बृहस्पतिवार, 31 दिसम्बर 2009

अनुज सं संवाद - रमण कुमार सिंह


हे
हमर अनुज लोकनि

सकय त क देब अहां सभ हमरा क्षमा
हम
नहि सौंपि सकब अहां सभ के
रागपूरित
पृथ्वी समूचा
जे
भेटल छल हमरा नेनपन में
हम
देबय चाहैत छी घर
अहां
के भेटत बाजार
हम
लिखय चाहैत छी प्रेम
अहां
के पढ़बा में आओत व्यापार

खाली अहींक गलती नै हैत
हम
सभ बहुत अन्हार समय में जीबि रहल छी
हमर
पूर्वज लोकनि पहिने रहैत छलाह जंगल में
एकटा
इजोत देखि ओ धयलनि विकासक बाट
इजोतक
पाछू-पाछू बौआय लगलहुं हमहूं
इजोत
बनि गेल मृग-मरीचिका आ
बौआयब
बनि गेल हमरा सभक बीमारी
कखनहुं
एकरा लग त कखनहुं ओकरा लग
बौआइए
रहल छी हम
अपना
लग थिर कहां रहि पबैत छी

निश्चये नीक दिन रहल होयत
जहिया
अपना लग थिर रहल होयब हम
आइ
बौआइत-बौआइत पहुंचि गेल छी
हम
विश्वग्राम धरि

हमर पूर्वज लोकनिक
वसुधैव
कुटुम्बकमक ग्राम त निश्चये नहि थिक
ग्लोबल
दुनियाक विश्वग्राम थिक ई
जतय
सभ किछु अछि बिकौआ
नेनपन
में हम बाबाक पराती सुनि
जागि
जाइत छलहुं अन्हरोखे
बाबा
लग छलन्हि अलग-अलग समयक लेल
अलग
-अलग राग
बाबा
क लैत छलाह समय सं संवाद
बाबा
समय के चिन्हबाक गुर जनैत छलाह
हम
नहि सीखि सकलहुं बाबा सं
समय
के चिन्हबाक गुर

नै बचा के राखि सकलहुं बाबाक राग
अइ
अन्हार समय में सभ किछु बिलटि गेल अछि
पथराय
गेल अछि गमर शब्द सभ
बौक
भ गेल अछि हमर इतिहास
स्मृति
के बिसरि ओझरा गेल छी
भौतिकताक
अन्हरजाली में हम सभ
हम
दिनोदिन बढ़ल जा रहल छी बुढ़ारी दिस

अहां सभ भ रहल छी
नेना
सं किशोर, किशोर सं युवा
बांचल
होयत हां सभ में अखनो
काल
सं संवाद करबाक साहस
बुढ़ायल
शताब्दीक अवसानक समय में
एकटा
लगभग असफल पीढ़ीक
प्रेम
आ सुभकामना अछि अहां संग
अपनहिं
सं चुनि लियअ अपन दिशा, अपन भविष्य
एहन
समय मे अहीं सभ गाबि सकैत छी
नव
स्वर लय ताल छंद मे
नवका
भोरक पराती...

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ओल्डहोममे वृद्ध - रमण कुमार सिंह

जखन
कि सेवानिवृति के बाद लोक रहि सकैछ
आराम
सं घर में आपन परिजनक संग
ओल्डहोम
में बैसल एकटा वृद्ध
सोचैत
अछि दुनियाक घृणा आ प्रेम

कोठरी एकटा बोधिवृक्ष अछि
जतय
ओ पवैत अछि जिनगीक निस्सारताक ज्ञान
थाकल
-ठेहियाएल सपना सभ
नचैत
अछि ओकर बुढायल आंखि में
एहि
शहरक घर में जीवैवाला लोक सभ
नहि
बुझि सकैछ ओकर अनिद्राक कारण
आइ
-काल्हि ओकर मोन कागतक नाव जकां
डुबैत
-उतराइत रहैत छैक
एकटा
क्षीणकाय धार मे
सुख
-दुख, पाओल-हेरायल, कुचक्र-यंत्रणा, नाच-गान
सभ
किछु मोन पड़ैत रहैत छैक ओकरा
जिनगीक
छोट-छोट खंड में
कतेक
रूप कतेक रंग में

ओ प्रायः भसियाबय लगैत अछि।

सोचैत अछि प्रेम -
जे
नहि क सकल जिनगी भरि

सोचैत अछि कर्तव्य
जे
पूरा करबाक पछातियो भेटलैक ओकरा उपेक्षा

सोचैत अछि संगी-साथी, परिवार, संबंध-बंध
जकरा
सभ से ओकरा भेटलैक अगबे दुख
ओकरा
होइत छैक ग्लानि
जिनगी
में कयल अपन कोनो गलती पर
कौखन
-काल ओ पूछैत अछि अपनहि सं -
आखिर
की थिक ई जिनगी?
सदिखन
आगिक धार के पार करब थिक
अथवा
नेनपनक गुड्डी लूटबाक थिक कौशल

कि थिक एकटा गीत -
जे
कहियो चढ़ि नहि सकल लय पर

कि एकटा नाटक थिक
जकर
पटाक्षेप होइत छैक दुखांत
की
थिक ई जिनगी?
किशोर
वयसक प्रेम आ कि प्रौढ़ वयसक कर्तव्यपरायणता
अथवा
दीनताक रेगिस्तान में तपैत बालु पर चलब

कि समृद्धिक रंगीन कुहेस में भुतिआएब थिक जिनगी?
सभटा
स्मृति गड्डमड्ड भ रहल अछि

ओ सदिखन करैत अछि
अपनहिं
संततिक तीर सं घायल भीष्म जकां
आइ
-काल्हि मृत्युक प्रतीक्षा
मुदा
मृत्युओ अछि अखन ओकरा सं दूर
बहुत
दूर... अपना परिजने जकां।

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फेरसँ हरियर - रमण कुमार सिंह


एक टा वयसक एकाकीपनसँ त्रास्त
हम आ अहाँ भेल छलहुँ संग
दुःख, उमेद आ उत्सवक ओहि राति

एक दोसरासँ अपन-अपन दुःख बाँटैत
पता नहि कहिया क’ नेने छलहुँ निर्णय
जे जहिया कनियों टा सुख क’ लेब अर्जित
दुनू गोटए मिलि क’ भोगब
साँचे कहै छी मीता
अहाँक आँखिमे चमकैत आकांक्षा देखि
मौसम अनेरो लाग’ लागल छल सोहाओन
हमर साँसमे व्यग्रता और
शब्दमे उत्साहक होमए लागल संचार
अहर्निश अहींक संगीत गूँजै छल
हमरा हृदयमे
अपन सपनाक एकान्तमे रचने छलहुँ एक टा
सुख-संसार
मुदा यातना आ प्रेमक एहि कथाक
अन्त भेल संशय आ नाउमेदीक कुहेसमे
सब किछु सूगा-मैनाक कथा जकाँ
व्यर्थ भेल मीता
कोनो कथाक एहन अन्त
कतेक दारुण होइ छै से बूझल अछि मीता?
तकर बाद किछु बाकी नहि रहै छै
निपट रिक्तता आ बेमतलब जीवन
अपने मोन समझाबै छै अपना मोनकें
दैत रहै छै भरोस
मित्रा-परिजन सब बुझबैत रहैत अछि
जीवनकें फेरसँ सुखमय बनेबाक व्योंत
नाउमेदीक एहि दौरमे कतहुसँ
उमेदक एक टा टुस्सी फुटैत अछि
आ जिनगी होमए लगैत अछि
फेरसँ हरियर।

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बुधवार, 30 दिसम्बर 2009

राष्ट्रीय संस्कृत सम्मेलनःसंस्कृत कें रोज़गारपरक भाषा बनएबा पर मंथन

संस्कृत भाषा केर प्रासंगिकता एही में छैक जे पाठ्यक्रम के साथे-साथ एकरा बातचीतक माध्यम बनाओल जाए। लोकमानस के कंठ में संस्कृत उतरतैक, तखनहिं ओ अपन प्रासंगिकता के बरकरार राखि सकत। एही संकल्पक संग श्रीकृष्ण मेमोरियल हाल में काल्हि राष्ट्रीय संस्कृत सम्मेलन समाप्त भेल। सम्मेलन के आखिरी दिन संस्कृत साहित्य में वैज्ञानिक चिंतन आ लौकिक संस्कृत साहित्य में बिहार के प्रतिभागिता पर व्यापक चर्चा भेलैक। सम्मेलन एहि निष्कर्ष पर समाप्त भेल जे अखुनका समय संस्कृत के देव भाषा कहिकए गौरव-गान करबाक नहिं छैक। बल्कि, शिक्षण-प्रशिक्षण आ प्रचार-प्रसार के अतिरिक्त,एकरा व्यवहार में अनबा लेल, रोजगारपरक बनएबा लेल आ वैज्ञानिक पद्धति अपनएबाक नितांत आवश्यकता छैक। संस्कृत भाषा आमजन केर बोली में केना इस्तेमाल हुअए,एहू पर विद्वानलोकनि अपन-अपन विचार व्यक्त कएलनि। विशेष रूप सं, डा. शिववंश पाण्डेय संस्कृत के उन्नयन में बिहारक पत्र-पत्रिका सभहक दृष्टिकोण के अलावा संस्कृत लेखकलोकनिक चर्चा कएलनि। एहि सं पूर्व, संस्कृत के उन्नयन के ल कए चारि सत्र में चर्चा भेलैक। पहिल सत्र में, डा. शिववंश पाण्डेय लौकिक संस्कृत साहित्य पर बजलाह। एहि सत्र में डा. उमेश शर्मा, डा. मिथिलेश कुमारी मिश्र, डा. एचएन ठाकुर व प्रो. राम प्रसन्न शर्मा समेत अन्य प्रतिनिधिलोकनि हिस्सा लेलनि। प्रो. रामविलास चौधरी अध्यक्षता कएलनि आ आचार्य रामविलास मेहता धन्यवाद ज्ञापन । विविध आलेख वाचन सत्र में, कुरुक्षेत्र विवि के प्राध्यापक प्रो. रणवीर सिंह, वासुदेव प्रसाद सिंह, डा. ब्रह्मचारी सुरेन्द्र आ बी.बी. प्रसाद समेत अन्य प्रतिनिधिलोकनि विचार व्यक्त कएलनि। संस्कृत साहित्य में वैज्ञानिक चिंतन सत्र में कोलकाता के जितेन्द्र धीर, हैदराबाद के डा. अहिल्या मिश्र, तमिलनाडु के चन्द्रभूषण, बनारस हिन्दू वि.वि., वाराणसी के प्रो. सच्चिदानंद मिश्र, आर.पी. चौधू आ प्रो. अरविन्द कुमार समेत अन्य प्रतिनिधिलोकनि प्रतिभागी छलाह।

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मंगलवार, 29 दिसम्बर 2009

आकाशवाणी पटना मे मैथिली के आओर जगह भेटयःताराकांत झा

विधान परिषद के सभापति ताराकांत झा आकाशवाणी पटना सं मैथिली के आओर सम्मान देबाक अपेक्षा कएलनि अछि। पटना समाचार एकांश के स्वर्ण जयंती समारोह के उद्घाटन सत्र में सोमकए ओ कहलनि जे आकाशवाणी पटना सदैव देशहित और समाजहित में काम कएने अछि। बजलाह जे विश्वसनीयता में आकाशवाणी सर्वोपरि छैक। स्मरण करओलनि जे आपातकालो में सरकार सं नजरि बचाकए आकाशवाणी पटना के समाचार एकांश लोकसभ के खबरि दैत रहल। एहि ठाम सं एखन समाचार बुलेटिन तं प्रसारित भ रहल छैक मुदा ई देखैत जे मैथिली भाषाभाषीलोकनिक संख्या साढ़े तीन करोड़क आसपास छैक,एहि बुलेटिनक समय बढाओल जएबाक चाही। पाठक लोकनिकें बतबैत चली जे 28 दिसंबर 1959 सं आकाशवाणी पटना प्रादेशिक समाचार एकांश के तहत समाचार बुलेटिन के प्रसारण शुरू कएने छल। एहि अवसर पर आकाशवाणी परिसर में आयोजित स्वर्ण जयंती समारोह में संयुक्त निदेशक (समाचार) अरुण कुमार वर्मा कहलनि जे ग्रामीण विकास में आकाशवाणी के बड्ड योगदान रहल छैक।

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बाजार-कालमे मन- गंगेश गुंजन


शब्दकें छुच्छे काने टा नहि
आँखि चाहिऐ
आँखिकें मन-मस्तिष्क।
मन-मस्तिष्ककें चाहिऐ जेना ज्ञान
तकरा लेल छठम इन्द्रिय।
अंगकें निरोग सम्वेदन-गुण,
गुणकें चाही अपन सहज प्राकृतिक सुगन्धि।
कोनो वस्तु बिलाइत-तिलाइत नहि छै
ब्रह्माण्डसँ बाहर तँ कथमपि नहि।
कखनो हेराइत, कखनो नुकाइत, आ कखनो बलात।
नुकाओल-चोराओल वा बेचि देल जाइ छै
हमर, अहाँक, अहाँक मित्राक वा सखी-बहिनपाक प्राण-वस्तु पर्यन्त बन्हकी।
मामूली लोटा किम्बा हाथ घड़ी वा पाँच-दस टाका
विभागीय परिचय फोटो-कार्ड, थोड़ेक टेलिफोन नम्बर वला फाटल मनीबैग
हेरा जाइत अछि, केहन विकल भेल दौड़ै छी पुलिस थाना--
एफ.आइ.आर. लिखेबा लेल?
एते रास शब्द, मन, गुण, गन्ध
एहन देखार बलजोरीसँ बेचल-बिकनल चल जा रहल’ए--
ई धूत्र्त बजार-काल,
तखनहुँ कोना छी एतेक निश्चिन्त, नहि जानि।
भने मैथिले होइ अहाँक मन किऐक नहि खदकै-बड़कै’ए
चूल्हि परक बासनक खिच्चड़ि, लोहियाक तीमन-तरकारी जकाँ?
आ कि गाएब अछि, आइ-काल्हि जेना बासन-लोहियासँ खदकब-बड़कबक शब्द
अहूँक हृदयसँ तहिना अनुभूति?
कोन आश्चर्य काल्हि खन स्नेह आ अनुरागो हेराएल वस्तु भ’ चलए। आ प्रेम?
प्रेमकें तँ ई डिजिटल युग, प्रतिदिन क’ लैत अछि अगवा,
आ पठा दैत अछि -- अमेरिका-इंगलैंड।
हाल हालक पछिला शताब्दीमे जेना कोंचि-काँचि क’ ल’ गेल जाइत रहए
भूखें असहाय यू.पी., बिहारक सए-हजार ज’न बनिहार
पानिक विशाल जहाजक जहाज -- माॅरिशस-फीजी-त्रिनिदाद?
-समुद्रे-समुद्र?

