ल छलीह। माइ कहलखिन-अहाँ साड़ी बदलि क’ केश बान्हि लिअ’ ...जल्दी करू। शशि बाबू बेसी काल नइं बैसल रहताह। केश बान्हि लिअ’ ...ओसनी पर ललका साड़ी राखल अछि, से पहिरि लिअ’ ...जल्दी करू। शशि बाबूकेँ चाह आ पान द’ अबिअनु।
चम्पा इनार लग चल गेलीह। बालटीनमे पानि भरलनि। बड़ी काल धरि हाथ-पैर धोइत रहलीह। केहुनीमे लागल हरैद’क दाग छोड़ौलनि। कनपट्टी लगक मैल... भौंह परक मैल... मुदा, चम्पाक देहमे मैल कोनो ठाम नइं छनि, मात्रा मैलक भ्रम छनि हुनक मोनमे। कनिएँ काल पहिने दोकान लग खसि पड़लि छलीह, तँ अभिमन्यु चैधरीक भातिज, परीक्षित कतेक जोरसँ हँसल छल... लाजें रंगि गेल छलीह चम्पा, लाजसँ, क्रोधसँ, अपमानसँ आरक्त भ’ गेल छलीह। सन्देह भेल छलनि, परीक्षित कोनो अपशब्द सेहो बाजल अछि। यद्यपि परीक्षित मात्रा हँसले टा छल, बाजल नइं छल। चम्पा एहिना एही अल्पवयसमे सदिखन, मैलक भ्रमसँ, अपशब्दक सन्देहसँ, अपमानक सन्देहसँ व्यथित आ चिन्तित होइत रहै छथि।
हाथ-पैर धोलाक बाद ललका साड़ी आ ललका आँगी तकबाक हेतु चम्पा भनसाघरक ओसार पर अएलीह। माइ कहैत छथि, तँ मुँहमे पाउडर लगा क’ केश थकड़ि क’ ललका साड़ी पहीरि क’ शशि बाबूक हाथमे चाहक पेयाली देबैए टा पड़त। माइ जे कहथि, सैह करबाक चाही। सैह करैत छथि चम्पा। इच्छा नहियों रहै छनि, तैयो करैत छथि... जेना दोकानसँ उधार आनब, जेना ललितेशक आंगन जाएब... जेना एही तरहक आन कतेको काज करबाक इच्छा चम्पाकेँ नइं होइत छनि। चम्पा ओहि कोठलीमे प्रवेश नइं कर’ चाहैत छथि, जाहिमे पलंग पर बैसल छथि शशि बाबू आ निहोरा-मिनतीक मुद्रामे एकटा पीढ़ी पर नीचाँमे बैसल छथि चम्पाक बाबूजी, दशरथ झा। चम्पाकेँ लाज नइं होइत छनि, होइत छनि ग्लानि, आत्मवेदना, जे बाबूजी एहन लोक किऐ छथि, एहन दरिद्र आ एहन क्षुद्र... बाबूजी पलंग पर किऐ नइं बैसल छथि? ...कोन स्वार्थक कारणें एखन शशि बाबूक लेल चाह बनाओल जा रहल अछि? ...माइ एतेक अस्त-व्यस्त किऐ छथि?
अपने बैसल जाओ, हम दू मिनटमे अबैत छी-एतबा कहि क’ दशरथ कोठलीसँ बाहर भ’ ओसार पर अएलाह, लोटा हाथमे लेलनि, आ आँगनसँ बहरा गेलाह। शशि बाबू द्रौपदी-चीर-हरणक कैलेन्डर देखि रहल छथि, आ विचारि रहल छथि जे दशरथ झाकेँ टाका देल जाए, किंवा नइं देल जाए। बेसी संभावना तँ एही बातक अछि, जे टाका डूबि जाएत। मुदा, जँ टाका नइं देल जाए, तँ चम्पाक बियाह कोना होएतैक? ...आ दशरथ चल कत्त’ गेलाह? ओ कहैत छलाह जे रामगंजवाली अपने हमरासँ गप्प करतीह। ओ किऐ करतीह गप्प?
आगू-आगू रामगंजवाली, एक हाथमे हलुआक छिपली, दोसर हाथमे पानिक लोटा-गिलास नेने आ हुनका पाछूमे नुकायलि जकाँ, लाल साड़ी आ लाले आँगी पहिरने, बड्ड सकुचायलि, बड्ड लजबिज्जी चम्पा...
