शुक्रवार, 22 अक्तूबर 2010

कालीकांत झा "बूच"- 1934-2009 दू टा गजल

1
अहॅक लेल रंजन, हमर भेल गंजन
केहेन खेल ई, रक्त सॅ हस्त मंजन

तरल नेह पर मात्र दुःखक सियाही,
जड़ल देह हम्मर अहॅक आॅखि अंजन

रचल गेल छल जे, सुखक लोक सुन्दर
चलल अछि प्रलय लऽ तकर सुधिप्रभंजन

मृतक हम, अहाॅ छी सुधा स्वर्ग लोकक
अहॅक लेल यौवन हमर गेल जीवन


2
सध्यः अहाॅ, मुदा छी सपना एहि जीवन मे
सहजो सुख भऽ गेल कल्पना एहि जीवन मे

विहुॅसल ठोर विवश भऽ विजुकल,
मादक नैन नोर केर नपना एहि जीवन मे


अछि केॅ कतऽ श्रृंगार सजाओत्,
आश लाश पर कफनक झपना एहि जीवन मे


दुनियाॅ हमर एकातक गहवर,
भेल जिअत मुरूतक स्थपना एहि जीवन मे

दीप वारि अहाॅ द्वारि जड़यलहुॅ,
घऽर हम लोकक अगितपना एहि जीवन मे

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बुधवार, 20 अक्तूबर 2010

कविता

आम चुनाव
अछि गाम-गाम मे उतरि रहल
किछु लोक फेर सँ अनचिन्हार।
अछि पर्व चुनावक आवि गेल
क्षण-क्षण जड़तै सौंसे बिहार।

हमरे गामक किछु लोक बेद
आतंक मचायत अर्थ पाबि।
के कखन ककर दल मे जायत
के छीन लेत सभ वोट आबि।

नहि जानि कते दल बनत फेर
संघर्ष हएत टूटत समाज।
ओ रहत फेर अपने एक्कहि
छै ओकर मात्र विध्वंस काज।

जौं छै सभके उद्ेश्य एक
मानव सेवा कल्याण कार्य।
त’ बनल कियै छै दल सहस्त्र
क’ रहल कियै छै घृणित कार्य।

हम कोना करू प्रतिकार एकर
जड़ि गेल समाजक आत्मबोध।
सभटा जनितो सभ वोट देत
अन्यायक के करतै विरोध।

जातिक अछि भ गेल राजनीति
भाषा भाषा मे भेद भाव।
सभ अपन स्वार्थ मे अंध भेल
क’ रहल मनुक्खक मोल भाव।

बनते सरकार एतय ककरो
नहि बदलि सकत संपूर्ण चित्र।
विपदा बिहार के मिटा सकय
अछि कहाँ आइ ओ एकर मित्र।


सतीश चन्द्र झा

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सोमवार, 11 अक्तूबर 2010

लंदनमे चित्रकला प्रदर्शनी (आर्ट एक्सीविशन) लेल आमंत्रण

मित्रगण, हमर मिथिला चित्रकलाक आर्ट एक्सीविशन लंदनमे  भ' रहल अछि, तै लेल अहाँ सादर आमंत्रित छी... अवश्य आउ...............

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शनिवार, 9 अक्तूबर 2010

हमहूँ मिथिला के बेटी छीक ?

भोरे सूती उठी देखलो
आँखी सं अपन नोर पोछैत ,
माए पुछलक कियाक कनैत छीक ?
की देखलो स्वप्न में कुनू दोस ?
बेटी आँखिक नोर पोछैत --की माए
हमहूँ मिथिला के बेटी छीक ?

जतय सीता जन्मली मैट सं
ओहो एकटा नारी भेली ,
जिनका रचायल वियाह स्वम्बर
हमहूँ ओहिना एगो नारी छीक
बेटी आँखिक नोर पोछैत --की माए
हमहूँ मिथिला के बेटी छीक ?

आय देखैत छीक घर - घर में
दहेजक कारन कतेक घरसे बहार ,
उमर वियाहक बितैत अछि हमरो --
की करू हमहूँ अपन उपचार ?
बेटी आँखिक नोर पोछैत --की माए
हमहूँ मिथिला के बेटी छीक ?

धिया - पुत्ता में कनियाँ - पुतरा संग
अपन जिनगी के केलो बेकार ,
बाबु - काका लगनक आश में
सालक - साल लागोलैन जोगार ,
बेटी आँखिक नोर पोछैत --की माए
हमहूँ मिथिला के बेटी छीक ?