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देवभाषा नहिं,जनभाषा बनाऊ संस्कृत के

श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल में सोम सं शुरू भेल दू दिनक राष्ट्रीय संस्कृत सम्मेलन में, देशभर सं जुटल विद्वानलोकनि संस्कृत भाषा के उज्जवल भविष्यक कामना कएलनि अछि। एहि मंत्रक जयघोष सेहो भेल जे संस्कृत सभ भाषाकेर जननी अछि।
सम्मेलन के उद्घाटन ज्ञानपीठ पुरस्कार सं सम्मानित संस्कृत विद्वान पद्मश्री सत्यव्रत शास्त्री आ राष्ट्रीय संस्कृत संस्था, नई दिल्ली के पूर्व कुलपति व शिक्षाविद् डा. रामकरण शर्मा कएलनि। बिहार संस्कृत शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष सिद्धेश्वर प्रसाद सम्मेलन के अध्यक्ष छलथि। उद्घाटन भाषण में पद्मश्री सत्यव्रत शास्त्री कहलनि जे संस्कृत के भविष्य उज्जवल छैक। जाधरि भारतीय संस्कृति के विरासत रहतैक,ताधरि संस्कृत भाषा अक्षुण्ण रहत किएक तं संस्कृत आ संस्कृति हमार सभहक विरासत अछि।
विशिष्ट अतिथि जल संसाधन मंत्री विजेन्द्र प्रसाद यादव कहलनि जे हमसभ संस्कृति आ संस्कृत के बिसरि रहल छी जे चिंता के विषय छैक। डा. रामकरण शर्मा के कहब रहनि जे उत्तराखंड सरकार संस्कृत के अतिरिक्त राजभाषा के रूप में शामिल कएने अछि जे सराहनीय कदम अछि। एमएलसी केदारनाथ पाण्डेय कहलनि जे संस्कृत भाषा के देव भाषा बनाकए गौरवान्वित होइत रहब,त ई जनभाषा नहिं बनि पाओत। कामेश्वर सिंह संस्कृत विवि के कुलपति डा. नंदकिशोर शर्मा, कुलानुशासक उमेश शर्मा, डीन डा. अरविन्द पाण्डेय, ब्रह्मचारी सुरेन्द्र, एमएलए कृष्ण प्रसाद सिंह आ पत्रकार के. विक्रम राव सेहो सम्मेलन के संबोधित कएलनि। सम्मेलन में अलख नारायण झा के कविता-संग्रह
पुष्पायण के लोकार्पण कएल गेलैक।

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शनिवार, 26 दिसम्बर 2009

मिथिला चालीसा सचित्र

मिथिला चालीस
दोहा
अति आबस्यक जानी के शुनियो मिथिला के वास
बेद पुराण सब बिधि मिलल लिखल भोला लाल दास
पंडित मुर्ख अज्ञानी से मिथिला के ई राज
पाहुनं बन आएला प्रभु जिनकर आज

चोपाई
जय - जय मैथिल सब गुन से सागर
कर्म बिधान सब गुन छैन आगर





जनक नन्दनी गाम कहाबैन
दूर - दूर से कई जन आबैन




देखीं क सीता राम के स्वम्बर
भेला प्रसन्य लगलैन अतिसब सुन्दर




पुलकित झा पंचांग से सिखलो
बिघन - बाधा से अति शिग्रः निपट्लो






मंत्र उचार केलो सब दिन भोरे
ग्रह - गोचर से भेलोहूँ छुट्कोरे











विद्यापति जी के मान बढ़ेलन
बनी उगाना महादेव जी ऐलन










जय - जय भैरवी गीत सुनाबी
सब संकट अपन दूर पराबी








लक्ष्मीस्वर सिंह राजा बन ऐला
पुनह मिथिला क स्वर्ग बनेला








भूखे गरीब रहल सब चंगा
सब के लेल ऐला राज दरिभंगा









बन योगी शंकरा चार्य कहोलैथ
अनेको शिव मंठ निर्माण करोलैथ






धर्म चराचर रहल सत धीरा
जय - जय करैत आयल संत फकीरा









जन्म लेलैन लक्ष्मीनाथ सहरसा
जिनकर दया से भेल अति सुख वर्षा










साधू संत के भेष अपनोलैन
फेर गोस्वामी लक्ष्मीनाथ कहोलैन











मंडन मिश्र क शास्त्राथ कहानी
हिनकर घर सुगा बजल अमृत बाणी










पत्त्नी धर्म निभेलैन विदुषी
जिनकर महिमा गेलें तुलशी









आयाची मिसर क गरीबी कहानी
हिनकर महिमा सब केलैनी बखानी








साग खाई पेटक केलनी पालन
हिनकर घर जन्मल सरोस्वती के लालन








काली मुर्ख निज बात जब जानी
भेला प्रसन्य उचैट भवानी







ज्ञान प्राप्त काली दाश कहोलैथ









फेर मिथिला शिक्षा दानी बनलैथ







गन्नू झा के कृत्य जब जानी
हँसैत रहैत छैथ सब नर प्राणी











केहन छलैथ ई नर पुरूषा
कोना देलखिन दुर्गा जी के धोखा







खट्टर काका के ईहा सम्बानी
खाऊ चुरा - दही होऊ अंतर यामी









मिथिला के भोजन जे नाही करता
तिनों लोक में जगह नै पाउता








सोराठ सभा क महिमा न्यारी
गेलैन सब राजा और नर - नारी








जनलैथ सब के गोत्र - मूल बिधान
फेर करैत सब अपन कन्या दान








अमेरिका लंदन सब घर में सिप्टिंग








छैट परमेस्वरी के धयान धराबैथ









चोठी चन्द्र के हाथ उठाबैथ










जीतवाहन के कथा सुनाबैथ
फेर मिथिला पाबैन नाम बताबैथ








स्वर संगीत में उदित नारायण
मिथिला के ई बिदिती परायण









होयत जगत में हिनकर चर्चा
मनोरंजन के ई सुख सरिता











शिक्षा के जखन बात चलैया
मिथिला युनिभर्सिटी नाम कहाया










कम्पूटिरिंग या टैपिंग रिपोटर
बजैत लिखैत मिथिला शुद्ध अक्षर









है मैथिल मिथिला के कृप्पा निधान
रखियो सब कियो संस्कृति के मान









जे सब दिन पाठ करत तन- मन सं
भगवती रक्षा करतेन तन धन सं










हे मिथिला के पूर्वज स्वर्ग निवासी
लाज बचायब सब अही के आशी

दोहा

कमला कोषी पैर परे गंगा करैया जयकार
शत्रु से रखवाला करे सदा हिमालय पाहार
( माँ मैथिल की जय , मिथिला समाज की जय -----------)


समाप्प्त

लेखक --







मदन कुमार ठाकुर
पट्टीटोल , कोठिया , (भैरव स्थान)
झंझारपुर , मधुबनी , बिहार -८४७४०४
madanjagdamba@yahoo.com



जगदम्बा ठाकुर
पट्टीटोल , कोठिया , (भैरव स्थान)
झंझारपुर , मधुबनी , बिहार -८४७४०४

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नताशा 36 (चित्र-श्रृंखला पढ़बाक लेल नीचाँक चित्रकेँ क्लिक करू आ आनन्द उठाऊ।)