रामगंजवाली घोघ नइं तनने छथि। पैघ-पैघ आँखिमे सुन्दरता अवश्य छनि मुदा, स्त्राी-सुलभ लज्जा नइं। लज्जा स्त्राी-आँखिक आन्तरिक ज्योति थिक... रामगंजवालीक आँखि जेना पाथरक बनाओल गेल हो, सुन्दर, किन्तु, जकरामे कोनो आकर्षण-शक्ति नइं। चम्पाक हाथसँ चाहक पेयाली लैत काल शशि बाबू अनुभव कएलनि जे चम्पाक हाथ थरथरा रहलि छनि... जे चम्पाक अंग-अंग काँपि रहलि छनि। सौंसे कपार घामसँ भीजल... दुन्नू आँखि जेना नोरसँ झलफल-झलफल करैत... शशि बाबू अनुभव कएलनि, जँ कनियों काल चम्पा एहि ठाम ठाढ़ि रहतीह, तँ ठामहि झमा क’ खसि पड़तीह, बेहोश भ’ जएतीह।
माइक कोनो नव आज्ञाक प्रतीक्षा चम्पा नइं कएलनि। चाहक पेयाली शशि बाबूक हाथमे देलाक उपरान्त, चम्पा माइ दिस उपेक्षाक तीक्ष्ण दृष्टिसँ देखैत, चुपचाप कोठलीसँ बहरा गेलीह, आंगनमे एक छन ठाढ़ि रहलीह, आ आंगनसँ बहरा क’ अपन सखी, अन्नपूर्णाक आंगन दिस चलि गेलीह। चम्पा जखन बड्ड दुखमे डूबलि रहै छथि, तखन चुपचाप अन्नपूर्णाक घरमे जा क’ सूति रहै छथि।
दशरथ टाकाक विषयमे किछु नइं बजलाह... कतेक टाका चाही, आर की-की, से तँ अहीं सभ कहब-शशि बाबू चम्पाक तीव्र पलायनसँ एक रत्ती अप्रतिभ, आ एक रत्ती निश्चिन्त होइत, समीपमे ठाढ़ि भेलि, रामगंजवालीसँ जिज्ञासा कएलनि-दशरथ कहाँ छथि?
रामगंजवाली बजलीह-ओ बथाने दिस गेल छथि। अबिते होएताह... मुदा, हुनका रहलासँ की, आ हुनका नहिएँ रहलासँ की... हुनका अहाँसँ कोनो गप्प कहैत लाज होइत छनि। ओ नइं कहताह। हमहीं कहब। चम्पा हमर बेटी थिक; हम चम्पाक माइ छी। बेटी पर माइए टाकेँ अधिकार होइत छै, बापक कोनो अधिकार नइं। माइ अपन बेटीक लेल प्राण दैत अछि। हमहूं दैत छी। तें, हमहीं अहाँसँ गप्प करब।
रामगंजवालीक एहि निद्र्वंन्द्व, ओजस्वी आ स्पष्ट भाषणसँ शशि बाबू मोने-मोन सशंकित होइत छथि-की कह’ चाहैत छथि दशरथक स्त्राी?-शशि बाबू कनिएँ सम्हरि क’ बैसैत छथि, अपन पीठ तर तकिया राखि लैत छथि। दशरथ किऐ चल गेलाह? चम्पा किऐ पड़ा गेलीह? किऐ रामगंजवाली एतेक निकटतासँ आ एत्तेक भूमिका बान्हि क’ गप्प क’ रहलि छथि? शशि बाबू गामक लोक नइं छथि, सभ दिन शहरे-बजारमे रहलाह। शहरक लोक छथि शशि बाबू। नोकरी तेयागि क’, आब स्थायी रूपें गाम आएल छथि। गामक रीति-रेवाज, गामक राजनीति, गामक लोकक आचार, भाषा, आ व्यवहार बूझल नइं छनि। तें रामगंजवालीक भूमिकाकेँ बुझबाक उचित क्षमता शशि बाबूकेँ नइं छनि।
शशि बाबू पानक बीड़ा उठौलनि। जर्दाक डिबिया खोललनि। असली गप्प सुनबाक प्रतीक्षा कर’ लगलाह। रामगंजवाली एक बेर आंगनसँ भ’ अएलीह। चम्पा कत्त’ गेल? कोनो पड़ेसियाक आंगनक कोनो स्त्राी कोनटा लग तँ ठाढ़ नइं अछि? रामगंजवाली घुरि क’ कोठलीमे अएलीह।
