मंगलवार, 27 अप्रैल 2010

मैथिली गजलशास्त्र- ३ आ ४

मैथिली गजलशास्त्र- भाग-३

आब मैथिली गजलक किछु कठिनाह विषएपर आबी।
कठिनाह विषए किछु विविधता आनत आ मैथिलीक परिप्रेक्ष्यमे नूतनता सेहो, मुदा ततेक कठिनाह सेहो नहि।

वैदिक आ मैथिली छन्दक गणना अक्षरसँ होइत अछि से तँ कहिये गेल छी, गुरु-लघुक विचार ओतए नहि भेटत। मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थ लौकिक संस्कृत आ हिन्दीसँ प्रभावित छथि मुदा गएर मैथिल ब्राह्मण आ कर्ण कायस्थक शब्दावलीमे ढेर रास शब्द भेटत जे वैदिक संस्कृतमे अछि मुदा लौकिक संस्कृतमे नहि, तेँ कम दूषित आ खाँटी मैथिली भाषा हुनके लोकनिक अछि आ तेँ छन्दक गणना अक्षरसँ करबाक आर बेशी आवश्यकता।
गायत्री-२४ अक्षर
उष्णिक्- २८ अक्षर
अनुष्टुप् – ३२ अक्षर
बृहती- ३६ अक्षर
पङ्क्ति- ४० अक्षर
त्रिष्टुप्- ४४ अक्षर
जगती- ४८ अक्षर

शूद्र कवि ऐलुष आ आन गोटे द्वारा रचित ऋक् वेद मे गायत्री, त्रिष्टुप् आ जगतीक छन्द सर्वाधिक परिमाणमे भेटैत अछि से एहि तीनूपर विचारी।

गायत्री: ई चारि प्रकारक होइत अछि- द्विपदी, त्रिपदी, चारि पदी आ पाँचपदी। चारि पदी मे ८-८ अक्षरक पद आ एक पदक बाद अर्द्धविराम आ दू पदक बाद पूर्णविराम दए सकै छी। माने एक गायत्री शेर तैयार। ओना एहिठाम हम स्पष्ट करी जे गायत्री मंत्र नहि छंद छैक। लोक जकरा गायत्री मंत्र कहैत छैक ओ सविता मंत्र छैक जे गायत्री छंद मे कहल गेल छैक।

त्रिष्टुप्: चारि पद, ११-११ अक्षरक पद आ एक पदक बाद अर्द्धविराम आ दू पदक बाद पूर्णविराम दए सकै छी। माने एक त्रिष्टुप् शेर तैयार।

जगती: चारि पद १२-१२ अक्षरक पद आ एक पदक बाद अर्द्धविराम आ दू पदक बाद पूर्णविराम दए सकै छी। माने एक जगती शेर तैयार।



आब जेना पहिने कहल गेल अछि जे गायत्रीमे एक-दू अक्षर कम वा बेशी सेहो भए सकैत अछि माने २२ सँ २६ अक्षर धरि गायत्रीक प्रकार भेल- विराड् गायत्री भेल- २२ निचृद् गायत्री भेल- २३ भुरिग् गायत्री भेल- २५ आ स्वराड् गायत्री भेल २६ अक्षरक। तँ निअमक अन्तर्गत भेटि गेल ने छूट आ स्वतंत्र भऽ गेल ने मैथिली गजल।

पूर्ण विराम छोड़ियो सकै छी।

आउ आब गजल कही:

गायत्री गजल
त्रिष्टुप् गजल
जगती गजल

(क्रमशः भाग-४ मे)

मैथिली गजलशास्त्र- भाग-४


आउ आब गजल कही:
गायत्री गजल
छै सुनि देखि रहल , छै ककरासँ ककर
कोन गपक सहल, छै ककरासँ ककर
हे अछि देखि सहल, अछि की टीस उठल
रे चिन्हलकेँ चीन्हल, छै ककरासँ ककर
ई सभ सत्यक संगी , सभ छै भेष बदलि
के अछि मुँह फेरल, छै ककरासँ ककर
हे बिजुलौका देखियौ, छै उकापतङ्ग जेकाँ
की माथ सुन्न कएल, छै ककरासँ ककर
अगिनवान मैथिली, की सुखि जाएत धार
कहै किदनि कहल, छै ककरासँ ककर
करू कोन समझौता, करू कोन निपटारा
के ललकारि रहल, छै ककरासँ ककर
के अछि उठा रहल, अछि के झुका रहल
के अछि बाजि रहल, छै ककरासँ ककर
ऐरावत छै चकित, अछि की सोचि रहल
ई कर्णधार बँचल, छै ककरासँ ककर
त्रिष्टुप् गजल
अछि चोरबा संग देखू ठाढ़, देखैत रहलि डकलिलामी
नहि होएत आब बरदाश्त, डाक- डकौअलि डकलिलामी
ई सुरकि रहल छल आब, नै भेटत आब फेर की खाद्य
अछि कोना भेल ई असम्हार, डघरब चलि डकलिलामी
कोना तड़फड़िया सभ अछि, डगहर थस लेने की बात
नञि निचेन भेल अछि बाप, ओ मुहानी आनि डकलिलामी
औ बुझारति होएत फेरसँ, भेल की ई ढिंढमदरा आब
ई ढाबुस बेंगक अछि ठाढ़, ई ककर चालि डकलिलामी
पुक्की पाड़ि के रहल पुकारि, बहीर बनि भने अछि ठाढ़
नहि ककरो सुनब पुकार, ई हथौड़ा मारि डकलिलामी
कहू यौ किएक छी हूस ठाढ़, ऐरावतक फोंफक अबाज
नहि किए बनल बौक ठाढ़ , चिपैले सुआदि डकलिलामी
जगती गजल
भगवानक बनाओल ई गाम, जखन अछि हो भोर बकटेंट
नहि तँ भेटत की कोनो विराम, अछि भेल कोना भेर बकटेंट
औ की नहि भेटत आबहु त्राण, छी सुनल सएह सरनरिया
कोना मिरदङिया देलक थाप, ई मिरहन्नी शेर बकटेंट
जाए रहल पछताए रहल, नहि बाट कोनो सुझाए रहल
अछि गोलहत्थी खाइत ई छौड़ा, पँचागि ई बिहटार बकटेंट
मोचण्ड बूड़ि रौदमुँहा होइत, साँझक लकधक बैसि रहल
धमधूसर सभ बेर लगौरी, आनि रहल गनौर बकटेंट
गदा रे गुइँ गुइँ मार गदा रे, गदा रे पुइँ पुइँ, मुक्का मारल
गताखोरक छै ई हेँज चलल, गतात संग पथार बकटेंट
बेराम पड़ब नै आउ सकल, बेपर्द करब बेदरंग भेल
ऐरावत चीन्हि बेपारी सभकेँ, करू भाषाक व्यापार बकटेंट
(क्रमशः भाग-५ मे)

पोस्ट स्क्रिप्ट:एखन धरिक गजलशास्त्रक प्रस्तुतिपर किछु टिप्पणी एतए प्रस्तुत अछि:




गंगेश गुंजन

ग़ज़ल पर संपादकीय मे स्थान देब एकटा गंभीर संपादन-बोधक व्यवहार बुझायल। तें एकर स्वागत आ बधाइ ।

ग़ज़लक बुनियादी अर्थ-शृंखला मे स्त्री, सुन्दर स्त्री एक खूब प्रशस्त अर्थ भेलैक। स्त्री अर्थात सौन्दर्य, शक्ति, प्रेम, आनन्द, सृष्टिक सब सं मधुर गीत।

ग़ज़ल तें कविता-विधाक सर्वोत्तम 'विधा' सेहो ( यद्यपि ई विवादहीन मान्यता नहिं तथापि...)

एक समय हिन्दी मे (प्रायः) शाइर इक़बालक कहल छनि-.....शाइरी इल्म से नहीं आती ' (पहिल पांती बिसरै छी)

अपन ग़ज़ल-कोटिक रचना कें, मैथिली हो बा हिन्दी, हम "ग़ज़ल नुमा" कहैत रहलियैक। तकरो आशय यैह। मैथिलीक अत्यल्पे ग़ज़ल हएत जे ग़ज़लक एहि बुनियादी लक्षणक ल'ग मे देखाय। ओना हमर पाठकीयताक सीमा अछि। तें अप्रिय मुदा यथार्थ थिक जे मैथिलीक एहि २०१० ई. मे लिखल जा रहल ग़ज़ल-अधिकांश ग़ज़ल हिन्दी-कविताक ' गुप्तकालीन कविता मात्र बुझाइछ। तुकबन्दी । प्रिय साकेतानन्दक शब्द मे- अहा ! ग्राम जीवन भी क्या है...कहीं लौकियां लटक रही हैं ..।( आदरणीय मैथिली शरण गुप्तजीक कविताक ई अनविकल उद्धरण थिक)। हिन्दीक दुष्यन्त कुमारक ग़ज़ल मात्र अपन आधुनिकताक कारणें बा छुच्छ प्रगतिशीलताक कारणें नहि, युग-जीवनक जन-युग-जीवनक ईमानदार अभिव्यक्ति सहज तासीरक कारण सेहो एतेक प्रख्यात-प्रशस्त भेलनि। भरिसके कोइ कहि सकैछ जे कोनो ने कोनो रूपें दुष्यन्तजी कें नहि पढ़ने होथि। नहियों होति तं पढ़ि लेब उपकारके हेतनि। हृदय चाही, आत्मदान । '

शुद्ध सौंदर्ये बनैत अछि आनन्द । मनुष्यक महान आनन्द दुःखेक चरम निरानन्दताक चिर वांछित दुर्लभ चित्तावस्था होइछ। जकरा कविता मे "ब्रह्मानन्द सहोदर" सेहो कहल गेल। से सौन्दर्य ब्रह्मान्ड मे "कविते"टा रचि सकैये ।

हमर उक्ति के रूढ़,निंघेस तथाकथित धर्ममार्गी अध्यात्मक रंगे मे नहि देखल-मानल जाय, से विनती ।

इल्म सेहो तखने पाठककें स्पन्दित करैत छैक।

" कहिये कुछ आसान ग़ज़ल

हर एक दिल की जान ग़ज़ल

जन-मन को दिखलाये राह

भटके मत सुनसान ग़ज़ल

एहि प्रकरण मे अपन "ग़ज़लनुमा"क किछु शेर मोन पड़ि जयबाक कवि-भावुकता कें माफी भेटओ।

गंगेश गुंजन



तारानन्द वियोगी

बहुत सुन्दर आ सम्पन्न विवेचन।गायनक सम्बन्ध मे बेस मेंही विवेचन अछि।दोसर भागक प्रतीक्षा रहत।

फेर:

वेद मे सब किछु छै।ओहि मे रसायन विज्ञान छै। कम्प्यूटर आ इन्टरनेट छै।ओहि मे एड्स के इलाज छै।ओहि मे परमाणु विज्ञानो छै।वेद जिन्दाबाद छै। गजल के बापक दिन छियै जे ओ वेद मे नहि रहतै?लेकिन बन्धु, हमर विचार जे फारसीक काव्यशास्त्र के हिन्दुत्वीकरण के बदला मौलिक गजल-रचना मे हिन्दुत्व आनल जाय तं से बेसी श्रेयस्कर।की करबै? दिल पर पाथर राखि लिय" जे ओहि विधर्मी सभक लग मे सेहो काव्य छलै, काव्यशास्त्र छलै।

उत्तर:१.गजलक बापक दिन छिऐ वा नै से तँ नञि बुझल अछि, मुदा वेदमे आन चीज जे होइ मुदा गजल नञि छै आ ओ काव्यशास्त्र फारसक फेर अरबक अछि से जगतख्यात अछि, आ एहिमे हमरा वा ककरो कोनो संदेह नञि होएबाक चाही।

२. फारसीक काव्यशास्त्रक हिन्दुत्वीकरणक संबंधमे हमरा नञि बुझल अछि आ मौलिक गजल रचनामे कोना हिन्दुत्व आनल जाए सेहो हमरा नञि बुझल अछि। काव्यकेँ "हिन्दु" आ "विधर्मी" शब्दावलीसँ दूर राखल जाए सएह नीक, हँ "मैथिली गजल" शब्दक प्रयोगमे हमरा कोनो आपत्ति नञि, आ तकरा हिन्दुत्वीकरण मानल जाए तँ हमर कोनो दोख नहि।

३.ओहि "विधर्मी"(अहाँक शब्दमे) लग सेहो काव्यशास्त्र रहै- ई विश्वास करबामे ककरो करेजपर पाथर नञि राखए पड़तै कारण जतेक सौँसे विश्वमे मिला कऽ कवि/ काव्यशास्त्री भेल होएताह ओहिसँ बेशी कवि/ काव्यशास्त्री अरबी-फारसीमे भेल छथि।

४.प्रायः मैथिली भाषामे गजल जे हम लिखी तँ छन्दशास्त्रक अनुसार लिखी, आ से छन्दशास्त्र हम अरबी-फारसीक प्रयुक्त करी, प्रायः अहाँक मंतव्य से अछि। मुदा ओ ट्राइ कऽ कए हम नञि आनो भाषाबला सभ (जेना अंग्रेजी गजलक शास्त्रकार लोकनि)थाकि गेल छथि, ओहिमे ने लय बनि पबै छै आ ने सरलता आबि पबै छै। ऋगवैदिक छन्दशास्त्र टगण-मगण सँ बेशी वैज्ञानिक आ सरल छै आ मैथिली गजल लिखबा-पढ़बा-गुनगुनएबामे लोककेँ सुविधा होएतैक से हमर विश्वास अछि- वेदक समएमे हिन्दू शब्दक जन्मो नहि भेल रहै से वैदिक छन्दशास्त्रक प्रयोग मात्र मैथिली गजलकेँ हिन्दू बना देतै से हमरा नञि लगैए।

५.तहिना जखन हम "मैथिली हाइकूशास्त्र" लिखने रही तहिया सेहो हमरा लग "वार्णिक" आ "मात्रिक"मे एकटा चयन करबाक छल, आ तहियो हम "वार्णिक"क अक्षर गणना पद्धतिक चयन कएलहुँ। "शिन्टो" धर्मावलम्बी जापानी (किछु बौद्ध सेहो) सभक लिपि आ तकर छन्दशास्त्र जे प्रयोग करी तँ मैथिलीमे हाइकू कहियो नञि लिखल जा सकत; कारण ओकर काव्यशास्त्र जापानी भाषा आ ओकर कएक तरहक लिपिक सापेक्ष छै आ ओहिमे धर्म अबितो छलै (टनका/ वाका- ईश्वरक आह्वाण)। अरबी-फारसी गजल मुदा धर्म निरपेक्ष छै, मुदा ओकर काव्यशास्त्र ओकर अपन भाषा-लिपि लेल छै। से भाषा-निरपेक्ष ने जापानी काव्यशास्त्र भऽ सकै छै आ ने अरबी-फारसी काव्यशास्त्र।

सादर

गजेन्द्र





गौतम राजरिशी

पिछला तीन-चार दिन स पढि रहल छि इ आलेख....हिंदी आ उर्दू के ग़ज़ल-शास्त्र स त भलि भांति परिचित रहि, मैथिली के लेल जानकारी बड निक लागल। बहुत मेहनत आ लगन स लिखल आलेख- सेव कs लेलौं घोटै खातिर। मुदा आलेख के आखिर पंक्ति "मैथिली गजलकेँ सेहो ई छूट भेटबाक चाही" स सहमत नै छि। कविता के अ-कविता होय लs दियो, मुदा ग़ज़ल के सर्वदा ग़ज़ल ही रहैक चाहि...अ-ग़ज़ल नै। हमर उस्ताद कहित छथिन कि रचना करि काल सुविधा नै खोजबाक चाहि।



अपनेक फोन नंबर चाहि गजेन्द्र जी...मैथिली शब्द के उच्चारन हेतु किछु शंका निदान करबाक अछि। ग़ज़ल त सब टा खेल अछि उच्चारणक...

