शनिवार, 31 अक्तूबर 2009

नताशा 29 (चित्र-श्रृंखला पढ़बाक लेल नीचाँक चित्रकेँ क्लिक करू आ आनन्द उठाऊ।)

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बुधवार, 28 अक्तूबर 2009

मैथिली


हम रहू बैसल कखन धरि
सुन्न अहिना कात लागल।
हम बजै छी मैथिली तैं
बुझि रहल अछि लोक पागल।

बाट नहि छोड़त, अकड़ि क’
ठाढ़ अछि सब आन भाषी।
जानि नहि आयत कखन धरि
चान केर ओ पूर्णमासी।
दोष अछि हमरो,अहूँ के
तैं रहल मिथिला उपेक्षित।
नहि भेलहुँ हम संगठित
तैं हैत की परिणाम इच्छित।
घर मे दुबकल अपन
हम ठाढ़ खिड़की मे तकै छी।
कंठ अछि अवरुद्ध,कहुना
मैथिली जय हो! गबै छी।
छै विवशता की,कहत के
अछि कतौ नहि लोक जागल।
पश्चिमी देशक तिमिर मे
जा रहल अछि लोक भागल।
आऊ सुनियौ सभ केहन अछि
ई हमर भाषा मधुरगर ।
स्वच्छ, निर्मल वर्ण जहिना
गाम के अछि माटि मिठगर।
मैथिली के शब्द मे छै
भोर कें आभा समेटल।
पढ़ि लिय इतिहास ,भेटत
ज्ञान के चिर सत्य फेंटल।
अछि हमर उन्नत धरोहर
सभ्यता आ संस्कारक।
दैत छी सम्मान सबकें
छी धनी एखनहुँ बिचारक।
मातृभाषा मैथिली कें
हम कोना बैसू बिसरि क’।
अछि हमर ई प्राण जा धरि
हम रहब ता ठाढ़ अड़ि क’।
जोर सँ चिकरब मुदा नहि
मुँह झँपने आइ भागब।
आधुनिकता के इजोतक
आइ हम परिधान त्यागब।

झूठ के साटल मुखौटा
फेक सबके आइ कहब ै
मैथिली भाषा हमर अछि
जाति अछि मैथिल चिकड़बै।






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शनिवार, 24 अक्तूबर 2009

मनुख आ जानवर

आय फरियाइल जाय

अपना सब मनुख छि या जानवर

किये कि दूनू में छैक

जमीन आ आसमानक अंतर

एकटा पेटक लेल रहैत अछि ललायत

एकटा परिवारक लेल रहैत अछि कपसैत

एकटा झूइठ प्रतिष्ठाक लेल करैत अछि छल-प्रपंच

एकटा पाय-कौड़ीक लेल घड़ी-घड़ी करैत अछि नौटंकी

एकटा मानसिक संतुष्टि लेल बौराबैत अछि दिन-राति

एकटा शारीरिक संतुष्टि लेल होइत अछि व्याभिचारी

एकटा पैर पर ठाढ़ भेलाक बाद माई-बाप कऽ दैत अछि लाइत

दोसर तऽ छैन चार-टा टांग बाला

अपन पेट भरलाक बाद दैत छैक दोसर कऽ मौका

सभकियो आ॓कर सहोदर छैन

झूइठ लेल प्राण नहि गमबैत अछि

दोसर नहि बौराइत अछि

मानसिक वा शारीरिक संतुष्टि लेल

पाइर पर ठाढ़ भेलाक बाद

माय-बाप स्वतंत्र कऽ दैत अछि

अहिना मे,

के ककरा सऽ उत्तम

ई कहैक गप नहि अछि

मन सऽ सोचैत, आत्मा सऽ परखैत

निश्चित करू कि नीक के

मनुख आ जानवर।

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बुधवार, 21 अक्तूबर 2009

जरा रहल छी श्रद्धा-दीप : रूपेश कुमार झा 'त्योंथ'


उत्तर मे छैक उमकी उठल, दच्छिन मे हिलकोर।
पश्चिम मे पपियाहक तांडव, पूब तकै छी भोर॥
पूब तकै छी भोर, मुदा बटतक्की अछि लागल।
राति जेना बनि गेल अहद्दी, हम छी बनल अभागल॥

अन्हार बढ़ल, छी कतय नुकायल दिनकर-दीनानाथ।
प्रकाश पसारब छोडि कतय, तकै छी कोन-कोन लाथ॥
तकै छी कोन-कोन लाथ, जगत मे पसरल हाहाकार।
निशाचरक अछि तांडव बढ़ल, असह्य भेल प्रहार॥