-आब हमरा देरी होइत अछि। ...दशरथ कहाँ छथि?-शशि बाबू प्रश्न कएलनि। रामगंजवाली मुस्कएलीह। बजलीह-चम्पाक बियाहमे नहियों किछु तँ दू-सवा दू हजार टाका लागत। हमरा सभकेँ मात्रा एक बीघा दस कट्ठा खेत अछि। आ, एकटा महींस अछि। जँ दस कट्ठा खेत बेचब तँ एक हजार टाका भेटत। जँ महींस बेचब तँ भेटत पाँच सै टाका।
शशि बाबू बीचमे टोकलखिन-महींस किऐ बेचब? खेत किऐ बेचब? आ बेचि लेब तखन जीवन कोना चलत?
रामगंजवाली संभवतः इएह प्रश्न सुन’ चाहैत छलीह। तें ई प्रश्न सुनि क’ ओ हँसलीह, जेना कोनो सुखान्त नाटकक नायिका-अभिनेत्राी हँसैत अछि, ताही तृप्त मुद्रामे हँसि क’ रामगंजवाली बजलीह-अहाँ उचित कहलहुँ, जखन ई सभ बेटीक बियाहमे बेचिये लेब, तखन जीवन नइं चलत। अपने लात अपन पेट पर मारब उचित नइं, एतबा हम बुझैत छी। तें हम सभ, माने हमर मालिक, हम, आ हमर बेटी, चम्पा अहाँक शरणमे आएलि छी। ...अहीं, मात्रा अहीं हमरा सभक उद्धार क’ सकैत छी।
-अहीं हमरा सभक उद्धार क’ सकैत छी-रामगंजवालीक मुँहसँ ई गप्प सुनि क’ शशि बाबू विरक्त भ’ गेलाह। क्रोध भेलनि, जे हम किऐ एहि ठाम समय नष्ट क’ रहल छी। काल्हिए-परसूसँ दशरथ झा हजार बेर एहि वाक्यक आवृत्ति कएने छथि, जे शशि बाबू हुनक आ हुनक परिवारक उद्धार क’ सकैत छथि।
जखन कि उद्धार करबाक हेतु नइं, एकटा आन स्वार्थसँ शशि बाबू एहन असमयमे, एहन एकान्तमे दशरथ झाक आंगन आएल छथि। शशि बाबू योजना बना क’ कोनो काज करैत छथि। जीवन-रूपी शतरंज कोना खेलाएल जाए, कोना जीवित मनुष्य सभकेँ काठक पेयादा, किंवा काठक हाथी-घोड़ा बनाओल जाए, से मर्म हुनका बूझल छनि।
शशि बाबूकेँ घरडीहक स्थान बड्ड कम्म। परिवार बड्ड पैघ। आ, दशरथ झाक आंगन शशि बाबूक देबालसँ सटले छनि, पश्चिम दिस। जँ दशरथ झा अपन आंगनक पुबरिया हिस्सासँ बारह धूर जमीन शशि बाबूक हाथें बेचि लेथि, तँ तकर मूल्यक रूपमे चम्पाक विवाहमे हजार-बारह सै टाका देबामे शशि बाबूकेँ कोनो कष्ट नइं हेतनि। ...शशि बाबू उद्धार करबाक लेल नइं, बारह धूर घरडीह किनबाक लेल दशरथक आंगन आएल छथि। अस्तु, रामगंजवालीक गप्पसँ हुनका कोनो प्रसन्नता नइं भेलनि। ओ विरक्त भेलाह जे रामगंजवाली मूलकथा पर नइं आबि, व्यर्थ समय नष्ट क’ रहल छथि... लोक अनेरे सन्देह करत जे शशि बाबू किऐ अपन पड़ोसियाक आंगनमे एत्तेक कालधरि एकान्त कोठलीमे बैसल छथि। बड़ी कालक उपरान्त अपन मोनकेँ स्थिर क’, किंचित गम्भीर मुद्रा बना क’ कनिएँ हतप्रभ जकाँ, रामगंजवाली बजलीह-हम खेत नइं बेचब, घरडीह नइं बेचब, महींसो नइं बेचि सकैत छी। हमरा एक्केटा चम्पा नइं अछि, आनो सन्तान अछि। तकरा सभक मुँहमे जाबी नइं लगाओल जा सकैत अछि।
शशि बाबू पुछलखिन-घरडीह नइं बेचब, तँ की करब? कत्तेक टाका लेब हमरासँ?