उत्तर:राजर्षिजी

मैथिलीमे उच्चारण निर्देश, मैथिली गजल-शास्त्र- भाग-२ मे देल गेल अछि।

हमर मो.नं. ९९११३८२०७८ अछि।

सादर



आशीष अनचिन्हार

काफिया केखनो शब्दक नहि , वर्ण आ मात्राक होइत छैक। जेना हमरापर आ ओकरापर दूनू शब्द मे र काफिया छैक। तेनाहिते आरे आ माँड़े(हमर गजलक) मे ए मात्रा कफिया छैक।

एकै भाव बला गजल दूषित मानल जाइत अछि।

उत्तर:मैथिली आ संस्कृतमे मात्र तुकान्त (अन्तक तुक) लयक निर्माण नहि करै छै, मुदा करितो छै।

से ई गप जे-

जे तुक मिलानीक दृष्टिएँ ओहूमे शब्दक आरम्भ-मध्य-आखिरीक किछु अक्षर नहि बदलै छै।

सायास लिखल गेल अछि।

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सोमवार, 26 अप्रैल 2010

गीत


हमर भैआ के छोटकी सारि
तोड़ैए खुब्बे बफारि------


मारए हमरा कनखी-मटकी
हमरो मोन जे केखन ने पटकी
दिअै ओकर जनम के तारि
तोड़ैए खुब्बे बफारि-----


हमरो मोन अछि लुसकल-फुसकल
सटिऐ जा कए घुसकल-घुसकल
करी ओकरा सँ हम अड़ारि
तोड़ैए खुब्बे बफारि------


रुप ओकर छै सोन्हगर सन
देह ओकर छै पनिगर सन
रहए सदिखन आँचर ससारि
तोड़ैए खुब्बे बफारि-----


हुनका देहि कए होइए सेहन्ता
हुनके सन जे भेटए कन्ता
तखन खतम हेतै इ जुआरि
तोड़ैए खुब्बे बफारि॰॰॰॰

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शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

क्षमा प्रार्थी छी -रूपेश कुमार झा 'त्योंथ'

कतय गेल आ जा रहलय,
हमर ओ अप्पन छवि।
केहन बेदाग छल स्वर्णिम,
साक्ष्य छथि उगल रवि।

कतय गेल उर्वरता हमर माटिक,
जे उगबैत छल बिनु कांट गुलाब।
आश्वस्त छलहुं छवि रहत नीक,
मुदा पूर भेल ने हमर खोआब।

यैह माटि उगओने छल कहियो,
वीर सपूत शिवाजी कें ।
यैह माटि उगओने छल कहियो,
सावरकर, लोकमान्य तिलक कें ।

एकरे उपज छल ओ संत,
जकरा स्वार्थ छलैक ने एको पाई।
जनसेवा कें सर्वोपरि बुझलक,
ओ बनल देव शिरडी साईं।

कयने अछि हमरा अति आकच्छ,
उत्पात मचा 'दू गोट कपूत'।
नहि रहय देलक ई छवि स्वच्छ,
धयने छैक एकरा स्वार्थक भूत।

कयलक ई दुनू घोर कलंकित,
स्वर्णिम इतिहास मराठा कें ।
सेकि रहलय ई बिनु आंच,
अप्पन स्वार्थ पराठा कें।

जं घाव रहैछ कोनो अंग मे,
दुखित होइछ समूचा शरीर।
एहन नालायकक बात पर,
होउ ने अहाँ सभ अधीर।

किन्नहु नहि होयत भला जखन,
प्रान्तक हित देखि छोडि राष्ट्र।
हो खाहे ओ असाम, बंगाल,
वा हम अपने महाराष्ट्र।

डीरिया रहलय जे ई दुनू कुपात्र,
एहन ने हम स्वार्थी छी।
कष्ट पहुंचल अपने सभ कें,
ताहि हेतु हम क्षमा प्रार्थी छी।

http://teoth-aihik.blogspot.com
More Poems (Published) By रूपेश कुमार झा 'त्योंथ'
Visit- www.rkjteoth.blogspot.com
E-mail: rkjteoth@gmail.com
Mobile-09239415921

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बृहस्पतिवार, 22 अप्रैल 2010

प्रीति ठाकुरक - मैथिली चित्रकथा ( नीचाँक चित्र सभकेँ बेरा-बेरी क्लिक करू आ पढ़ू-देखू।)- narrated by Gajendra Thakur (drawn in Videha Children-literature workshop)

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मैथिली चित्रकथा- नीतू कुमारी (नीचाँक चित्र सभकेँ बेरा-बेरी क्लिक करू आ पढ़ू-देखू।) - Story narrated by Gajendra Thakur (drawn in Videha Children-literature workshop)

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गीत-प्रबन्ध- नाराशंसी



कोड़वाह ठाढ़ टिक्करक नीचाँमे

हलमहल कऽ कूटि माटि

सिलोहक बनल मुरुत ई मनुक्ख

छोलगढ़ियाक गुलाबीपाक

एहि बेर नहि जानि किएक रहल कचकुआह



आ बीतल कएक दिन, छठिहारी छठम दिन

कविक कविताक छन्दक रससँ उगडुम करैत

आ डराएल विश्वदेव जे पद्यक रस जे झझाएत तँ

पसरि जाएत सगर विश्वमे गायत्री नाराशंसीक संग

से ओ

कविक कविताकेँ छन्दक रसमे राखि दैत छथि

बलि दऽ दैत छथि

कविक कविताक छन्दक रसक बलि

आ गबैत छथि नाराशंसी।



आ आकांक्षाक अग्नि

पृथ्वीसँ द्युलोक दिस जाइत

माता पृथ्वीक हृदएक आगि

द्यौ पिताश्री पृथ्वीक पुत्र वा भाए

आलोकदीप्त ई नीलवर्णक आकास

अरणिमन्थनसँ प्रकाशित ई पृथ्वी





कर्कश बजरी सूगाक स्वर

ओतए धारक पलार लग



आ दूटा धारक हहाइत मोनियारक

भँसिआएल खेबाह कहुना निकलि गेल मुदा

आगाँ बढ़िते जक, बढ़ब आकि धँसब

झाँखीक झझिया करत सुरक्षित हमर गाम

दाह-बोह आएल, किएक ई

एकार्णवा, दह, जलामय, कनबहकेँ झाँपि



खेधा-पौटी नाहक माङीपर बैसि

खसबैत बसेर जाल आ हम दोसर माङीपर बैसि खेबैत छी

ओहि जालकेँ, दिशा निर्दिष्ट भऽ

कन्हेर करैत

जालक चारूकात ठकठकिया करैत

अनैत माँछकेँ जाल दिस



टुस्सा, सारिलबला काठक तँ गाछी विलुप्त

बबुरबन्ना बनल ओहि पारक खेत, कमलाक रेत





बदहा पहिरने लोक, आ ई गाछ बृच्छ

ठाढ़ मुदा हरियरी, जेना दुःखी पीड़ित

टुस्साक निकलब, जेना आगमन कोनो अभागक

चारू कात पसरल कमलाक रेत, आ ताहि बीच टुस्सा निकलब

मुदा संकेत प्रायः कोनो आसक।



आ तखने ध्वनि

मधुर स्वर बला करार सूगाक

कंठ लग लाल दागी बला अमृत भेला सूगाक

स्वर अबैत बनि नाराशंसी।

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बृहस्पतिवार, 15 अप्रैल 2010

गाम - नगर में (गीत) - विनीत ठाकुर


गाम - नगर में सोरसराबा सुनल गेल बड़ बेसी
लोकतन्त्र में अपन अधिकार लs कs रहत मधेशी
जनसंख्या सँ जनसागर में जोरल छलों हम सीधा
खाकs हमहूं लाठी गोली पारकेलों सबटा बाधा


बटवृक्षक अंकुर बनि जनमत कतेको आशा
लतरल चतरल मधेस में हेते नै कतो निराशा
जाइत पाइत में नै ओझराकs चुनब असली नेता
विकास में लिखत नव ईतिहास मधेसक बेटा


हिसाब सीधा सबकिछु में छी आधा के अधिकारी
कानून में जँ ई नै लिखत तँ होयत समस्या भारी
मधेसक नेता चिन्हु समस्या करू नै अपना में टन्टा
छी जागल अधिकारक लेल सब मधेसी जनता



विनीत ठाकुर


स्थायी पता: मिथिलेश्वर मौवाही - ६, धनुषा, नेपाल.. इ-मेल: binitthakur@yahoo.co.in

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मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

गीत


छौ चढ़ल जवानी भरपूर
गे छौड़ी हमरा संग लए ले
हेतौ तोहर मनोरथ पूर
गे छौड़ी हमरा संग लए ले -------


असगर ने तोरा नीके लगतौ
रहबौ संग त ठीके लगतौ
देबौ रसगर जौबन अंगूर
गे छौड़ी हमरा संग लए ले-------


एना जे हमरा तरसेबएँ
बाद मे तो अपने पछतेबएँ
जो नहि हमरा सँ दूर
गे छौड़ी हमरा संग लए ले------


-आशिष सन नहि भेटतौ साजन
कतबो बजतौ तोहर बाजन
करबौ तोहर घमंड के चूर
गे छौड़ी हमरा संग लए ले ॰॰॰॰

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सोमवार, 12 अप्रैल 2010

नेना-भुटका

1.िबहुला

चम्पानगर।
ओतए एकटा पैघ बनिजारा- चाँद सौदागर।
िशवजीक भक्त।
एक बेर िवषहारा मनसा सोचलक जे ओ कैलाश त्यािग मृत्युलोक आबि जाए। लोक ओकर पूजा
करत।
मनसा मृत्युलोक आयलि- चम्पानगर। चाँद सौदागरकेँ कहलक- हमर पूजा कर।
मुदा चाँद सौदागर िशवक भक्त। मना कऽ देलक।
मनसा क्रोिधत! चाँद सौदागरक सात टा बेटा। मनसा सातूकेँ कािट लेलक। सभ मरि गेल।
फेर एक बेर जहाजसँ अबैत रहए सौदागर चाँद। दूर देशसँ। मनसा जहाज डुमा देलक।
कंगाल भऽ गेल चाँद। मुदा तखने ओकरा एकटा बेटा भेलै। लखिन्दर नाम राखल गेलै ओकर।
चाँद सौदागर डरायल रहए से अखण्ड सौभाग्यवती कन्या िबहुलासँ बेटाक िबयाह करेलक
लखिन्दरक। आब की करतीह मनसा?
मनसा सपना देलन्हि चाँद सौदागरकेँ। कोहबरमे डसब तोहर बेटाकेँ।
पातर जालीसँ कोहबर बनबओलक चाँद। आब की करतीह मनसा?
मुदा मनसा पातरो सँ पातर भऽ गेलीह। कािट लेलन्हि आ लखिन्दर खतम।
मिथिलामे साँपक काटलकेँ केराक थम्हमे बान्हि देल जाइत अछि। बहि गेल लखिन्दर गंगामे।
मुदा िबहुला। ओही केराक थम्ह पर बैिस गेलीह पिताक संग।
संगम पहुँचैत गेलाह सभ, त्रिवेणी घाट! एकटा धोिबन कपड़ा खीिच रहल छलीह। बेटा कानए
लगलन्हि तँ ओकरा मािर कऽ कपड़ासँ झाँिप देलन्हि। फेर जाइ काल ओकरा िजया कऽ िबदा
भेलीह। पुछलन्हि िबहुला- तँ पता लागलन्हि जे मनसाक कृपासँ ई सम्भव अछि।
तप, तप तप। िबहुलाक तपसँ प्रसन्न मनसा लखिन्दर आ जेठ सातू भाँएकेँ िजया देलन्हि।
चाँद सौदागर प्रसन्न। चम्पानगरक लोक प्रसन्न। सभ मनसाक आ संगमे िबहुलाक पूजा करए लगलाह
तहियासँ।

2.मोतीसाएरि

मोरंग।
राजा भीमसेन। िनःसन्तान।
यज्ञ। कन्याक प्राप्ति। नाम मोतीसाएरि।
पैघ भेिल मोतीसाएरि।
-कुंडली देखू पंिडत।
पंिडत कुंडली देखलन्हि। एकरासँ जे िबयाह करत से एहि प्रपंचक सभटा सुखपर अधिकार करत।
सोचलन्हि-
-अद्भुत। एकरासँ जे हमहॴ िबयाह कऽ ली।
मुदा कहताह कोना?
-अहाँक बेटीक भाग्यमे अनिष्टे-अनिष्ट। अहाँ आ अहाँक राज्यक समापन भऽ जएत। अविलम्ब एकरा
राज्यसँ बाहर करू।
एकटा पैघ सन्दूकमे खेनाइ-िपनाइक सामग्रीक संग मोतीसएरि बन्द भऽ गेलीह। हुनका बहा देल गेल
धारमे। पंिडत चाहलक जे संदूक ऊपर कऽ ली। मुदा प्रवाह तेज रहै। बहि गेल संदूक। आ एकटा
बोनमे कात लागल।मोरंगक बोन। एकटा सरदार रहए गवल। बोनक सरदार। ओ मोतीसएरिकेँ बेटी
जेकाँ मानए लागल।
पंिडतकेँ एहि गपक पता लािग गेलैक।
राजाकेँ फेर सन्तान प्राप्तिक िललसा भेलैक। पंिडतसँ पुछलक।
-राजन्। मोरंग बोनक गवली सरदारक पुत्रीसँ जे अहाँक िबयाह भऽ जाए तँ पुत्रक प्राप्तिक योग
अछि!
पंिडत सोचलक जे बेटीसँ िबयाह केने ओकरा राज्यसँ च्युत कऽ देल जएतैक। आ फेर पंिडत राजा
बनि सकत।
गवलसँ भयंकर युद्ध। भीमसेन हािर गेल।
भीमसेन पंिडतसँ मंत्रणा कए यादव जाितक सरदार कृष्णारामकेँ बजेलन्हि।
-गवलक बेटीकेँ आनि कऽ िदअ आ अदहा राज्य लऽ जाऊ।
बुझेलक गवलकेँ कृष्णाराम, मुदा गवल नहि मानल। आक्रमण केलन्हि कृष्णाराम मुदा नहि हारल
गवल। मरछौर िछटवा देलन्हि कृष्णाराम। मोतीसाएरिकेँ भीमसेन लग पहुँचा देलन्हि आ आधा मोरंग
भेिट गेलन्हि कृष्णारामकेँ।
मुदा जखने िबयाहक प्रस्ताव देलन्हि भीमसेन मोतीसाएरि शाप देलन्हि आ अपने अन्तर्धान भऽ गेलीह,
मोक्ष भेटलन्हि हुनका। भीमसेनक राज्य खतम भऽ गेल।