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शुक्रवार, 25 दिसम्बर 2009

भेंटक लावा

पछिला बाढ़ि। मोन पड़ितहि देह भुटुकि जाइत अछि। रोइयाँ-रोइयाँ ठाढ़ भऽ जाइत अछि। बाढ़िक विकराल दृश्य आँखिक आगू नचै लगैत अछि। घोड़ोसँ तेज गतिसँ पानि दौगैत। बाढ़ियो छोटकी नहि, जुअनकी नहि, बुढ़िया। बुढ़िया रुप बना ताण्डव नृत्य करैत। ककरा कहू बड़की धार आ ककरा कहू छोटकी, सभ अपन-अपन चिन्ह-पहचिन्ह मेटा समुद्र जेकाँ बनि गेल। जिम्हर देखू तिम्हर पाँक घोराएल पानि, निछोहे दछिन मुहेँ दौगल जाइत। कतेक गाम, घर पजेबाक नहि रहने, घर-विहीन भऽ गेल। इनार, पोखरि, बोरिंग, चापाकल पानिक तरमे डुबकुनिया कटै लगल। एहन भयंकर दृश्य देखि, लोककेँ डरे छने-छन पियास लगलोपर पीबैक पानि नहि भेटैत। जीवन-मरण आगूमे ठाढ़ भऽ झिक्कम-झिक्का करैत बुझाए। घर खसल, घरक कोठी खसल, कोठीक अन्न भसल। जेहने दुरगति घरक तेहने गाइयो-महीसि, गाछो-बिरीछ आ खेतो-पथारक।
घरक नूआ-बिस्तर, आनो-आन समानक मोटरी बान्हि माथपर लऽ, अपनो डाँड़मे दू भत्ता खरौआ डोरी बान्हि आ बेटोक डाँड़मे बान्हि, आगू-आगू मुसना आ पाछू-पाछू घरवाली जीबछी, बेटी दुखनीकेँ कोरामे लऽ कन्हा लगौने पोखरिक ऊँचका महार दिशि चलल। एखन धरि ओ मोहार बोन-झाड़ आ पर-पैखानाक जगह छल। जाहिमे साँप-कीड़ा बसेरा बनौने, बाढ़ि ओकरा घरारी बना देलक। जहिना इजोतमे छाँह लोकक संग नहि छोड़ैत, तहिना बरखा बाढ़िक संग छोड़ै लेल तैयार नहि। निच्चा पानिक तेज गति आ ऊपरसँ बरखाक नमहर बुन्न। मोहारपर मुसनाकेँ पहुँचैसँ पहिने बीस-पच्चीस गोटे अप्पन-अप्पन धिया-पूता, चीज-बस्तु आ माल-जालक संग पहुँचि चुकल छल। मोहारपर पहुँचि मुसना रहैक जगह हियाबै लगल। शौच करैक ढ़लान लग खाली जगह देखि मुसना मोटरी रखलक। मोटरी राखि बिसनाइरिक डाढ़ि तोड़ि खरड़ा बनौलक। ओहि खरड़ासँ खरड़ै लगल। एक बेर खरड़ि कऽ देखलक तँ मनमे पड़पन नञि भेलइ।
फेर दोहरा कऽ खरड़ि चिक्कन बनौलक। चिक्कन जगह देखि दुनू बेकतीक मनमे चैन भेलै। मोटरी खोलि मुसना एकटा बोरा निकालि चारिटा बत्तीक खूँटा गाड़ि, खरौआ जौरसँ चारु खूट बान्हि, बत्तीमे बान्हि कऽ घर बनौलक। दोसर बोरा निच्चामे ओछा धियो-पूतोकेँ बैसौलक आ मोटरियोक समान रखलक। चिन्तासँ दुनू परानीक मूह सुखाएल रहै। एक दिशि दुनू बच्चाकेँ मुसना देखए आ दोसर दिशि गनगनाइत बाढ़ि। माथपर दुनू हाथ दऽ जीबछी मने-मन कोसी-कमला महरानीकेँ गरिऐबो करै आ जान बचबै लेल निहोरो करै। दुनू बच्चो, कखनो कऽ बाढ़ि देखि हँसैत तँ कखनो जाड़े कनैत।
बाढ़िक वेगमे एकटा घर भसिआएल अबैत देखि मुसना बाँसक टोन आ कुड़हरि लऽ दौगल। पानिमे पैसि हियाबे लगल जे कोन सोझे घर आओत। ठेकना कऽ हाँइ-हाँइ पाँचटा खुट्टा ठोकलक। आस्ते-आस्ते घर आबि कऽ खुट्टामे अड़कल, खूटामे अड़ल घर देखि घरवालीकेँ सोर पाड़ि कहलक- ‘‘हाँसू नेने आउ। घरक समचा सभ उघि-उघि लऽ जाउ।’’
घरक ऊपरमे एकटा कुकूर सेहो भसैत आएल। ओ लोकक सुन-गुन पाबि कूदि कऽ महारपर चलि गेल। ठाठक बत्तीमे जहाँ मुसना हाँसू लगौलक आकि एकटा साँप लप दऽ हाथेमे हबक मारि देलकै। घरक भार थालमे गरल खुट्टा नहि सम्हारि सकल। पाँचो खुट्टा पानिमे गिर पड़लै। घर भसि गेलै। खूब जोरसँ मुसना कनबो करैत आ हल्लो करैत जे हौ लोक सभ, दौड़ै जाइ जा हौ, हमरा साँप काटि लेलक। मुसनाक कानब सुनि घरवाली सेहो बपहारि कटै लागलि। बपहारि कटैत घरवालीकेँ मुसना कहलक- ‘‘हे गए दुखनी माय, नाग डसि लेलकौ। छाती लग बिख आबि गेल। कनिये बाकी अछि कंठ छुबै लेल। धिया-पुताकेँ सोर पाड़ि कनी मूह देखा दे। आब नै बचबौ।’’
जीबछी हल्लो करए आ घरबलाक बाँहि पकड़ि उपरो करै लागलि। महारक किनछरिमे पहुँचि जहाँ उपर हुअए लगल आकि दुनू गोटे पिछड़ि कऽ तरे-उपरे निच्चामे खसल। दुनू परानी भीजल रहबे करए आरो नहा गेल। मुदा तइयो ओरिया-ओरिया कऽ उपर भेल। महारपर आबि जीबछी चूनक कोहीसँ चून निकालि दाढ़मे लगौलक। साँपक बिख झाड़निहार गाममे एकोटा नहि। मुदा रौदिया एहि बेर दसमीमे चनौरा गहबरमे चाटी सिखने छल। सभ कियो रौदियाक खोज करए लगल। ओ रौदिया माछ मारै लेल सहत लऽ कऽ बाध दिशि गेल छल। एक गोरे ओकरा बजा अनलक। अबिते रौदिया सहत कातमे रखि हाथ-पाएर धोए मुसना लग आबि बाजल- ‘‘हौ भाइ, हमर चाटी सिद्ध नहि भेल अछि, किऐक तँ हम एखन धरि गंगा स्नान नञि केलहुँहेँ। मुदा तइयो बिसहाराकेँ सुमरि देखै छिऐ।’’
मुसनाकेँ आगूमे बैसा रौदिया हाथेसँ जगहकेँ झाड़ि चाटी रखलक। सभ रौदिया दिशि देखैत। मुदा चाटी चलबे ने कएल। बाढ़िक दुआरे आन गामसँ झाड़निहार आ चट्टिवाहकेँ बजाएब महाग मोसकिल रहै। सभ निराश भऽ गेल। छाती पीटि-पीटि जीबछी कनबो करै आ देवी-देवताकेँ कबुलो करै। मुदा ढ़ोढ़ साँप कटने रहए तेँ बिख लगबे ने केलै।
गोसाइ लुक-झुक करै लगल। गामक ढ़ेरबा, बूढ़ि आ जुआन स्त्रीगण, चंगेरीयो आ चंगेरोमे, काँच माटिक दिआरी लऽ, पोखरिक घाट लग जमा भऽ कमला महरानीकेँ साँझ दऽ, गीत गबै लागल। बच्चा सभ जय-जयकार करैत। तहि बीच लुखिया कमला महरानीकेँ पाठी कबुला केलक, सुबधी एक सेर मधुर। दोसरि साँझ धरि गीत-गाबि सभ घुरि कऽ आंगन आएल।
एक्क रफ्तारमे बाढ़ि पाँच दिन रहल। मुदा पौह-फटितहि छठम दिन पानि कमै लगल। बाढ़िक पानि, जहिना हु-हुआ कऽ अबैए, तहिना जाइए। बेर झुकैत-झुकैत घर-अंगनाक पानि निकलि गेलै। मुदा थाल-खिचार रहबे करै। सातम दिनसँ लोक घर ठाढ़ करै लगल। बाढ़ि सटकितहि लोक परदेश दिशि पड़ाए लगल। गाममे ने एक्कोटा धानक गब बँचल आ ने खेत रोपै लेल बिरार। नारक टाल सभ कतए भसि कऽ गेल तेकर ठेकान नहि। गहुमक भुस्सी भुसकाँरेमे सड़ि-सड़ि गोबर बनि गेल। मनुक्खसँ बेसी दिक्कत माल-जालकेँ भऽ गेलै। आमक पात, बाँसक पात आन-आन गाछ सबहक पात काटि-काटि माल-जालकेँ खुआबै लगल। आन-आन गामसँ नार, भुस्सी कीनि-कीनि अनै लगल। मुदा माल-जाल तइयो अन-धुन मुइलै। जे बँचल रहै, ओहो सुखा कऽ संठी जेकाँ भऽ गेलै। तइ परसँ रंग-बिरंगक बीमारी सभ सेहो आबि गेलै। ककरो खुरहा तँ ककरो पेटझड़्ड़ी। किछु गोटे अपन सभ मालकेँ कुटमैती सभमे दऽ आएल।
चारिक अमल। पिसुआ भांग पीबि श्रीकान्त मैदान दिशिसँ आबि दलानपर बैसि चाह पीबैत रहथि। सोगसँ अधमरु जेकाँ भेल। मने-मन सोचथि जे महाजनी तँ चलिये गेल आब अपनो साल भरि की खाएब ? अगते धान सबाइ लगा देलहुँ। बड़ पैघ गलती भेल जे एक्को बखारी पछुआ कऽ नहि रखलौं। मुदा एक बखारी रखनहि की होइत। के ककरा मदति करत। ठीके कहब छै जे सभकेँ अपना भरोसे जीबाक चाही। भने दुआर परक बखारीक धान सठि गेल। कियो दरवज्जापर आओत तँ देखा देबै। मुदा अपनो तँ जरुरत अछि, से कतए सँ आनब। लऽ दऽ कऽ घरक कोठीमे चाउर अछि, ओतबे अछि। एक्को धुर धान नञि बँचल अछि जे अगहनोक आशा होइत। आब अबाद कएल नै हएत। आगू रब्बीयेक आशा। जे सभ दिन कीनि-बेसाहि कऽ खाइत अछि ओकरा तँ कोनो नै, मुदा हमरा लोक की कहत ? चाह पीबिते-पीबिते श्रीकान्तकेँ चैन्ह अबै लगलनि। मन पड़लनि जे बाबा कहने रहथि जे दरवज्जापर जँ क्यो दू-सेर वा दू-टका मंगै लेल आबए तँ ओकरा ओहिना नहि घुमबिहक। ओहिसँ लछमी पड़ाइ छथि। जीबछीकेँ अबैत देखि श्रीकान्त सोर पाड़लखिन। सालो भरि जीबछी हुनके कुटाउन कऽ गुजर करैत छलि। चाउर-चूड़ा कुटैमे जीबछी गाममे सभसँ बेसी लुरिगर। श्रीकान्तक लग आबि जीबछी हँसैत कहलकनि- ‘‘एत्ते किअए सोगाइल छथि कक्का, हिनका एत्ते छनि तखन एते दुख होइ छनि, हमरा तँ किछु ने अछि तेँ कि मरि जाएब।’’
जीबछीक बात सुनि भखरल स्वरमे श्रीकान्त कहलखिन- ‘‘जहिना सभ किछु बाढ़िमे दहा गेल तहिना जँ अपनो सभ तुर भसि जइतहुँ, से नीक होइत। जाबे परान छुटैत, ततबे काल ने दुख होइत। आगू तँ दुख नहि काटै पड़ैत।’’ मुस्की दैत जीबछी बाजलि- ‘‘एक्केटा बाढ़िमे एत्ते चिन्ता करै छथि काका, कनी नीक की कनी अधलाह, दिन तँ बितबे करतनि।’’
चीलम पीबैत मुसना ओसारपर बैसल। कसि कऽ दम खींचि मने-मन सोचए लगल, जे दू मास, अगहन-पूस, मुसहनि खुनि-खुनि गुजर करै छलहुँ। दस सेर जमो भऽ जाइ छल आ गुजरो कऽ लैत छलहुँ। ओहो चलि गेल। ने एक्को गब कतौ धान बँचल आ ने गाममे एकोटा मूस। दोसर दम खींचि धूँआकेँ घोटितहि मनमे अएलै जे मूसक तीमन आ धुसरी चाउरक भात जँ जाड़क मासमे भेटए तँ एहिसँ नीक दोसर की हएत। एहेन खेनाइक तँ रजो-महरजोकेँ सिहिन्ते लागल रहतनि। ओ-हो-हो, भगवान गरीबेक सुख छीनि लेलनि।
मुसनाक पहिलुका नाम मकसूदन छल। मुदा मूस आ मुसहनिसँ बेसी सिनेह रहने लोक ओकरा मुसना कहै लगल। जीबछी आंगनक चुल्हिपर रोटी पकबैत। इनारपर हाथ-पैर धोय मुसना लोटामे पानि नेने आंगन आबि जलखै करै लेल बैसल। टिनही छिपलीमे रोटी-नून जीबछी घरबलाक आगूमे देलक। अंगनामे दुखबाकेँ नहि देखि मुसना जोरसँ शोर पाड़लक। पिताक अवाज सुनितहि दुखबा दौगल आबि धुराइले हाथे-पएरे खाइ लेल बैसि रहल। दुनू बापुत खाए लगल। चुल्हिये लगसँ मुस्की दैत जीबछी बाजलि- ‘‘ककरो किछु होउ, जकरा लूरि रहतै ओ जीबे करत। ऐठाम तँ देखै छिऐ जे एक्के दहारमे किदनि बहार कऽ खिस्सा अछि। सभ हाकरोस करै अए।’’
मूहक रोटी मुसना हाँइ-हाँइ चिबा, जीबछी दिशि देखि कऽ बाजल- ‘‘तते ने माछ भसि-भसि आएल अछि जे खत्ता-खुत्तीमे सह-सह करैए। कने पानि तँ कम होउ। जखने पानि कमि कऽ उपछै जोकर भेलि आकि मछबारि शुरु कऽ देब। खेबो करब आ बेचबो करब। सदिखन दू पाइ हाथेमे रहत।’’
अपन नहिराक बात मन पड़ितहि जीबछी कहै लागलि- ‘‘हमरा नैहरमे पूबसँ कोशी आ पछिमसँ गंडकक बाढ़ि सभ साल अबैत छल। एहि बीचक जे धार अछि ओकर पानि तँ घुमैत-फिरैत रहिते छल। सगरे गाम साउनेसँ जलोदीप भऽ जाइ छल। टापू जेकाँ, एकटा परती टा सुखल रहैत छल। ओहिपर सौँसे गामक लोक बरसाती घर बना कऽ रहैत छल। कातिक अबैत-अबैत खेत सभ जगै लगैत छलै। तकर बाद लोक खेती करैत छल। गहींरका खेत आ खाधि-खुधिमे भेंटक गाछ, सोहरी लागल जनमै छल। अगहन बीतैत-बीतैत ओ तोड़ैबला हुअए लगैत छल। हम सभ ओहि भेंटकेँ तोड़ि-तोड़ि आनी, ओकरे दाना निकालि सुखा कऽ लावा भूजी। तते लावा हुअए जे अपनो खाइ आ बेचबो करी। काल्हि गिरहत कक्काक ओहिठाम जाएब आ कहबनि जे चौरीमे मनसम्फे भेंटि जनमल अछि, ओ हमरा दऽ दिअ।’’
एखन धरि दुनू परानी मुसना, चाउर आ चूड़ाक कुट्टी करैत छल, सेहो ढ़ेकीमे। किएक तँ गाममे एक्कोटा छोटको मशीन धनकुटियाक नहि छल। अधिकतर परिवार अपन-अपन ढेकी-उखड़ि रखैत छल। मुसना सेहो कुट्टीक दुआरे अपन ढे़की-उखड़ि रखने अछि। नीक चाउर बनबैमे जीबछीक लोहा सभ मानैए। एहि बेरि तँ धनकुट्टी चलत नहि। मुदा बाढ़िमे आन गामसँ तते भेंट दहा कऽ चौरीमे आएल जे सापरपिट्टा गाछ सौँसे चौरीमे जनमि गेल अछि। तेँ जीबछी मने-मन चपचपाइत। दोसरकेँ भेंटिक भाँज बुझले नहि छलै।