रामगंजवाली उत्तर देलखिन-अहाँसँ बेसी नइं, पन्द्रह सै टाका हम सभ लेब। पन्द्रह सै टाका नगद, आ अपना मोने चम्पाकेँ अहाँ जे गहना, कपड़ा, साड़ी, जे देबै, से अपना मोने। अहाँ सन धनीक, बुझनुक, आ विद्वान लोकक संगें चम्पा भरि जीवन सुखी रहती, भरि जीवन आनन्द करती...
-अहीं हमरा सभक उद्धार क’ सकैत छी-शशि बाबू आब एहि गप्पक असली अर्थ बुझि गेलाह। एही कारणें एतेक भूमिका बान्हल जा रहल छल। शशि बाबू स्वयं चम्पासँ बियाह करथि-से दशरथ झा, आ रामगंजवालीक उद्देश्य। ई योजना स्वयं रामगंजवाली बनौने छथि। जँ साठि बर्खक स्वस्थ, सुन्दर, पराक्रमी वृद्ध, शशि बाबू, तेरह बरखक आत्ममुग्ध, लज्जामयी, स्पर्शहीन, नवीन चम्पा-कलीसँ बियाह करताह-तँ शशि बाबूक सम्पूर्ण राजकाज, सम्पूर्ण धन-सम्पत्ति पर रामगंजवालीक आ दशरथ झाक पंजीकृत अधिकार, अर्थात एकाधिकार भ’ जएतनि, आ महारानी जकाँ, वृद्ध शशि बाबूक संसारमे पटरानी जकाँ राज करतीह हमर चम्पा, हमर चम्पा-कली।
चाह देबाक लेल चम्पा आएल छलीह। शशि बाबूकेँ अवस्से पसिन्न भेल छथिन हमर कन्या, हमर दुलारि-सुकुमारि कन्या। एहन पैघ-पैघ आँखि, एहन सरल-निश्छल स्वभाव, एहन बुद्धि-विचार गाम भरिमे आन कोनो धीयाकेँ नइं छै।
एक बेर अपने दलान पर अपन मित्रा-मण्डलीक समक्ष हास्य कएने अवस्स छलाह शशि बाबू। कहने छलाह, जे मोन होइत छनि जे फेर एकटा विवाह क’ लेथि। मुदा, ई गप हास्ये छल, विनोदे छल, सत्य नइं। विवाह करबाक, बासठिक एहि विचित्रा बयसमे, विवाह करबाक कोनो आकांक्षा शशि बाबू नइं रखैत छथि। मुक्त-हृदय लोक छथि ओ, आब कोनो जाल-जंजालमे नइं पड़ताह।
अतएव, पलंगसँ नीचाँ उतरि क’, धरती पर ठाढ़ होइत, शशि बाबू कठोर आ कठिन स्वरमे बजलाह-अहाँक गप्प हम सुनलहुँ। ...दशरथ झाकेँ अहाँ कहि देबनि, हम एतेक मूर्ख नइं छी। बेसी नइं, चम्पा हमर बेटी, कल्याणीसँ बाइस बर्ख छोट छथि, आ हमर बेटीक बेटी, मुन्नीसँ चारि बर्ख छोट छथि। हम चम्पासँ कतेक बर्ख पैघ छी? अहाँक पति देवता, दशरथ झा हमरासँ कतेक बर्ख छोट छथि, रामगंजवाली? ...अहाँक मोनमे एहन विचार कोना आएल?
रामगंजवाली परम विषाक्त आ परम विरक्त दृष्टिसँ एक बेर शशि बाबू दिस तकलनि। शशि बाबू आतंकित भ’ गेलाह। जेना हुनक सोझाँमे कोनो स्त्राी, कोनो रामगंजवाली कनियाँ ठाढ़ि नइं हो, जेना हुनका सोझाँमे फन काढ़ने, कोनो विषधर ठाढ़ हो... कोनो भयावह विषधर...
रामगंजवाली शशि बाबूकेँ कोनो उत्तर नइं देलखिन। कोनो वाक्य नइं, कोनो शब्द नइं, विषधरक उत्तर होइत छै ओकर विष, ओकर विषदन्त!
मुदा, विधिक ई केहन विधान अछि, जे एहि सामाजिक घटनामे, शशि बाबू विषधर नइं छथि, विषधर छथि चम्पाक माइ, रामगंजवाली!

