शुक्रवार, 31 दिसम्बर 2010

नूतन वर्षक हार्दिक शुभ - कामना...



ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ

सर्व मंगल मांगल्ये, शिवे सर्वार्थ साधिके!
शरण्ये त्रयंबके गौरी, नारायणी नमोस्तुते!!

ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ

माँ दुर्गा अपनेक शांति, शक्ति, सम्पति, स्वरुप, संयम, सादगी,
सफलता, समृद्धि, साधना, संस्कार, आर स्वास्थ्य प्रदान करैथ!
आबई बला
अंग्रेजी नूतन वर्ष में अपने आ अपनेक समस्त परिवारक
लेल हमर ई कामना अछि! नूतन वर्षक हार्दिक शुभ - कामना!!

ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ

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सोमवार, 27 दिसम्बर 2010

सोमदेवकेँ प्रबोध साहित्य सम्मान २०११


सोमदेवकेँ प्रबोध साहित्य सम्मान २०११ देल जाएत।

सोमदेव 1934- उपन्यासकार ओ कवि । साहित्य अकादेमी पुरस्कारसँ सम्मानित । प्रकाशित कृति: चानोदाइ, होटल अनारकली (उपन्यास), काल ध्वनि (कविता संग्रह), चरैवेति (गीति नाट्य) सोम सतसइ (दोहा)।२००२- सोमदेव (सहस्रमुखी चौक पर, पद्य) लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार। २००१ . - श्री सोमदेव, दरभंगा;यात्री-चेतना पुरस्कार, प्रबोध साहित्य सम्मान २०११।


साहित्य अकादेमी  फेलो- भारत देशक सर्वोच्च साहित्य पुरस्कार (मैथिली)

१९९४- नागार्जुन (स्व. श्री वैद्यनाथ मिश्र यात्री १९११-१९९८ ) , हिन्दी आ मैथिली कवि।
२०१०- चन्द्रनाथ मिश्र अमर (१९२५- )- मैथिली साहित्य लेल।


साहित्य अकादेमी भाषा सम्मान ( क्लासिकल आ मध्यकालीन साहित्य आ गएर मान्यताप्राप्त भाषा लेल)
 २०००- डॉ. जयकान्त मिश्र (क्लासिकल आ मध्यकालीन साहित्य लेल।)          

२००७- पं. डॉ. शशिनाथ झा (क्लासिकल मध्यकालीन साहित्य लेल।)
            पं. श्री उमारमण मिश्र

साहित्य अकादेमी पुरस्कार- मैथिली

१९६६- यशोधर झा (मिथिला वैभव, दर्शन)
१९६८- यात्री (पत्रहीन नग्न गाछ, पद्य)
१९६९- उपेन्द्रनाथ झा “व्यास” (दू पत्र, उपन्यास)
१९७०- काशीकान्त मिश्र “मधुप” (राधा विरह, महाकाव्य)
१९७१- सुरेन्द्र झा “सुमन” (पयस्विनी, पद्य)
१९७३- ब्रजकिशोर वर्मा “मणिपद्म” (नैका बनिजारा, उपन्यास)
१९७५- गिरीन्द्र मोहन मिश्र (किछु देखल किछु सुनल, संस्मरण)
१९७६- वैद्यनाथ मल्लिक “विधु” (सीतायन, महाकाव्य)
१९७७- राजेश्वर झा (अवहट्ठ: उद्भव ओ विकास, समालोचना)
१९७८- उपेन्द्र ठाकुर “मोहन” (बाजि उठल मुरली, पद्य)
१९७९- तन्त्रनाथ झा (कृष्ण चरित, महाकाव्य)
१९८०- सुधांशु शेखर चौधरी (ई बतहा संसार, उपन्यास)
१९८१- मार्कण्डेय प्रवासी (अगस्त्यायिनी, महाकाव्य)
१९८२- लिली रे (मरीचिका, उपन्यास)
१९८३- चन्द्रनाथ मिश्र “अमर” (मैथिली पत्रकारिताक इतिहास)
१९८४- आरसी प्रसाद सिंह (सूर्यमुखी, पद्य)
१९८५- हरिमोहन झा (जीवन यात्रा, आत्मकथा)
१९८६- सुभद्र झा (नातिक पत्रक उत्तर, निबन्ध)
१९८७- उमानाथ झा (अतीत, कथा)
१९८८- मायानन्द मिश्र (मंत्रपुत्र, उपन्यास)
१९८९- काञ्चीनाथ झा “किरण” (पराशर, महाकाव्य)
१९९०- प्रभास कुमार चौधरी (प्रभासक कथा, कथा)
१९९१- रामदेव झा (पसिझैत पाथर, एकांकी)
१९९२- भीमनाथ झा (विविधा, निबन्ध)
१९९३- गोविन्द झा (सामाक पौती, कथा)
१९९४- गंगेश गुंजन (उचितवक्ता, कथा)
१९९५- जयमन्त मिश्र (कविता कुसुमांजलि, पद्य)
१९९६- राजमोहन झा (आइ काल्हि परसू, कथा संग्रह)
१९९७- कीर्ति नारायण मिश्र (ध्वस्त होइत शान्तिस्तूप, पद्य)
१९९८- जीवकान्त (तकै अछि चिड़ै, पद्य)
१९९९- साकेतानन्द (गणनायक, कथा)
२०००- रमानन्द रेणु (कतेक रास बात, पद्य)
२००१- बबुआजी झा “अज्ञात” (प्रतिज्ञा पाण्डव, महाकाव्य)
२००२- सोमदेव (सहस्रमुखी चौक पर, पद्य)
२००३- नीरजा रेणु (ऋतम्भरा, कथा)
२००४- चन्द्रभानु सिंह (शकुन्तला, महाकाव्य)
२००५- विवेकानन्द ठाकुर (चानन घन गछिया, पद्य)
२००६- विभूति आनन्द (काठ, कथा)
२००७- प्रदीप बिहारी (सरोकार, कथा
२००८- मत्रेश्वर झा (कतेक डारि पर, आत्मकथा)
२००९- स्व.मनमोहन झा (गंगापुत्र, कथासंग्रह)