सभ दिन नहाइ बेरिमे जीबछी चौरी जा भेंट देखि-देखि अबैत छलि। चौरगर-चकरगर पात सौँसे चौरीकेँ छेकने। गोटि-पङरा फूल हुअए लगलै। फूल देखि जीबछीक मनमे होइ जे एत्तेटा फुलवारी इन्द्रो भगवानकेँ हेतनि की नहि। पाँचे दिनमे सौँसे चौरी फूल फुला गेल। अगता फूलक पत्ती झड़ि-झड़ि खसै लागल, फूलमे नुकाएल फड़ निकलए लगल। गोल-गोल, हरियर-हरियर। फड़ देखि जीबछी आमदनी बुझि, चौरी कातमे बैसि, नव-नव योजना मने-मन बनबै लागलि। अइ बेर एकटा खूब निम्मन महीस कीनब। जँ महीस जोकर आमदनी नै हएत तँ दूटा गाये कीनि लेब। अप्पन तँ सम्पति भऽ जाएत। ओकरे खूब चराएब-बझाएब। ओहीसँ तँ चारु परानीक गुजर चलत। जिनगी भरि तँ कुटौने करैत रहलहुँ मुदा अहि बेरि कमलो महरानी आ कोसियो महरानी दुख हेरि लेलथि। मने-मन जीबछी दुनूकेँ गोड़ लगलकनि। अपन धन हएत, तइ परसँ मेहनत करब तँ कोन दरिदराहा दुख आबि कऽ हम्मर सुख छीनि लेत ? मजगूत घर बान्हब, बेटा-बेटीक बिआह करब। नाति-पोता हएत, बाबा-दादी बनि कऽ जते दिन जीबी ओ कि देवलोकसँ कम भेलै। अहीले ने सभ हेरान अछि। कएलासँ सभ किछु होइ छै, बिनु केने पतरो फुसि।
घनगर गाछ देखि जीबछीक मनमे अएलै जे बीच-बीचमे सँ जँ गाछ उखारि देबै तँ सौरखियो करहर भऽ जाएत आ छेहर गाछ रहने फड़ो नमहर हएत। जइसँ दानो नीक हएत। एखनेसँ आमदनी शुरु भऽ जाएत। उत्साहित भऽ जीबछी कमठौन शुरु केलक। मुदा करहर उखारैमे तते डाँड़ दुखाइ जे हूबा कमि गेलै। कमठौन छोड़ि देलक। देखते-देखते फड़मे लाली पकड़ए लगलै।
अगता फूल, अगता फड़ भेल। नमहर-नमहर, पोछल-पोछल, गोल-गोल, पुष्ट। रंगल फड़ देखि जीबछी बुझि गेल जे आब ई तोड़ैबला भऽ गेल। दोसर दिनसँ फड़ तोड़ैक विचार जीबछी मने-मन कऽ लेलक।
दोसर दिन, भोरे जीबछी रोटी पका, दुनू बच्चो आ अपनो दुनू परानी खा, प्लास्टिकक बोरा लऽ फड़ तोड़ैले बिदा हुअए लगल आकि धक दऽ मन पड़लै जे बोरामे तँ फड़ राखब, मुदा पानिमे तोड़ि-तोड़ि कतए राखब। फड़ तोड़ैले तँ झोराक जरुरत हएत। झोरा तँ अपना अछि नहि ! आब की करब ? लगले जीबछी पुरना साड़ीकेँ फाड़ि दूटा झोरा सीलक। झोरा सीबि, बोरो आ झोरोकेँ चौपेत एकटा झोरामे राखि, दुनू बच्चो आ दुनू गोटे अपनो चौर दिशि बिदा भेल।
फड़क रुप-रंगसँ जीबछीक मन गद-गद। मुदा अनभुआर काज बुझि मुसना तर्क-वितर्क करैत। चौरक कात पहुँचि, उपरका खेत, जे सुखाएल छल, मे दुनू बच्चो, बोरो आ रोटी-पानिकेँ रखि, दुनू परानी भेंट तोडै़ले पानिमे पैसल। पानिमे पैसितहि जीबछीक नजरि भेंटक फड़क उपरे-ऊपर नाचय लगल। जहिना ककरो रुपैआक थैली भेटलासँ खुशी होइ छै, तहिना जीबछीक मनमे भेलै। एक टकसँ देखि जीबछी दुनू हाथे हाँइ-हाँइ फड़ तोड़ए लागलि। खिच्चा फड़ देखि जीबछी पतिकेँ कहलक- ‘‘जुएलके फड़ टा तोड़ब। अजोहा एखन छोड़ि दियौ। पछाति तोड़ब।’’
झोरा भरिते जीबछी ऊपर आबि-आबि बोरामे रखैत। मुसनो सैह करैत। दुनू बोरा भरि गेल। ऊपर आबि जीबछी पतिकेँ कहलक- ‘‘कनी काल सुस्ता लिअ। पानिमे निहुड़ल-निहुड़ल डाँड़ो दुखा गेल हैत। अहाँ एत्तै रहू, हम एक बेर अंगनासँ रखने अबै छी।’’
कहि जीबछी एकटा बोरा उठा आंगन बिदा भेलि। एक तँ पानिक भीजल, दोसर ओजनगर बस्तु। मुदा जीबछी भारी बुझबे ने करए। किएक तँ सम्पत्तिक मोटरी रहै किने। आंगन आबि ओसारपर बोरा रखि पुनः जीबछी चौर दिशि रमकल विदा भेलि। चौर पहुँचि पतिकेँ कहलक- ‘‘हम बोरा लै छी, अहाँ दुनू बच्चो आ डोलोकेँ सम्हारने चलू।’’
आगू-आगू मुसना बेटीकेँ कोरामे, दोसर हाथमे डोल आ बेटाकेँ लऽ चलल। पाछू-पाछू जीबछी माथपर बोरा लेने। थोड़े दूर बढ़लापर जीबछी पतिकेँ कहलक- ‘‘भगवान दुःख हेरि लेलनि।’’
मुदा स्त्रीक बात सुनि मुसनाकेँ ओ खुशी नञि अएलै जे जीबछीकेँ रहै। आंगन आबि जीबछी पहिलुके बोरा लग दोसरो बोरा रखि भानसक ओरियान करै लागलि।
चारिम दिन, पहिलुके खेप भेंट तोड़ै काल मुसनाकेँ एकटा ठेंगी बाँहिमे पकड़ि लेलकै। जे ओ देखबे ने केलक। मुदा जखन ठेंगी भरि पोख खून पीबि भरिया गेलै, तखन मुसनाक नजरि पड़लै। ठेंगीकेँ देखितहि ओकर परान उड़ि गेलै। थर-थर कपै लगल। खूब जोरसँ घरवालीकेँ कहलक- ‘‘बाप रे बाप! देहक सभटा खून ठेंगी पीबि लेलक। कोन पाप लागल जे अइ मौगियाक भाँजमे पड़लौं। एक तँ बाढ़िक मारल छी जे भरि पोख अन्न नै होइए। सुखा कऽ संठी भेल छी। तइपर जेहो खून देहमे छलए सेहो ठेंगिये पीबि गेल। झब दे आउ, ने तँ हम पानियेमे खसि पड़ब।’’
मुसनाक बातकेँ अनठबैत जीबछी हाँइ-हाँइ फड़ो तोड़ैत आ मने-मन बजबो करैत- ‘‘जना नाग डसि नेने होइ, तहिना अड़राइ अए। भभटपन ने देखू। एहने-एहने पुरुख बुते परिवार चलत ?’’
दुन झोरा भरिते जीबछी मुसना लग आबि हाथेसँ ठेंगी पकड़ि एकटा चिचोरमे बान्हि देलक। मुदा जइ ठाम ठेंगी पकड़ने रहै तइ ठामसँ छड़-छड़ खून बहैत। अपन दहिना औंठासँ जीबछी दाबि देलक। कनिये कालक बाद खून बन्न भऽ गेलै। जीबछी फेर फड़ तोड़ैले पानिमे पैसल। कने काल तोड़ि जीबछी कहलक- ‘‘आउ ने, आब किछु ने हैत।’’
जीबछीक बात सुनि मुसना आँखि गुड़रि कऽ बाजल- ‘‘ई मौगिया जान मारैपर लगल अछि। जे कहुना मरि जाए। हमरा की, दुनियामे सैँएक कमी छै ? दोसर कऽ लेब। मुदा, (दुनू बच्चा दिशि देखैत), अइ टेल्हुक सभक की हेतै ? बिलटि कऽ मरत की नहि?’’ पति दिशि देखि पत्नी मुस्की दैत बाजलि- ‘‘नञि तोड़ब तँ नञि तोरु। ओतै बैसि बच्चा सभकेँ खेलाउ।’’
दुनू बोरा भरि जीबछी आंगन अनलक। सभकेँ सम्हारने मुसना सेहो आएल। आंगन आबि जीबछी चुल्हि पजारि, भानस कऽ दुनू बच्चो आ अपनो दुनू परानी खेलक। खा कऽ जीबछी हाँसू लऽ भेंटक फड़ चीरि-चीरि दाना निकालै लागलि। लाल-लाल, गोल-गोल। मुसना सेहो दाना निकालै लगल। दुनू बच्चा दुनू भाग बैसि दूटा फड़केँ गुड़कबैत। दानाकेँ एकटा चटकुन्नीपर थोपि-थोपि रखैत जाए। मुदा कनिये काल बाद मुसनाकेँ चीलम पीबैक मन भेलै। ओ उठि कऽ चुल्हि लग जा आगियो तपै लगल आ चीलमो पीबै लगल। दानाक ढ़ेरी देखि जीबछी गर अँटबै लागलि जे एत्ते कत्त कऽ राखब। गुनधुन करैत। एकाएक नैहरक बात मन पड़लै। मन पड़िते मूहसँ हँसी फुटलै। जीबछीकेँ हँसैत देखि मुसना अह्लादित भऽ कहलक- ‘‘ऐँ गै, कोन सोनाक तमघैल तोरा भेटि गेलौहेँ, जे एना खिखिआइ छेँ।’’
मुदा पाशा बदलैत जीबछी बाजलि- ‘‘एखैन तँ अन्हार भऽ गेलै, काल्हि भोरे एकटा खाधि टाटक कात अंगनेमे खुनि देबै।’’
भोरे मुसना ढ़क जेकाँ गोल-मोल खाधि खुनलक। जीबछी दू-लेब कऽ कऽ लेबि, सुखौलक। ओहिमे भेंटक दाना सुखा-सुखा रखैत गेल। ऊपरसँ टाटक झँपना बना मुसना दऽ देलक।
मास दिनक मेहनतसँ जीबछीक आंगन भेंटक दानासँ भरि गेल। अनभुआर चीज, तेँ चोरी-चपाटीक डरे नहि। भरल आंगन देखि जीबछीक मनमे समुद्रक लहरि जेकाँ खुशी हिलकोर मारए लगलै। कनडेरिये आखिये मुसना दिशि देखि जीबछी मुस्किया देलक। घरवालीक मुस्की देखि मुसना खिसिया कऽ बाजल- ‘हमरा देखि-देखि तोरा हँसी लगै छौ। हँसि ले, जते हँसमे से हँसि ले। जाबे जीबै छियौ ताबे। भगवान केलखुन आ मरलियौ तखैन तोहर हँसी नगरक लोक देखतौ।’’
मुदा जीबछीक लेल धैन-सन। किएक तँ खुशीसँ मन एते भरल रहै जे घरबलाक बात ओहिमे पैसिबे ने केलै। मने-मन जीबछी लावा भुजैक विचार करै लागलि। लावा भुजै लेल एकटा नम्हर खापड़ि चाही। बालु रखै लेल एकटा कोहा चाही। लारनि तँ अपनो खरहीसँ बना लेब। बाउलो नदी कातसँ लऽ आनब। जखन कुम्हनि ओहिठाम जायब तँ कचकुह ताकि कऽ एकटा नमहर तौला लऽ लेब। ओकरे खापड़ि बना लेब। बालु धिपबैले मझोलको कोहासँ काज चलि जाएत। एकटा सरबाक काज सेहो पड़त। किएक तँ बालु जे देबै से तँ हाथसँ नञि हएत। ओइमे एकटा बत्तीक डाँट लगबए पड़त। लगा लेब। मुसनाकेँ कहलक- ‘‘लाबा भुजै लेल जारनक ओरियान करै पड़त।’’
लावाक नाम सुनि मुसनाक मनमे खुशी भेलै। मुस्कुराइत उत्तर देलक- ‘‘एखन टेंगारी सुढ़िया लै छी। बेरु पहर गिरहत कक्काक गाछीसँ बाँझियो आ सुखल ठौहरियो सभ आनि देब।’’
भरि दिनमे दुनू परानी जीबछी सभ कथूक ओरियान कऽ लेलक।
लावा भुजब जीबछी शुरु केलक। दू चुल्हिया चुल्हि। एक मूहमे खापड़ि, दोसरमे कोहा। खापड़िमे भाटिक दाना भुजैत आ कोहामे बालु धिपैत। पहिल घानी भुजि जीबछी एक चुटकी चुल्हिमे दऽ दोसर घानी भुजब शुरु केलक। दोसर घानीक लावा देखि जीबछीक मन तर-उपर करै लागल। पहिलुका घानीक लावा चंगेरीमे लऽ दुनू बच्चो आ घरोबलाकेँ आगूमे देलक। आगूमे लावा देखि मुसना मने-मन सोचै लगल जे ई मौगिया बड़ लुरिगर अछि। एहन स्त्री भगवान सभकेँ देथुन। कहू जे एखैन तक हम जे बुझितो ने छलौं से आइ खाइ छी। धिया-पुताकेँ पोसब कोन बड़का भारी बात छियै, समाजो लेल लोक बहुत किछु कऽ सकैत अछि।
लावाक गमक पुरबा हवामे मिलि गामकेँ सुगंधित कऽ देलक। सुगंध पाबि टोलोक आ गामोक स्त्रीगण सभ लावा कीनैक लेल एक्के-दुइये जीबछीक आंगन अबै लागल। मुदा एक्केटा जबाब जीबछी सभकेँ दैत- ‘पहिने गिरहत कक्काकेँ खुएबनि, तखन ककरो देब। भरि दुपहर जीबछी लाबा भुजलक। दू छिट्टा। दुनू छिट्टा लावा घरमे रखि ओहिमे सँ एक मुजेला लऽ साड़ीसँ झाँपि जीबछी मुसनाकेँ कहलक- ‘‘हम गिरहत कक्का ओहिठाम जाइ छी। अहाँ अंगनेमे रहब।’’ कहि जीबछी माथपर मुजेला लेने श्रीकान्त ऐठाम बिदा भेल।
जीबछीक माथपर मुजेला श्रीकान्त गौरसँ देखि मुस्कुराइत कहलखिन- ‘‘बड़ खुशी देखै छी लछमी महरानी। मुजेलामे की चोराकऽ अनलहुँहेँ। कने हमरो देखए दिअ?’’
अनसुनी करैत जीबछी मुस्की दैत आंगन जा गिरहतनीक आगूमे मुजेला रखि कहलकनि- ‘‘काकी, थोड़े कऽ लाइ बना लिहथि। अखन थोड़े नोन-मरीच-तेल मिला कऽ देथु। जे कक्काकेँ दऽ अबै छियनि।’’
छिपलीमे लावा नेने जीबछी दरवज्जापर जा श्रीकान्तक आगूमे देलकनि। ओ छिपलीमे उज्जर-उज्जर रमदानाक लावा जेकाँ लावाकेँ निहारि-निहारि देखए लगलाह। जीबछी कहलकनि- ‘‘काका, की निङहारै छथिन, पहिने एक मुट्ठी मूहमे दऽ कऽ देखथुन ने। भेंटक लावा छिऐ।’’
एक मुट्ठी उठा श्रीकान्त मूहमे देलखिन। लावाक कोमलता आ सुआद बुझि श्रीकान्त पत्नीकेँ सोर पाड़ि कहलथिन- ‘‘एत्ते सुन्नर वस्तुकेँ एखन धरि जनितहुँ नहि छलहुँ। धन्य अछि जीबछीक ज्ञान आ लूरि जे एहेन सुन्नर हराएल बस्तुकेँ ऊपर केलक। साक्षात् देवी छी जीबछी। जाउ, सन्दुकमे सँ एक जोड़ साड़ी आ आंगी निकालने आउ। जीबछीकेँ अपना ऐठामसँ पहिरा कऽ बिदा करब। गरीब-दुखियाक देवी छी जीबछी।’’
सभ दिन जीबछी लावा भुजैत छलि आ अंगनेसँ लोक सभ कीनि-कीनि लऽ जाइत। पनरह दिनक जमा कएल रुपैयो आ फुटकुरियो जीबछी मुसनाकेँ गनै लेल आगूमे देलक। पाइ देखि मुसनाक मन उड़ि गेल। मूहसँ ठहाका निकलल। एक टकसँ मुसना जीबछी दिशि देखि, कैँचा गनै लगल।