वियाह देखलो संगी - सहेली क
नयन जुरयल मन में आस भेटल ,
बट सावित्री आ मधुश्रवणी पूजितो
सेहो आई सपनोहूँ से छुटल
बेटी आँखिक नोर पोछैत --की माए
हमहूँ मिथिला के बेटी छीक ?

(    समाप्त   )

लेखिका  -
सोनी कुमारी ठाकुर (नॉएडा )
पट्टीटोल , भैरव स्थान ,
झंझारपुर , मधुबनी , बिहार
मो -९३१२४६०१५०

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शुक्रवार, 8 अक्तूबर 2010

करब नै हम नेतागिरी रोजगार --



यो बाबु करब नै,
हम नेतागिरी रोजगार --
लोग कहैत अछि--
ई छी मतलबी दुनियां ,
कम काज पर नै कोनो विचार
लुट - माइर में सब से आगू ,
अपना के कहैत अछि होशियार
यो बाबु करब नै ,
हम नेतागिरी रोजगार --
अपन जिनगी के शर्थक बुझायथ
गरीब जिनगी के नै कोनो उपचार ,
भोट मंगैय लेल दउर - दउर आबैथी
आ काज परलैन त नै कोनो सरोकार ,
यो बाबु करब नै ,
हम नेतागिरी रोजगार --
खन दरिभंगा खन मधुबनी
सब दिन भागैथी बिधान सभा के द्वार ,
खेती - बारी के देखैत अछि ,
जोन- हरवाह के कतेक उपकार
यो बाबु करब नै ,
हम नेतागिरी रोजगार --
रेडियो टी वी सब दिन   कहैया
नेता लोकिन नै केलेन परोपकार ,
अपन पेटक रोजी - रोटी लै
हरदम उठेलैन अपन ललकार ,
यो बाबु करब नै ,
हम नेतागिरी रोजगार --


मदन  कुमार ठाकुर 
पट्टीटोल , भैरब स्थान ,
झंझारपुर , मधुबनी , बिहार
ई मेल -
Madanjagdamba@yahoo.com


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बृहस्पतिवार, 7 अक्तूबर 2010

मारियो वर्गास लोसाकेँ साहित्यक नोबल पुरस्कार


74 वर्षक मारियो वर्गास लोसाकेँ एहि वर्षक साहित्यक 15 लाख डॉलर पुरस्कार राशिक (एक सए लाख क्रोनर) नोबल पुरस्कार देल जा रहल अछि।

लोसा पेरूक (बादमे ओ स्पेनक नागरिकता लए लेलन्हि) स्पेनिश भाषाक लेखक छथि। 1963 ई. मे द टाइम ऑफ द हीरो नाम्ना पहिल उपन्यासक लेखक श्री लोसा मूलतः गद्य लेखक छथि आ ओ निबन्ध, उपन्यास लिखै छथि। नोबल समिति कहलक अछि जे शक्तिक केन्द्रक विरुद्ध व्यक्तिक संघर्षक चित्रण लेल श्री लोसा केँ ई पुरस्कार देल गेल अछि। ओ तीससँ नाटक, निबन्धक अतिरिक्त 30 सँ बेसी उपन्यास लिखने छथि।

हुनकर किछु आन रचना छन्हि: द फीस्ट ऑफ द गोट, ऑंट जूलिया एंड द स्क्रीनराइटर, द ग्रीनहाउस, कंवर्सेशन इन द कैथेड्रल, कैपटन पैनटोजा एंड द स्पेसल सर्विस।