3.माधव सिंह आ अमता गाम


मिथिलामे माधव सिंहक राज्य छल तखने भयंकर दुर्भिक्ष आयल।डबरा-चभच्चा धरि सुखा गेल। दरबार बजाओल गेल।
-राजन्। नेपालक दरबारमे रामनवाज, सीताराम, राधाकृष्ण आ करताराम चारि संगीतज्ञ छथि आ चारू भाइ छथि। हुनकर संगीतमे जादू छन्हि। ओ संगीतसँ बरखा करबा सकै छथि।
नेपालसँ आग्रह कएल गेल तँ ओ राधाकृष्ण आ करतारामकेँ मिथिला दरबारमे पठेलन्हि। ई दुनू गोटे ध्रुवपदक प्रसिद्ध गबैय्या छलाह। जखन ई दुनू भाँए पखावजी भीम मल्लिकक संग राग मेघ मल्हारक सुरक नोम-तोम पूर्ण केलन्हि तँ घटा आबि गेल। बन्दिश प्रारम्भ भेल आ भीम मल्लिक पखावजपर थाप देलन्हि तँ बुन्नी पड़ए लागल। फेर बरखाक पानि दरबार आबि गेल। चारू दिस दूत पठाओल गेल जे कतहु रुक्ख तँ नहि अछि। आ जखन ई पता लागि गेल जे कतहु रुक्ख नहि अछि तखन जा कऽ गायन खतम भेल।
राजा हुनका सभक लेल अमता गाममे घर बनबा देलन्हि आ ओहि गाममे खीरीक गाछ लगबा देलन्हि जकर फरमे दूध भरल रहैत छल।
राजा अमता गाम ध्रुवपदक आनन्द लेबाक लेल जाइत रहैत छलाह। मृत्युकालमे राजा ध्रुवपद सुनबाक लेल अमता गाम बिदा भेला मुदा रस्ते मे हुनकर मृत्यु भऽ गेलन्हि।

4.उगना
विद्यापति शिवक भक्त छलाह। हुनकर नचारी सुनि कऽ शिव कैलासमे नाचए लगैत छलाह आ एक बेर ओ निर्णय लेलन्हि जे ओ विद्यापतिक घरमे नोकर बनि रहताह।
विद्यापतिक पत्नीक नाम चन्दन छलन्हि आ शिव जखन नोकरक भेषमे उगना बनि पहुँचलाह तँ विद्यापति पत्नीक सहायता करबाक लेल उगनाकेँ नोकर राखि लेलन्हि।
एक बेर विद्यापति कतौ जाइत छलाह। उगना संगमे छलन्हि। रस्तामे गुमारसँ विद्यापति बेकल छलाह, पियास लागि गेलन्हि। मुदा पानिक कतहु पता नहि। उगना सेहो पानि लेल चारू दिस घुमल आ घुमि कऽ आयल तँ विद्यापतिकेँ मूर्छित देखलक। तखन उगना अपन असली रूपमे आबि कऽ जटाक गंगधारसँ पानि निकालि विद्यापतिकेँ पियेलखिन्ह। विद्यापतिकेँ होश अएलन्हि, मुदा गंगाजलक स्वाद ओ परखि लेलन्हि। उगनाक केश एखनो भीजल छल ओ बुझि गेलाह जे ई साक्षात् शिव छथि। शिव अपन असली रूपक दर्शन विद्यापतिकेँ देलखिन्ह।विद्यापतिकेँ दुख भेलन्हि जे ओ शिवकेँ नोकर राखलन्हि मुदा शिव तँ विद्यापतिक नचारीक भूखल। कहलखिन्ह जे अहाँक गीत सुनबाक लेल हम नोकर बनि कऽ रहब मुदा जहिये अहाँ ई भेद खोलि देब तहिये हम अन्तर्धान भऽ जएब।
एम्हर पार्वती दुखी छलीह। से एक दिन जखन चन्दन विद्यापतिकेँ तेतरि अनबाक लेल पठेलन्हि तँ पार्वती सभटा तेतरि पहिनहिये तोड़बा लेलन्हि। उगनाकेँ एकोटा तेतरि नहि भेटलन्हि आ जखन ओ घुरलाह तँ तामसमे चन्दन बाढ़नि लऽ कऽ छुटलीह। विद्यापतिकेँ ई देखल नहि गेलन्हि आ ओ हा शिव! कहलन्हि आकि शिव अन्तर्धान भऽ गेलाह। तकर बाद कतेक दिन धरि विद्यापति विक्षिप्त रहलाह।

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समीक्षा श्रृंखला-१६- सुभाष चन्द्र यादव- जगदीश प्रसाद मंडलक कथा संग्रह गामक जिनगीपर

मैथिली साहित्यमे जगदीश प्रसाद मंडलक पदार्पण किछु-किछु ओहिना भेल अछि जेना कहियो विवेकानन्द ठाकुरक भेल छल। जहिना विवेकानन्द ठाकुर अपन जीवनक उत्तरार्धमे बहुत बहुत आकस्मिक ढ़ंगे मैथिलीमे प्रगट भेलाह, तहिना जगदीश प्रसाद मंडल एकबैग अपन अनेक कथा आ उपन्यास लऽ कऽ उपस्थित भेल छथि। विवेकानन्द ठाकुरक काव्यमे पाठककेँ ग्रामीण परिवेशक जेहन टटका बिम्ब आ नव सुआद भेटल छलनि, जगदीश प्रसाद मंडलक कथामे ओहने टटका चित्र आ नव आस्वाद भेटतनि। दुनू रचनाकार मिथिलाक ग्राम्य-जीवन संस्कृतिसँ मोहाविष्ट छथि। दुनुक शैली वर्णनात्मक अछि।

लेकिन आगमन, विषयवस्तु, दृष्टि आ शैलीमे समानता होइतहु दुनूमे क्यो ने तँ ककरो अनुकरण कएने छथि ने एक दोसरासँ प्रभाव ग्रहण कएने छथि। दुनुक अपन स्वतंत्र लेखकीय व्यक्तित्व छनि।
ठेलाबला, रिक्शाबला, चूनवाली, इन्जीनीयर, डॉक्टर इत्यादि शीर्षकसँ लागत जेना जगदीश प्रसाद मंडल वर्ग संघर्षक कथाकार हेताह। लेकिन ओ जनवादी या प्रकृतिवादी कथाकार नहि छथि, जीवन-संघर्षक कथाकार छथि।

हुनक कथाक सन्दर्भमे जे सर्वाधिक उल्लेखनीय बात अछि से ई जे हुनक सभ कथामे औपन्यासिक विस्तार अछि। वर्तमान समएमे प्रचलित आ मान्य कथासँ हुनक कथा भिन्न अछि। हुनक कथा घटना बहुलता आ ऋजुसँ युक्त अछि।
जगदीश प्रसाद मंडल जीवनमे प्राप्य जिजीविषा, मानवीयता एवं आदर्शकेँ सुदृढ़ आ पुनर्प्रतिष्ठित करबाक उद्देश्यसँ अनुप्राणित छथि।

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बाँकी अछि हमर दुधक कर्ज - विनीत ठाकुर


२१ वीं शताब्दी में गीत क्षेत्र में एकटा नवीन आयाम मुद्रित एल्वम गीत संग्रह "बाँकी अछि हमर दुधक कर्ज" ई कहव छन्हि माय मिथिलाभुमिक! तें हे मैथिल लोकनि अथवा हे मधेशी समाज आइ काल्हुक २१ वीं शताब्दी में सब वर्ग या जाति अपन - अपन अधिकारक रक्षाक आर अधिकारक प्राप्तिक हेतु एकता बद्ध आ निडर भs कs अहर्निश प्रयत्नशील अछि, अतः हमहूँ आहाँ एकजुट आ निर्भीक भs अधिकार प्राप्तिक हेतु तत्पर होई से आग्रह गीतक माध्यम सँ करबद्ध प्रार्थना कs रहल छि....


भरल नोर में...

केहन सपना हम मीता देखलों भोर में
माय मिथिला जगाबथि भरल नोर में
कहथि रने वने घूमी अपन अधिकार लेल
छें तूँ सुतल छुब्ध छी तोहर बिचार लेल

कनिको बातपर हमरा तूं करै विचार
की सुतलासँ ककरो भेटलै अछि अधिकार
जोरि एक एक हाथ बनवै जो लाखों हाथ
कर हिम्मत तूं पुत्र छियों हम तोहर साथ

अछि तोरापर बाँकी हमर दुधक कर्ज
करै एहिबेर तूं पुरा सबटा अपन फर्ज
लौटेदे हमर आब अपन स्वाभिमान
पुत्र तूं छै महान तोहर कर्म छो महान

हम जल्दिये अपने सबहक बिच "बाँकी अछि हमर दुधक कर्जक" बाँकी गीत लs कें हाजिर हेब...


विनीत ठाकुर
माता: शान्ति देवी, पिता: ब्रह्मदेव ठाकुर, जन्म तिथि: ०१.०३.१९७६, शिक्षा: बी.एड, सेवा: शिक्षक, स्थायी पता: मिथिलेश्वर मौवाही - ६, धनुषा, नेपाल.. इ-मेल: binitthakur@yahoo.co.in

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रविवार, 11 अप्रैल 2010

समीक्षा श्रृंखला-१५- राजदेव मंडल- जगदीश प्रसाद मंडलक उपन्यास उत्थान-पतनपर

नाटककार, कथाकार आ उपन्यासकारक रुपमे श्री जगदीश प्रसाद मंडलजी मैथिली साहित्यमे नूतन उर्जाक संग उपस्थित भेल छथि। हिनक जन्म १९५७ ई. मे भेल। विभिन्न पत्र-पत्रिकामे हिनक कथा, प्रेरक कथा उपन्यास सेहो प्रकाशित भऽ चुकल अछि।

एहि उपन्यास ‘उत्थान-पतन’ क माध्यमसँ लेखक गामक जिनगीकेँ यथार्थ आ नव रुपमे उपस्थित करबाक चेष्टा कएने छथि। गामक जड़ता, रीति-रिवाज, पावनि-तिहार, मूर्खता, विद्वता, अड़ि जाएबला भाव आ सहज स्वभाव आदि सहज रुपमे आबि गेल अछि।

तत्वक दृष्टिसँ देखल जाए तँ सर्वप्रथम कथावस्तु घ्यानकेँ आकृष्ट करैत अछि। कथावस्तु तँ सशक्त आधार अछि जाहिपर उपन्यासक कतेक रंगक प्रसाद ठाढ़ होइत अछि। जाहिमे जिनगीक श्वास रहब आवश्यक।

उत्थान-पतनमे गंगानंद, यमुनानंद, पंडित शंकर, सुधिया, ज्ञानचंद, भोलिया, विसेसर, भोलानाथ, सुकल, निलमणि, मोहिनी, रीता, महंथ रघुनाथ दास, लीला, दीनानाथ, गुलाब आदि अनेक पात्रसँ सज्जित भऽ अंचलक मार्मिक चित्र उपस्थित भेल अछि।

कथावस्तुमे बिच्छिन्न होइत गाम-घर आ टूटैत बेकती सबहक समस्याकेँ मार्मिक ढंगसँ अभिव्यक्ति कएल गेल अछि। उपन्यासक प्रारम्भ होइत अछि- ‘‘गामे-गाम, कतौ अष्टयाम-कीर्तन तँ कतौ नवाह, कतौ चण्डी यज्ञ तँ कतौ सहस्त्र चण्डी यज्ञ होइत। किएक तँ एगारहटा ग्रह एकत्रित भऽ गेल अछि। की हएत की नै हएत कहब कठिन। एकटा बालग्रह बच्चाकेँ भेने तँ सुखौनी लगि जाइत आ जहिठाम एगारह ग्रह एकत्रित अछि तइठाम तँ अनुमानो कम्मे हएत। परोपट्टा भगवानक नामसँ गदमिसान होइत।........ जाधरि लोक कीर्तन मंडलीक संग मंडपमे कीर्तन करैत ताधरि घरक सभ सुधि-बुधि बिसरि मस्त भऽ रहैत। मुदा घरपर अबितहि.......... बच्चाकेँ बाइस-बेरहट लेल ठुनकब सुनि। व्यथाककेँ दबैत सभ आँखिक नोर होइत बहबैत।’’

सामाजिक उत्थान करऽ बला बेकतीकेँ गामक एहि परम्परा आ धार्मिक आडम्बरसँ संधर्ष करऽ पड़ैत अछि। लेखक अपना पात्रक द्वारा अंधविश्वासकेँ तोड़ि परिवर्तन अनबाक प्रयास कएने छथि।

साहित्यक भाषा होएबाक चाही जन-भाषा। जेकरा साधारण जन सहज रुपसँ पचा सकए। एहि उपन्यासक भाषा गाम-घरक बोलचालक भाषा अछि। जेकरा प्रयोग करैत काल सहजहि नव-नव शब्दक निर्माण भऽ गेल अछि। साधारण जनक बोली आ नूतन शब्दक प्रयोग एहि उपन्यासमे प्रचुरताक संग देखल जा सकैत अछि। कथोपकथनमे सहजता संक्षिप्तता आओर स्वभाविकता अछि। जेना एहि कथोपकथनपर दृष्टिपात कएल जा सकैत अछि-

‘‘अगर दसखत कएल नइ होइत होअए तब?’’