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पछताबा


इंजीनियरिंगक रिजल्ट निकलितहि रघुनाथ संगी-साथीक संग नोकरी करए अमेरिका जेबाक तैयारी कऽ नेने छल। सासुरसँ गाम आबि पिताकेँ कहलनि- ‘‘बाबू, आइये रौतुका गाड़ी पकड़ि चलि जाएब। परसू दस बजे, सुभाषचन्द्र एयरपोर्टसँ जहाज फ्लाइ करत।’’
जहिना पाकल आम तोड़ै लेल कियो गाछपर चढ़ैत अछि आ आम तोड़ैसँ पहिनहि खसि पड़ैत अछि, तहिना शिवनाथोकेँ भेलनि। अचंभित होइत कहलखिन- ‘‘ किए ? तोरा जोकर काज अपना ऐठाम नहि छै ? ’’
पिताक बात सुनि कनेकाल गुम्म भऽ रघुनाथ बाजल- ‘‘ओहिठाम अधिक दरमाहा दैत अछि। संगहि अपना ऐठामक रुपैआसँ ओतुका रुपैइयो महग छैक।’’
अमेरिकाक संबंधमे शिवनाथ किछु नहि जनैत खाली एतबे जनैत जे ओहो एकटा देश छी। किछु काल गुम्म रहि कहलखिन- ‘‘ तइसँ की ? हम ओहि वंशक छी जे देशक गुलामी मेटबै लेल गोली खाए स्वतंत्र देशक उपहार-भार देलनि। तोरा सन-सन पढ़ल-लिखल जँ देशसँ चलि जाएत तँ तोहर सनक काज के करत, कोना हएत ? ’’
पिताक बातकेँ अनसून करैत गोर लागि, बैग लऽ ओ चुपचाप विदा भऽ गेल। शिवनाथ दुनू परानीक नजरि ताधरि रघुनाथक पीठपर रहलनि जाधरि ओ गाछीक अढ़ नहि भऽ गेल। अढ़ होइतहि दुनूक मन एहि रुपे चूर-चूर भऽ गेलनि जहिना अएनापर पाथरक लोढ़ी खसलासँ होइत अछि। अखन धरि दुनूक मनमे पैघ-पैघ अरमान पैघ-पैघ सपना छलनि जे एकाएक फुटल बैलूनक हवा जेकाँ वायुमंडलमे मिलि गेलनि। बाढ़िक पानिमे डूबल खेतमे जहिना पानि सुखितहि नव-नव पौधाक अंकुर उगै लगैत अछि तहिना शिवनाथोक मनमे नव-नव विचार उगै लगलनि। अखन दुनियाँ भने गाम-घरक रुपमे केक नहि बुझि पडै़त हुअए मुदा बापो बेटाक दूरी हजारो कोस हटि रहल अछि। की हम सभ फेर गुलामीक रस्ता पकड़ि रहल छी आकि आजादीक रस्ता धऽ चलि रहल छी। एक दिसि मातृभूमिक लेल पिताक तियाग आ दोसर दिसि बेटाक भटकल रस्ता अछि। भलही बेटाक आशा हुअए मुदा एहनो लोक तँ छथि जनिका बेटा नहि छन्हि। मन पड़लनि पिताक ओ बात जे ओ मृत्युसँ चौबीस घंटा पहिने मृत्यु-सय्यापर कहने रहथिन - ‘‘बाउ, हमर खून वीरक खून छी जे भारतमाताकेँ चढ़ौलिएनि। भने अखन लड़ाइक दौड़ अछि मुदा ओ खून स्वतंत्रता लइएकेँ छोड़त। तोँ सभ स्वतंत्र देशक स्वतंत्र मनुष्य हेबह। तेँ अपन देशकेँ परिवार बुझि सभकेँ भाए-बहीनि जेकाँ इमानदारीसँ सेवा करैत रहिहऽ। जाहिसँ हमर आत्मा अनबरत प्रसन्न रहत। सेवाक मतलब खाली एतबे नहि होइत जे देशक सीमाक रक्षा करैत अछि बल्कि ईहो होइत जे माथपर ईंटा उघि सड़क बनबैत आ हर-कोदारिसँ अन्न उपजबैत अछि।’’
पिताक बात मन पड़ितहि शिवनाथक हृदय तरल पानि सँ ठोस पाथर बनै लगलनि। नव-नव विचार मनमे जगै लगलनि। पत्नीक खसल मन देखि कहलखिन- ‘‘अहाँ, एते सोगायल किए छी?’’
आँचरक खूँटसँ दुनू आँखिक नोर पोछि रुक्मिणी कपैत अबाजमे बजलीह- ‘‘की सपना मनमे रहए आकि देखि रहल छी। जँ से बुझितिऐक तँ एत्ते देहकेँ किए धौजनि करितहुँ। नढ़िया-कुकुड़ जेकाँ अनेर छोड़ि दैतिऐक।’’
पत्नीक व्यथा सुनि शिवनाथक हृदय पसीज गेलनि। मुदा अपन व्यथाकेँ मनमे दबैत मुस्कुराइत कहलखिन- ‘‘अखन धरिक जे जिनगी रहल ओ कर्तव्यनिष्ठ रहल। अपन कर्तव्य इमानदारीसँ निमाहलहुँ। सभकेँ अपना-अपना आशापर अपन जिनगी ठाढ़ कऽ जीबाक चाही। जहिना बरखाक एक-एक बुन्न रस्ता धए चलैत-चलैत अथाह समुद्रमे पहुँच जाइत अछि तहिना अपनो सभ अपन काजकेँ परिवारसँ आगू बढ़ा समाज रुपी समुद्रमे फेटि दी। बेटा अछि तेँ बेटापर अपन भार देमए चाहैत छलहुँ मुदा जनिका अपना बेटा नहि छन्हि ओ ककरापर अपन भार देथिन। तेँ अपनो सभ ओएह बुझू ! बाबूजी एते अरजिकेँ दऽ गेलथि जे इज्जतक संग हँसैत-खेलैत जिनगी जीबैत रहब।’’
सन् १९४२ क असहयोग आन्दोलनसँ सुनगति-सुनगति सौँसे देश पजरि गेल। जइमे मिथिलांचलोक योगदान ककरोसँ कम नहि अछि। दसकोसी लोकक मन एत्ते उत्साहित भऽ गेलनि जे चान-सूर्जमे आजादीक झंडा फहराइत देखथि। सुतली रातिमे ओछाइनपर सँ चहा कऽ उठि नारा लगबैत सड़कपर आबि जाइत छलाह। जे मिथिला याज्ञवल्क्य, गौतम, नारद सन-सन ऋषि पैदा केलक ओ पंचानन झा आ पुरन मंडल सन वीर अभिमन्यु सेहो पैदा केने अछि। दसकोसीक वीर सिपाही माथमे कफन बान्हि, लाठीमे झंडा फहरा झंझारपुर सर्कल, रेलवे स्टेशन आ पोस्ट आफिसमे आगि लगबैक संग-संग रेल-लाइन तौड़ै लेल सर्कलक मैदानमे एकत्रित भेलाह। अंग्रेज पलटनक केन्द्र सर्कल छलैक। आन्दोलनकारीकेँ एकत्रित होइत देखि ओहो सभ अपन बन्दूकमे गोली भरि-भरि तैयार भऽ गेल। आन्दोलनकारी भारत माताक नारा जगबैत आगू बढ़ल। अनधुन गोली पलटन सभ चलौलक। एक नहि अनेक गोली पंचानन आ पुरनक छातीमे लगलनि। दुनू गोटे नारा लगबैत दम तोड़ि देलनि। सिर्फ दुइये टा गोटेकेँ गोली नहि लागल छलनि, अनेको गोटे गोलीसँ घाएल भेलाह। ओहि घाएलमे शिवनाथक पिता देवनाथो छलाह। दहिना जाँघमे गोली लागल छलनि। गोली तँ जांघक माँस, चमराकेँ कटैत हड्डी तोड़ैत निकलि गेलनि। मुदा घाएल भऽ ओहो खसि पड़लाह। पितिऔत भाए हुनकर लटकल जांघक माँसकेँ तौनीसँ बान्हि, पीठपर उठा घरपर अनलकनि। चिकित्साक समुचित व्यवस्था नहि, ताहिपर गामे-गाम सिपाही दमन शुरु केलक। गामक-गाम आगि लगौलक। मर्द-औरतकेँ पकड़ि-पकड़ि बन्दूकक कुन्दा आ पएरक बूटसँ मारि-मारि बेहोश केलकनि। ओछाइनपर पड़ल देवनाथक हृदयमे आगि धधकैत रहनि मुदा किछु करैक तँ शक्ति नहि रहि गेलनि। जीवन-मृत्युक बीच लटकल रहथि। तीसम दिन प्राण छूटि गेलनि।
दस बर्खक शिवनाथ १५ अगस्त १९४७ ई. केँ आजादीक समय पनरह बर्खक भऽ गेल। पतिक मुइने शिवनाथक माए राधाक मन टुटलनि नहि बल्कि आगिमे तपल सोना जेकाँ आरो चमकै लगलनि। पाकल आमक आंठी जेकाँ करेज आरो सक्कत भऽ गेलनि। गुलामीसँ मिझाइल दीपकेँ आजादीक नव तेल-बत्ती भेटलैक, जाहिसँ नव-ज्योति प्रज्वलित भेल। अखन धरिक अव्यवस्थित परिवारकेँ दुनू माए-बेटा मिलि सुढ़िअबै लगलथि, व्यवस्थित बनबै लगलथि। अढ़ाइ बीघा खेतकेँ अपन दुनियाँ आ कर्मक्षेत्र बुझि दुनू माए-बेटा जी-जानसँ मेहनत करै लगलथि, जाहिपर परिवार नीक नहाँति ठाढ़ भऽ गेलनि। ओना शिवनाथक बिआह बच्चेमे भऽ गेल छलैक मुदा दुरागमन पछुआएल रहैक। परिवारक बढ़ैत काज देखि बेटाक दुरागमन माए करा लेलनि।
देश आजाद होइतहि गामे-गाम स्कूल बनै लगल। ओना पढ़लो-लिखल लोक कम छलाह मुदा जतबे छलाह ओ ओहि रुपे विद्या-दानमे भीड़ि गेलाह, जाहिसँ सभ गाममे तँ नहि मुदा अधिकांश गाममे लोअर प्राइमरी स्कूल ठाढ़ भऽ गेल। कतौ-कतौ मिड्लो स्कूल आ हाइयो स्कूल बनल। कतौ-कतौ कओलेजो ठाढ़ भऽ गेल। अखन धरि जे स्कूल ठाढ़ भेल ओ सामाजिके स्तरपर , सरकारी स्तरपर बहुत कम बनल। स्कूल खोलैक पाछू लोकक मनमे धर्मस्थानक बुझब छलैक। गुरुओजी ओहने रहथि जे मात्र भोजनपर सेवा करैत रहथि। शनीचरा मात्र जीविकाक आधार छलनि। पाइ लऽ कऽ पढ़ाएब पाप बुझल जाइत छलैक। ओना मिड्ल स्कूल, हाइ स्कूल आ कओलेजमे महिनवारी फीस लगैत छल, जे संस्थागत सहयोग छल। स्कूल-कओलेज खुजने विद्याक ज्योति प्रज्वलित भेल मुदा अंडी तेलमे जरैत डिबियाक इजोत जेकाँ, जखनकि जरुरी अछि हजार वोल्ट बौलक इजोत जेकाँ। ओना ठाम-ठीम संस्कृत विद्यालय सेहो अछि, मुदा.....।
दुरागमनक तीन साल बाद शिवनाथकेँ बेटा भेलनि। रघुनाथक जन्म होइतहि राधाक हृदय खुशीसँ सूप सन भऽ गेलनि। मनमे नचै लगलनि बाँसक ओ बीट जाहिमे दिनानुदिन बेसी बाँसोक जन्म होइत आ नमगर, मोटगर सुन्दर-सुडौलौ होइत। मनक खुशीसँ दुनियाँ फुलवारी सदृष्य बुझि पड़ै लगलनि। बाधक-बाध धानक फूल, गाछीक-गाछी आमक मंजर, जामुन, लताम इत्यादिक फूलसँ सजल ई दुनियाँ सोहनगर लगै लगलनि। मुदा जहिना आसिन मास अकाशकेँ करिया मेघ झँपने रहैत अछि आ कतौ-कतौ मेघक फाटसँ सूर्यक इजोत निकलैत अछि आ सेहो गाछे-बिरीछपर अटकि जाइत अछि, तहिना। धरती-जमीन ओहिनाक ओहिना अन्हार रहि जाइत अछि।
छबे मासक रघुनाथकेँ राधा अपन मुँह चमका-चमका दा-दा-दा सिखबै लगलीह। दादामे देवनाथक ओ रुप देखैत छलीह जे माथपर वीरक मुरेठा बान्हि, हरोथिया लाठीमे लाल झंडा टांगि, हँसैत गोली खेने रहथि।
चारि बर्ख टपितहि शिवनाथ रघुनाथक नाओ गामक स्कूलमे लिखा देलखिन साले-साल टपैत रघुनाथ गामक स्कूल टपि गेल। मिड्ल स्कूल टपि साइंस राखि रघुनाथ केजरीवाल हाइ स्कूल झंझारपुरमे नाओ लिखौलक। जहिना विज्ञान विषय पढ़ैमे नीक लगै तहिना अंग्रेजिओ। जाहिसँ ठाकुर बाबू आ लत्ती बाबू बेसी मानथिन। चारि बर्खक बाद प्रथम श्रेणीमे मेट्रिक पास केलक। बाढ़ि-रौदिक द्वारे उपजो-बाड़ी नीक नहि होइ जाहिसँ परिवारो लड़खड़ाइते चलैत। बाहर जा कऽ आगू पढ़ब असंभव जेकाँ रहैक। मुदा संजोग नीक रहलैक जे जनतो कओलेजमे साइंसक पढ़ाइ शुरु भेलैक। रघुनाथो कओलेजमे नाओ लिखौलक।
रघुनाथकेँ कओलेजमे नाओ लिखेलाक सालभरि उत्तर राधा दादी मरि गेलीह। पिताक श्राद्ध तँ शिवनाथ केनहि नहि रहथि मुदा माएक श्राद्ध नीक जेकाँ केलनि। जाहिसँ पाँच कट्ठा खेतो बिका गेलनि। ताहि लेल मन मलिन नहि भेलनि। किएक तँ भोजमे खूब जस भेलनि। दू सालक बाद रघुनाथ फस्ट डिविजनसँ आइ.एस.सी. पास केलक। सत्तरि प्रतिशतसँ उपरे नम्बर रहैक। आइ.एस.सी.क रिजल्ट सुनि शिवनाथकेँ बेटाकेँ पढ़बैक उत्साह बढ़लनि। खेत बेचब अधलाह नहि बुझेलनि। मनमे अएलनि जे रघुनाथ पढ़ि कऽ नोकरी करत आकि खेती करत। तखन खेतक जरुरते की रहतैक। संगहि हमहूँ समाजकेँ एकटा सक्षम मनुष्य देबैक।