डुमल बाइढ सं अयाचिक बारी, उपजत कतय साग।
पेट भरब भेल मोश्किल, पहिरब की टोपी-पाग॥
पहिरब की टोपी पाग , आगि लागल अछि सउँसे हाट।
कप्पार पकडि कय कानय जन-गण, खा उपेक्षाक चाट॥

रामक धरती पर शान सं, चलबइए रावण राज ।
सता संत कें ठिठियाइत कनिको , लगैछ ने ककरो लाज ॥
लगैछ ने ककरो लाज, कतय सुतल छी रघुबीर ।
की ध्वंश भेल अछि धनुष, आ बिझा गेल अछि तीर ॥

प्राण पियासल आतंकीक भय सं, लोकक अछि उपरे दम।
हाट, बजार वा टीशन सगरो, फुटैछ फटक्का बम॥
फुटैछ फटक्का बम , तें जिनगीक ने कोनो ठीक।
जनता भेल बेहाल मुदा , सरकारक ने डोलैछ टीक॥

अजगुत लगैछ देखि चहुँदिस , जग-जमानाक चालि।
क्यो कुहरय , क्यो कानय बैसल, क्यो पीटि रहल अछि झालि ॥
क्यो पीटि रहल अछि झालि, भेल अपने मे विभोर ।
एही बीच चानी पीटइए, साधू भेष मे चोर॥

आब परीक्षा नहि लिअय भगवन, दिअय शक्ति अपार।
जाहि बले धरती कें कय दी, दैत्यक तांडव सं उबार ॥
दैत्यक तांडव सं उबार, करी हम वा अपने चलि आउ ।
जरा रहल छी श्रद्धा-दीप, आब जुनि बाट तकाउ ॥


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मंगलवार, 20 अक्तूबर 2009

पति - पत्नी (चुटुक्का-हास्य कणिका)- मदन कुमार ठाकुर



.

पति - डाक्टर साहिब हमर घर वाली के पेट में एक दू महिना से लगातार दर्द भ
राहल छैक, से
कन्नी निक जेका देखियो की कारन छैक ?
डाक्टर - देखो मै अछे से देख लिया हूँ और दबाई भी दे दिया हूँ , रोज सुबह - शाम
एक - एक मुन्ना खा लेना और फिर १५ दिन के बाद आके दिखा बा लेना ,
पत्नी - यो फल्लं के बाबु हमरा पेट में और जोर से दर्द बारहल जैया , रोज साँझ आ भोर के एगो -
एगो मुन्ना खैत छीय तयो ,
पति - निक बात छि , निक बात छि , दर्द होयत अछि त हुअ दियो , देखियो १४ दिन में कतेक टा
पेट भगेल अछि , लागैत अछि जे जल्दीय एक दू महिना में डेल्बरी भ जायत ,

.

पत्त्नी - सुनै छिय हम आब खेनाय - पिनाया नै बंबायब और चुल्हा चेकी के काज नही करब ,
पति - से किया ?
पत्नी - आब केंद्र सरकार आ बिहार सरकार सेहो महिला के लेल ५० प्रतिसत आरक्षण क देलकै हन ,
अपन भविष्य सुधारे के लेल ,
पति - ठीक अछि , आहा बहार के काज देखू आ दुनिया घुमु , हम घर में भोजन बनायब आ संग- संग
अहाँ के बचो के जनम देब ,

.

पत्त्नी - यो फला बाबु के रेडियो में कहैत छल जे , परिवार की गती विर्धी को रोको या फिर कंडोम इस्तमाल करो ,
पति - ठीक अछि , हम जाई छी दबाई दुकान पर ,
( दुकान दर से ) यो हमरा एगो कंडोम दिय , हमरा अपन कनिया कहलें हन ,
दुकानदार - कुन कंपनी के आ लेडिज या जैन्स के ?
पति - हम पूछी के आबैत छी ,
यई सुनैत छिय , कहलक जे कुन कंपनी के आ लेडिज या जैन्स के ,
पत्त्नी - कहबैन अपना दुकान से बच्चा बाला ,

.
पति - (फोन से फोन पर ) चालू डार्लिंग सिनेमा देखेय लेल ,
पत्त्नी - आई नै सन्डे दिन ,
पति - (फोन से अगिला सन्डे के ) आई टिकट ल लिय ?
पत्त्नी - (चुपे - चाप ) कहलो ने अगिला सन्डे दिन के ,
पति - एखन कतय छी ? ऐना कियक बजय छि ,
पत्त्नी - कहलो ने बॉय फ्रेंड संग पि बी आर में ,

.