(मिथिला मिहिर,15 जून 1975 सँ साभार)

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नेना भुटका - दयावान बालकक कहानी

दयावान बालकक कहानी

फ्रांस शहरमे एकटा लड़का आर एकटा ओकर बहिन छल। दुनू भाइ-बहिनक बीचमे बड़ प्रेम छल। लड़काक नाम नेपोलियन छल आर लड़कीक नाम इलायजा छल। दुनू गोटे बड़ नटखट छल। एक दिन दुनू भाइ-बहिनक बीचमे तय भेल जे सभसँ तेज के दौड़ब।
ई बातपर दुनुक बीच तय भेल जे- जे जीतब से पार्टी देब। दुनू भाइ-बहिन दौड़ै लागल। दौड़ैत-दौड़ैत दुनू गोटे एकटा लड़कीसँ टकरा गेल। से ऊ लड़की केर माथापर एकटा टोकरी छल। लड़की आर ओकरा माथापरक टोकरी जकरामे फल सब रहै से रोडपर खसि गेल। लड़कीकेँ क्सि कए चोट लागल। दुनू भाइ-बहिन मिलि कऽ ऊ लड़की केँ उठेलक आर पुछ्लक- चोटो लगल ये अहाँकेँ। ई बातपर लड़की कहलक जे कसि कऽ लागल छल। दुनू भाइ-बहिन मिलि केँ लड़की केर टोकड़ी आर ओकरामे फल छलै सेहो, सभकेँ उठाय, ओकरा अपन संगे अपन घर लेलै चल गेल। ओतए ओकर माँ छै, से कहलक जे ई अहाँ ककरा अपन संगमे लेले ऐलो ये। तँ दुनू भाइ बहिन कहलक जे हम दुनू गोटे दौड़ैत छलौ, ई हमरासँ टकरा गेल आर एकर माथा परक टोकरीमे छ्लै फल, सब सड़कपर बिखरि गेल आर एकरा चोट सेहो लागि गेल छलै। से हम एकरा अपन संगेमे लेले ऐलोँ। एकरा एकर फलक पैसा दऽ दियौ। ई बातपर हुनकर माँ गुस्सा गेल आर कहलक- एना अहाँ सब किए करैत छी। आर घरक अन्दर गेल, पैसा आनिकऽ ऊ लड़कीकेँ दैत पुछलक जे अहाँ एतना कम उम्रमे एहन भारी समानकेँ ठा कऽ कतए जाइ छलौँ। तँ जाएकऽ लड़की कहलक- हमर बाबू बड़ बीमार छल। एकरा बेच कऽ हम अपन बाबूकेँ डॉक्टरक पास लै जेतौँ। लड़कीकेँ ई बात सुनिकऽ दुनू भाइ-बहिन आर हुनकर माएकेँ बड़ दया लागल आर कहलक जे अहाँ केर घर कतए ये, से हम सब अहाँक संगमे अहाँक घर चलब। ई बातपर लड़की केर आँखिमे आँसु आबि गेल आर कहलक- चलू, अहाँ सभ हमर घरक लेल। दुनू भाइ-बहिन, हुनकर माए, ऊ लड़की केर संग बिदा भेल आर लड़कीक घर पहुँचल तँ देखलक जे एकटा अधवयसू आदमी एकटा चौकीपर सुतल ये आर खाँसि रहल ये, जकरा देखने से लागैत छल जे ई आब नै बचत। दुनू भाइ-बहिन आर हुनकर माए ओकरा अपन गाड़ीमे डालि कऽ अस्पताल लेले गेल। ओकरा अस्पतालमे भरती करबाएकऽ कहलक- जे खर्च आएत हिनका ठीक होएबाकमे, सब हम देब। आर दुनू भाइ-बहिन मिलिकऽ हुनकर खूब सेवा कएलन्हि। लड़कीक बाबू जल्दीए ठीक भऽ गेलाह आर अपनासँ चलिकऽ घर पहुँचलाह। आर ऊ दुनू भाइ-बहिनकेँ ओ सभ बड़ आशीर्वाद दैत छलै। ई लड़का आगू चलै केर बाद फ्रांस देशक शासक बनल। आर बहुत दिन तक राज केलक।