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सोमवार, 4 अक्तूबर 2010

गजल- गजेन्द्र ठाकुर


तेजगर छी से छद्म ज्ञान छल
खिखिर कटाबै भौकी प्रतिपल

हिल्कोरक संग जाइत बहैत
संग हमर जे घास-फूस छल

अकलबेर मे बिसरि गेल जे
गिरिमाल लेने ठाढ़ ओतै छल


सूर्य-किरिण से मद्धिम-मद्धिम
सेहो गर्दासँ झँपा रहल छल

नटुआ बिपटा बनि हँसै अछि
तोहूँ हमरे सन अछि देखल

जागि अन्हरिया केलहुँ काज जे
सेहो मस्त ओंघाएल सन छल

आन्ही संग झमटगर अछार
बान्ह एखनो अछि सुखा रहल

शान्त भंगिमासँ काज करै जाउ
निराउ वर्षा अछि देखा रहल

मानरि-अबाज रहि कऽ अबैछ
झाँपि बोल ई सुना रहल छल

गप बिच्च ठकुरा दैत रहै छी
काज करू धए कए करिनाल

ताहि मनुख-गाछी भुताहि बिच
ओ मनुक्खगन्ध सूंघि सहै छल

बानर पट लैले अछि तैयार
बिरनल सभ करू ने उद्धार

गाएक अर्र-बों सुनि अनठेने
दुहै समऐँ जनताक कपार

पुल बनेबाक समचा छैक नै
अर्थशास्त्र-पोथीक छलै भण्डार

कोरो बाती उबही देबाक लेल
आउ बजाउ बुढ़ानुस - भजार

डरक घाट नहाएल छी हम
से सहब दहोदिश अत्याचार

ऐरावत अछि देखा - देखा कए
सभटा देखैत अछि ओ व्यापार



कानैत दुनू बच्चाकेँ देखलहुँ बिछुड़ैत काल
सम्वेदना छै बाँचल जकर चहुँदिस अकाल

बिसरी हँसैत खिलखिलाइ अनमुनाह सन
अछि बुरबक बताह मथसुन्न अछि ई काल

गम्भीर बात विचारेँ ओढ़ल देखल कलुषता
काल सन चंठ अछि सम्वेत ई सुन्ने देखाएल

लाल सूर्यकेँ पीअर कपीश होइतहिँ ओकर
पाँजड़ दबल मनुषता ई-ओ-हे जाइत काल

सुन्न-मसान बोनक मचानपर बैसल छी की
भगजोगनीक बाड़ल भकराड़ ई राति भेल  

ऐरावत देखैत इजोतक बिर्रो- बाढ़ि- दुर्भिक्ष
ग्रहणक ई सूर्य थाकल देखै छी चोन्हराएल

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रविवार, 3 अक्तूबर 2010

शिव कुमार झा - गजल

आव विसरव कोना सुनू जननी अहॉ, कतेक निर्मल सेहंतित अहॅक ऑचर।
हिय सिहकै जखन वहै लोचन तखन नोर पोछलहुॅ लपेटि हम अहॅक ऑचर।।


कोना अयलहुॅ खलक ? मोन नहि अछि कथा, पवित्र पट सॅ सटल देह भागल व्यथा।
सिनेह निश्छल अनमोल प्रथम सुनलहुॅ मातृबोल, मोह ममताक आन के‘ करत परतर?


दंत दुग्धक उगल, नीर पेट सॅ वहल, देह लुत्ती भरल कंठ सरिता सुखल।
जी करै छल विसविस तालु अतुल टिसटिस, मुॅह मे लऽ चिवयलहुॅ अहॅक ऑचर।



नेना वयसक अवसान ताक‘ चललहुॅ हम ज्ञान, कएलहुॅ गणना अशुद्ध गुरू फोड़ि देलनि कान।
सिलेट वाट पर पटकि मॉक कोर मे सटकि, तीतल कमलाक धार सॅ अहॅक ऑचर।


देखि पॉचमक फल मातृदीक्षा सफल, भाल तिरपित मुदा ! उर तृष्णा भरल।
गेलहुॅ कत‘ हे अम्बे कत‘ गेल ऑचर, ताकि रहलहुॅ हम ऑगन सॅ पिपरक तर।

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कालीकांत झा "बूच"1934-2009 तीनटा गजल

गजल-१



आशवर शीघ्र श्रावण मे औता पिया,
प्यास पर नीर पावन बहौता पिया ।।


देखि हुनका सुखक मारि सहि ने सकब,खसि पड़ब द्वारि पर ठाढ़ रहि ने सकब,
पाशतर थीर छाती लगौता पिया,प्यास पर नीर पावन बहौता पिया ।।


भऽ उमंगित बहत आड़नक बात ई,उल्लसित भऽ रहत चाननक गात ई,
पाततर पिक बनल स्वर सुनौता पिया,प्यास पर नीर पावन बहौता पिया ।।


मन उमड़ि गेल बनि गेल यमुना नदी,तन सिहरि गेल जहिना कदंबक कली,
श्वास पर धीर बंसुरी बजौता पिया,प्यास पर नीर पावन बहौता पिया ।।