( पति - पत्नी के एक दोसर से झगरा होयत छल , खूब गारा - गारी , ओकरा माय के ओ ,त
ओकर बाप के ओ , खाई त छलखिन , )
पति - हम जहिया से बियाह केलो हमरा कपार में आगि लागी गेल ,
पत्नी - हमरा जहिया से एकरा संग हमर माय बाप लगा देलक हमर नशीब में आगि लगी गेल ,
( ताबे में एगो छोरा जे दिल्ली से आयल छल , आ संग में मोबाईल फोन सेहो रखने छल ओ हबर - हबर -१०१ नंबर डाइल क देलकै आ कहलकै , हेल्लो अग्नि शमन पुलिस कंट्रोल (यस
स्पीकिंग ) सर हमरे परोस में एक ही परिवार के पति और पत्नी को कापार में आग लग चुके है
कृप्या बुताने का प्रबंध करे --)
पुलिस आयल आ दुनु बय्क्ति के हाथ में हाथकरी लगा के जेल में बन्द क देलकैन तखने दुनु
प्राणी के कपार में लागल आगी सांत भगेल ,

६.
पति - यई काल्ही हमर मैरेड एनिभार्शारी छि , से हमर दोस्त महिम सब आयत से
अपन मुहक सरोसती के कनी बंद क के रखाब ,
पत्नी - ठीक अछि , बुझालो अहाँ के बात ,
दोस्त सब - यो मित्र बहुत निक पार्टी रहल , बहुत आनन्द आयल , बहुत खेलो - पिलो ,
मुदा अह्ना के लाइफ़ पाटनर के नहीं देखैत छि , हुनके लेल ने एतेक केलो हन ,
कनी बजाऊ हुनको से बात करब आ मैरेड एनिभार्शारी के सेहो सल्ब्रेट क देबैन ,
पति - यई सुनाई छीय हमर दोस्त सब कनी बात करता से घर से बहार आउ कनी
चेहरा देखा दियोन हिनको सब के ,
दोस्त सब - आ -- हा हा , बहुत सुन्दर , -२ दोस्त अहाँ त खूब नशीब बाला छि यो ?
पत्नी - हँ हँ कियक ने आई जे हिनकर मैरेड एनिभार्शारी जे छियन ,
दोस्त सब - से की अहाँ के मैरेड एनिभार्शारी नहीं छि ?
पत्नी - नै , हमर बियाह के प्रथम शालगिरः छि ,

७.
जगदम्बा ठाकुर के प्रस्तुती –

पत्नी - यो फल्ला के बाबु गाम में सब कहैत छैक जे कमला कात में बड़ जोरगर
बाड़ी आयल छैक से सबटा सामान लके कतय जायब , घर त बढिक पैन से
खैस परत ?
पति - यई अहाँ सब दिनक बुधु के बुधु रहिये गेलो ,
पत्नी - से की , ठीके त कहैत छि ,
पति - बाढ़ी एलय त आब दियो ने , कमला के कात में में एलय ना हमर घर त
कमला के दुनू छहर के बिच यानि कमला के पेट में अछि , हमरा कुन डर ,

८.
पत्नी - यो सुनैत छिऐ आब शोभाग्य मिथिला टी वि पर गप्पी नंबर वन आबैत छैक ,
से अहँ कियक नै अहि में भाग लैत छि , ओही में भाग लेला से बहुत रास
पाई, बहुत रास समान आ बहुत रास इज्जत, आ मान सम्मान सेहो भेटत ,लोक सब
सेहो चिनहत जे ई फलां बाबु छिया ,
पति - हाँ हाँ से त ठीके कहैत छि , मुद्दा अहाँ के झारू ,अहाँ के बारैहन , आ अहाँ के खापैर
आ बेलां से फुर्सत भेटत तखन न ,

.

पत्नी - सब के घर में देखैत छि , गिप्ट पर गिप्ट भरी घर गिप्टे टा मुद्दा अहाँ के घर
में की आयल , एको पाओ मिठाई के डिबो टा नही , खाली नाम के लेल पंडित जी ,
सबटा फुसिये के जे हमरा एतेक रास जजमान अछि ,
पति - अहाँ चिंता कियक करैत , सब दुखक इलाज त हमरे लग अछि ,
पत्नी - से कोना ?
पति - जाबे हम १००१ रूपैया नही लेबई ताबे की हम कतौ के पूजा करेबनी , हमरा बिना
किनको की उधार छैन , जाबे लबैन नै ताबे पूजा करबैन नही, हम टस से मस नही हेबैन ,
ओकर बात अहाँ लैत रहब गिप्ट ,लिप्ट, सिपट जतेक लेबक रहत ,
( जय मैथिल जय मिथिला )
मदन कुमार ठाकुर
जगदम्बा ठाकुर
पट्टीटोल , कोठिया , झंझारपुर , मधुबनी , बिहार
मो -- ९३१२४६०१५०
e-mail , madanjagdamba@yahoo.com