इंजीनियरिंग, डॉक्टरी पढ़बैमे केहेन खर्च होइत छैक से तँ नीक जेकाँ बुझथि नहि। मनमे होइन जे पाँच-दस कट्ठा जमीन बेचि बेटाकेँ पढ़ा देबैक। मनमे उत्साह रहबे करनि तेँ महग बुझि घरारियेमे सँ दू कट्ठा बेचि इंजीनियरिंग कओलेजमे बेटाक नाओ लिखा देलनि। नाओ लिखौलाक डेढ़ बर्ख बीतैत-बीतैत अदहा जमीन बिका गेलनि। आगूक अढ़ाइ बर्ख बाकी देखि चिन्ता घेरए लगलनि। मन मानि गेलनि जे सभ खेत बेचनहुँ पार नहि लागत। सोचैत-बिचारैत तए केलनि जे पढ़ैक खर्चपर रघुनाथक बिआह करा देबै। बिआह भेनहुँ ओकरा पढ़ैमे बाधा थोड़े हेतैक, पाँच बर्खक बादे दुरागमन कराएब। समस्याक समाधान होइत देखि मनमे खुशी अएलनि। फेर मोनमे उठलनि जे समयो बदलि रहल अछि। पहिने माए-बाप बेटा-बेटीक बिआहकेँ अपन कर्तव्य बुझैत छलाह तेँ पुछब जरुरी नहि बुझैत छलाह। मुदा आब पूछब जरुरी भऽ गेल अछि। परिस्थिति देखि रघुनाथो बिआह करब मानि लेलक मुदा शर्त एकटा लगौलकनि जे लड़की रंग-रुपमे सुन्दर हुअए। जँ गुणवानक शर्त रहितनि तहन तँ ओझरा जएतथि। मुदा से नहि भेलनि। बिआहक चर्चा शिवनाथ चला देलखिन।
इंजीनियर वर तेँ कथकियाक ढबाहि लागि गेलनि। मुदा कोनो गाम अधलाह बुझि पड़नि तँ कोनो परिवारक कुल-गोत्र। कतहु लड़की दब तँ कतौ उमरगर लड़की भाँज लगनि। होइत-हबाइत एकठाम कथा पटि गेलनि। गाम तँ नीक नहि मुदा लड़कीयो गोर आ पढ़ैक खर्चो गछि लेलकनि। विवाह भऽ गेलैक। विवाहक बाद दुनू समधि बिचारि लेलनि जे सालो भरि जे भार-दौरक फेरीमे पड़ब से नीक नहि। तेँ भार-दौरक बेबहार छोड़िए दियौक। दुनू गोटे सैह केलनि। इंजीनियरिंगक अंतिम परीक्षा दऽ रघुनाथ सभ सामान लऽ सासुर आबि गेल। ओना दुरागमन बाकिये मुदा सासुर तँ सासुरे छी, तेँ चलि आएल। रिजल्ट निकलैमे तीन मास। काजो तँ अखन किछु नहिए अछि, तेँ निश्चिन्तसँ सासुरमे रहैक विचार रघुनाथ कऽ लेलक। दसे दिनक बाद विदेशमे इंजीनियरक भेकेन्सी खूब भेलैक। सभसँ बेसी अमेरिकामे भेलैक। नव टेकनोलौजी अएने नव युगक आगमन भेल। नव मशीन नव इंजीनियरकेँ जन्म देलक। मुदा पुरना तकनीको आ इंजीनियरो, अछैते औरदे, फाँसीपर लटकै लगलाह। जहिना गामक-गाम हैजासँ मरैत अछि तहिना इंजीनियरक जमात पटपटाए लगलाह। मुदा दवाइक करखन्ने नहि जे दवाइ बनाओत।
परीक्षाक पेपर रघुनाथक नीक भेल तेँ फेल करैक अन्देशे नहि रहैक। हाइये स्कूलसँ अमेरिकाक उन्नतिक, सुख-मौजक संबंधमे किताबो-पत्रिकामे पढ़ने आ लोकोक मूहे सुनने रहए। तेँ मनमे गुदगुदी लगैत रहै। ई भिन्न बात जे आठ मासमे अस्सीटा बैंक अमेरिकामे दिवालिया भेल।
रघुनाथ फस्ट डिवीजनसँ पास केलक। एक तँ फस्ट डिवीजन रिजल्ट, ताहिपर अमेरिकाक नौकरी। खुशीसँ रघुनाथक मन उड़िया गेलै। आवेदन केलाक आठे दिन पछाति चिट्ठी भेटलैक। स्त्रीक गहना बेचि ओ दुनू परानीक टिकट बनबौलक। ससुर पढै़ धरिक खर्चा गछने रहनि तेँ टिकटक खर्च दैसँ इन्कार केलकनि।
मिशिगन राज्यक राजधानीक शहर लानसिंग। ठंढ़ इलाका। ने अपना सभ जेकाँ छह ऋतुक मौसम बनैत आ ने ओकर हास-परिहास होइत। ने रंग-बिरंगक गाछ-बिरीछ अपना सभ जेकाँ होइत। लानसिंगक सत्तरह तल्लाक छोट-छोट तीन कोठरीक आंगन। जहिमे ने सभ दिन सूर्यक रोशनी अबैत अछि आ ने भोरे कौआ आबि ओसारपर बैसि सारि-सरहोजिक समाचार सुनबैत अछि। रहैत-रहैत दुनू परानी रघुनाथकेँ पनरह बर्ख बीति गेलनि। जवानीक सभ सपना मने-मन गुमसड़ि रहल छलनि।
रघुनाथकेँ अमेरिका गेने शिवनाथक जिनगीक गाछ मौलायल नहि, चतरिकेँ पाकरिक गाछ जेकाँ झमटगर भऽ गेलनि। दुनू बेकतियोक विचार सुधरलनि। वंशगत संबंध क्षीण होइत-होइत सुखि गेलनि, सामाजिक संबंध मोटा कऽ जुआएल गाछक सील जेकाँ बनि गेलनि। जहिना कोनो समांगकेँ मुइलापर परिवारक लोक आस्ते-आस्ते बिसरि जाइत अछि, तहिना रघुनाथोकेँ दुनू प्राणी शिवनाथ सोलहन्नी बिसरि गेलाह। साल भरिक छाया आ सैएक-सए बरिसक बरखी करैक खगते नहि रहलनि। वंश अंत हैत सदः आँखिसँ शिवनाथ देखैत छलाह। स्वतंत्र देशक गुलाम बुद्धि । कोना नहि बिसरितथि ? ने कहियो एक्कोटा पत्र लिखि मन राखे चाहलनि आ ने कोनो मनोरथ मनमे संयोगिकेँ रखने रहथि। पढ़ल-लिखल तँ शिवनाथ नहि मुदा ‘हरिवंश पुराण’क कथा, गप-सपक क्रममे बेसी काल दोसराक मूहे सुनैत छलाह।
स्वतंत्रताक उपरान्त विकासपुरक लोकोक विचार सुधरलनि। कोना नहि
सुधरितनि ? बूढ़-बच्चा छोड़ि गामक सभ लाठी-झंडा लऽ झंझारपुर सर्कल आगि लगबै जे गेल रहथि। आँखिसँ सभ किछु देखने रहथि। ओना हजार बीघा रकबाक गाम विकासपुर, जाहिमे साढ़े चारि सए परिबार हँसी-खुशीसँ कताक पुस्तसँ एकठाम रहैत आएल छलाह। स्वतंत्राक पूर्व मलिकाना –जमीनदारक- गाम रहए। मालगुजारीक लेन-देनमे सबहक जमीन निलाम भऽ जमीनदारक हाथमे चलि गेल छलैक। कियो अपन खेतक दखल तँ हुनका नहि देलकनि मुदा बटेदार बनि उपजा बाँटि-बाँटि दिअए लगलनि। जागल गामक लोक देखि जतबे-तेतबे दाम लए मालिक खेत घुमा देलकनि। अपन खेतकेँ स्थायी पूँजी बुझि श्रमक पूँजी जोड़ि जिनगीकेँ ठाढ़ करए लगलथि। बाढ़ि-रौदीक प्रकोप सालो-साल होइतहि रहैत छलैक मुदा विचार आ कर्म बदलने ओहो अभिशाप नहि वरदान बनि गेलैक। बाढ़ि देखि माथपर हाथ लए नहि बैसि, ओकर प्रतिकार करैक रस्ता अपनौलनि। तहिना रौदियोक प्रति केलनि। जाहिसँ बाढ़ि-रौदीसँ बचैक उपाए कऽ लेलनि। सबहक एहन धारणा बनि गेलनि। जे बाढ़िक उपद्रव मात्र साओनसँ कातिक चारि मास होइत अछि बाकी बारह मासक सालमे आठ मास तँ बचैत अछि। जे आठ मास जमि कऽ मेहनत कएल जाए तँ बारहो मास हँसी-खुशीसँ गुजर चलि सकैत अछि। ततबे नहि, पानियो तँ आगि नहि छी जे सभ किछुकेँ जरा देत। पानियो तँ उत्पादित पूँजी छी, तेँ जरुरत अछि ओकर उपयोग करैक। तहिना रौदियोक संबंधमे धारणा बनौने रहथि। खेतमे रंग-बिरंगक अन्न, फल, तरकारी अछि। ने सभ अन्नेक लेल एक रंग पानिक जरुरत होइत अछि आ ने फले-तरकारीक लेल। अधिक वर्षा भेने अधिक पनिसहू फसल होइत अछि आ कम वर्षा भेने कम पनिसहू हएत। ताहिपर थोड़ेक सुविधा सरकारो देलक। नब्बे प्रतिशत अनुदानमे बोरिंग आ पचास प्रतिशत अनुदानमे पम्पसेट देलक। जाहिसँ पर्याप्त बोरिंग-पम्पसेट गाममे भऽ गेलैक। किसानक हाथमे पानि चलि आएल। समाजक किसानक कान्हमे कान्ह मिला शिवनाथो चलऽ लगलाह। कम खेत रहितहुँ हुनका अन्न-पानि उगरिये जाइत छन्हि।
छह बजे भोरे रघुनाथ धीपल-सराएल पानि मिला अधा-छिधा नहा, कपड़ा पहीरि, चाह-बिस्कुट खा ड्यूटी चलि जाथि। असकरे श्यामा डेरामे रहि जाइत छलीह। ने अंग्रेजी भाषाक बोध छन्हि जे दोकानो-दौरीक काज कऽ सकितथि आ दोसरोसँ गप-सप करैत समय बितबितथि। ओना बगलेक फ्लेटमे आरो-ओरो भारतीय –इंडियन- सभ रहैत अछि। मुदा ओहो कियो केरलक तँ कियो मद्रासक छथि। भाषाक दूरी देखि श्यामा मने-मन सोचै लगलीह जे मनुष्यसँ नीक पशु होइत अछि जे अपन स्वभावसँ एक-दोसरासँ मेलो रखैत अछि। मनुक्ख तँ मनुक्खे छी जे बोलेसँ राजा बनि जाइत अछि। जहिना पिजराक सुग्गा अकासमे उड़ैत सुग्गा देखि कनैत अछि तहिना कोठरीमे बैसलि श्यामा मने-मन कुही होइत छलीह। मनमे होइत छलनि कोन जनमक पाप कएल अछि जे एहन गति भऽ गेल अछि। नैहरसँ सासुर धरिक सभ किछु हेरा गेल।
भिनसरे डेरासँ निकलि रघुनाथ कार्यालय पहुँचि जाइत छथि। कार्यालयेमे खाइ-पीबैक व्यवस्था सेहो छैक। मशीनेक संग-संग रघुनाथ बारह घंटा बितबैत छथि। बुद्धिसँ लऽ कऽ हाथ धरि मशीनेक संग भरि दिन रहैत-रहैत मशीन बनि गेलनि। संवेदनशून्य मनुष्य। जाहिमे दया, श्रद्धा, प्रेमक कतौ जगह नहि। मुदा आइ रघुनाथकँस कार्यालय पहुँचतहि मनमे उड़ी-बीड़ी लगि गेलनि। काजक दिसि एको-मिसिया ध्याने नहि जाइत छलनि। छुट्टीक दरखास्त दऽ कार्यालयसँ डेरा बिदा भेलाह। डेरा आबि, देहक कपड़ा आ जुत्ता बिनु खोलनहि पलंगपर, चारु नाल चीत भऽ ओंघरा गेला। जहिना जेठ मासक तबल धरतीपर बिहरिया बरखाक बुन्न खसितहि गरमी-सरदीक बीच घनघोर लड़ाइ शुरु भऽ जाइत अछि तहिना रघुनाथक मनमे वैचारिक संघर्ष हुअए लगलनि। एहन जोर वैचारिक बिहारि मनमे उठि गेलनि जे बुद्धि चहकै लगलनि। चहकैत बुद्धिसँ अनायास निकलै लगलनि- ‘‘हमरासँ सइओ गुना ओ नीक छथि जे अपना माथपर पानिक घैल उठा मातृभूमिक फुलवारीक फूलक गाछ सींचि रहल छथि। अपन माए-बाप, समाजक संग जिनगी बिता रहल छथि। आइ जे दुनियाँक रुप-रेखा बनि गेल अछि ओ किछु गनल-गूथल लोकक बनि गेल अछि। जिनगीक अंतिम पड़ावमे पहुँचि आइ बुझि रहल छी जे ने हमरा अपन परिवार चिन्हैक बुद्धि भेल आ ने गाम-समाजक। दुनू आँखिसँ दहो-बहो नोर चुबि गालपर होइत पलंगपर खसै लगलनि।
शिवनाथ हँसैत ओछाइनपर सँ उठि पत्नीकेँ सोर केलखिन- ‘‘कत्तऽ छी, कने एम्हर आउ?’’
मुस्की दैत लग आबि रुक्मिणी बजलीह- ‘‘भोरे-भोरे की रखने छी जे सोर पाड़लहुँ।’’
‘‘मनमे आबि रहल अछि जे अपन दुनू प्राणीक श्राद्ध कइये लइतहुँ। जँ हम पहिने मरि जाएब तँ अहाँक श्राद्ध हएत की नहि। नहि जँ पहिने अहीं मरि जाएब तँ हमर श्राद्ध हएत की नहि।’’
‘अखन हम थोड़े मरैबाली भेलहुँहेँ, जे मरब।’’
‘‘अपन बिआह बिसरि गेलिऐक ? जखन अहाँ छह बर्खक रही आ हम सात बर्खक रही तहिये ने बिआह भेल रहए। मन अछि आकि नहि जे खरहीसँ नापि कऽ जोड़ा लगौल गेल रहए।’’
किछु काल गुम्म रहि रुक्मिणी बजलीह- ‘‘अपन बिआह-दुरागमन आ माए-बाप जँ लोक बिसरि जाएत तँ ओहो कोनो लोके छी।’’
मुस्की दैत शिवनाथ कहलखिन- ‘‘हमरा आँखिमे अहाँ ओएह छी जे दुरागमन दिन झाँपल पालकीमे बैसि नैहरसँ सासुर आएल रही। अहीं कहू जे हमरा किए ने अहाँक चूड़ीक खनखनीक अबाजमे स्वर लहरी आ माथक सेन्नुरमे जिनगीक मधुर फल देखि पड़त। पचहत्तरि पार कऽ अस्सीक बर्खक बीच दुनू गोटे पहुँच चुकल छी तेँ खुशी अछि। आँखिक सोझमे देखैत छी जे विआहक पाँचे दिनक बाद चूड़ियो फूटि जाइत छैक आ माथो धुआ जाइत छैक। ताहि ठाम हम-अहाँ भाग्यशाली छी की नहि?’’
पतिक बात सुनि रुक्मिणी मुस्कुराइत पतिक आँखिमे अपन आँखि गाड़ि पाछुसँ आगू धरिक जिनगी देखए लगलीह।