आशिष चौधरी गाम – चरैया,
जिला – अररिया।


निवेदन:-

१.धीमेश्वर स्थान- बनमनखीसँ उत्तर ३ किलोमीटरपर धीमा गाँव अछि। एहि स्थानक बारेमे जे ई बहुत पुरान अछि, से सुनै छी। पहिले एतए मन्दिर नै रहै मुदा बादमे एत्तऽ विशाल मन्दिर बनल आर एकटा पोखरि सेहो अछि। आर एक बात जे ई अपने आप प्रकट भेला-ए। ई मन्दिरसँ सटल एकटा माँ दुर्गाक सेहो प्राचीन मन्दिर ये। जे मन्दिरक बारेमे ओइ अगल-बगल गामक लोक सब कहै ये जे कोनो प्रार्थना अगर मनसँकरल जाइ-ए, ते माँ भगवती जरूर पूर्ण कए दैत अछि।

२.अररिया जिलासँ ३० किलोमीटरपर भरगामा प्रखण्ड अछि। वैह प्रखण्डमे भरगामा गाममे एकटा चण्डी स्थान बाधमे अछि, जकर बारेमे बुजुर्ग सभ कहै ये जे ई अपने-आप प्रकट भेल अछि आर ओए ठाम कोनो प्रार्थना आइ तक पूरा नञि होबए के प्रश्न ने अछि। एकटा खास बात ये जे ओइ ठाम के भगवती के गेट मंगलवार दिन टा खुलै ये। आर गाछ सभ जे ये, अगर ओकरा कियो काटए के कोशिश करै ये से खुन बहे लगे ये, जेना मनुखक खून बहै ये ओहिना। ओत्तऽ आइ वरु जेना मन्दिर बनल अछि वैहने। ओत्तऽ मंदिर अगर बनाबे चाहे ये ते नै बनबे सके ये।
हुनके समर्जपित, जय मां।