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शुक्रवार, 16 अक्तूबर 2009

संस्कार

संस्कार

नहि जानि कतय ई जीवन के
ल’ जायत नवका संस्कार।
भ’ रहल जतेक उन्नति लोकक
भ’ रहल ह्ास ओतबे विचार।

आगत केर सपना मे जागल
बीतल जीवन छथि बिसरि गेल।
ई देश प्रांत मानव समाज
सबसँ छथि बंधन मुक्त भेल।

अपने गृहणी दू टा बच्चा
परिवारक जीवन पूर्ण भेल।
सुख दुख जे भोगथु बृद्ध पिता
ममता केर सेवा व्यर्थ भेल।

निज स्वार्थ जीवनक परिभाषा
सुख भोग जीवनक सत्य धर्म।
छथि पढ़ा रहल अपने शिशु के
परहित जग मे अछि अशुभ कर्म।

धन बल जीवन कें परम लक्ष्य
परिजन पुरजन सँ अनचिन्हार।
ई अंध दौड़ अछि केहन जतय
परलोक मोक्ष सबटा बेकार।

स्वध्याय,ज्ञान,तप,अनुशासन
गीता पुराण सब भेल व्यर्थ।
अछि बात व्यथा के कोना आइ
सबसँ सम्मानित बनल अर्थ।

चेतू आबो किछु करू ऐहन
इतिहास अपन स्थान देत।
अनको लए किछु जँ सोचि लेब
सगरो समाज सम्मान देत।

नहि त’ सभ मोन पड़त जहिया
आयत जीवन के अंत पहर।
ओ गाम घर सभ अपन आन
रहि - रहि करेज मे देत लहर।

हम सत्य कहै छी जीवन मे
दुख के कारण अछि ई निजता।
अछि जतेक धर्म जग मे एखनो
सबसँ महान अछि मानवता।

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बृहस्पतिवार, 15 अक्तूबर 2009

आशीष अनचिन्हार- गजल

बम सँ डेड़ाएल अछि मनुख सँ हेमान धरि
जानवर तँ जानवर भगवत्ती सँ भगवान धरि

नीकक लेल सोहर खरापक लेल समदाउन
गाबि रहल गबैआ सोइरी सँ श्मसान धरि

समालोचना केकरा कहैछ छैन्ह किनको बूझल
अछि सगरो पसरल निन्दा सँ गुणगान धरि

राम नाम केर लूटि थिक लूटि सकी त लूटू
लूटि रहल छथि अगबे दक्षिणा पंडित सँ जजमान धरि

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शनिवार, 10 अक्तूबर 2009

धूमकेतु-कविता



कविता थिक निश्शंक सार्थक शिलालेख कालक आतंकक
कविता मनुखक सत्य शाश्वत
कविता महज ईमान थिक
काव्य-विघटन-बीच काव्य अक्षर आस्था
कविता मनुखक मनुख हेबाक प्रमाण थिक।
कविता उपस्थित बात थिक दहकैत
बात, एकदम सोझ आ सपाट धधरा
युग-युगक संचित-दमित मनुषत्व के अवमानना के
कार्बनित महुराएल ज्वाला
कविता जीहक धार हन-हन आ कुलिश-सम दाँत
ढाहि क’ पाखण्ड के चट्टान
मुखर करतै अपन परिभाषा, अपन सन्दर्भ सन्धानक
नव जन-गणक उद्दाम जिज्ञासा
आ जन-जनक प्राणक भितरिया शान्ति के
आकांक्षाक निनाद
आ, मुक्तिकामी महत्तम आरोहणक अनुगूंज।

जे जनै छथि बात
आ देबालक लिखलाहाकें बाँचि सकै छथि, गूनि सकै छथि
तिनका कथीक बध लागल छनि?
वाक हरण भ’ कोन देशक कोन बैंकमे बन्द पड़ल छनि?
च वा हि तु भेद मात्रा कविता जनैत अछि।

जे शोणितमे बारि अपन अँतड़ी के टेमी
कुल्लम साजल महल अटारी
राजकक्ष आलोकित कएने छथि
जनिक रिक्ततामे बेहोशीक किसिम-किसिम के गैसक धूआँ
चुप्पेचाप भरल जाइत छनि दीना-राति
तिनके विवश निसट्ठ आँखि के
मार्मिक मूक मुदा औनाइत तप्पत आखर
उमड़ि सहज कविता बनैत अछि।
स्वयंसिद्ध अधिकार मनुख के हेरा जाइ छै जखने
वा विस्तृत आकास मनुख के लागि जाइत छै बन्हकी
वा पाखण्डक अन्हरजालमे
ओझरा जाइ छै सत्य मनुख के