गजल-२



स्वप्न सुन्दरि अहाॅ जीवनक सहचरी ।
निन्न मे आउ अहिना घड़ी दू घड़ी ।।



भोग भोगल जते जे बनल कल्पना,आब भऽ गेल अछि अन्तरक अनमना,
हऽम मानव अहाॅ देव लोकक परी ।




मात्र उत्तापदायी बसंती छटा,आब संतापदायी अषाढ़ी घटा,
काॅट लागनि सुखायल गुलाबी छड़ी ।





रूप अमरित पिया कऽ अमर जे केलहुॅ,विक्ख विरहक खोआ फेर की कऽ देलहुॅ ?
घऽर मे जिन्दगी गऽर मरनक कड़ी ।




वेर वेरूक अहॅक फेर अभयागतम्,अछि सदा सर्वदा हार्दिक स्वागतम्,
कप्प चाहक दुहू नैन मन तस्तरी ।





गजल-३


श्याम होइछ परक प्रेम अधलाह हे,
तेॅ बिसरि जाह हमरा बिसरि जाह हे ।



दीप बुझि रूप केॅ जुनि हृदय मे धरह,मोहवाती जरा तेल नेहक भरह ।
कऽ देतऽ जिन्दगी केॅ ई सुड्डाह हे,तेॅ बिसरि जाह हमरा विसरि जाह हे ।


हऽम मधुबन मे साॅझक पहिल तारिका,तोॅ फराके बनावह अपन द्वारिका ।
उठि रहल अछि अनेरेक अफवाह हे,




हम विमल राश केर खास संयोजिका,छी प्रवल गोप केर प्रेयसी गोपिका,
घाट सॅ खुलि चुकल अछि हमर नाह हे,



मोन मे उत्तरी सागरक जल भरह,लाख चुचुकारी बर्फक महल मे धरह,
हम तहू ठाम बरबानलक धाह हे,

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शुक्रवार, 1 अक्तूबर 2010

रूपैआक ढेरी- उमेश मंडल

फुदकैत फुलि‍या कि‍ताब-काँपीक बस्‍ता माटि‍क रैकपर राखि‍ माएकेँ ताकए लगलीह। माए आंगनमे नहि‍ छलीह। पछुआरमे गोरहा पाथैत छलीह। ओना गोरहा पाथैक समए नहि‍ छल तेँ फुलि‍याक मनमे गोरहा पाथैक बात ऐबे नहि‍ कएल छल। मुदा तकबो करैत आ शोरो पाड़ैत। आंगनसँ नि‍कलि‍ जखने फुलि‍या डेढ़ि‍या लग आयलि‍ की गोरहा मचान लगसँ माएक बाजब सुनलक। गोरहा मचान लग पहुँचते फुलि‍या देखलनि‍ जे माए गोरहा पाथि‍ रहलीहेँ। मनमे तामस उठए लगलनि‍ जे एक तँ काति‍क मास तहूमे सूर्यास्‍तक समए, ई कोन समए भेल। अनेरे ठंढ़ लगतनि‍। मन खराब हेतनि‍। मुदा कि‍छु बाजलि‍ नहि‍। अप्‍पन बात बाजलि‍- “माए, परसू मधुबनी जाएब। लड़की‍ सबहक बीच ऽमहि‍ला सशक्‍तीकरणऽ वि‍षयक प्रति‍योगि‍ता अछि‍। सौंसे जि‍लाक छात्रा सभ रहतीह। हमहूँ जाएब। तहि‍ले कमसँ कम पच्‍चीस टा रूपैआक ओरि‍यान कए दे।”

मधुबनीक नाओ सुनि‍ अपन सभ सुधि‍-बुद्धि‍ बि‍सरि‍ गेलीह। हाथ गोबरपर रहनि‍, आँखि‍ बेटीक आँखि‍पर अा मन अकासमे कटल धागाक गुड्डी जकाँ उड़ए लगलनि‍। पँजरामे बैसि‍ फुलि‍या कहए लगलनि‍- “माए, हमरा जरूर इनाम भेटत।‍”

अकाससँ माएक मन धरतीपर खसि‍ पड़ल, मने-मन सोचए लगलीह जे पच्‍चीस रूपैआ कतऽ सँ आनब? कहलखि‍न- “‍बुच्‍ची, ताबे ककरोसँ पैइच लऽ लेह कि‍ए तँ जुग-जमाना बदलि‍ रहल अछि‍, बि‍नु पढ़ल-लि‍खल लोककेँ कोनो मोजर रहतै। तेँ कोनो धरानी रूपैआक ओरि‍यान कऽ लेह। गाए बि‍आएत तँ दूध बेचि‍ कऽ दऽ देबै।”