साहित्य अकादेमी मैथिली अनुवाद पुरस्कार

१९९२- शैलेन्द्र मोहन झा (शरतचन्द्र व्यक्ति आ कलाकार-सुबोधचन्द्र सेन, अंग्रेजी)
१९९३- गोविन्द झा (नेपाली साहित्यक इतिहास- कुमार प्रधान, अंग्रेजी)
१९९४- रामदेव झा (सगाइ- राजिन्दर सिंह बेदी, उर्दू)
१९९५- सुरेन्द्र झा “सुमन” (रवीन्द्र नाटकावली- रवीन्द्रनाथ टैगोर, बांग्ला)
१९९६- फजलुर रहमान हासमी (अबुलकलाम आजाद- अब्दुलकवी देसनवी, उर्दू)
१९९७- नवीन चौधरी (माटि मंगल- शिवराम कारंत, कन्नड़)
१९९८- चन्द्रनाथ मिश्र “अमर” (परशुरामक बीछल बेरायल कथा- राजशेखर बसु, बांग्ला)
१९९९- मुरारी मधुसूदन ठाकुर (आरोग्य निकेतन- ताराशंकर बंदोपाध्याय, बांग्ला)
२०००- डॉ. अमरेश पाठक, (तमस- भीष्म साहनी, हिन्दी)
२००१- सुरेश्वर झा (अन्तरिक्षमे विस्फोट- जयन्त विष्णु नार्लीकर, मराठी)
२००२- डॉ. प्रबोध नारायण सिंह (पतझड़क स्वर- कुर्तुल ऐन हैदर, उर्दू)
२००३- उपेन्द दोषी (कथा कहिनी- मनोज दास, उड़िया)
२००४- डॉ. प्रफुल्ल कुमार सिंह “मौन” (प्रेमचन्द की कहानी-प्रेमचन्द, हिन्दी)
२००५- डॉ. योगानन्द झा (बिहारक लोककथा- पी.सी.राय चौधरी, अंग्रेजी)
२००६- राजनन्द झा (कालबेला- समरेश मजुमदार, बांग्ला)
२००७- अनन्त बिहारी लाल दास “इन्दु” (युद्ध आ योद्धा-अगम सिंह गिरि, नेपाली)
२००८- ताराकान्त झा (संरचनावाद उत्तर-संरचनावाद एवं प्राच्य काव्यशास्त्र-गोपीचन्द नारंग, उर्दू)
२००९- भालचन्द्र झा (बीछल बेरायल मराठी एकाँकी-  सम्पादक सुधा जोशी आ रत्नाकर मतकरी, मराठी)
साहित्य अकादेमी मैथिली बाल साहित्य पुरस्कार
 
२०१०-तारानन्द वियोगीकेँ पोथी "ई भेटल तँ की भेटल"  लेल

प्रबोध सम्मान

प्रबोध सम्मान 2004- श्रीमति लिली रे (1933- )
प्रबोध सम्मान 2005- श्री महेन्द्र मलंगिया (1946- )
प्रबोध सम्मान 2006- श्री गोविन्द झा (1923- )
प्रबोध सम्मान 2007- श्री मायानन्द मिश्र (1934- )
प्रबोध सम्मान 2008- श्री मोहन भारद्वाज (1943- )
प्रबोध सम्मान 2009- श्री राजमोहन झा (1934- )
प्रबोध सम्मान 2010- श्री जीवकान्त (1936- )
प्रबोध सम्मान 2011- श्री सोमदेव (1934- )