तेहने कोनो विकट लग्नमे
फोड़ि कतौ धरती के छाती
अकस्मात अपरिपथगामी जनक आँखिमे
लहकि लपटि कविता जरैत अछि।

सभसँ ऊपर सत्य मनुक्खक
तै सँ ऊपर किछु नहि, किछु नहि
ताही सत्यक जयोद्घोषमे
कविता अछि अर्पित नित सहजहि।

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नताशा 28 (चित्र-श्रृंखला पढ़बाक लेल नीचाँक चित्रकेँ क्लिक करू आ आनन्द उठाऊ।)

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शुक्रवार, 9 अक्तूबर 2009

हर्टा मुलरकेँ २००९ ई.क साहित्यक नोबल पुरस्कार

रुमानियामे जनमल जर्मन लेखिका हर्टा मुलरकेँ २००९ ई.क साहित्यक नोबल पुरस्कारसँ सम्मानित कएल गेल अछि। १९५३ ई.मे जनमल मुलर निकोल चौसेस्कूक शासनक अप्रिय परिस्थिक निरूपणक लेल बेस चर्चित छलीह। स्टॊकहोमक स्वेडिश एकेडमी कहलक अछि जे हुनकर गद्य आ पद्य दुनू प्रशंसनीय अछि। एकेडमी कहलक अछि जे लेखिका गरीब-गुरबाक परिस्थितिक वर्णनमे पारंगत छथि।

रुमानियाक जर्मन अल्पसंख्यक समुदायमे जनमल मुलर १९८७ ई. मे जर्मनी आबि गेलीह। १९८२ ई. मे हुनकर पहिल जर्मन भाषाक लघु-कथा संग्रह नादिर्स रुमानियाक जर्मन भाषी गामकेँ केन्द्रित कऽ कथा कहैत अछि, ई पोथी रुमानियामे प्रतिबन्धित कऽ देल गेल। तकर बाद ओप्रेसिव टैंगो प्रकाशित भेल।

मुलर मात्र अपन मातृभाषा जर्मनमे लिखैत छथि। हुनकर
द एप्वाइन्टमेन्ट उपन्यास फ्लैशबैकमे भूतकालक वर्णन करैत अछि जखन ओ ट्रामसँ रोमानियन पुलिसक इन्टेरोगेशन लेल जाइत छथि। हुनकर स्विन्गिंग ब्रेथ उपन्यास हुनकर नव्यतम रचना अछि।


हुनकर पिता द्वितीय विश्वयुद्धमे भाग लेने छथि आ हुनकर माता पाँच बर्ख धरि सोवियत वर्क कैम्पमे कटने छथि।
हुनकर आन पोथी सभमे द पासपोर्ट, द लैंड ऑफ ग्रीन प्लम्स ट्रैवलिंग ऑन वन लेग अछि।

आत्म-केंद्रित आ आइ-माइमे लागल अमेरिकी साहित्य लेल साहित्यक नोबल पुरस्कारक लगातार तेसर बर्ख यूरोपकेँ जाएब एकटा चेतौनीक रूपमे देखल जा रहल अछि।

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नोबल पुरस्कार 2009-वेंकटरमन रामकृष्णन

भारतीय मूलक अमेरिकी नागरिक वेंकटरमन रामकृष्णनकेँ 2009 ई.क रसायनशास्त्रक नोबल पुरस्कारसँ संयुक्त रूपसँ सम्मानित कएल गेल अछि। हुनका ई पुरस्कार हुनकर एहि रिसर्च लेल जे सभ सेलमे जीनक ब्लूप्रिंट होइत अछि जकरा राइबोजोम जीवित पदार्थमे बदलैत अछि जे प्रोटीन बनबैत अछि। एहिसँ एंटीबायोटिक रिसर्चमे प्रगति होएत।

अल्मोड़ा, उत्तराखण्डमे जनमल रोनाल्ड रॉसकेँ हुनकर मलेरियापर खोज लेल
1902 ई.मे मेडिसीनक नोबल भेटल।

बम्बैमे जनमल ब्रिटिश रुडयार्ड किपलिंगकेँ
1907 ई.क साहित्यक नोबल भेटल।

1913 ई. मे रवीन्द्रनाथ ठाकुरकेँ गीतांजली- (बांग्ला पद्य-संग्रह) लेल जकरा संवेदनशील, नव आ सुन्दर पद्य कहल गेल रहए-साहित्यक नोबल भेटल रहए।

1930 ई. मे चन्द्रशेखर वेंकटरमन केँ भौतिकीक नोबल- "प्रकाश किरणक बिन नमरएबला पसार"पर देल गेल।