माएक बात सुि‍न फुलि‍या मुस्‍कुराइत कहलकनि‍- “धुर बुढ़ि‍या नहि‍तन, तीनि‍ रूपैये गोरहा बि‍काइ छै, दसेटा बेचि‍ लेब तहीमे तँ तीस रूपैआ भऽ जाएत। तइले ककरोसँ मुँह छोहनि‍ कि‍ऐ करब। ई तँ रूपैआक ढेरी छि‍अौ। जखैन जत्ते रूपैआक काज हेतौ, तखैन तत्ते बेचि‍ लि‍हेँ। तोरा कि‍ कोनो हेलीकेप्‍टर कीनैक छओ?‍”

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थल-कमल - जगदीश प्रसाद मंडल

जहि‍ना अगुरबार दरमाहा उठा परदेशी घरक काज सम्‍हारैक लेल पत्‍नीकेँ पठबैत आ ओहि‍ रूपैयासँ, टावरक कि‍रदानीसँ अकछि‍ तेसर मोबाइल कीनए जाइत तहि‍ना झंझारपुरक हाटक चाउर-दालि‍क बजारमे ठकाइ देहरादून चाउरक दोकानक आगूमे ठाढ़ भऽ आँखि‍ गरौने। थालमे जनमल कमलक भौंरा सदृश्‍य ठकाइक मनमे उठलै- ऽसात दि‍नसँ दुनू संझी नवका गहूमक रोटी खाइत एलौं, भूसीपर पाइ उठा चाउर कीनए एलौं, जे सस्‍त हएत सहए ने कीनब।ऽ

मुदा लगले थल-कमलक बि‍ढ़नी जकाँ मन घुनघुनाएल- ऽचाउर तँ चाउरे छी, तहन नीक कि‍अए ने कीनब।ऽ

ओझराएल मने ठकाइ सइओ रूपैआमे कि‍लो भरि‍ चाउर कीनि‍, गमछाक खूँटमे बान्‍हि‍, तमाकू चुनबैत घरमुँहा भेल।

बीघा भरि‍ बटाइ खेतक उपजासँ छह मासक बुतात नि‍कलि‍ जाएत। बैशाखक पूर्णिमाक दि‍न। गहूमक लरती-तरती आबि‍ गेल आ धान-चाउरक चलि‍ गेलै। बाड़ीक तरकारी नि‍ङहटि‍ गेल छलैक, लऽ दऽ कऽ पटुआक साग टा छलैक। सेहो रोटी दुआरे छोड़ि‍ये देने। पटुआ सागसँ नीक नोन-मेरि‍चाइ।

हाट जाइये काल परसुका ढोलहो ठकाइकेँ मन पड़ल। मन पड़ि‍ते मुँहसँ हँसी नि‍कलल। मुदा हँसी रूकल नहि‍ मोकरक पानि‍ जकाँ बहि‍ते रहि‍ गेल। बाटो चलै आ असकरे हँसबो करै। तहि‍ बीच एकटा अधवयसू स्‍त्रीगण माथपर छाउरक पथि‍या नेने देखलनि‍ तँ मने-मन घुनघुनेलीह- “पुरूख छी की पुरूखक नांगड़ि‍। केदैन हँसला कीदैन देखि‍।‍” मुदा कि‍छु बजलीह नहि‍।

ठकाइक खुशीक कारण छलैक जे ढोलहो दऽ सोरहा केलक जे ईंटा-सि‍मटीक घर, पानि‍ पीबैले कल, खाइक उपाए एक सए पच्‍चीस रूपैयाक प्रति‍दि‍न काज, रोग-व्‍याधि‍क लेल खरतुआ दवाइ सभकेँ भेटत। जखन सब चीजक उपाए भइये गेल तखन कि‍अए लोक अनेरे मनकेँ भरयौने रहत। तेँ मन खुशी। दरदे ने ककरो माथ टनकै छै जौं दर्द रहबे ने करतै तँ माथ किअए टनकतै।

गामक सीमान टपि‍ते ठकाइक मनमे उठल। देवि‍यो-देवता हारि‍ मानतीह। बड़ दइ छेलखि‍न ते एक दि‍आरी साँझमे समांग, वि‍द्या, धन दइ छेलखि‍न। ईंटा-सि‍मटीक घर, पानि‍ पीबैक कल आकि‍ सवा सौक बोइन तँ नहि‍ दइ छेलखि‍न।