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नेना भुटका - किसानक कहानी

किसानक कहानी

एकटा किसान ओर किसानक कनियाँ छलै। किसानक शादी केर बहुत दिन बीतल लेकिन किसानक कनियाँ केर बाल-बच्चा नहि होबैत छलाह। दुनू गोटे ई बात लक बड परेशान रहैत छलाह। बहुत मन्नत माँगेक केर बाद किसानक कनियाँ केर एकटा बेटा भेल जकर नाम सौरभ राखलक। जे कुछ दिनक बाद बीमार पडल, ओर फेरो बाद में मरि गेल। ई बात सँ किसान ओर किसानक कनियाँ बड दुःखी रहै छलै। एक दिनक बात अछि एकटा साधु-महात्मा किसानक घर आएल ओर किसानक कनियाँक केर कहलक जे अहाँ चिंता नहि करू अहाँक चारिटा बेटा होएत, लेकिन ओकर सभक नाम अहाँक बिगाडि के राखय पडैत अगर अहाँ ऎना नहि करब तँ अहाँ केर बेटा फेर नहि बचत। ई गप्प पर किसान कहलक बाबा अहाँ जे कहलो हम दुनू गोटे वैह करब हम अपन बेटा केर नाम बिगाडि केर राखब। सँ साधु बाबा ठीके कहलक छलै जे अहाँ केर चारिटा बेटा हैत। किसानक कनियाँक एक-एक करि चारिटा बेटा भेल जकर नाम किसान ओर किसानक कनियाँ दुनू गोटे मिलकेर नाम राखलक। पहिल केर नाम छलै- ‘टुटल’, दोसेर केर नाम छलै- ‘सडल’, तेसिर केर नाम छलै- ‘फाटल’ ओर चारिम केर नाम छलै- ‘पंक्चर’। किसानक चारो बेटा जब पैघ भेल तँ किसान ओर किसानक कनियाँ बड चिंता होबे लागल जे एकर सभक बियाह कोना हैत। कुछ दिनक बाद एकटा लडकी बला किसानक घर पर आयल तँ किसान कँ लागल जे आब हमर बेटा सभक बियाह भ जाएत। से किसान अपन पहिल बेटा केर आवाज लगेलक ‘टुटल’ कुर्सी लाबु। ई बात सुनि केर लडकी बला कहलक नहि नहि हमरा सभ नहि बैठब तँ किसान कहलक एना कोना हैत अहाँ सभ मिठाई खाय लिअ ओर अपन दोसेर बेटा केर आवाज देलक ‘सडल’ मिठाई लाबु तँ लडकी बला कहलक हमरा सभक चीनीक बीमारी छलै सँ हमरा सभ मिठाई नहि खायब। तँ लडकी बला कहलक जे आबि हमरा सभ घर लेल जायब से हमरा सब के बिदा करू। किसान कहलक पहिले हम अहाँ सभक बिदाई करब तबने किसान अपन तेसिर बेटा केर आवाज देलक ‘फाटल’ धोती लाबु तँ लड्की बला के भेल ई हमरा फाटल धोती बिदाई करत से लडकी बला कहलक नहि नहिफेर आयब नहि वैह दिन बिदाई करब आय हमरा सभके बिदा करू। तँ किसान अपन चारिम बेटा जे कि सबसे छोट छलै ओकरा आवाज देलक ‘पंक्चर’ गाडी निकालु ओर हिनका सभ केर छोडि आबु। तँ लडकी बला के भेल जे ई हमरा पंक्चर गाडी में बिदा करत। सँ लडकी बला ओतए सँ भागि गेल। किसान अपन माथा पर हाथ धरि कए कहैत छलै जे आब हमर बेटा सँ बियाह के करत।

आशिष चौधरी गाम – चरैया,
जिला – अररिया।

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मिथिलाक खानपान...

मिथिलाक खानपान-नीलिमा चौधरी आ राखी साह... मखानक खीर सामग्री- दूध-१ १/२ किलो, चिन्नी-१०० ग्राम, मखान कुटल- १०० ग्राम, इलाइची पाउडर- स्वाद अनुसार, काजू- १० टा, किशमिश-२०टा बनेबाक विधि- मखानक पाउडर (कनी दरदरा)क पहिने १/२ किलो ठंढ़ा दूधमे घोरि लिअ, शेष दूध केँ खौला लिअ। आब गर्म दूधमे ई घोड़ल मखानक मिश्रण मिला दियौक आर करौछसँ लगातार चलबैत रहियौक जाहिसँ मिश्रण पेनीमे बैसय नहि। .... (आगाँ पढू)

मिथिलांचलक विकास..

मिथिलांचलक विकास... मिथिलांचल क्षेत्र बिहार मे सबस पिछड़ल मानल जाइत अछि, अगर प्रतिव्यक्ति आय , साक्षरता और प्रसवकाल मे जच्चा-बच्चा के मृत्यु के मापदंड बनायल जाय तो मिथिलांचल देश के सबस गरीब आ पिछड़ल इलाका अछि। एकर किछु कारण त अहि इलाका के भौगोलिक बनावट अछि... (आगाँ पढू)

मिथिला अरिपन....

मिथिला चित्रकला- स्त्री आ पुरुषक दशपात अरिपन / स्वास्तिक अरिपन... स्त्रीगणक दशपात अरिपनकन्याक मुण्डन,कान छेदन आ' विवाहक अवसर पर कुलदेवताक घर आकि मण्डप पर बनाओल जाइत अछि।बनेबाक- विधि। एकर बनेबाक विधि सूक्ष्म अछि।ऊपरमे तीन पातक पुष्प, ,ओकरनीँचा पाँच-पातक कमल-पुष्प,ओकर नीचाँ सात-पात युक्त्त कमल, बीचमे अष्टदल कमल अछि। दश पात चारू दिशि अछि। नौ टा माँछक चित्र सेहो अछि... (आगाँ पढू)

एक विलक्षण प्रतिभा...