1968 ई. मे भारतीय मूलक अमेरिकी नागरिक डॉ. हरगोविन्द खुरानाकेँ मेडिसीनक नोबल हुनकर गेनेटिक कोडक विश्लेषण आ ओकर प्रोटीन- संश्लेषण संबंधी कार्यपर देल गेल।

1979 ई. मे अल्बानिया मूलक भारतीय नागरिक मदर टेरेसाकेँ शांतिक नोबल हुनकर गरीबी आ दुखसँ संघर्ष लेल- जे शांतिक लेल खतरा अछि, देल गेल।

अविभाजित भारतमे जनमल अबदुस सलामकेँ इलेक्ट्रोवीक यूनीफिकेशन पर
1979 ई. मे भौतिकी नोबल भेटल।

1983 ई. मे भारतीय मूलक अमेरिकी नागरिक सुब्रह्मण्य़म चन्द्रशेखरकेँ भौतिकी नोबल तरेगणक सैद्धांतिक स्वरूप आ निर्माण-विसाकपर देल गेल।

1998 ई.क अर्थशास्त्रक नोबल भारतीय अमर्त्य सेनकेँ कल्याणकारी अर्थशास्त्र लेल देल गेल।

2001 ई. मे साहित्यक नोबल भारतीय मूलक त्रिनिदादमे जन्मल ब्रिटिश वी.एस.नैपॉलकेँ भेटल।

2007 ई. मे संयुक्त राष्ट्र संघक मौसम परिवर्तनक पैनेलकेँ शांतिक नोबल भेटल जकर अध्यक्ष आर.के.पचौरी छलाह।

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रामदेव झा-निर्जल मेघ

राशि-राशि मेघ आबि
पड़ाएल जाइत अछि
पश्चिम दिस
प्रतीक्षककें डुबा क’
निराशाक सागरमे --

जेना कोनो
फ्लैग स्टेशन पर
कोनो एक्सप्रेस ट्रेन
हड़हड़ाइत जाइछ चल।

आ ठाढ़, प्लेटफारम पर
मोसाफिर देखि-देखि
ठकुआएल रहि जाइत अछि।

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हंसराज- ईश्वर

ईश्वर
पहाड़क खाधिमे जनमल
एहि गोबरछत्ताक एकटा दोगमे
शरशय्या पर पड़ल
अहर्निश उकासी,
भरि अढ़िया कफ आ रक्तक वमन;
दस टा रोगग्रस्त बन्धुक बीच
एकसर हम सोचि रहलहुँ--
यन्त्राणाक सीमा ईश्वर!

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धीरेन्द्र-मनुक्ख आ मशीनी आदमी

तोरा संग हँसैत छी
तोरा संग बजैत छी
खा’ लै’ छी तोरा संग--दू खिल्ली पान!
तेजी सँ चलै छी,
जोरसँ बजै छी,
रहैत अछि ठोर पर हरदम मुस्कान!
बूझि लैह से तों, हल्लुक छी तूर जकाँ?
सहि लेब अवज्ञा फेकल नूर जकाँ?
बदलि गेल रंजक होएत ने अवधान?
मुदा गुप्प से नहि छै मित्रा!
हँसी देखलह अछि, हँसीक त’रक नोर नहि।
चंचलता देखलह अछि, अन्तरमे पालित होड़ नहि।
मुस्कीक बिहाड़ि तों देखलह अछि कहाँ!!
इच्छा छल बाँटि दी अप्पन मुस्की,
नोर आ बिहाड़िकें घोंटि पीबि जाइ।
डुबा दी व्यष्टिक चिन्ता समष्टिक समुद्रमे!
मोन नहि छल जे समुद्रक पानि नोनगर होइछ
पियास ओ मिझाओत नहि।
तें कहलिअह ई सभ!
मुदा नमस्कार बन्धु!
देखि लैह कृत्रिमताक उच्च-पहाड़,
अर्चना करए लागह गम्भीरता बूझि तों।
(बिना बुझने बिहाड़िक पूर्वक शान्ति,
बिना बुझने मित्राताक पण्डुकीक हत्या।)
किन्तु गप्प एतबे जे मनुक्ख मरि गेल,
ई जकरा देखैत छह--ओ थिक मशीनी आदमी।

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बुधवार, 7 अक्तूबर 2009

समाजक ई चेहरा

इहो अछि एहि समाजक चेहरा
दिल्लीक बाट पर, बत्ती लाल भेलाह पर
इंदौर स निजामुद्दीन वा पटना स दिल्लीक लेल ट्रेन पकड़बाक पर
आआ॓र फेर घरक दुआरि पर
दस्तक दैत देखबाक मे आबैत अछि आ॓