कि‍लो भरि‍ चाउरक मोटरी देखि‍ आंगन बाहरैत बि‍लटी बाढ़ब छोड़ि‍, हाथमे बाढ़नि‍ नेनहि‍ तरंगि‍ कऽ पति‍केँ पुछल- “हाटमे चाउर नइ छलै जे छुछे हाथे घुमि‍ गेलहुँ?‍”

मुस्‍की दैत ठकाइ बाजल- “आँखि‍मे रतौनी भेलि‍ अछि‍ जे चाउरक माटरी नइ देखै छीऐ।‍”

आँत मसोसि‍ बि‍लटी मने-मन सोचए लागलि‍ जे जेहने पटुआ साग गलनमा होइए तेहने अरबा चाउर। तहूमे मोटका चाउर पाँच दि‍न चलबो करैत, ई तँ एक्को दि‍न नइ चलत।

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रचनाक नक़ल नहि हेबाक चाही - मनीष झा "बौआभाई"





पाठकगण,
मैथिल आर मिथिला ब्लॉग

हमरा लोकनिक समक्ष एक-दू टा एहेन रचना एहि चर्चित ब्लॉग पर प्रकाशित भेल अछि, जे कि स्पष्ट रूप स' नक़ल कयल गेल अछि आ ओहि रचनाक शीर्षक एहि प्रकारे अछि-

पहिल-  तरुवाक पंच तिलकोर - प्रविष्टिकर्ता (मदन कुमार ठाकुर) /रचनाकार (मुकेश मिश्रा)
दोसर-  आमक झगरा - प्रविष्टिकर्ता (मदन कुमार ठाकुर) /रचनाकार (मुकेश मिश्रा)

ई प्रसंग हम एहि दुआरे नहि उठा रहल छी, जे हमरा प्रविष्टिकर्ता (मदन कुमार ठाकुर) /रचनाकार (मुकेश मिश्रा) स' कोनो तरहक आपसी द्वेष वा ईर्ष्या अछि (जहां तक हमरा लोकनि एक-दोसर स' अपरिचित छी), मुदा ई प्रसंग हुनका पक्ष में उठायब अत्यधिक उचित बुझना जा रहल अछि, जे एकर मूल रचनाकार छथि आ इन्टरनेट के दुनिया स' दूर एहि प्रकारक जानकारी स' शायद अनभिज्ञ हेताह I
ई बहुत दुःखक बात अछि जे मूल रचनाकार के श्रेय त' दूर हुनक नामों वा सौजन्य के चर्चा तक कतहु नई देखना जा रहल अछि I हम एहि रचना पर टिप्पणी दैत रही मुदा अकस्मात् रचना देखल सन बुझना गेल, हम ठमकि गेलहुँ आ ओहि दिन स' ओहि पुस्तकक खोज में लागि गेलहुँ अंततः सफलता भेटल अर्थात साक्ष्य भेटल, तैं अपनें लोकनिक समक्ष एहि प्रसंग के रखबा में बिलम्ब सेहो भेल क्षमा चाहै छी I

पोथीक जानकारी :
पोथीक नाम- संगम सुधा
(पन्ना सं.-६ आ पन्ना सं.-२४)
लेखक- महेन्द्र कुमार पाठक "अमर"
पेशा स'- मधुबनी कोर्ट में वकील
मैथिल भाषा में एतेक बेसी समर्पणता जे अपन लिखल एहि पोथी के स्वयं ट्रेन में घूमि-घूमि क' एकर प्रचार-प्रसार व्यावसायिक दृष्टिकोण स' नहि, अपितु भाषक उत्थान हेतु करैत रहलाह अछि हुनक एहि असाध मेहनति के बिसरि कियो अपना नाम स' वाहवाही ल' रहल छी ई युक्तिसंगत नहि, नकले करक छल त' ओहि विषय के ल' क' अपन शब्द सजबितौं आ परसितौं I
हमरा एखन जिंदगी के कोनो प्रकारक अनुभव नहि अछि तथापि एकटा निवेदन रचनाकार लोकनि स' ज़रूर करब जे, हमर मिथिलाक माटि ककरो स' ज़रूर बेसी समृद्ध अछि ओ चाहे धन में होय, बल में होय वा बुद्धि में होय, ककरो स' दस डेग आगुए रहैत छी तैं अपन ह्रदय स' निकलल, अपन बुद्धि स' उपजल जे रचना होय ओएह टा प्रकाशित कराबी जाहि स' अपन आत्मसंतुष्टि सेहो भेटत संगहि लोकक अपार स्नेह आ प्रतिष्ठा I खास क' एहेन तरहक चर्चित ब्लॉग पर त' कथमपि नहि राखी जकरा लग रोज़ के लाखो पाठक अछि I हम आशा करै छी जे रचनाकार अपन मूल रचनाक संग समय-समय पर उपस्थित होइत रहताह आ एहेन तरहक क्रियाकलाप स' बचताह I