‘‘तब की? औंठा निशान दऽ देतइ।’’

‘‘भाय दूटा समांग आएल अछि। दुनूकेँ काज कऽ दहक।’’

‘‘अच्छा थमहह। किरानी बाबूसँ गप्प केने अबै छी।’’

कथोपकथन उपन्यासमे वर्णित जिनगीक अनुकूल अछि। दौड़ैत-पड़ाइत संसारमे बृहताकार उपन्यास पढ़बाक लेल समएक अभाव रहैत अछि। किन्तु भाषा आ शौलीमे जँ आकर्षणक गुण रहैत अछि तँ ओ जनमानसकेँ पढ़बाक लेल अपना दिशि घिचि लैत अछि। ताहि गुणसँ भरल-पूरल एहि उपन्यासक चित्रात्मक शैलीक एकटा उदाहरण देखल जा सकैत अछि।

‘‘गौर वर्ण, रिष्ट-पुष्ट शरीर, घनगर मोंछ, बड़दक आँखि सन नम्हर-नम्हर आँखि सुकलक रहै। कोठीक गेटपर कान्हमे बन्दूक लटका ठाढ़ ड्यूटी सुकल सेठक करैत।’’

एकहि वाक्यमे बहुत बात कहि देब लेखकक बिशेषता अछि। जेना-

‘‘माथपर छिट्टा, दुनू हाथसँ दुनू भाग छिट्टाकेँ पकड़ने, दुलकी डेग बढ़बैत गुलाब, सैंया भेल किसनमा घुनघुनाइत आंगन दिशि लफड़ल चललीह।’’

केहनो अकर्मण्य बेकती जँ पूर्ण मनोयोगक संग आर्थिक उन्नतिमे दत्तचित भऽ जाए तँ हुनक प्रगति होएब निश्चित भऽ जाइत अछि। एहि दर्शनकेँ देखेबाक प्रयत्न लेखक पात्र श्यामानन्द द्वारा कएलनि अछि। परिवर्तनशीलता संसारक निअम थीक। परिवर्तनशीलता संसारक निअम थीक। सामन्तवादसँ पूँजीवाद आ पूँजीवादक गर्भहिसँ समाजवादक जन्म सेहो होइत अछि। ई अलग बात जे पूँजीवादसँ साम्राज्यवाद सेहो पनपैत अछि।

सामाजिक उत्थान समितिक निर्माण कऽ लेखक ई देखबए चाहैत छथि जे टूटैत गामक लेल एकता आवश्यक भऽ गेल अछि। जाहिसँ एक-दोसराक सहयोग भेटतैक आ गामक सम्पूर्ण विकास होएतैक। सबहक संगे सामाजिक न्याय होएतैक। श्यामानन्द द्वारा आधुनिक यंत्रसँ कृषि कार्य होइत अछि। जाहिसँ ओ सम्पन्न किसान बनि जाइत अछि। एहि माध्यमसँ लेखक देखाबए चाहैत छथि जे अपनहुँ गाम-घरमे जँ बेकती विवेक आ कर्म निष्ठासँ काज करए तँ ओकरा अर्जन करबाक लेल दोसर प्रदेश नहि जाए पड़तैक आ पलायन रुकि जएतैक।

एखनहुँ गाम-घरमे पूर्ण ज्ञानक किरिण नहि पहुँचि सकल अछि। ताहि कारणे एक गाम दोसर गामसँ लड़ैत-झगड़ैत अपना विकासकेँ अवरुद्ध कएने रहैत अछि। बेमारीकेँ डाइन-जोगिन आ भूत-प्रेतक प्रकोप मानैत अछि। ई समस्या सभ सहजहि एहि उपन्यासमे उपस्थित भऽ गेल अछि। एहि तरहेँ देखैत छी जे लेखक गामक यथार्थ जिनगीक चित्र उपस्थित कएने छथि, संगहि आदर्श रुप सेहो दृष्टिगत भऽ रहल अछि।

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बुधवार, 7 अप्रैल 2010

बनभोज चित्रकथा ( नीचाँक चित्र सभकेँ बेरा-बेरी क्लिक करू आ पढ़ू-देखू।)











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गजल


आरे तिरपित पारे तिरपित
कनही कूकूर माँड़े तिरपित

बैसि रहल सरकार चुना
देशक जनता ठाढ़े तिरपित

मना रहल मधुमास धनिकबा
गरीबक भाग अखाढ़े तिरपित

उठौना लागल दूनू साँझ
बाछी मुदा लथारे तिरपित

कतबो झपबै नंगटीनी के
निर्लज्जी मुदा उघारे तिरपित

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मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

प्रीति ठाकुरक - मैथिली चित्रकथा ( नीचाँक चित्र सभकेँ बेरा-बेरी क्लिक करू आ पढ़ू-देखू।)- narrated by Gajendra Thakur (drawn in Videha Children-literature workshop)

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मैथिली चित्रकथा- नीतू कुमारी (नीचाँक चित्र सभकेँ बेरा-बेरी क्लिक करू आ पढ़ू-देखू।) - Story narrated by Gajendra Thakur (drawn in Videha Children-literature workshop)

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सोमवार, 5 अप्रैल 2010

मैथिली गजल शास्त्र-भाग-१ आ २

भाग-१

गजलक उत्पत्ति अरबी साहित्यसँ मानल जा सकैत अछि मुदा ओतए ई अरकान माने कोनो उत्तेजक घटनाक वर्णन विशेषक रूपमे छल। मुदा गजल जे एहि अरकान सभक समुच्चय अछि से फारसीक छी। फेर ओतएसँ गजल उर्दू-हिन्दी आ आब मैथिलीमे आएल अछि।
मायानन्द मिश्र मैथिली गजलकेँ गीतल कहलन्हि, मुदा हम एतए ओकरा गजले कहब आ अरबी फारसीक छन्द-शास्त्रक किछु शब्दावलीक प्रयोग करब। से मैथिली गजल शास्त्रक शब्दावली भेल अरूज ।
बहर: उन्नैस टा अरबी बहर होइत अछि। एतेक बहर मोन रखबाक आवश्यकता नहि। किएक तँ बहर माने थाट, राग-रागिनी। एहि उन्नैसटा अरबी बहरक बदला मैथिली लेल नीचाँमे भारतीय संगीत (स्रोत स्व. श्री रामाश्रय झा रामरंग) दऽ रहल छी। आ किएक तँ देवनागरी आ मिथिलाक्षरमे जे बाजल जाइत अछि सएह लिखल जाइत अछि (ह्रस्व इ सेहो मैथिलीमे अपवाद नहि अछि) से ह्रस्व आ दीर्घ स्वरकेँ गनबाक विधि मैथिलीमे भिन्न अछि, सेहो एतए देल जाएत। जाहि बहरमे शेरमे आठ (माने शेरक दुनू मिसरामे चारि-चारि) अरकान हुअए से भेल मसम्मन आ जाहि बहरमे शेरमे छह (माने शेरक दुनू मिसरामे तीन-तीन) अरकान हुअए से भेल मुसद्द्स । एतए मैथिलीमे विभक्ति सटा कऽ लिखबाक वैज्ञानिक आधार फेर सिद्ध होइत अछि कारण गजलमे जे विभक्ति हटाइयो कऽ लिखब तैयो अरकान गनबा काल तेना कऽ गानए पड़त जेना विभक्ति सटल हुअए, विभक्ति लेल अलगसँ गणना नहि भेटत।
जाहि बहरमे एक्केटा रुक्न हुअए से भेल मफरिद बहर आ जाहिमे एकटा सँ बेशी रुक्न हुअए (रुक्नक बहुवचन अराकान) से भेल मुरक्कब बहर।
दूटा अराकान पुनः आबए तँ ओकरा बहरे-शिकस्ता कहल जाएत।
मिसरा आ शेर: मैथिली गजलमे दू पाँतीक दोहा जे कोनो उत्तेजक घटनाक विशेष वर्णन करैत अछि तकरा मिसरा वा शेर कहै छी। दुनू पाँती एकट्ठे भेल शेर आ ओहि दुनू पाँतीकेँ असगरे मिसरा कहब। मतलाक दुनू मिसरामे एकरंग काफिया माने तुकबन्दी होएत।
ऊला आ सानी: शेरक पहिल मिसरा ऊला आ दोसर मिसरा सानी भेल। दू मिसरासँ मतला आ दू पाँतीसँ दोहा बनल।
अरकान (रुक्न) आ जिहाफ: आठ टा अरकान (एकवचन रुक्न) सँ उन्नैस टा बहर बहराइत अछि। से अरकान मूल राग अछि आ बहर भेल वर्णनात्मक राग। अरकानक छारन भेल जिहाफ । जेना वरेण्यम् सँ वरेणियम्।
तकतीअ: दू पाँतीक कोनो उत्तेजक घटनाक विशेष वर्णन करैत दोहा जे मिसरा वा शेर अछि आ कएक टा मिसरा वा शेर मिलि कऽ गजल बनैत अछि, तकर शल्य चिकित्सा लेल तकतीअ अछि। से मिसरा कोन राग-रागिनीमे अछि तकर तकतीअसँ बहर ज्ञात होइत अछि ।

मतला (आरम्भ) आ मकता (अन्त): गजलमे पहिल शेर मतला आ आखिरी शेर मकता भेल। मतलाक दुनू मिसरामे तुक एकरंग मुदा मकतामे कवि अपन नाम दै छथि। मकताक कखनो काल लोप रहत, एकरा सन्दर्भसँ बुझब थिक मुदा मतलाक रहब अनिवार्य।

काफिया आ रदीफ: तुकान्त काफिया आ ओकर बाद वा कफियायुक्त शब्दक पहिनेक शब्द/ शब्द समूहकेँ रदीफ कहैत छिऐ। काफिया युक्त शब्द बदलत मुदा रदीफ नञि बदलत। काफिया वर्ण वा मात्राक होइ छै आ रदीफ शब्द वा शब्द समूहक।
दूटा काफियाबला शेर जू काफिया कहल जाइत अछि।
एक दीर्घक बदला दूटा ह्रस्व सेहो देल जा सकैए।
जेना काफिया वर्ण आ मात्राक संग शब्दकेँ सेहो प्रयुक्त करैत अछि तेहिना रदीफ एकर विपरीत शब्द आ शब्दक समूहमे सन्निहित वर्ण आ मात्राकेँ सेहो प्रयुक्त करिते अछि। ऐ तरहेँ पहिल पाँतीमे जँ शब्द समूह रदीफ अछि तँ तँ दोसर पाँतीमे ओकर कोनो एक शब्द दोसर शब्दक अंंग भऽ सकैए आ ओइ काफिया युक्त शब्दमे रदीफक उपस्थिति रहि सकैए।

दूटा काफियाक बीचमे सेहो रदीफ रहि सकैए, रदीफ ऐ तरहेँ अनुपस्थितसँ लऽ कऽ एक शब्द, शब्दक समूह वा वाक्य भऽ सकैत अछि जे अपरिवर्तित रहत। मुदा काफिया युक्त शब्द गजलमे बदलैत रहत। मैथिली व्याकरणक दृष्टिसँ अपरिवर्तित मात्रा अपरिवर्तित अपूर्ण शब्दकेँ बिना रदीफक गजल कहि सकै छिऐ, कारण ई काफियाक मूल विशेषता छिऐ (अपरिवर्तित मात्रा वा अपरिवर्तित अपूर्ण शब्द) ..आ जँ शब्द वा शब्दक अपरिवर्तित समूह दृष्टिसँ देखी तँ एतए रदीफ अनुपस्थित अछि ...ओना रदीफ अनुपस्थित सेहो रहि सकैए, शास्त्रीय दृष्टिसँ कोनो दिक्कत नै अछि.. से प्रारम्भमे बिना रदीफक गजलक बदला "एक शब्द, शब्दक समूह वा वाक्य" जे अपरिवर्तित रहए, सएह रदीफक रूपमे प्रयुक्त करू।
मैथिली गजल शास्त्र :
पहिने कमसँ कम ३७ ‘की’ बला कीबोर्ड लिअ।
एहिमे १२-१२ टाक तीन भाग करू। १३ आ २५ संख्या बला की सा,आ सां दुनूक बोध करबैत अछि। सभमेँ पाँचटा कारी आ सातटा उज्जर ‘की’ अछि। प्रथम १२ मंद्र सप्तक, बादक १२ मध्य सप्तक आ, सभसँ दहिन १२ तार सप्तक कहबैछ। १ सँ ३६ धरि मार्करसँ लिखि लिय। १ आ तेरह सँ क्रमशः वाम आ दहिन हाथ चलत।

१२ गोट ‘की’ केर सेटमे ५ टा कारी आ सात टा उज्जर ‘की’ अछि।
प्रथम अभ्यासमे मात्र उजरा ‘की’ केर अभ्यास करू। पहिल सात टा उजरा ‘की’ सा, रे, ग, म, प, ध, नि, अछि आ आठम उजरा की तीव्र सं अछि जे अगूलका दोसर सेटक स अछि।
वाम हाथक अनामिकासँ स, माध्यमिका सँ रे, इंडेक्स फिंगर सँ ग ,बुढ़बा आँगुरसँ म , फेर बुढ़बा आँगुरक नीचाँसँ अनामिका आनू आ प, फेर माध्यमिकासँ ध, इंडेक्स फिंगरसँ नि, आ बुढ़बा आँगुरसँ सां। दहिन हाथसँ १२ केरसेट पर पहिल’की’ पर बुढ़बा आँगुरसँ स, इंडेक्स फिंगरसँ रे, माध्यमिकासँ ग, अनामिकासँ म, फेर अनामिकाक नीचाँसँ बुढ़बा आँगुरकेँ आनू आ तख बुध्बा आँगुरसँ प, इंडेक्स फिंगरसँ ध, माध्यमिकासँ नि आ अनामिकसँ सां। दुनू हाथसँ सां दोसर १२ केर सेटक पहिल उज्जर ‘की’ अछि। आरोहमे पहिल सेटक सां अछि तँ दोसर सेटक प्रथम की रहबाक कारण सा।
दोसर गप जे की बोर्डसँ जखन आवज निकलयतँ अपन कंठक आवाजसँ एकर मिलान करू। कनियो नीच-ऊँच नहि होय। तेसर गप जे संगीतक वर्ण अछि सा,रे,ग,म,प,ध,नि,सां एकरा देवनागरीक वर्ण बुझबाक गलती नहि करब। आरोह आ अवरोहमे कतेक नीच-ऊँच होय तकरे टा ई बोध करबैत अछि। जेना कोनो आन ध्वनि जेनाकि क केँ लिय आ, की बोर्ड पर निकलल सा,रे...केर ध्वनिक अनुसार क ध्वनिक आरोह आ अवरोह करू।
ई जे सातो स्वरक वर्णन पिछला अंकमे देल गेल छल ओकरासँ आगू आऊ। एहि सातू स्वरमे षडज आ पंचम मने सा आ प अचल अछि, एकर सस्वर पाठमे ऊपर नीचाँ होयबाक गुंजाइस नहि छैक। सा अछि आश्रय आकि विश्राम आ प अछि उल्लासक भाव। शेष जे पाँचटा स्वर अछि से सभटा चल अछि, मने ऊपर नीचाँक अर्थात् विकृतिक गुंजाइस अछि एहिमे। सा आ प मात्र शुद्ध होइत अछि। आ आब विकृति भ’ सकैत अछि दू तरहेँ शुद्धसँ ऊपर स्वर जायत किंवा नीँचा। जदि ऊपर रहत स्वर तँ कहब ओकरा तीव्र आ नीचाँ रहत तँ कोमल कहायत। म कँ छोड़ि कय सभ अचल स्वरक विकृति होइत अछि नीचाँ, तखन बुझू जे “रे, ग,ध, नि” ई चारि टा स्वरक दू टा रूप भेल कोमल आ शुद्ध। ’म’ केर रूप सेहो दू तरहक अछि, शुद्ध आ तीव्र। रे दैत अछि उत्साह ग दैत अछि शांति म सँ होइत अछि भय ध सँ दुःख
आ नि सँ आदेश। शुद्ध स्वर तखन होइत अछि, जखन सातो स्वर अपन निश्चित स्थान पर रहैत अछि। एहि सातो पर कोनो चेन्ह नहि होइत अछि।
जखन शुद्ध स्वर अपन स्थानसँ नीचाँ रहैत अछि तँ कोमल कहल जाइत अछि, आ ई चारिटा होइत अछि एहिमे नीचाँ क्षैतिज चेन्ह देल जाइत अछि, यथा- रे॒, ग॒, ध॒, नि॒।

शुद्ध आ मध्यम स्वर जखन अपन स्थानसँ ऊपर जाइत अछि, तखन ई तीव्र स्वर कहाइत अछि, एहिमे ऊपर उर्ध्वाधर चेन्ह देल जाइत अछि। ई एकेटा अछि- म॑।
एवम प्रकारे सात टा शुद्ध यथा- सा,रे,ग, म, प, ध, नि, चारिटा शुद्ध यथा- रे॒,ग॒,ध॒,नि॒ आ एकटा तीव्र यथा म॑ सभ मिला कय १२ टा स्वर भेल।
एहिमे स्पष्ट अछि जे सा आ प अचल अछि, शेष चल किंवा विकृत।
आब फेर कीबोर्ड पर आऊ। ३७ टा की बला कीबोर्ड हम एहि हेतु कहने चालहुँ,किएक तँ १२, १२, १२ केर तीन सेट आ, अंतिम ३७म तीव्र सां केर हेतु।
सप्तक मे सातटा शुद्ध आ पाँचटा विकृत मिला कय १२ टा भेल!
वाम कातसँ १२ टा उजरा आ कारी की मंद्र सप्तक, बीच बला १२ टा की मध्य सप्तक आ, २५ सँ ३६ धरि की तार सप्तक कहल जाइत अछि।