एक विलक्षण प्रतिभा जिनका हम सदिखन याद करैत छी (प्रथम कड़ी) - कुसुम ठाकुर..... एक बेर हमारा एक पत्रिका में किछु लिखय लेल कहल गेल छल, ई सन् १९९६ क गप्प थिक। हम बस एतबे लिखी सकलौं "हम की लिखी हमर त लेखनिये हेरा गेल"। मुदा आई बुझना जैत अछि जे नै, हमारा एकटा कर्तव्यक निर्वाहन... (आगाँ पढू),
(दोसर कड़ी), (तेसर कड़ी), (चारिम कड़ी), (पाँचम कड़ी), (छठम कड़ी), (सातम कड़ी), (आठम कड़ी), (नवम कड़ी), (दसम कड़ी), (एग्यारहम कड़ी), (बारहम कड़ी), (तेरहम कड़ी), (चौदहम कड़ी), (पन्द्रहम कड़ी )

चिनबारक दीप...

चिनबारक दीप–उषा किरण खान... समस्तीपुर मे गाड़ी बदली कऽ महेसरी अइमे बैसलि सरिया कऽ। आब घर बेसी लग आयल जाइत छैक। चारि टीसन आ छैक, फे तऽ टीसन सऽ एक कोस जमीन हैतै। चारि-पाँच गोटाक हेंज छैक्। बौआइत-बतियाइत गाम पहुँचि जयतै। आठे दिनुका दिन छैक, की सब करतै? एह, करऽक की छैक? सभटा बस्तुजात तऽ कीननहिं जाइत छैक.... (आगाँ पढू)

बिदेसिया (संकल्पित नाटिका)

विद्यापतिक बिदेसिया (संकल्पित नाटिका).... भोजपुरीक साहित्य मैथिलीसँ कम समृद्ध अछि मुदा से अछि मात्र परिमाणमे, गुणवत्ताक दृष्टिमे ई कतेक क्षेत्रमे आगाँ अछि। भोजपुरीक भिखाड़ी ठाकुरक बिदेसियाक सन्दर्भमे हम ई कहि रहल छी। भिखाड़ी ठाकुर कलकत्तामे प्रवासी... (आगाँ पढू)

पाँच पत्र...

पाँच पत्र-हरिमोहन झा... प्रियतमे अहाँक लिखल चारि पाँती चारि सएबेर पढ़लहुँ तथापि तृप्ति नहि भेल। आचार्यक परीक्षा समीप अछि किन्तु ग्रन्थमे कनेको चित्त नहि लगैत अछि। सदिखन अहींक मोहिनी मूर्ति आँखिमे नचैत रहैत अछि। राधा रानी मन होइत अछि जे अहाँक ग्राम वृन्दावन बनि जाइत, जाहिमे केवल अहाँ आ हम राधा-कृष्ण जकाँ अनन्त काल धरि विहार करैत रहितहुँ... (आगाँ पढू)

कथा- माउगि

कथा- माउगि - विभा रानी.... माउगि, माउगि, गे माउगि, गे माउगि! तों माउगि, हम माउगि, ई माउगि, ऊ माउगि - सभ किओ माउगे-माउगि। ऊँहूँ - सभ किओ भला माउगि हुअए। ई तय कर' बाली तों के? अएं गे? तोरा कहिया स' भेटलौ ई हक? ई सभ काज-धंधा हमरा आओरक अछि - हमरे आओर के करे दें। देख त' कने, तोहरो आओर के कतेक रंग-बिरंगा रूप दिया देलियौ! माउगि, गे माउगि.... (आगाँ पढू)

मातृत्व...

डा. मंजू गीता मिश्राक आलेख : मातृत्व.... नारी जीवनक सबसँ गौरवशाली एवं सुखद अनुभव थिक मातृत्व ।ई नारी जीवनक परिपूर्णताक प्रतीक अछि । पूरा नौ मास अपन गर्भमे फलैत-फूलैत एक शिशुक अपन जान सँ बेसी देखभाल करैत छथि । तत्पश्चात एक फूल सन सुन्दर सुकोमल शिशु जन्म लैत अछि, यैह स्त्रीक सबसँ अनमोल उपहार एवं आनन्ददायक क्षण थिक । एहि नौ मासक दौरान गर्भवतीक भोजन एवं वातावरण पर निर्भर करैत अछि.... (आगाँ पढू)
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