स्नेहाभिलाषी :
मनीष झा "बौआभाई"
Mailto: manishjhaonline@gmail.com
Blog: http://manishjha1.blogspot.com/

मैथिल आर मिथिला:- पहिल- तरुवाक पंच तिलकोर आ दोसर- आमक झगरा
एहि जालवृत्तसँ हटा देल गेल अछि आ madan kumar thakur जीसँ आग्रह जे एहि प्रकारक रचनाक प्रस्तुति प्रविष्टिकर्ता वा आन रूपमे अपना नामसँ तँ नहिये करथि मुकेश मिश्रा  वा कियो आन व्यक्ति सेहो जे हुनका कोनो रचना अपन रचना कहि दैत छथिन्ह तँ तकरा सेहो एहि घटनाक आलोकमे पोस्ट नै करथि ।


जेना कि बौआभाइ ठीके लिखै छथि-
"हमर मिथिलाक माटि ककरो स' ज़रूर बेसी समृद्ध अछि ओ चाहे धन में होय, बल में होय वा बुद्धि में होय, ककरो स' दस डेग आगुए रहैत छी तैं अपन ह्रदय स' निकलल, अपन बुद्धि स' उपजल जे रचना होय ओएह टा प्रकाशित कराबी जाहि स' अपन आत्मसंतुष्टि सेहो भेटत संगहि लोकक अपार स्नेह आ प्रतिष्ठा I खास क' एहेन तरहक चर्चित ब्लॉग पर त' कथमपि नहि राखी जकरा लग रोज़ के लाखो पाठक अछि I हम आशा करै छी जे रचनाकार अपन मूल रचनाक संग समय-समय पर उपस्थित होइत रहताह आ एहेन तरहक क्रियाकलाप स' बचताह I" 

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मिथिलाक खानपान...

मिथिलाक खानपान-नीलिमा चौधरी आ राखी साह... मखानक खीर सामग्री- दूध-१ १/२ किलो, चिन्नी-१०० ग्राम, मखान कुटल- १०० ग्राम, इलाइची पाउडर- स्वाद अनुसार, काजू- १० टा, किशमिश-२०टा बनेबाक विधि- मखानक पाउडर (कनी दरदरा)क पहिने १/२ किलो ठंढ़ा दूधमे घोरि लिअ, शेष दूध केँ खौला लिअ। आब गर्म दूधमे ई घोड़ल मखानक मिश्रण मिला दियौक आर करौछसँ लगातार चलबैत रहियौक जाहिसँ मिश्रण पेनीमे बैसय नहि। .... (आगाँ पढू)

मिथिलांचलक विकास..

मिथिलांचलक विकास... मिथिलांचल क्षेत्र बिहार मे सबस पिछड़ल मानल जाइत अछि, अगर प्रतिव्यक्ति आय , साक्षरता और प्रसवकाल मे जच्चा-बच्चा के मृत्यु के मापदंड बनायल जाय तो मिथिलांचल देश के सबस गरीब आ पिछड़ल इलाका अछि। एकर किछु कारण त अहि इलाका के भौगोलिक बनावट अछि... (आगाँ पढू)

मिथिला अरिपन....

मिथिला चित्रकला- स्त्री आ पुरुषक दशपात अरिपन / स्वास्तिक अरिपन... स्त्रीगणक दशपात अरिपनकन्याक मुण्डन,कान छेदन आ' विवाहक अवसर पर कुलदेवताक घर आकि मण्डप पर बनाओल जाइत अछि।बनेबाक- विधि। एकर बनेबाक विधि सूक्ष्म अछि।ऊपरमे तीन पातक पुष्प, ,ओकरनीँचा पाँच-पातक कमल-पुष्प,ओकर नीचाँ सात-पात युक्त्त कमल, बीचमे अष्टदल कमल अछि। दश पात चारू दिशि अछि। नौ टा माँछक चित्र सेहो अछि... (आगाँ पढू)

एक विलक्षण प्रतिभा...