आरोह- नीचाँ सँ ऊपर गेनाइ, जेना मंद्र सप्तकसँ मध्य सप्तक आ मध्य सप्तकसँ तार सप्तक।
मंद्र सप्तकमे नीचाँ बिन्दु, मध्य सप्तक सामान्य आ तार सप्तकमे ऊपर बिन्दु देल जाइत अछि, यथा-
स़, ऱ,ग़,म़,प़,ध़,ऩ सा,रे,ग,म,प,ध,नी ‍ सां,रें,गं,मं,पं,धं,निं
अवरोह- तारसँ मध्य आ मध्यसँ मंद्र केँ अवरोह कहल जाइत अछि।

वादी स्वर- जाहि स्वरक सभसँ बेशी प्रयोग रागमे होइत अछि। समवादी स्वर- जकर प्रयोग वादीक बाद सभसँ बेशी होइत अछि। अनुवादी स्वर- वादी आ समवादी स्वरक बाद शेष स्वर। वर्ज्य स्वर- जाहि स्वरक प्रयोग कोनो विशेष रागमे नहि होइत अछि। पकड़- जाहि स्वरक समुदायसँ कोनो राग विशेषकेँ चिन्हैत छी।
गायन काल सेहो सभ राग-रागिनीक हेतु निश्चित रहैत अछि। १२ बजे दिनसँ १२ बजे राति धरि पूर्वांग आ १२ बजे रातिसँ १२ बजे दिन धरि उत्तरांग राग गाओल-बजाओल जाइत अछि।
पूर्वांग रागक वादी स्वर मे कोनो एक टा (सा, रे, ग, म, प ) होइत अछि। उत्तरांगक वादी स्वरमे (म,प,ध,नि,सा)मे सँ कोनो एक टा होइत अछि। सूर्योदय आ सूर्यास्तक समयमे गाओल ज्आय बला रागकेँ संधि प्रकाश राग कहल जाइत अछि।
रागक जाति
रागक आरोह आ अवरोहमे प्रयुक्त्त स्वरक संख्याक आधार पर रागक जातिक निर्धारण होइत अछि।
एकर प्रधान जाति तीन टा अछि। १. संपूर्ण (७) २.षाड़व(६) ३.औड़व(५) आ एहिमे सामान्य स्वर संख्या क्रमशः ७,६,५ रहैत अछि।
आब एहि आधार पर तीनूकेँ फेँटू।
संपूर्ण-औरव की भेल? हँ पहिल रहत आरोही आ दोसर रहत अवरोही। कहू आब। (७,५) एहिमे सात आरोही स्वर संख्या आ ५ अवरोही स्वर संख्या अछि। संपूर्णक सामान्य स्वर संख्या ऊपर लिखल अछि(७) आ औड़वक (५) । तखन संपूर्ण-औड़व भेल(७,५)। अहिना ९ तरहक राग जाति होयत। १.संपूर्ण-संपूर्ण(७,७) २.संपूर्ण-षाड़व(७,६) ३.संपूर्ण-औड़व(७,५)
४. षाड़व-संपूर्ण- (६,७)
५. षाड़व- षाड़व - (६,६)
६. षाड़व -औड़व (६,५)
७.औड़व-संपूर्ण(५,७)
८.औड़व- षाड़व(५,६)
९. औड़व- औड़व(५,५)

थाट:
थाट- एकटा सप्तकमे सात शुद्ध, चारिटा कोमल आ एकटा तीव्र स्वर (१२ स्वर) होइत अछि। एहिमे सात स्वरक ओ’ समुदाय, जेकरासँ कोनो रागक उत्पत्ति होइत अछि, तकरा थाट वा मेल कहल जाइत अछि।
थाट रागक जनक अछि, थाटमे सात स्वर होइत छैक(संपूर्ण जाति)। थाटमे मात्र आरोही स्वर होइत अछि। थाटमे एकहि स्वरक शुद्ध आ विकृत स्वर संग-संग नहि रहैत अछि। विभिन्न रागक नाम पर थाट सभक नाम राखल गेल अछि। थाटक सातो टा स्वर क्रमानुसार होइत अछि आ एहिमे गेयता नहि होइत छैक।
थाटक १० टा अछि।
१.आसावरी-सा रे ग॒ म प ध॒ नि॒
२.कल्याण-सा रे ग म॑ प ध नि
३.काफी-सा रे ग॒ म प ध नि॒
४.खमाज-सा रे ग म प ध नि॒
५.पूर्वी-सा रे॒ ग म॑ प ध॒ नि ६.बिलावल-सा रे ग म प ध नि ७.भैरव-सा रे॒ ग म प ध॒ नि ८.भैरवी-सा रे॒ ग॒ म प ध॒ नि॒ ९.मारवा-सा रे॒ ग म॑ प ध नि १०.तोड़ी-सा रे॒ ग॒ म॑ प ध॒ नि

वर्ण:
वर्णसँ रागक रूप-भाव प्रगट कएल जाइत छैक। एकर चारिटा प्रकार छैक।
१.स्थायी-जखन एकटा स्वर बेर-बेर अबैत अछि।ओकर अवृत्ति होइत अछि।
२.अवरोही- ऊपरसँ नीचाँ होइत स्वर समूह, एकरा अवरोही वर्ण कहल जाइत अछि।
३.आरोही- नीचाँसँ ऊपर होइत स्वर समूह, एकरा आरोही वर्ण कहल जाइत अछि।
४.संचारी-जाहिमे ऊपरका तीनू रूप लयमे होय।

लक्षण गीत: रचना जाहिमे बादी, सम्बादी,जाति आ गायनक समय केर निर्देशक रागक लक्षण स्पष्ट भ’ जाय।

स्थायी: कोनो गीतक पहिल भाग, जे सभ अन्तराक बाद दोहराओल जाइत अछि।
अन्तरा: जकरा एकहि बेर स्थायीक बाद गाओल जाइत अछि।
अलंकार/पलटा: स्वर समुदायक नियमबद्ध गायन/वादन भेल अलंकार।
आलाप: कोनो विशेष रागक अन्तर्गत प्रयुक्त्त भेल स्वर समुदायक विस्तारपूर्ण गायन/वादन भेल आलाप।
तान: रागमे प्रयुक्त्त भेल स्वरक त्वरित गायन/वादन भेल तान।
तानक गति द्रुत होइत अछि आऽ ई दोबर गतिसँ गायन/वादन कएल जाइत अछि।

आब आउ ताल पर। संगीतक गतिक अनूरूपेँ ई झपताल- १० मात्रा, त्रिताल- १६ मात्रा, एक ताल- १२ मात्रा, कह्रवा- ८ मात्रा दादरा- ६ मात्रा होइत अछि।
गीत, वाद्य आऽ नृत्यक लेल आवश्यक समय भेल काल आऽ जाहि निश्चित गतिक ई अनुसरण करैत अछि, से भेल लय।जखन लय त्वरित अछि तँ भेल द्रुत, जखन आस्ते-आस्ते अछि, तँ भेल विलम्बित आऽ नञि आस्ते अछि आऽ नञि द्रुत तँ भेल मध्य लय।
मात्रा ताल केर युनिट अछि आऽ एहिसँ लय केर नापल जाइत अछि।
तालमे मात्रा संयुक्त रूपसँ उपस्थित रहला उत्तर ओकरा विभाग कहल जाइत अछि- जेना दादरामे तीन मात्रा संयुक्त्त रहला उत्तर २ विभाग।
तालक विभागक नियमबद्ध विन्यास अछि छन्द।आऽ तालक प्रथम विभागक प्रथम मात्रा भेल सम आऽ एकर चेन्ह भेल + वा x आऽ जतय बिना तालीक तालकेँ बुझाओल जाइत अछि से भेल खाली आऽ एकर चेन्ह अछि ०.
ओऽ सम्पूर्ण रचना जाहिसँ तालक बोल इंगित होइत अछि, जेना मात्रा, विभाग,ताली, खाली ई सभटा भेल ठेका।
चेन्ह-
तालीक स्थान पर ताल चेन्ह आऽ संख्या।
सम + वा x
खाली ०
ऽ अवग्रह/बिकारी
- एक मात्राक दू टा बोल
- एक मात्राक चारिटा बोल
एक मात्राक दूटा बोलकेँ धागे आऽ चारि टा बोलकेँ धागेतिट सेहो कहल जाइत अछि।

तालक परिचय
ताल कहरबा
४ टा मात्रा, एकटा विभाग, आऽ पहिल मात्रा पर सम।
धागि
नाति
नक
धिन।

तीन ताल त्रिताल

१६ टा मात्रा, ४-४ मात्राक ४ टा विभाग। १,५ आऽ १३ पर ताली आऽ ९ म मात्रा पर खाली रहैत अछि।
धा धिं धिं धिं
धा धिं धिं धा
धा तिं तिं ता
ता धिं धिं धा
झपताल
१० मात्रा। ४ विभाग, जे क्रमसँ २,३,२,३ मात्राक होइत अछि।
१ मात्रा पर सम, ६ पर खली, ३,८ पर ताली रहैत अछि।
धी ना
धी धी ना

ती ना
धी धी ना

ताल रूपक
७ मात्रा। ३,२,२ मात्राक विभाग।
पहिल विभाग खाली, बादक दू टा भरल होइत अछि।
पहिल मात्रा पर सम आऽ खाली, चारिम आऽ छठम पर ताली होइत अछि।
धी धा त्रक
धी धी
धा त्रक

ह्रस्व-दीर्घ गणना
छन्द दू प्रकारक अछि।मात्रिक आ वार्णिक। वेदमे वार्णिक छन्द अछि।
वार्णिक छन्दक परिचय लिअ। एहिमे अक्षर गणना मात्र होइत अछि। हलंतयुक्त अक्षरकेँ नहि गानल जाइत अछि। एकार उकार इत्यादि युक्त अक्षरकेँ ओहिना एक गानल जाइत अछि जेना संयुक्ताक्षरकेँ। संगहि अ सँ ह केँ सेहो एक गानल जाइत अछि।द्विमानक कोनो अक्षर नहि होइछ।मुख्यतः तीनटा बिन्दु मोन राखू-
१. हलंतयुक्त्त अक्षर-० २. संयुक्त अक्षर-१ ३. अक्षर अ सँ ह -१ प्रत्येक।
आब पहिल उदाहरण देखू :-
ई अरदराक मेघ नहि मानत रहत बरसि के=१+५+२+२+३+३+३+१=१७ मात्रा
आब दोसर उदाहरण देखू ; पश्चात्=२ मात्रा ; आब तेसर उदाहरण देखू
आब=२ मात्रा ; आब चारिम उदाहरण देखू स्क्रिप्ट=२ मात्रा

छन्दोबद्ध रचना पद्य कहबैत अछि-अन्यथा ओ गद्य थीक। छन्द माने भेल एहन रचना जे आनन्द प्रदान करए । मुदा एहिसँ ई नहि बुझबाक चाही जे आजुक नव कविता गद्य कोटिक अछि कारण वेदक सावित्री-गायत्री मंत्र सेहो शिथिल/ उदार नियमक कारण, सावित्री मंत्र गायत्री छंद, मे परिगणित होइत अछि तकर चरचा नीचाँ जा कए होएत - जेना यदि अक्षर पूरा नहि भेल तँ एक आकि दू अक्षर प्रत्येक पादकेँ बढ़ा लेल जाइत अछि। य आ व केर संयुक्ताक्षरकेँ क्रमशः इ आ उ लगा कए अलग कएल जाइत अछि। जेना- वरेण्यम्=वरेणियम्
स्वः= सुवः।
आजुक नव कविताक संग हाइकू/ क्षणिका/ हैकूक लेल मैथिली भाषा आ भारतीय, संस्कृत आश्रित लिपि व्यवस्था सर्वाधिक उपयुक्त्त अछि। तमिल छोड़ि शेष सभटा दक्षिण आ समस्त उत्तर-पश्चिमी आ पूर्वी भारतीय लिपि आ देवनागरी लिपि मे वैह स्वर आ कचटतप व्यञ्जन विधान अछि, जाहिमे जे लिखल जाइत अछि सैह बाजल जाइत अछि। मुदा देवनागरीमे ह्रस्व “इ” एकर अपवाद अछि, ई लिखल जाइत अछि पहिने, मुदा बाजल जाइत अछि बादमे। मुदा मैथिलीमे ई अपवाद सेहो नहि अछि- यथा 'अछि' ई बाजल जाइत अछि अ ह्र्स्व 'इ' छ वा अ इ छ। दोसर उदाहरण लिअ- राति- रा इ त। तँ सिद्ध भेल जे हैकूक लेल मैथिली सर्वोत्तम भाषा अछि। एकटा आर उदाहरण लिअ। सन्धि संस्कृतक विशेषता अछि, मुदा की इंग्लिशमे संधि नहि अछि ? तँ ई की अछि - आइम गोइङ टूवार्ड्सदएन्ड। एकरा लिखल जाइत अछि- आइ एम गोइङ टूवार्ड्स द एन्ड। मुदा पाणिनि ध्वनि विज्ञानक आधार पर संधिक निअम बनओलन्हि, मुदा इंग्लिशमे लिखबा कालमे तँ संधिक पालन नहि होइत छै, आइ एम केँ ओना आइम फोनेटिकली लिखल जाइत अछि, मुदा बजबा काल एकर प्रयोग होइत अछि। मैथिलीमे सेहो यथासंभव विभक्त्ति शब्दसँ सटा कए लिखल आ बाजल जाइत अछि।

छन्द दू प्रकारक अछि।मात्रा छन्द आ वर्ण छन्द ।
वेदमे वर्णवृत्तक प्रयोग अछि मात्रिक छन्दक नहि ।
वार्णिक छन्दमे वर्ण/ अक्षरक गणना मात्र होइत अछि। हलंतयुक्त अक्षरकेँ नहि गानल जाइत अछि। एकार उकार इत्यादि युक्त अक्षरकेँ ओहिना एक गानल जाइत अछि जेना संयुक्ताक्षरकेँ। संगहि अ सँ ह केँ सेहो एक गानल जाइत अछि। एकसँ बेशी मान कोनो वर्ण/ अक्षरक नहि होइछ। मोटा-मोटी तीनटा बिन्दु मोन राखू-
१. हलंतयुक्त अक्षर-०
२. संयुक्त अक्षर-१
३. अक्षर अ सँ ह -१ प्रत्येक।
आब पहिल उदाहरण देखू-
ई अरदराक मेघ नहि मानत रहत बरसि के=१+५+२+२+३+३+१=१७
आब दोसर उदाहरण देखू

पश्चात्=२
आब तेसर उदाहरण देखू
आब=२
आब चारिम उदाहरण देखू
स्क्रिप्ट=२
मुख्य वैदिक छन्द सात अछि-
गायत्री, उष्णिक्, अनुष्टुप्, बृहती, पङ्क्ति, त्रिष्टुप् आ जगती। शेष ओकर भेद अछि, अतिछन्द आ विच्छन्द। एतए छन्दकेँ अक्षरसँ चिन्हल जाइत अछि। जे अक्षर पूरा नहि भेल तँ एक आकि दू अक्षर प्रत्येक पादमे बढ़ा लेल जाइत अछि। य आ व केर संयुक्ताक्षरकेँ क्रमशः इ आ उ लगा कए अलग कएल जाइत अछि। जेना-
वरेण्यम्=वरेणियम्
स्वः= सुवः
गुण आ वृद्धिकेँ अलग कए सेहो अक्षर पूर कए सकैत छी।
ए = अ + इ
ओ = अ + उ
ऐ = अ/आ + ए
औ = अ/आ + ओ