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मिथिला चालीसा

मिथिला चालीसा
दोहा
अति आबस्यक जानी के शुनियो मिथिला के वास
बेद पुराण सब बिधि मिलल लिखल भोला लाल दास
पंडित मुर्ख अज्ञानी से मिथिला के ई राज
पाहुनं बन आएला प्रभु जिनकर आज

चोपई
जय - जय मैथिल सब गुन से सागर
कर्म बिधान सब गुन छैन आगर




जानक नन्दनी गाम कहाबैन
दूर - दूर से कई जन आबैन




देखीं क सीता राम के स्वम्बर
भेला प्रसन्य लगलैन अतिसब सुन्दर




पुलकित झा पंचांग से सिखलो
बिघन - बाधा से अति शिग्रः निपट्लो




मंत्र उचार केलो सब दिन भोरे
गृह - गोचर से भेलोहूँ छुट्कोरे



विद्यापति जी के मान बढ़ेलन
बनी उगाना महादेव जी ऐलन




जय - जय भैरवी गीत सुनाबी
सब संकट अपन दूर पराबी




लक्ष्मीस्वर सिंह राजा बन ऐला
पुनह मिथिला क स्वर्ग बनेला




भूखे गरीब रहल सब चंगा
सब के लेल ऐला राज दरिभंगा

बन योगी शंकरा चार्य कहोलैथ
अनेको शिव मंठ निर्माण करोलैथ

धर्म चराचर रहल सत धीरा
जय - जय करैत आयल संत फकीरा

जन्म लेलैन लक्ष्मीनाथ सहरसा
जिनकर दया से भेल अति सुख वर्षा

साधू संत के भेष अपनोलैन
फेर गोस्वामी लक्ष्मीनाथ कहोलैन

मंडन मिश्र क शास्त्राथ कहानी
हिनकर घर सुगा बजल अमृत बाणी

पत्त्नी धर्म निभेलैन विदुषी
जिनकर महिमा गेलें तुलशी

आयाची मिसर क गरीबी कहानी
हिनकर महिमा सब केलैनी बखानी


साग खाई पेटक केलनी पालन
हिनकर घर जन्मल सरोस्वती के लालन

काली मुर्ख निज बात जब जानी
भेला प्रसन्य उचैट भवानी

ज्ञान प्राप्त काली दाश कहोलैथ

फेर मिथिला शिक्षा दानी बनलैथ

गन्नू झा के कृत्य जब जानी
हँसैत रहैत छैथ सब नर प्राणी

केहन छलैथ ई नर पुरूषा
कोना देलखिन दुर्गा जी के धोखा

खट्टर काका के ईहा सम्बानी
खाऊ चुरा - दही होऊ अंतर यामी

मिथिला के भोजन जे नाही करता
तिनों लोक में जगह नै पाउता

सोराठ सभा क महिमा न्यारी
गेलैन सब राजा और नर - नारी

जनलैथ सब के गोत्र - मूल बिधान
फेर करैत सब अपन कन्या दान

अमेरिका लंदन सब घर में सिप्टिंग
देखलो सब जगह मिथिला के पेंटिंग

छैट परमेस्वरी के धयान धराबैथ
चोठी चन्द्र के हाथ उठाबैथ

जीतवाहन के कथा सुनाबैथ
फेर मिथिला पाबैन नाम बताबैथ

स्वर संगीत में उदित नारायण
मिथिला के ई बिदिती परायण

होयत जगत में हिनकर चर्चा
मनोरंजन के ई सुख सरिता

शिक्षा के जखन बात चलैया
मिथिला युनिभर्सिटी नाम कहाया

कम्पूटिरिंग या टैपिंग रिपोटर
बजैत लिखैत मिथिला शुद्ध अक्षर

है मैथिल मिथिला के कृप्पा निधान
रखियो सब कियो संस्कृति के मान

जे सब दिन पाठ करत तन- मन सं
भगवती रक्षा करतेन तन धन सं

हे मिथिला के पूर्वज स्वर्ग निवासी
लाज बचायब सब अही के आशी

दोहा
कमला कोषी पैर परे गंगा करैया जयकार
शत्रु से रखवाला करे सदा हिमालय पाहार
( माँ मैथिल की जय , मिथिला समाज की जय -----------)

( समाप्प्त )

लेखक :-
मदन कुमार ठाकुर
जगदम्बा ठाकुर
पट्टीटोल , कोठिया , (भैरव स्थान)
झंझारपुर , मधुबनी , बिहार -८४७४०४

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बृहस्पतिवार, 24 दिसम्बर 2009

साहित्य अकादमी पुरस्कार 2009- स्व.मनमोहन झाकेँ कथा संग्रह गंगापुत्रपर


मैथिली लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार 2009- स्व.मनमोहन झाकेँ कथा संग्रह गंगापुत्रपर देल गेल छन्हि।
मनमोहन झाक जन्म 1918 ई. मे सरिसबमे भेलन्हि आ मृत्यु 2009 ई. मे भेलन्हि। हिनकर रचना सभ छन्हि- अश्रुकण, वीरभोग्या, मिथिलाक निशापुरमे, गंगापुत्र। एहि बेरसँ पुरस्कार राशि बढ़ा कए एक लाख टाका कए देल गेल अछि।
पुरस्कार 16 फरबरी 2010 केँ देल जाएत।