यात्री-चेतना पुरस्कार


२००० ई.- पं.सुरेन्द्र झा “सुमन”, दरभंगा;
२००१ ई. - श्री सोमदेव, दरभंगा;
२००२ ई.- श्री महेन्द्र मलंगिया, मलंगिया;
२००३ ई.- श्री हंसराज, दरभंगा;
२००४ ई.- डॉ. श्रीमती शेफालिका वर्मा, पटना;
२००५ ई.-श्री उदय चन्द्र झा “विनोद”, रहिका, मधुबनी;
२००६ ई.-श्री गोपालजी झा गोपेश, मेंहथ, मधुबनी;
२००७ ई.-श्री आनन्द मोहन झा, भारद्वाज, नवानी, मधुबनी;
२००८ ई.-श्री मंत्रेश्वर झा, लालगंज,मधुबनी
२००९ ई.-श्री प्रेमशंकर सिंह, जोगियारा, दरभंगा
२०१० ई.- डॉ. तारानन्द वियोगी, महिषी, सहरसा


कीर्तिनारायण मिश्र साहित्य सम्मान

२००८ ई. - श्री हरेकृष्ण झा (कविता संग्रह “एना त नहि जे”)
२००९ ई.-श्री उदय नारायण सिंह “नचिकेता” (नाटक नो एण्ट्री: मा प्रविश)
२०१० ई.- श्री महाप्रकाश (कविता संग्रह “संग समय के”)

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शनिवार, 25 दिसम्बर 2010

मैथिली गजलशास्त्र - १२

गजल द्वारा किछु संदेश, किछु भावनात्मक अभिव्यक्ति, किछु जीवन दर्शन, सौन्दर्य आकि प्रेम ओ विरहक सौन्दर्य प्रदर्शित रहबाक चाही। किछु एहेन जे सायास नै अनायास होअए। तेँ गजल आन पद्य-कविता जेना- कहल जएबाक चाही, लिखल नै। लिखल तँ चित्र जाइत अछि- मिथिला चित्रकला लिखिया द्वारा लिखल जाइत अछि, संस्कृतमे हम कहै छिऐ- अहं चित्रं लिखामि। गजलक विषय अलग होइत अछि, गजलशास्त्रक अधारपर भजन लिख देलासँ ओ गजल नै भऽ जाएत। अरबीमे तँ गजलक अर्थे होइ छै स्त्रीसँ वार्तालाप। गजल प्रेम विरहक बादो, नै पौलाक बादो, लोकापवाद आ तथाकथित अवैध रहलाक उत्तरो प्रेमक रस लैत अछि। ई प्रेम भगवान आ भक्तक बीच सेहो भऽ सकैत अछि, शारीरिक आ आध्यात्मिक भऽ सकैत अछि। ई राधाक प्रेम भऽ सकैत अछि तँ मीराक सेहो। ई प्रेम दुनू दिससँ हो सेहो जरूरी नै। भावनाक उद्रेक आ संगमे गजल कहि कऽ आत्मतुष्टिक लेल गजलकार भावनाक उद्रेककेँ क्षणिक नै वास्तविक आ स्थायी बनाबथि तखने नीक गजल लिखि सकै छथि।
रुबाइ:



रुबाइक चतुष्पदीमे पहिल दोसर आ चारिम पाँती काफिया युक्त होइत अछि; आ मात्रा २० वा २१ हेबाक चाही।
रुबाइमे मात्रा २० वा २१ राखू। रुबाइक सभ पाँतीक प्रारम्भ दू तरहे शुरू होइत अछि- १.दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ (मफलु ।।U )सँ वा २.दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व (मफलुन ।।।) सँ। ओना फारसी रुबाइमे पाँती सभ लेल प्रारम्भक आगाँक ह्रस्व-दीर्घ क्रम निर्धारित छै, मुदा मैथिली लेल अहाँ २०-२१ मात्राक कोनो छन्द जे १.दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ (मफलु ।।U )सँ वा २.दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व (मफलुन ।।।) सँ प्रारम्भ होइत हो, तकरा उठा सकै छी। पाँती २० वा २१ मात्राक हेबाक चाही, (मफलु ।।U ) वा (मफलुन ।।।) सँ प्रारम्भ हेबाक चाही।
मुदा एक रुबाइक वाक्य सभक बहर वा छन्द/ लय एकसँ बेशी तरहक भऽ सकैए। चारू पाँतीमे सेहो काफियाक मिलान भऽ सकैए।