छन्दः शास्त्रमे प्रयुक्त ‘गुरु’ आ ‘लघु’ छंदक परिचय प्राप्त करू।
तेरह टा स्वर वर्णमे अ,इ,उ,ऋ,लृ ई पाँच ह्र्स्व आर आ,ई,ऊ,ऋ,ए.ऐ,ओ,औ, ई आठ दीर्घ स्वर अछि।
ई स्वर वर्ण जखन व्यंजन वर्णक संग जुड़ि जाइत अछि तँ ओकरासँ ‘गुणिताक्षर’ बनैत अछि।
क्+अ= क,
क्+आ=का ।
एक स्वर मात्रा आकि एक गुणिताक्षरकेँ एक ‘अक्षर’ कहल जाइत अछि। कोनो व्यंजन मात्रकेँ अक्षर नहि मानल जाइत अछि- जेना ‘अवाक्’ शब्दमे दू टा अक्षर अछि, अ, वा ।

१. सभटा ह्रस्व स्वर आ ह्रस्व युक्त गुणिताक्षर ‘लघु’ मानल जाइत अछि। एकरा ऊपर U लिखि एकर संकेत देल जाइत अछि।
२. सभटा दीर्घ स्वर आर दीर्घ स्वर युक्त गुणिताक्षर ‘गुरु’ मानल जाइत अछि, आ एकर संकेत अछि, ऊपरमे एकटा छोट -।
३. अनुस्वार किंवा विसर्गयुक्त सभ अक्षर गुरू मानल जाइत अछि।
४. कोनो अक्षरक बाद संयुक्ताक्षर किंवा व्यंजन मात्र रहलासँ ओहि अक्षरकेँ गुरु मानल जाइत अछि। जेना- अच्, सत्य। एहिमे अ आ स दुनू गुरु अछि।
५. जेना वार्णिक छन्द/ वृत्त वेदमे व्यवहार कएल गेल अछि तहिना
स्वरक पूर्ण रूपसँ विचार सेहो ओहि युग सँ भेटैत अछि। स्थूल रीतिसँ ई विभक्त अछि:- १. उदात्त २. उदात्ततर ३. अनुदात्त ४. अनुदात्ततर ५. स्वरित ६. अनुदात्तानुरक्तस्वरित, ७. प्रचय (एकटा श्रुति-अनहत नाद जे बिना कोनो चीजक उत्पन्न होइत अछि, शेष सभटा अछि आहत नाद जे कोनो वस्तुसँ टकरओला पर उत्पन्न होइत अछि)।
१. उदात्त- जे अकारादि स्वर कण्ठादि स्थानमे ऊर्ध्व भागमे बाजल जाइत अछि। एकरा लेल कोनो चेन्ह नहि अछि। २. उदातात्तर- कण्ठादि अति ऊर्ध्व स्थानसँ बाजल जाइत अछि। ३. अनुदात्त- जे कण्ठादि स्थानमे अधोभागमे उच्चारित होइछ।नीचाँमे तीर्यक चेन्ह खचित कएल जाइछ। ४. अनुदातात्ततर- कण्ठादिसँ अत्यंत नीचाँ बाजल जाइत अछि। ५. स्वरित- जाहिमे अनुदात्त रहैत अछि किछु भाग, आ किछु रहैत अछि उदात्त। ऊपरमे ठाढ़ रेखा खेंचल जाइत अछि, एहिमे। ६. अनुदाक्तानुरक्तस्वरित- जाहिमे उदात्त, स्वरित किंवा दुनू बादमे होइछ, ई तीन प्रकारक होइछ। ७. प्रचय-स्वरितक बादक अनुदात्त रहलासँ अनाहत नाद प्रचयक,तानक उत्पत्ति होइत अछि।

१. पूर्वार्चिकमे क्रमसँ अग्नि, इन्द्र आ सोम पयमानकेँ संबोधित गीत अछि।तदुपरान्त आरण्यक काण्ड आ महानाम्नी आर्चिक अछि।आग्नेय, ऐन्द्र आ पायमान पर्वकेँ ग्रामगेयण आ पूर्वार्चिकक शेष भागकेँ आरण्यकगण सेहो कहल जाइछ। सम्मिलित रूपेँ एक प्रकृतिगण कहैत छी। २.उत्तरार्चिक: विकृति आ उत्तरगण सेहो कहैत छी। ग्रामगेयगण आ आरण्यकगणसँ मंत्र चुनि कय क्रमशः उहगण आ ऊह्यगण कहबैछ- तदन्तर प्रत्येक गण दशरात्र, संवत्सर, एकह, अहिन, प्रायश्चित आ क्षुद्र पर्वमे बाँटल जाइछ। पूर्वार्चिक मंत्रक लयकेँ स्मरण क’ उत्तरार्चिक केर द्विक, त्रिक, आ चतुष्टक आदि (२,३, आ ४ मंत्रक समूह) मे एहि लय सभक प्रयोग होइछ। अधिकांश त्रिक आदि प्रथम मंत्र पूर्वार्चिक होइत अछि, जकर लय पर पूरा सूक्त (त्रिक आदि) गाओल जाइछ।
उत्तरार्चिक उहागण आ उह्यगण प्रत्येक लयकेँ तीन बेर तीन प्रकारेँ पढ़ैछ। वैदिक कर्मकाण्डमे प्रस्ताव, प्रस्तोतर द्वारा, उद्गीत उदगातर द्वारा, प्रतिघार प्रतिहातर द्वारा, उपद्रव पुनः उदगातृ द्वारा आ निधान तीनू द्वारा मिलि कय गाओल जाइछ। प्रस्तावक पहिने हिंकार (हिं,हुं,हं) तीनू द्वारा आ ॐ उदगातृ द्वारा उदगीतक पहिने गाओल जाइछ। ई पाँच भक्त्ति भेल।
हाथक मुद्रा- हाथक मुद्रा १.१.औँठा(प्रथम आँगुर)-एक यव दूरी पर २.२. औँठा प्रथम आँगुरकेँ छुबैत ३.३. औँठा बीच आँगुरकेँ छुबैत ४.४. औँठा चारिम आँगुरकेँ छुबैत ५.५. औँठा पाँचम आँगुरकेँ छुबैत ६.११. छठम क्रुष्ट औँठा प्रथम आँगुरसँ दू यव दूरी पर ७.६. सातम अतिश्वर सामवेद ८.७. अभिगीत ऋग्वेद

ग्रामगेयगान- ग्राम आ सार्वजनिक स्थल पर गाओल जाइत छल। आरण्यक गेयगान- वन आ पवित्र स्थानमे गाओल जाइत छल।
ऊहगान- सोमयाग एवं विशेष धार्मिक अवसर पर। पूर्वार्चिकसँ संबंधित ग्रामगेयगान एहि विधिसँ। ऊह्यगान आकि रहस्यगान- वन आ पवित्र स्थान पर गाओल जाइत अछि। पूर्वार्चिकक आरण्यक गानसँ संबंध। नारदीय शिक्षामे सामगानक संबंधमे निर्देश:- १.स्वर-७ ग्राम-३ मूर्छना-२१ तान-४९
सात टा स्वर सा,रे,ग,म,प,ध,नि, आ तीन टा ग्राम-मध्य,मन्द,तीव्र। ७*३=२१ मूर्छना। सात स्वरक परस्पर मिश्रण ७*७=४९ तान।
ऋगवेदक प्रत्येक मंत्र गौतमक २ सामगान (पर्कक) आ काश्यपक १ सामगान (पर्कक) कारण तीन मंत्रक बराबर भऽ जाइत अछि। मैकडॉवेल इन्द्राग्नि, मित्रावरुणौ, इन्द्राविष्णु, अग्निषोमौ एहि सभकेँ युगलदेवता मानलन्हि अछि। मुदा युगलदेव अछि –विशेषण-विपर्यय।
वेदपाठ-
१. संहिता पाठ अछि शुद्ध रूपमे पाठ।
अ॒ग्निमी॑ळे पुरोहि॑त य॒घ्यस्य॑दे॒वम्त्विज॑म।होतार॑रत्न॒ धातमम्।
२. पद पाठ- एहिमे प्रत्येक पदकें पृथक कए पढ़ल जाइत अछि।
३. क्रमपाठ- एतय एकक बाद दोसर, फेर दोसर तखन तेसर, फेर तेसर तखन चतुर्थ। एना कए पाठ कएल जाइत अछि।
४. जटापाठ- एहिमे ज्योँ तीन टा पद क, ख, आ ग अछि तखन पढ़बाक क्रम एहि रूपमे होएत। कख, खक, कख, खग, गख, खग। ५. घनपाठ-एहि मे ऊपरका उदाहरणक अनुसार निम्न रूप होयत- कख,खक,कखग,गखक,कखग। ६. माला, ७. शिखा, ८. रेखा, ९. ध्वज, १०. दण्ड, ११. रथ। अंतिम आठकेँ अष्टविकृति कहल जाइत अछि।
साम विकार सेहो ६ टा अछि, जे गानकेँ ध्यानमे रखैत घटाओल, बढ़ाओल जा सकैत अछि। १. विकार-अग्नेकेँ ओग्नाय। २. विश्लेषण- शब्द/पदकेँ तोड़नाइ ३. विकर्षण-स्वरकेँ खिंचनाई/अधिक मात्राक बड़ाबर बजेनाइ। ४. अभ्यास- बेर-बेर बजनाइ।५. विराम- शब्दकेँ तोड़ि कय पदक मध्यमे ‘यति’। ६. स्तोभ-आलाप योग्य पदकेँ जोड़ि लेब। कौथुमीय शाखा ‘हाउ’ ‘राइ’ जोड़ैत छथि। राणानीय शाखा ‘हावु’, ‘रायि’ जोड़ैत छथि।
मात्रिक छन्दक प्रयोग वेदमे नहि अछि वरन् वर्णवृत्तक प्रयोग अछि आ गणना पाद वा चरणक अनुसार होइत रहए। मुख्य छन्द गायत्री, एकर प्रयोग वेदमे सभसँ बेशी अछि। तकर बाद त्रिष्टुप आ जगतीक प्रयोग अछि।
१. गायत्री- ८-८ केर तीन पाद। दोसर पादक बाद विराम। वा एक पदमे छह टा अक्षर।
२. त्रिष्टुप- ११-११ केर ४ पाद।
३. जगती- १२-१२ केर ४ पाद।
४. उष्णिक- ८-८ केर दू तकर बाद १२ वर्ण-संख्याक पाद।
५. अनुष्टुप- ८-८ केर चारि पाद। एकर प्रयोग वेदक अपेक्षा संस्कृत साहित्यमे बेशी अछि।
६. बृहती- ८-८ केर दू आ तकरा बाद १२ आ ८ मात्राक दू पाद।
७. पंक्त्ति- ८-८ केर पाँच। प्रथम दू पदक बाद विराम अबैछ।
यदि अक्षर पूरा नहि होइत अछि, तँ एक वा दू अक्षर निम्न प्रकारेँ घटा-बढ़ा लेल जाइत अछि।
(अ) वरेण्यम् केँ वरेणियम् स्वः केँ सुवः।
(आ) गुण आ वृद्धि सन्धिकेँ अलग कए लेल जाइत अछि।
ए= अ + इ
ओ= अ + उ
ऐ= अ/आ + ए
औ= अ/आ + ओ
अहू प्रकारेँ नहि पुरलापर अन्य विराडादि नामसँ एकर नामकरण होइत अछि।
यथा- गायत्री (२४)- विराट् (२२), निचृत् (२३), शुद्धा (२४), भुरिक् (२५), स्वराट्(२६)।
ॐ भूर्भुवस्वः । तत् सवितुर्वरेण्यं। भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् ।
वैदिक ऋषि स्वयंकेँ आ देवताकेँ सेहो कवि कहैत छथि। सम्पूर्ण वैदिक साहित्य एहि कवि चेतनाक वाङ्मय मूर्त्ति अछि। ओतए आध्यात्म चेतना, अधिदैवत्वमे उत्तीर्ण भेल अछि, एवम् ओकरा आधिभौतिक भाषामे रूप देल गेल अछि।
देवनागरीक अतिरिक्त्त समस्त उत्तरभारतीय भाषा नेपाल आ दक्षिणमे (तमिलकेँ छोड़ि) सभ भाषा वर्णमालाक रूपमे स्वर आ कचटतप आ य, र ल व, श, स, ह केर वर्णमालाक उपयोग करैत अछि। ग्वाङ केर हेतु संस्कृतमे दोसर वर्ण छैक (छान्दोग्य परम्परामे एकर उच्चारण नहि होइत अछि छथि मुदा वाजसनेयी परम्परामे खूब होइत अछि- जेना छान्दोग्य उच्हारण सभूमि तँ वाजसनेयी उच्चारण सभूमीग्वंङ), ई ह्रस्व दीर्घ दुनू होइत अछि। सिद्धिरस्तु लेल सेहो कमसँ कम छह प्रकारक वर्ण मिथिलाक्षरमे प्रयुक्त होइत अछि। वैदिक संस्कृतमे उदात्त, अनुदात्त आ स्वरित (क्रमशः क॑ क॒ क॓) उपयोग तँ मराठीमे ळ आ अर्द्ध ऱ् केर सेहो प्रयोग होइत अछि। मैथिलीमे ऽ (बिकारी वा अवग्रह) केर प्रयोग संस्कृत जकाँ होइत अछि आ आइ काल्हि एकर बदलामे टाइपक सुविधानुसारे द’ (दऽ केर बदलामे) एहन प्रयोग सेहो होइत अछि मुदा ई प्रयोग ओहि फॉंटमे एकटा तकनीकी न्यूनताक परिचायक अछि। मुदा आकार केर बाद बिकारीक आवश्यकता नहि अछि।
जेना फारसीमे अलिफ बे से आ रोमनमे ए बी सी होइत अछि तहिना मोटा-मोटी सभ भारतीय भाषामे लिपिक भिन्नताक अछैत वर्णमालाक स्वरूप एके रङ अछि।
वर्णमालामे दू प्रकारक वर्ण अछि- स्वर आ व्यंजन। वर्णक संख्या अछि ६४ जाहिमे २२ टा स्वर आ ४२ टा व्यञ्जन अछि।
पहिने स्वरक वर्णन दैत छी- जाहि वर्णक उच्चारणमे दोसर वर्णक उच्चारणक अपेक्षा नहि रहैत अछि, से भेल स्वर।
स्वरक तीन टा भेद अछि- ह्रस्व, दीर्घ आ प्लुत। जाहिमे बाजयमे एक मात्राक समय लागय से भेल ह्रस्व, जाहिमे दू मात्रा समय लागल से भेल दीर्घ आ जाहिमे तीन मात्राक समय लागल से भेल प्लुत।