नहि तऽ पुरूष अछि आ नहि एकटा स्त्री
भरसक शारीरिक तौर स
मुदा मन बा अभिनयक चेहरा
रहैत अछि अलग-अलग स
जे कि हुनकर की नाम देल जाए

मायक कोख स इहो लेल जनम
भाई-बहिनक संग पलल-बढ़ल
स्कूल मे पढाईक सीढ़ी चढ़ल
मुदा, फारम भरैत काल
खसल भारी विपैत

कियाकि आपशन छल दू टा
स्त्री वा पुरूष
तखन शुरू भेल हुनकर
सामाजिक बहिष्कार
नहि घरक रहल नहि रहल घाटक

परिस्थिति सभकऽ
जीयब सीखा दैत छैक
ताहि लेल
देखबाक में आबैत अछि
बाट सऽ लऽ कऽ ट्रेन तक।

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सोमवार, 5 अक्तूबर 2009

मैथिल

मैथिल
एहि देश प्रांत मे कोना हैत
सम्मान मैथिली भाषा के ।
दोषी छी हमहूँ सब अपने
छी दर्शक बनल तमाशा के।

किछु कतौ बरख दिन पर कहियो
विद्यापति पर्व मना रहलौं।
हम पाग माथ पर राखि कतौ
किछु कथा पिहानी बाँचि एलौं।

की हैत करै छी झूठ- मुठ
चढ़ि कतौ मंच सँ व्यथा पाठ।
दू चारि लोक के छोड़ि दिअ बाँकी
सभटा छी बनल काठ।
सभ मुँह नुकौने जड़ बैसल छी
कतय अपन भाषा भाषी।
पथ उतरि करत के शंखनाद
हम छी विद्रोहक अभिलाशी।
अछि अपन पत्रिका गिनल- चुनल
निष्प्राण भेल पाठक विहीन।
के कीनत सोचि रहल अछि ओ
टीशन पर टाँगल दीन हीन।
हम कोना बचायब एकर प्राण
ल’ जायब एकरा गाम- गाम।
देखत बच्चा उपहास करत
अंग्रेजी बाजब बढ़त नाम।
चुट्टी पिपरी सभ जीव जन्तु
अपना सँ राखत कतेक स्नेह।
छथि मुदा केहन मैथिल समाज
सभ समाघिस्थ, निश्चल, विदेह।
माइक कोरा मे पहिल बेर
जहि भाषा के छल भेल ज्ञान।
ओ पहिल चेतना भाव बोध छल
जीवन के आधार प्राण।
सभ बिसरि गेल छी तैं देखू !
अछि सुखा रहल गंगाक धार।
कहिया धरि रहब उपेक्षित
हम सभ करू फेर सँ किछु बिचार।
संकल्प लिअ उठि चलू आइ
आँजुर मे गंगा जल राखू।
दिनकर के साक्षी राखि फेर
नहि आइ कियो पाछाँ ताकू।
हरिमोहन झा जयकांत मिश्र
सभकंे साहित्यिक मान लेल।
छी कतय नीन्न मे एखनो धरि
जागू मैथिल सम्मान लेल।
.....................

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शनिवार, 3 अक्तूबर 2009

नताशा 27 (चित्र-श्रृंखला पढ़बाक लेल नीचाँक चित्रकेँ क्लिक करू आ आनन्द उठाऊ।)

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मिथिलाक खानपान...

मिथिलाक खानपान-नीलिमा चौधरी आ राखी साह... मखानक खीर सामग्री- दूध-१ १/२ किलो, चिन्नी-१०० ग्राम, मखान कुटल- १०० ग्राम, इलाइची पाउडर- स्वाद अनुसार, काजू- १० टा, किशमिश-२०टा बनेबाक विधि- मखानक पाउडर (कनी दरदरा)क पहिने १/२ किलो ठंढ़ा दूधमे घोरि लिअ, शेष दूध केँ खौला लिअ। आब गर्म दूधमे ई घोड़ल मखानक मिश्रण मिला दियौक आर करौछसँ लगातार चलबैत रहियौक जाहिसँ मिश्रण पेनीमे बैसय नहि। .... (आगाँ पढू)

मिथिलांचलक विकास..

मिथिलांचलक विकास... मिथिलांचल क्षेत्र बिहार मे सबस पिछड़ल मानल जाइत अछि, अगर प्रतिव्यक्ति आय , साक्षरता और प्रसवकाल मे जच्चा-बच्चा के मृत्यु के मापदंड बनायल जाय तो मिथिलांचल देश के सबस गरीब आ पिछड़ल इलाका अछि। एकर किछु कारण त अहि इलाका के भौगोलिक बनावट अछि... (आगाँ पढू)

मिथिला अरिपन....