साहित्य अकादेमी पुरस्कार- मैथिली

१९६६- यशोधर झा (मिथिला वैभव, दर्शन)
१९६८- यात्री (पत्रहीन नग्न गाछ, पद्य)
१९६९- उपेन्द्रनाथ झा “व्यास” (दू पत्र, उपन्यास)
१९७०- काशीकान्त मिश्र “मधुप” (राधा विरह, महाकाव्य)
१९७१- सुरेन्द्र झा “सुमन” (पयस्विनी, पद्य)
१९७३- ब्रजकिशोर वर्मा “मणिपद्म” (नैका बनिजारा, उपन्यास)
१९७५- गिरीन्द्र मोहन मिश्र (किछु देखल किछु सुनल, संस्मरण)
१९७६- वैद्यनाथ मल्लिक “विधु” (सीतायन, महाकाव्य)
१९७७- राजेश्वर झा (अवहट्ठ: उद्भव ओ विकास, समालोचना)
१९७८- उपेन्द्र ठाकुर “मोहन” (बाजि उठल मुरली, पद्य)
१९७९- तन्त्रनाथ झा (कृष्ण चरित, महाकाव्य)
१९८०- सुधांशु शेखर चौधरी (ई बतहा संसार, उपन्यास)
१९८१- मार्कण्डेय प्रवासी (अगस्त्यायिनी, महाकाव्य)
१९८२- लिली रे (मरीचिका, उपन्यास)
१९८३- चन्द्रनाथ मिश्र “अमर” (मैथिली पत्रकारिताक इतिहास)
१९८४- आरसी प्रसाद सिंह (सूर्यमुखी, पद्य)
१९८५- हरिमोहन झा (जीवन यात्रा, आत्मकथा)
१९८६- सुभद्र झा (नातिक पत्रक उत्तर, निबन्ध)
१९८७- उमानाथ झा (अतीत, कथा)
१९८८- मायानन्द मिश्र (मंत्रपुत्र, उपन्यास)
१९८९- काञ्चीनाथ झा “किरण” (पराशर, महाकाव्य)
१९९०- प्रभास कुमार चौधरी (प्रभासक कथा, कथा)
१९९१- रामदेव झा (पसिझैत पाथर, एकांकी)
१९९२- भीमनाथ झा (विविधा, निबन्ध)
१९९३- गोविन्द झा (सामाक पौती, कथा)
१९९४- गंगेश गुंजन (उचितवक्ता, कथा)
१९९५- जयमन्त मिश्र (कविता कुसुमांजलि, पद्य)
१९९६- राजमोहन झा (आइ काल्हि परसू)
१९९७- कीर्ति नारायण मिश्र (ध्वस्त होइत शान्तिस्तूप, पद्य)
१९९८- जीवकान्त (तकै अछि चिड़ै, पद्य)
१९९९- साकेतानन्द (गणनायक, कथा)
२०००- रमानन्द रेणु (कतेक रास बात, पद्य)
२००१- बबुआजी झा “अज्ञात” (प्रतिज्ञा पाण्डव, महाकाव्य)
२००२- सोमदेव (सहस्रमुखी चौक पर, पद्य)
२००३- नीरजा रेणु (ऋतम्भरा, कथा)
२००४- चन्द्रभानु सिंह (शकुन्तला, महाकाव्य)
२००५- विवेकानन्द ठाकुर (चानन घन गछिया, पद्य)
२००६- विभूति आनन्द (काठ, कथा)
२००७- प्रदीप बिहारी (सरोकार, कथा
२००८- मत्रेश्वर झा (कतेक डारि पर, आत्मकथा)
२००९- स्व.मनमोहन झा (गंगापुत्र, कथासंग्रह)

साहित्य अकादेमी मैथिली अनुवाद पुरस्कार

१९९२- शैलेन्द्र मोहन झा (शरतचन्द्र व्यक्ति आ कलाकार-सुबोधचन्द्र सेन, अंग्रेजी)
१९९३- गोविन्द झा (नेपाली साहित्यक इतिहास- कुमार प्रधान, अंग्रेजी)
१९९४- रामदेव झा (सगाइ- राजिन्दर सिंह बेदी, उर्दू)
१९९५- सुरेन्द्र झा “सुमन” (रवीन्द्र नाटकावली- रवीन्द्रनाथ टैगोर, बांग्ला)
१९९६- फजलुर रहमान हासमी (अबुलकलाम आजाद- अब्दुलकवी देसनवी, उर्दू)
१९९७- नवीन चौधरी (माटि मंगल- शिवराम कारंत, कन्नड़)
१९९८- चन्द्रनाथ मिश्र “अमर” (परशुरामक बीछल बेरायल कथा- राजशेखर बसु, बांग्ला)
१९९९- मुरारी मधुसूदन ठाकुर (आरोग्य निकेतन- ताराशंकर बंदोपाध्याय, बांग्ला)
२०००- डॉ. अमरेश पाठक, (तमस- भीष्म साहनी, हिन्दी)
२००१- सुरेश्वर झा (अन्तरिक्षमे विस्फोट- जयन्त विष्णु नार्लीकर, मराठी)
२००२- डॉ. प्रबोध नारायण सिंह (पतझड़क स्वर- कुर्तुल ऐन हैदर, उर्दू)
२००३- उपेन्द दोषी (कथा कहिनी- मनोज दास, उड़िया)
२००४- डॉ. प्रफुल्ल कुमार सिंह “मौन” (प्रेमचन्द की कहानी-प्रेमचन्द, हिन्दी)
२००५- डॉ. योगानन्द झा (बिहारक लोककथा- पी.सी.राय चौधरी, अंग्रेजी)
२००६- राजनन्द झा (कालबेला- समरेश मजुमदार, बांग्ला)
२००७- अनन्त बिहारी लाल दास “इन्दु” (युद्ध आ योद्धा-अगम सिंह गिरि, नेपाली)
२००८- ताराकान्त झा (संरचनावाद उत्तर-संरचनावाद एवं प्राच्य काव्यशास्त्र-गोपीचन्द नारंग, उर्दू)


प्रबोध सम्मान

प्रबोध सम्मान 2004- श्रीमति लिली रे (1933- )
प्रबोध सम्मान 2005- श्री महेन्द्र मलंगिया (1946- )
प्रबोध सम्मान 2006- श्री गोविन्द झा (1923- )
प्रबोध सम्मान 2007- श्री मायानन्द मिश्र (1934- )
प्रबोध सम्मान 2008- श्री मोहन भारद्वाज (1943- )
प्रबोध सम्मान 2009- श्री राजमोहन झा (1934- )


यात्री-चेतना पुरस्कार


२००० ई.- पं.सुरेन्द्र झा “सुमन”, दरभंगा;
२००१ ई. - श्री सोमदेव, दरभंगा;
२००२ ई.- श्री महेन्द्र मलंगिया, मलंगिया;
२००३ ई.- श्री हंसराज, दरभंगा;
२००४ ई.- डॉ. श्रीमती शेफालिका वर्मा, पटना;
२००५ ई.-श्री उदय चन्द्र झा “विनोद”, रहिका, मधुबनी;
२००६ ई.-श्री गोपालजी झा गोपेश, मेंहथ, मधुबनी;
२००७ ई.-श्री आनन्द मोहन झा, भारद्वाज, नवानी, मधुबनी;
२००८ ई.-श्री मंत्रेश्वर झा, लालगंज,मधुबनी
२००९ ई.-श्री प्रेमशंकर सिंह, जोगियारा, दरभंगा


कीर्तिनारायण मिश्र साहित्य सम्मान


२००८ ई. - श्री हरेकृष्ण झाकेँ कविता संग्रह “एना त नहि जे”
२००९ ई.-श्री उदय नारायण सिंह “नचिकेता”केँ नाटक नो एण्ट्री: मा प्रविश

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शनिवार, 19 दिसम्बर 2009

नताशा 35 (चित्र-श्रृंखला पढ़बाक लेल नीचाँक चित्रकेँ क्लिक करू आ आनन्द उठाऊ।)

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मिथिलाक खानपान...

मिथिलाक खानपान-नीलिमा चौधरी आ राखी साह... मखानक खीर सामग्री- दूध-१ १/२ किलो, चिन्नी-१०० ग्राम, मखान कुटल- १०० ग्राम, इलाइची पाउडर- स्वाद अनुसार, काजू- १० टा, किशमिश-२०टा बनेबाक विधि- मखानक पाउडर (कनी दरदरा)क पहिने १/२ किलो ठंढ़ा दूधमे घोरि लिअ, शेष दूध केँ खौला लिअ। आब गर्म दूधमे ई घोड़ल मखानक मिश्रण मिला दियौक आर करौछसँ लगातार चलबैत रहियौक जाहिसँ मिश्रण पेनीमे बैसय नहि। .... (आगाँ पढू)

मिथिलांचलक विकास..

मिथिलांचलक विकास... मिथिलांचल क्षेत्र बिहार मे सबस पिछड़ल मानल जाइत अछि, अगर प्रतिव्यक्ति आय , साक्षरता और प्रसवकाल मे जच्चा-बच्चा के मृत्यु के मापदंड बनायल जाय तो मिथिलांचल देश के सबस गरीब आ पिछड़ल इलाका अछि। एकर किछु कारण त अहि इलाका के भौगोलिक बनावट अछि... (आगाँ पढू)

मिथिला अरिपन....

मिथिला चित्रकला- स्त्री आ पुरुषक दशपात अरिपन / स्वास्तिक अरिपन... स्त्रीगणक दशपात अरिपनकन्याक मुण्डन,कान छेदन आ' विवाहक अवसर पर कुलदेवताक घर आकि मण्डप पर बनाओल जाइत अछि।बनेबाक- विधि। एकर बनेबाक विधि सूक्ष्म अछि।ऊपरमे तीन पातक पुष्प, ,ओकरनीँचा पाँच-पातक कमल-पुष्प,ओकर नीचाँ सात-पात युक्त्त कमल, बीचमे अष्टदल कमल अछि। दश पात चारू दिशि अछि। नौ टा माँछक चित्र सेहो अछि... (आगाँ पढू)

एक विलक्षण प्रतिभा...

एक विलक्षण प्रतिभा जिनका हम सदिखन याद करैत छी (प्रथम कड़ी) - कुसुम ठाकुर..... एक बेर हमारा एक पत्रिका में किछु लिखय लेल कहल गेल छल, ई सन् १९९६ क गप्प थिक। हम बस एतबे लिखी सकलौं "हम की लिखी हमर त लेखनिये हेरा गेल"। मुदा आई बुझना जैत अछि जे नै, हमारा एकटा कर्तव्यक निर्वाहन... (आगाँ पढू),
(दोसर कड़ी), (तेसर कड़ी), (चारिम कड़ी), (पाँचम कड़ी), (छठम कड़ी), (सातम कड़ी), (आठम कड़ी), (नवम कड़ी), (दसम कड़ी), (एग्यारहम कड़ी), (बारहम कड़ी), (तेरहम कड़ी), (चौदहम कड़ी), (पन्द्रहम कड़ी )

चिनबारक दीप...

चिनबारक दीप–उषा किरण खान... समस्तीपुर मे गाड़ी बदली कऽ महेसरी अइमे बैसलि सरिया कऽ। आब घर बेसी लग आयल जाइत छैक। चारि टीसन आ छैक, फे तऽ टीसन सऽ एक कोस जमीन हैतै। चारि-पाँच गोटाक हेंज छैक्। बौआइत-बतियाइत गाम पहुँचि जयतै। आठे दिनुका दिन छैक, की सब करतै? एह, करऽक की छैक? सभटा बस्तुजात तऽ कीननहिं जाइत छैक.... (आगाँ पढू)

बिदेसिया (संकल्पित नाटिका)

विद्यापतिक बिदेसिया (संकल्पित नाटिका).... भोजपुरीक साहित्य मैथिलीसँ कम समृद्ध अछि मुदा से अछि मात्र परिमाणमे, गुणवत्ताक दृष्टिमे ई कतेक क्षेत्रमे आगाँ अछि। भोजपुरीक भिखाड़ी ठाकुरक बिदेसियाक सन्दर्भमे हम ई कहि रहल छी। भिखाड़ी ठाकुर कलकत्तामे प्रवासी... (आगाँ पढू)

पाँच पत्र...

पाँच पत्र-हरिमोहन झा... प्रियतमे अहाँक लिखल चारि पाँती चारि सएबेर पढ़लहुँ तथापि तृप्ति नहि भेल। आचार्यक परीक्षा समीप अछि किन्तु ग्रन्थमे कनेको चित्त नहि लगैत अछि। सदिखन अहींक मोहिनी मूर्ति आँखिमे नचैत रहैत अछि। राधा रानी मन होइत अछि जे अहाँक ग्राम वृन्दावन बनि जाइत, जाहिमे केवल अहाँ आ हम राधा-कृष्ण जकाँ अनन्त काल धरि विहार करैत रहितहुँ... (आगाँ पढू)

कथा- माउगि

कथा- माउगि - विभा रानी.... माउगि, माउगि, गे माउगि, गे माउगि! तों माउगि, हम माउगि, ई माउगि, ऊ माउगि - सभ किओ माउगे-माउगि। ऊँहूँ - सभ किओ भला माउगि हुअए। ई तय कर' बाली तों के? अएं गे? तोरा कहिया स' भेटलौ ई हक? ई सभ काज-धंधा हमरा आओरक अछि - हमरे आओर के करे दें। देख त' कने, तोहरो आओर के कतेक रंग-बिरंगा रूप दिया देलियौ! माउगि, गे माउगि.... (आगाँ पढू)

मातृत्व...

डा. मंजू गीता मिश्राक आलेख : मातृत्व.... नारी जीवनक सबसँ गौरवशाली एवं सुखद अनुभव थिक मातृत्व ।ई नारी जीवनक परिपूर्णताक प्रतीक अछि । पूरा नौ मास अपन गर्भमे फलैत-फूलैत एक शिशुक अपन जान सँ बेसी देखभाल करैत छथि । तत्पश्चात एक फूल सन सुन्दर सुकोमल शिशु जन्म लैत अछि, यैह स्त्रीक सबसँ अनमोल उपहार एवं आनन्ददायक क्षण थिक । एहि नौ मासक दौरान गर्भवतीक भोजन एवं वातावरण पर निर्भर करैत अछि.... (आगाँ पढू)
© कॉपीराइट सूचना:
मैथिल आर मिथिला
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