मूलभूत स्वर अछि- अ इ उ ऋ लृ
पाणिनिसँ पूर्वक आचार्य एकरा समानाक्षर कहैत छलाह।
दीर्घ मिश्र स्वर अछि- ए ऐ ओ औ
पाणिनिसँ पूर्वक आचार्य एकरा सन्ध्यक्षर कहैत छलाह।
लृ दीर्घ नहि होइत अछि आ सन्ध्यक्षर ह्रस्व नहि होइत अछि।
अ इ उ ऋ एहि सभक ह्रस्व, दीर्घ (आ ई ऊ ॠ) आ प्लुत (आ३ ई३ ऊ३ ॠ३) सभ मिला कए १२ वर्ण भेल। लृ केर ह्रस्व आ प्लुत दू भेद अछि (लॄ३) तँ २ टा ई भेल। ए ऐ ओ औ ई चारू दीर्घ मिश्रित स्वर अछि आ एहि चारूक प्लुत रूप सेहो (ए३ ऐ३ ओ३ औ३) होइत अछि, तँ ८ टा ई सेहो भेल। भऽ गेल सभटा मिला कए २२ टा स्वर।

एहि सभटा २२ स्वरक वैदिक रूप तीन तरहक होइत अछि, उदात्त, अनुदात्त आ स्वरित।
ऊँच भाग जेना तालुसँ उत्पन्न अकारादि वर्ण उदात्त गुणक होइत अछि आ तेँ उदात्त कहल जाइत अछि।
नीचाँ भागसँ उत्पन्न स्वर अनुदात्त आ जाहि अकारादि स्वरक प्रथम भागक उच्चारण उदात्त आ दोसर भागक उच्चारण अनुदात्त रूपेँ होइत अछि से भेल स्वरित।
स्वरक दू प्रकार आर अछि, सानुनासिक जेना अँ आ निरनुनासिक जेना अ।
दत्तेन निर्वृत्तः कूपो दात्तः। दत्त नाम्ना पुरुष द्वारा विपाट्- ब्यास धारक उतरबरिया तट पर बनबाओल, एतए इनार भेल दात्त। अञ प्रत्यान्त भेलासँ ’दात्त’ आद्युदात्त भेल, अण् प्रत्यायान्त होइत तँ प्रत्यय स्वरसँ अन्तोदात्त होइत। रूपमे भेद नहि भेलो पर स्वरमे भेद अछि। एहिसँ सिद्ध भेल जे सामान्य कृषक वर्ग सेहो शब्दक सस्वर उच्चारण करैत छलाह।
स्वरितकेँ दोसरो रूपमे बुझि सकैत छी- जेना एहिमे अन्तिम स्वरक तीव्रस्वरमे पुनरुच्चारण होइत अछि।
आब व्यञ्जन पर आऊ।
व्यञ्जन ४२ टा अछि।
क् ख् ग् घ् ङ्
च् छ् ज् झ् ञ्
ट् ठ् ड् ढ् ण्
त् थ् द् ध् न्
प् फ् ब् भ् म्
य् र् ल् व्
श् ष् स्
ह्
य् व् ल् सानुनासिक सेहो होइत अछि, यँ वँ लँ आ निरुनासिक सेहो।
एकर अतिरिक्त्त दू टा आर व्यञ्जन अछि- अनुस्वार आ विसर्जनीय वा विसर्ग।
ई दुनूटा स्वरक अनन्तर प्रयुक्त्त होइत अछि।
विसर्जनीय मूल वर्ण नहि अछि, वरन् स् वा र् केर विकार थीक। विसर्जनीय किछु ध्वनि भेद आ किछु रूपभेदसँ दू प्रकारक अछि- जिह्वामूलीय आ उपध्मानीय। जिह्वामूलीय मात्र क आ ख सँ पूर्व प्रयुक्त्त होइत अछि, दोसर मात्र प आ फ सँ पूर्व।
अनुस्वार, विसर्जनीय, जिह्वामूलीय आ उपध्मानीयकेँ अयोगवाह कहल जाइत अछि।
उपरोक्त्त वर्ण सभकेँ छोड़ि ४ टा आर वर्ण अछि, जकरा यम कहल गेल अछि।
कुँ खुँ गुँ घुँ (यथा- पलिक् क्नी, चख ख्न्नुतः, अग् ग्निः, घ् घ्नन्ति)
पञ्चम वर्ण आगाँ रहला पर पूर्व वर्ण सदृश जे वर्ण बीचमे उच्चारित होइत अछि से यम भेल।
यम सेहो अयोगवाह होइत अछि।
अ आ कवर्ग ह (असंयुक्त्त) आ विसर्जनीय केर उच्चारण कण्ठमे होइत अछि।
इ ई चवर्ग य श केर उच्चारण तालुमे होइत अछि।
ऋ ॠ टवर्ग र ष केर उच्चारण मूर्धामे होइत अछि।
लृ तवर्ग ल स केर उच्चारण दाँतसँ होइत अछि।
उ ऊ पवर्ग आ उपध्मानीय केर उच्चारण ओष्ठसँ होइत अछि।
व केर उच्चारण उपरका दाँतसँ अधर ओष्ठ केर सहायतासँ होइत अछि।
ए ऐ केर उच्चारण कण्ठ आ तालुसँ होइत अछि।
ओ औ केर उच्चारण कण्ठ आ ओष्ठसँ होइत अछि।
य र ल व अन्य व्यञ्जन जेकाँ उच्चारणमे जिह्वाक अग्रादि भाग ताल्वादि स्थानकेँ पूर्णतया स्पर्श नहि करैत अछि। श् ष् स् ह् जकाँ एहिमे तालु आदि स्थानसँ घर्षण सेहो नहि होइत अछि।
क सँ म धरि स्पर्श (वा स्फोटक कारण जिह्वाक अग्र द्वारा वायु प्रवाह रोकि कए छोड़ल जाइत अछि) वर्ण र सँ व अन्तःस्थ आ ष सँ ह घर्षक वर्ण भेल।
सभ वर्गक पाँचम वर्ण अनुनासिक कहबैत अछि कारण आन स्थान समान रहितो एकर सभक नासिकामे सेहो उच्चारण होइत अछि- उच्चारणमे वायु नासिका आ मुँह बाटे बहार होइत अछि।
अनुस्वार आ यम केर उच्चारण मात्र नासिकामे होइत अछि- आ ई सभ नासिक्य कहबैत अछि- कारण एहि सभमे मुखद्वार बन्द रहैत अछि आ नासिकासँ वायु बहार होइत अछि। अनुस्वारक स्थान पर न् वा म् केर उच्चारण नहि होयबाक चाही।
जखन हमरा सभकेँ गप करबाक इच्छा होइत अछि, तखन संकल्पसँ जठराग्नि प्रेरित होइत अछि। नाभि लगक वायु वेगसँ उठैत मूर्धा धरि पहुँचि, जिह्वाक अग्रादि भाग द्वारा निरोध भेलाक अनन्तर मुखक तालु आदि भागसँ घर्षित होइत अछि आ तखन वर्णक उत्पत्ति होइत अछि। कम्पन भेलासँ वायु नादवान आ यैह गूँजित होइत पहुँचैत अछि मुँहमे आ ओकरा कहल जाइत अछि घोषवान, नादरहित भए पहुँचैत अछि श्वासमे आ ओकरा कहल जाइत अछि अघोषवान्।
श्वास प्रकृतिक वर्ण भेल “अघोष” , आ नाद प्रकृतिक भेल “घोषवान्”। जाहि वर्णक उत्पत्तिमे प्राणवायुक अल्पता होइत अछि से अछि “अल्पप्राण” आ जकर उत्पत्तिमे प्राणवायुक बहुलता होइत अछि, से भेल “महाप्राण”।
कचटतप केर पहिल, तेसर आ पाँचम वर्ण भेल अल्पप्राण आ दोसर आ चारिम वर्ण भेल महाप्राण। संगहि कचटतप केर पहिल आ दोसर भेल अघोष आ तेसर, चारिम आ पाँचम भेल घोषवान्। य र ल व भेल अल्पप्राण घोष। श ष स भेल महाप्राण अघोष आ ह भेल महाप्राण घोष।स्वर होइछ अल्पप्राण, उदात्त, अनुदात्त आ स्वरित।

तँ आब लीखू मैथिली गजल। कविता, अकविता, गद्य-कविता, पद्य सभ लेल तर्क उपलब्ध अछि। से मैथिली गजल सेहो अनिवार्य रूपमे बहर(छन्द)मे सरल-वार्णिक, वार्णिक आ मात्रिक छन्दमे कहल जएबाक चाही। जेना सोरठा, चौपाइ छै तहिना गजल छै..उर्दूमे ऐ तरहक प्रयास भेलै..आजाद गजलक नामसँ..), कहबाक आवश्यकता नै जे ओ पूर्ण रूपेँ फ्लॉप भऽ गेलै..५३९ ई.सँ अरबीमे बहर युक्त गजल आइ धरि लिखल जा रहल छै, फारसी आ उर्दूमे सेहो बिना बहरक गजल नै होइ छै..गजलमे भगवान धरिक मजाक उड़ाओल जाइत छै, ओइ अर्थमे ओ उदार छै मुदा बहरक मामिलामे ओ बड्ड कट्टर छै, आ ई कट्टरता ने अरबीमे गजलकेँखम केलकै आ ने उर्दूफारसीमे, मात्रा मिलान आ सहज प्रवाह गजलमे एकटा रीतियेँ होइ छै, आ से ओकर विशेषता छिऐ, नै तँ फेर ई नज्म भऽ जेतै..
भाग-२
मैथिलीमे उच्चारण निर्देश:



दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नहि सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जेकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जेकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जेकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि।
ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि) से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी।
अछि- अ इ छ ऐछ
छथि- छ इ थ – छैथ
पहुँचि- प हुँ इ च
आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ एहि सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा एहिमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- एहि लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि।
फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र ।
उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ/ के/ कऽ हटा कऽ। एहिमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नहि। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू।
रहए- रहै मुदा सकैए- सकै-ए
मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना
से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा।
पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए।
छलै, छलए मे सेहो एहि तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो।
संयोगने- संजोगने
केँ- के / कऽ
केर- क (केर क प्रयोग नहि करू )
क (जेना रामक) –रामक आ संगे राम के/ राम कऽ
सँ- सऽ
चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नहि। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- राम सऽ रामकेँ- राम कऽ राम के

केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ
क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक
कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ
सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ
सऽ तऽ त केर एहि सभक प्रयोग अवांछित।
के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना के कहलक।
नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ एहि सभक उच्चारण- नै

त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नहि) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नहि- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नहि)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नहि)।
राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नहि)
सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन)
पोछैले/
पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन)
पोछए/ पोछै
ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नहि)
ओइ/ ओहि
ओहिले/ ओहि लेल
जएबेँ/ बैसबेँ
पँचभइयाँ
देखियौक (देखिऔक बहि- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित)
जकाँ/ जेकाँ
तँइ/ तैँ
होएत/ हएत
नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ
सौँसे
बड़/ बड़ी (झोराओल)
गाए (गाइ नहि)
रहलेँ/ पहिरतैँ
हमहीं/ अहीं
सब - सभ
सबहक - सभहक
धरि - तक
गप- बात
बूझब - समझब
बुझलहुँ - समझलहुँ
हमरा आर - हम सभ
आकि- आ कि
सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नहि)
मे केँ सँ पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेशी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ।
एकटा दूटा (मुदा कैक टा)
बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नहि।आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नहि (जेना दिअ, आ )
अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचाएक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एत्स्हो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नहि दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)।
अइमे, एहिमे
जइमे, जाहिमे
एखन/ अखन/ अइखन

केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित)
भऽ
मे
दऽ
तँ (तऽ त नहि)
सँ ( सऽ स नहि)
गाछ तर
गाछ लग
साँझ खन
जो (जो go, करै जो do)
लिखू मैथिली गजल:
६ सँ १० टा शेर मोटामोटी एकटा गजलक निर्माण करत। मुदा कोनो ६-७ टा शेरकेँ एकक बाद दोसर लिखि देबै तँ गजल नञि बनि जाएत।
एहिमे दू-चारि टा गपपर ध्यान देमए पड़त।
जेना वर्ड डोक्युमेन्टमे जस्टीफाइ कएलासँ पाँतिक आदि आ अन्तमे एकरूपता आबि जाइ छै तहिना यदि शेरक दुनू पाँती आ गजलक सभ शेरमे बिनु जस्टीफाइ केने पाँतिक आदि आ अन्तमे एकरूपता रहए तँ कहल जाएत जे ओ एकहि बहरमे अछि आ एहि तरहक शेरक समुच्चय एकटा गजलक भाग होएबाक अधिकारी होएत (मैथिलीक सन्दर्भमे वार्णिक छन्दक गणना पद्धति जे भाग-१ मे देल गेल अछि माने

हलंतयुक्त्त अक्षर-0
संयुक्त अक्षर-1
अक्षर अ सँ ह -1 प्रत्येक।
, से उपयोगमे कएल जाए आ ओहि आधारपर १९ बहरक बदला छोट-मझोला आ पैघ आकारक पाँतिक उपयोग कएल जाए- नामकरणक कोनो आवश्यकता नहि)) ; संगहि गजलक पहिल शेरक दुनू पाँतीक अन्त मे आ शेष शेरक दोसर पाँतीक अन्त मे एक वा एकसँ बेशी शब्दक समूह दोहराओल जाएत (रदीफ) सेहो आवश्यक ओना बिनु रदीफक सेहो गजल कहि सकै छी-एक्के भावपर सेहो जजल कहि सकै छी, बिनु मतलाक आ बिनु मकताक (लोक तँ मकतासँ सेहो गजलक प्रारम्भ करै छथि) सेहो गजल लिखि सकै छी- शेरक दुनू पाँती आ गजलक सभ शेरक बहरमे एकरूपता सेहो नहि राखि सकै छी- मुदा ई सभ अपवादे स्वरूप, आ अपवाद तँ अपूर्ण रहिते अछि। मतला एकसँ बेशी सेहो भऽ सकैए। गजल कोन शेर हुस्न-ए-गजल (सभसँ नीक शेर) अछि ताहिमे ओहि गजलक विभिन्न समीक्षकक मध्य मतभिन्नता रहि सकैत अछि। फेर काफिया ओना तँ गजलक सभ शेरमे रहै छै (रदीफक पहिने) आ शब्द बदलै छै (एकाध बेर पुनः प्रयोग कऽ सकै छी) मुदा ध्यानसँ देखलापर लागत जे तुक मिलानीक दृष्टिएँ ओहूमे शब्दक आरम्भ-मध्य-आखिरीक किछु अक्षर नहि बदलै छै। माने लय रहबाके चाही।

आब आऊ किछु गजल सुनी:

सबसबाइत गप्प छल तकैत हमरापर गुम्हराइत (२३ वार्णिक मात्रा - रदीफ गुम्हराइत- काफिया युक्त शब्द हमरापर)
आबैत छलए खौंझाइत आ सेहो ओकरापर गुम्हराइत (२३ वार्णिक मात्रा - रदीफ गुम्हराइत- काफिया युक्त शब्द ओकरापर)

होएत हँसारथि की रहि जाएत चुकड़िऔने ओ मोन मारि (२३ वार्णिक मात्रा )
बाजत नै मुँह फुलौने, रहत मुदा मोनपर गुम्हराइत (२३ वार्णिक मात्रा - रदीफ गुम्हराइत- काफिया युक्त शब्द मोनपर)

ईह कहलकै जे, मोने-मोन प्रसन्न अछि ओ मारने गबदी (२३ वार्णिक मात्रा )
बुझैए सभ हमहीं बुझै छी, नियारे-भासपर गुम्हराइत (२३ वार्णिक मात्रा - रदीफ गुम्हराइत- काफिया युक्त शब्द नियारे-भासपर)

माने तोहूँ आ तोहर बापो हमर सार सम्बन्ध फरिछा देबौ (२३ वार्णिक मात्रा )
गप्पी छथि ! मुँह घुमेने देखैए कोना मचानपर गुम्हराइत (२३ वार्णिक मात्रा - रदीफ गुम्हराइत- काफिया युक्त शब्द मचानपर)

बुझै सभटा छी से नै जे नै बुझै छी मुदा मोना कहैए साइत (२३ वार्णिक मात्रा )
बड़बड़ाइए बाइमे, माने अछि ओ स्वयम् पर गुम्हराइत (२३ वार्णिक मात्रा - रदीफ गुम्हराइत- काफिया युक्त शब्द स्वयम् पर)

"ऐरावत" बुझैत बुझि गेल छी ई जे सृष्टिक पहिलुके राति (२३ वार्णिक मात्रा )
सभ चरित्र रहल देखैत, एक-दोसरापर गुम्हराइत (२३ वार्णिक मात्रा - रदीफ गुम्हराइत- काफिया युक्त शब्द एक-दोसरापर)

(क्रमशः भाग-३ मे)

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रविवार, 4 अप्रैल 2010

नताशा 44 (चित्र-श्रृंखला पढ़बाक लेल नीचाँक चित्रकेँ क्लिक करू आ आनन्द उठाऊ।)


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सुन लक बुचबा टिक भेल ठार

एक टा नया गीत प्रस्तुत अछि। गीतकार छथिन हमर मित्र सहरसा-निवासी शैलेन्द्र कुमार ’शैली’, गीत के धुन आ स्वर- दुनु हुनके देल अछि।



सुन लक बुचबा टिक भेल ठार
कहलक बाबू आबै छि
भैया पढ़s दरभंगा मे
हम त गोबर थापै छि

हमी सब टा काज करै छि
खेती आ पथारी
हमरे बूते देखू बाबू
भरैया बखारी

भैया बुचकुन बाबू छैत
आ हम त बुरि कहाबै छि

सुन लक बुचबा....