एक विलक्षण प्रतिभा जिनका हम सदिखन याद करैत छी (प्रथम कड़ी) - कुसुम ठाकुर..... एक बेर हमारा एक पत्रिका में किछु लिखय लेल कहल गेल छल, ई सन् १९९६ क गप्प थिक। हम बस एतबे लिखी सकलौं "हम की लिखी हमर त लेखनिये हेरा गेल"। मुदा आई बुझना जैत अछि जे नै, हमारा एकटा कर्तव्यक निर्वाहन... (आगाँ पढू),
(दोसर कड़ी), (तेसर कड़ी), (चारिम कड़ी), (पाँचम कड़ी), (छठम कड़ी), (सातम कड़ी), (आठम कड़ी), (नवम कड़ी), (दसम कड़ी), (एग्यारहम कड़ी), (बारहम कड़ी), (तेरहम कड़ी), (चौदहम कड़ी), (पन्द्रहम कड़ी )

चिनबारक दीप...

चिनबारक दीप–उषा किरण खान... समस्तीपुर मे गाड़ी बदली कऽ महेसरी अइमे बैसलि सरिया कऽ। आब घर बेसी लग आयल जाइत छैक। चारि टीसन आ छैक, फे तऽ टीसन सऽ एक कोस जमीन हैतै। चारि-पाँच गोटाक हेंज छैक्। बौआइत-बतियाइत गाम पहुँचि जयतै। आठे दिनुका दिन छैक, की सब करतै? एह, करऽक की छैक? सभटा बस्तुजात तऽ कीननहिं जाइत छैक.... (आगाँ पढू)

बिदेसिया (संकल्पित नाटिका)

विद्यापतिक बिदेसिया (संकल्पित नाटिका).... भोजपुरीक साहित्य मैथिलीसँ कम समृद्ध अछि मुदा से अछि मात्र परिमाणमे, गुणवत्ताक दृष्टिमे ई कतेक क्षेत्रमे आगाँ अछि। भोजपुरीक भिखाड़ी ठाकुरक बिदेसियाक सन्दर्भमे हम ई कहि रहल छी। भिखाड़ी ठाकुर कलकत्तामे प्रवासी... (आगाँ पढू)

पाँच पत्र...

पाँच पत्र-हरिमोहन झा... प्रियतमे अहाँक लिखल चारि पाँती चारि सएबेर पढ़लहुँ तथापि तृप्ति नहि भेल। आचार्यक परीक्षा समीप अछि किन्तु ग्रन्थमे कनेको चित्त नहि लगैत अछि। सदिखन अहींक मोहिनी मूर्ति आँखिमे नचैत रहैत अछि। राधा रानी मन होइत अछि जे अहाँक ग्राम वृन्दावन बनि जाइत, जाहिमे केवल अहाँ आ हम राधा-कृष्ण जकाँ अनन्त काल धरि विहार करैत रहितहुँ... (आगाँ पढू)

कथा- माउगि

कथा- माउगि - विभा रानी.... माउगि, माउगि, गे माउगि, गे माउगि! तों माउगि, हम माउगि, ई माउगि, ऊ माउगि - सभ किओ माउगे-माउगि। ऊँहूँ - सभ किओ भला माउगि हुअए। ई तय कर' बाली तों के? अएं गे? तोरा कहिया स' भेटलौ ई हक? ई सभ काज-धंधा हमरा आओरक अछि - हमरे आओर के करे दें। देख त' कने, तोहरो आओर के कतेक रंग-बिरंगा रूप दिया देलियौ! माउगि, गे माउगि.... (आगाँ पढू)

मातृत्व...

डा. मंजू गीता मिश्राक आलेख : मातृत्व.... नारी जीवनक सबसँ गौरवशाली एवं सुखद अनुभव थिक मातृत्व ।ई नारी जीवनक परिपूर्णताक प्रतीक अछि । पूरा नौ मास अपन गर्भमे फलैत-फूलैत एक शिशुक अपन जान सँ बेसी देखभाल करैत छथि । तत्पश्चात एक फूल सन सुन्दर सुकोमल शिशु जन्म लैत अछि, यैह स्त्रीक सबसँ अनमोल उपहार एवं आनन्ददायक क्षण थिक । एहि नौ मासक दौरान गर्भवतीक भोजन एवं वातावरण पर निर्भर करैत अछि.... (आगाँ पढू)
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