मिथिला चित्रकला- स्त्री आ पुरुषक दशपात अरिपन / स्वास्तिक अरिपन... स्त्रीगणक दशपात अरिपनकन्याक मुण्डन,कान छेदन आ' विवाहक अवसर पर कुलदेवताक घर आकि मण्डप पर बनाओल जाइत अछि।बनेबाक- विधि। एकर बनेबाक विधि सूक्ष्म अछि।ऊपरमे तीन पातक पुष्प, ,ओकरनीँचा पाँच-पातक कमल-पुष्प,ओकर नीचाँ सात-पात युक्त्त कमल, बीचमे अष्टदल कमल अछि। दश पात चारू दिशि अछि। नौ टा माँछक चित्र सेहो अछि... (आगाँ पढू)

एक विलक्षण प्रतिभा...

एक विलक्षण प्रतिभा जिनका हम सदिखन याद करैत छी (प्रथम कड़ी) - कुसुम ठाकुर..... एक बेर हमारा एक पत्रिका में किछु लिखय लेल कहल गेल छल, ई सन् १९९६ क गप्प थिक। हम बस एतबे लिखी सकलौं "हम की लिखी हमर त लेखनिये हेरा गेल"। मुदा आई बुझना जैत अछि जे नै, हमारा एकटा कर्तव्यक निर्वाहन... (आगाँ पढू),
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चिनबारक दीप...

चिनबारक दीप–उषा किरण खान... समस्तीपुर मे गाड़ी बदली कऽ महेसरी अइमे बैसलि सरिया कऽ। आब घर बेसी लग आयल जाइत छैक। चारि टीसन आ छैक, फे तऽ टीसन सऽ एक कोस जमीन हैतै। चारि-पाँच गोटाक हेंज छैक्। बौआइत-बतियाइत गाम पहुँचि जयतै। आठे दिनुका दिन छैक, की सब करतै? एह, करऽक की छैक? सभटा बस्तुजात तऽ कीननहिं जाइत छैक.... (आगाँ पढू)

बिदेसिया (संकल्पित नाटिका)

विद्यापतिक बिदेसिया (संकल्पित नाटिका).... भोजपुरीक साहित्य मैथिलीसँ कम समृद्ध अछि मुदा से अछि मात्र परिमाणमे, गुणवत्ताक दृष्टिमे ई कतेक क्षेत्रमे आगाँ अछि। भोजपुरीक भिखाड़ी ठाकुरक बिदेसियाक सन्दर्भमे हम ई कहि रहल छी। भिखाड़ी ठाकुर कलकत्तामे प्रवासी... (आगाँ पढू)

पाँच पत्र...

पाँच पत्र-हरिमोहन झा... प्रियतमे अहाँक लिखल चारि पाँती चारि सएबेर पढ़लहुँ तथापि तृप्ति नहि भेल। आचार्यक परीक्षा समीप अछि किन्तु ग्रन्थमे कनेको चित्त नहि लगैत अछि। सदिखन अहींक मोहिनी मूर्ति आँखिमे नचैत रहैत अछि। राधा रानी मन होइत अछि जे अहाँक ग्राम वृन्दावन बनि जाइत, जाहिमे केवल अहाँ आ हम राधा-कृष्ण जकाँ अनन्त काल धरि विहार करैत रहितहुँ... (आगाँ पढू)

कथा- माउगि

कथा- माउगि - विभा रानी.... माउगि, माउगि, गे माउगि, गे माउगि! तों माउगि, हम माउगि, ई माउगि, ऊ माउगि - सभ किओ माउगे-माउगि। ऊँहूँ - सभ किओ भला माउगि हुअए। ई तय कर' बाली तों के? अएं गे? तोरा कहिया स' भेटलौ ई हक? ई सभ काज-धंधा हमरा आओरक अछि - हमरे आओर के करे दें। देख त' कने, तोहरो आओर के कतेक रंग-बिरंगा रूप दिया देलियौ! माउगि, गे माउगि.... (आगाँ पढू)

मातृत्व...

डा. मंजू गीता मिश्राक आलेख : मातृत्व.... नारी जीवनक सबसँ गौरवशाली एवं सुखद अनुभव थिक मातृत्व ।ई नारी जीवनक परिपूर्णताक प्रतीक अछि । पूरा नौ मास अपन गर्भमे फलैत-फूलैत एक शिशुक अपन जान सँ बेसी देखभाल करैत छथि । तत्पश्चात एक फूल सन सुन्दर सुकोमल शिशु जन्म लैत अछि, यैह स्त्रीक सबसँ अनमोल उपहार एवं आनन्ददायक क्षण थिक । एहि नौ मासक दौरान गर्भवतीक भोजन एवं वातावरण पर निर्भर करैत अछि.... (आगाँ पढू)
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