भैया जखन गाम अबै छैथ
चाही खीर आ पुरी
हमरा खातिर देखियो सब दिन
वैह चिकना के गुरी

भैया पलंग पर सुतै छैथ
हम पटिया बिछाबै छि

सुन लक बुचबा...

भैया खातिर किन लैथ बाबू
बजाजक स्कूटर
हम खेत-खरिहान उगै छि
एक महिषक ऊपर


भैया खातिर बाटा जूता
हम त एंड़ धराबै छि

सुन लक बुचबा टिक भेल ठार....


- शैलेन्द्र कुमार ’शैली’
कायस्थ टोला
सहरसा-852201
संपर्क- 09430695337

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बृहस्पतिवार, 1 अप्रैल 2010

समय-साल केर मार्च-अप्रील अँक उपलब्ध भेल

1. कार्टून बाला साहेबक-मन्त्रेश्वर झा
2. के अछि कृषकक मर्मांतक पीड़ा देखनिहार(संपादकीय)
3. किछु जानल किछु सोचल(विभिन्न खबरि पर रिपोर्ट)
4. शहरी सुख सं वंचित किसान-महाकान्त मंडल
5. कांग्रेसक विरूद्ध विपक्षक अभाव-मधुकान्त झा
6. मिथिलांचल राज्य चाही-
7. अम्बेदकर सत्य आ सपना-जयराम यादव
8. मिथिला आ मैथिली-राजनन्दन लाल दास
9. सराप(लघुकथा)-रानी झा
10. अबंड जकां बौआइत(कविता)-डॉ. वीरेन्द्र मल्लिक
11. ग़ज़ल-विजयनाथ झा
12. सवाल जागल अछि(कविता)-मधुकान्त झा
13. एहेन त भेल अछि(कविता)-अंशुमान सत्यकेतु
14. पराकाष्ठा(कथा)-भक्तीश्वर झा सारथी
15. सरकार दर्शन- राजशेखर
16. फगुआ में माछ?किन्नहु नहि !-शिवकुमार नीरव
17. स्वर्गक चुनावी दंगल-ज्योतीरीश्वर झा
18. श्रेष्ठतम मैथिली साहित्यकार-अरविन्द कुमार सिंह झा
19. मैथिली भाषाक विकासक बाधक तत्त्व-डॉ. वीरेन्द्र झा
20. जीवन प्रेमीक देह यात्रा थिक-लतिका

पत्रिका प्राप्ति सम्पर्कः 9899891808

प्रस्तुतकर्ताक ब्लॉगः सा विद्या या विमुक्तये


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अप्रैल,2010 केर पाबनि-तिहार

2 अप्रैल: संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी व्रत
5 अप्रैल: शर्करा सप्तमी
6 अप्रैल: कालाष्टमी व्रत
7 अप्रैल: चण्डिका नवमी
11 अप्रैल: प्रदोष व्रत
12 अप्रैल: मासिक शिवरात्रि व्रत
14 अप्रैल: खरमास समाप्त। सतुआइन संक्रान्ति। मेष-संक्रान्ति भोरे 6.57 बजे, पुण्यकाल सूर्योदय सं दुपहर 1.21 बजे तक। हरिद्वार में कल्पवास प्रारंभ। हरिद्वार के महाकुम्भ मे पूर्ण कुम्भयोगक मुख्य स्नान तथा तृतीय (अंतिम) शाही स्नान। चडक पूजा (बंगाल)। सौर नववर्ष प्रारंभ, वैशाखी पर्वोत्सव। स्नान-दान-श्राद्ध केर अमावस्या।
15 अप्रैल: जूडशीतल। मलमास प्रारंभ। बंगाली नववर्ष 1417 प्रारंभ।
18 अप्रैल: वरदविनायक चतुर्थी व्रत।
19 अप्रैल: स्कन्द (कुमार) षष्ठी व्रत। स्वामी कार्तिकेय केर दर्शन-पूजन ।
20 अप्रैल: सूर्य सायन वृष मे भोरे 10.01 बजे। सौर ग्रीष्म ऋतु प्रारंभ।
22 अप्रैल: श्रीदुर्गाष्टमी व्रत। श्रीअन्नपूर्णाष्टमी व्रत। व्यतिपात महापात देर राति 3.14 सं।
23 अप्रैल: बाबू कुँवर सिंह जयंती। व्यतिपात महापात प्रात: 7.44 तक। कुमार योग अपराह्न 1.52 सं रात्रिपर्यन्त।
25 अप्रैल: षाण्मासिक रविव्रत पूर्ण। पुरुषोत्तमी कमला एकादशी व्रत।
26 अप्रैल: सोम-प्रदोष व्रत
27 अप्रैल: पुरुषोत्तमी पूर्णिमा व्रत, श्रीसत्यनारायण पूजा-कथा
28 अप्रैल: स्नान-दान केर पुरुषोत्तमी पूर्णिमा। तीर्थ अथवा पवित्र नदी सभ में स्नान विशेष पुण्यदायक। हरिद्वार महाकुंभ में स्नान।

रूचिगर सूचनाक मंच

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हम नै ई दुनियाँ कहैया ---- मदन कुमार ठाकुर


हम नै ई दुनियाँ कहैया

हमरा राज्य में ई सब भेल ,
फल्ला के राज्य में कि सब भेल
फूसी - फटक सब नेता बजैया ,
इलेक्शन बाद फेर के पुझैया
हम नै ---- ई दुनियाँ कहैया

गाम - गाम में मुखिया सरपंच ,
एक दोसरक सब खाइया अंस
ग्राम विकासक काज कहैया ,
अपन रोजी- रोटी के मार्ग बनबैया,
हम नै ---- ई दुनियाँ कहैया

बढिक दाही रौदिक अकाली ,
घर- खसि ई सब लोग कहैया
एसडियो -बीडीओ सब के लेखा - जोखा ,
भगवती से सद्दा ईहा मनबैया
हम नै ---- ई दुनियाँ कहैया

हॉस्पिटल चकर सब दिन लगैया ,
बिमारी सबहक खान भेटैया
डाक्टर सब नै नजैर परैया ,
अपन किल्निक सदीखन बैसैया
हम नै ---- ई दुनियाँ कहैया

तिलक द्हेजक जखन बात चलैया ,
लाख डेढ़ लाख से कम नै कहैया
अपना पर जखन विपैत परैया ,
बापरे - बाप कहिय दूर भगैया
हम नै ---- ई दुनियाँ कहैया

साधू – संत के जो बात चलैया ,
लोक -लाज से भीन्ने मरैया
आसन लगा सब भाषण करैया ,
अपन पेट लेल खुद्ये मरैया
हम नै ---- ई दुनियाँ कहैया

चिठ्ठी - पत्री के आब पढ़ेया ,
हेंड सेट से फुर्सत नै भेटैया
खन दरिभंगा , खन मधुबनी ,
अपना में सब लोक बजैया
हम नै ---- ई दुनियाँ कहैया

हाय - हेलो सब लोग बजैया ,
छोरी - छोरा संग नाच करैया
अपना के महान बुझैया ,
अपन मान- सम्मान गम्बैया
हम नै ---- ई दुनियाँ कहैया
मदन कुमार ठाकुर
पट्टीटोल , कोठिया ,भैरब स्थान
झंझारपुर , मधुबनी ,
बिहार -८४७४०४

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मिथिलाक खानपान...

मिथिलाक खानपान-नीलिमा चौधरी आ राखी साह... मखानक खीर सामग्री- दूध-१ १/२ किलो, चिन्नी-१०० ग्राम, मखान कुटल- १०० ग्राम, इलाइची पाउडर- स्वाद अनुसार, काजू- १० टा, किशमिश-२०टा बनेबाक विधि- मखानक पाउडर (कनी दरदरा)क पहिने १/२ किलो ठंढ़ा दूधमे घोरि लिअ, शेष दूध केँ खौला लिअ। आब गर्म दूधमे ई घोड़ल मखानक मिश्रण मिला दियौक आर करौछसँ लगातार चलबैत रहियौक जाहिसँ मिश्रण पेनीमे बैसय नहि। .... (आगाँ पढू)

मिथिलांचलक विकास..

मिथिलांचलक विकास... मिथिलांचल क्षेत्र बिहार मे सबस पिछड़ल मानल जाइत अछि, अगर प्रतिव्यक्ति आय , साक्षरता और प्रसवकाल मे जच्चा-बच्चा के मृत्यु के मापदंड बनायल जाय तो मिथिलांचल देश के सबस गरीब आ पिछड़ल इलाका अछि। एकर किछु कारण त अहि इलाका के भौगोलिक बनावट अछि... (आगाँ पढू)

मिथिला अरिपन....

मिथिला चित्रकला- स्त्री आ पुरुषक दशपात अरिपन / स्वास्तिक अरिपन... स्त्रीगणक दशपात अरिपनकन्याक मुण्डन,कान छेदन आ' विवाहक अवसर पर कुलदेवताक घर आकि मण्डप पर बनाओल जाइत अछि।बनेबाक- विधि। एकर बनेबाक विधि सूक्ष्म अछि।ऊपरमे तीन पातक पुष्प, ,ओकरनीँचा पाँच-पातक कमल-पुष्प,ओकर नीचाँ सात-पात युक्त्त कमल, बीचमे अष्टदल कमल अछि। दश पात चारू दिशि अछि। नौ टा माँछक चित्र सेहो अछि... (आगाँ पढू)

एक विलक्षण प्रतिभा...

एक विलक्षण प्रतिभा जिनका हम सदिखन याद करैत छी (प्रथम कड़ी) - कुसुम ठाकुर..... एक बेर हमारा एक पत्रिका में किछु लिखय लेल कहल गेल छल, ई सन् १९९६ क गप्प थिक। हम बस एतबे लिखी सकलौं "हम की लिखी हमर त लेखनिये हेरा गेल"। मुदा आई बुझना जैत अछि जे नै, हमारा एकटा कर्तव्यक निर्वाहन... (आगाँ पढू),
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चिनबारक दीप...

चिनबारक दीप–उषा किरण खान... समस्तीपुर मे गाड़ी बदली कऽ महेसरी अइमे बैसलि सरिया कऽ। आब घर बेसी लग आयल जाइत छैक। चारि टीसन आ छैक, फे तऽ टीसन सऽ एक कोस जमीन हैतै। चारि-पाँच गोटाक हेंज छैक्। बौआइत-बतियाइत गाम पहुँचि जयतै। आठे दिनुका दिन छैक, की सब करतै? एह, करऽक की छैक? सभटा बस्तुजात तऽ कीननहिं जाइत छैक.... (आगाँ पढू)

बिदेसिया (संकल्पित नाटिका)

विद्यापतिक बिदेसिया (संकल्पित नाटिका).... भोजपुरीक साहित्य मैथिलीसँ कम समृद्ध अछि मुदा से अछि मात्र परिमाणमे, गुणवत्ताक दृष्टिमे ई कतेक क्षेत्रमे आगाँ अछि। भोजपुरीक भिखाड़ी ठाकुरक बिदेसियाक सन्दर्भमे हम ई कहि रहल छी। भिखाड़ी ठाकुर कलकत्तामे प्रवासी... (आगाँ पढू)

पाँच पत्र...

पाँच पत्र-हरिमोहन झा... प्रियतमे अहाँक लिखल चारि पाँती चारि सएबेर पढ़लहुँ तथापि तृप्ति नहि भेल। आचार्यक परीक्षा समीप अछि किन्तु ग्रन्थमे कनेको चित्त नहि लगैत अछि। सदिखन अहींक मोहिनी मूर्ति आँखिमे नचैत रहैत अछि। राधा रानी मन होइत अछि जे अहाँक ग्राम वृन्दावन बनि जाइत, जाहिमे केवल अहाँ आ हम राधा-कृष्ण जकाँ अनन्त काल धरि विहार करैत रहितहुँ... (आगाँ पढू)

कथा- माउगि

कथा- माउगि - विभा रानी.... माउगि, माउगि, गे माउगि, गे माउगि! तों माउगि, हम माउगि, ई माउगि, ऊ माउगि - सभ किओ माउगे-माउगि। ऊँहूँ - सभ किओ भला माउगि हुअए। ई तय कर' बाली तों के? अएं गे? तोरा कहिया स' भेटलौ ई हक? ई सभ काज-धंधा हमरा आओरक अछि - हमरे आओर के करे दें। देख त' कने, तोहरो आओर के कतेक रंग-बिरंगा रूप दिया देलियौ! माउगि, गे माउगि.... (आगाँ पढू)

मातृत्व...

डा. मंजू गीता मिश्राक आलेख : मातृत्व.... नारी जीवनक सबसँ गौरवशाली एवं सुखद अनुभव थिक मातृत्व ।ई नारी जीवनक परिपूर्णताक प्रतीक अछि । पूरा नौ मास अपन गर्भमे फलैत-फूलैत एक शिशुक अपन जान सँ बेसी देखभाल करैत छथि । तत्पश्चात एक फूल सन सुन्दर सुकोमल शिशु जन्म लैत अछि, यैह स्त्रीक सबसँ अनमोल उपहार एवं आनन्ददायक क्षण थिक । एहि नौ मासक दौरान गर्भवतीक भोजन एवं वातावरण पर निर्भर करैत अछि.... (आगाँ पढू)
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