आन चतुष्पदी जाइमे पहिल दोसर आ चारिम पाँती काफिया युक्त होइत अछि मुदा मात्रा २०-२१ नै हुअए से रुबाइ नै
मैथिलीमे मुदा "कता"क परिभाषामे अओत जँ प्रारम्भ दीर्घ-दीर्घसँ हुअए मुदा छन्द आगाँ सरल वार्णिक, वार्णिक वा ,मात्रिक हुअए “कता”क प्रारम्भ दीर्घ-दीर्घसँ हुअए मुदा मात्रिक वा वार्णिकमे दुनूमेसँ कोनो एकमे शेर लिख सकै छी,  कमसँ कम दोसर चारिम पाँतीक काफिया मिलबाक चाही।
रुबाइक चतुष्पदीक चारिम पाँती भावक चरम हेबाक चाही।

रुबाइ
कारी अनहार मेघ, आ नै होइए
कत्तौ बलुआ माटि, खा नै होइए
दाहीजरती देखि, हिलोरै-ए मेघ
 भगजोगनी भकरार, जा नै होइए
बहर आ छन्दक मिलानी

गजल कोनो ने कोनो बहर (छन्द) मे हेबाक चाही। वार्णिक छन्दमे सेहो ह्रस्व आ दीर्घक विचार राखल जा सकैत अछि, कारण वैदिक वर्णवृत्तमे बादमे वार्णिक छन्दमे ई विचार शुरू भऽ गेल छल:- जेना
तकैत रहैत छी ऐ मेघ दिस
तकैत (ह्रस्व+दीर्घ+दीर्घ)- वर्णक संख्या-तीन
रहैत (ह्रस्व+दीर्घ+ह्रस्व)- वर्णक संख्या-तीन
छी (दीर्घ) वर्णक संख्या-एक
(दीर्घ) वर्णक संख्या-एक
मेघ (दीर्घ+ह्रस्व) वर्णक संख्या-दू
दिस (ह्रस्व+ह्रस्व) वर्णक संख्या-दू

मात्रिक छन्दमे द्विकल, त्रिकल, चतुष्कल, पञ्चकल आ षटकल अन्तर्गत एक वर्ण (एकटा दीर्घ) सँ छह वर्ण (छहटा ह्रस्व) धरि भऽ सकैए।
द्विकलमे- कुल मात्रा दू हएत, से एकटा दीर्घ वा दूटा ह्रस्व हएत।
त्रिकलमे कुल मात्रा तीन हएत- ह्रस्व+दीर्घ, दीर्घ+ह्रस्व आ ह्रस्व+ह्रस्व+ह्रस्व; ऐ तीन क्रममे।
चतुष्कलमे कुल मात्रा चारि; पञ्चकलमे पाँच; षटकलमे छह मात्रा हएत।
वार्णिक छन्द तीन-तीन वर्णक आठ प्रकारक होइत अछि जे यमाताराजसलगम् सूत्रसँ मोन राखि सकै छी।
आब कतेक पाद आ कतऽ काफिया (यति,अन्त्यानुप्रास) देबाक अछि; कोन तरहेँ क्रम बनेबाक अछि से अहाँ स्वयं वार्णिक/ मात्रिक आधारपर कऽ सकै छी, आ विविधता आनि सकै छी।


वर्ण छन्दमे तीन-तीन अक्षरक समूहकेँ एक गण कहल जाइत अछि। ई आठ टा अछि-

यगण U।।

रगण ।U।

तगण ।। U

भगण । U U

जगण U। U

सगण U U ।

मगण ।।।

नगण U U U


एहि आठक अतिरिक्त दूटा आर गण अछि- ग / ल

ग- गण एकल दीर्घ ।

ल- गण एकल ह्रस्व U

एक सूत्र- आठो गणकेँ मोन रखबा लेल:-

यमाताराजभानसलगम्

आब एहि सूत्रकेँ तोड़ू-

यमाता U।। = यगण

मातारा ।।। = मगण

ताराज ।। U = तगण

राजभा ।U। = रगण

जभान U। U = जगण

भानस । U U = भगण

नसल U U U = नगण

सलगम् U U । = सगण


बहरे मुतकारिब मुतकारिब आठ–रुक्न फ ऊ लुन (U।।) – चारि बेर

वर्णवृत्त भुजंगप्रयात : प्रति चरण यगण (U।।) – चारि बेर। बारह वर्ण। पहिल, चारिम, सातम आ दसम ह्रस्व, शेष दीर्घ। छअम आ आखिरी वर्णक बाद अर्द्ध-विराम।

बहरे मुतकारिब चारि–रुक्न फ ऊ लुन (U।।) – दू बेर

वर्ण वृत्त सोमराजी यगण (U।।) – दू बेर। छह वर्ण। पहिल आ चारिम ह्रस्व, शेष दीर्घ। दोसर आ अन्तिम वर्णक बाद अर्द्ध-विराम।

मात्रिक रूप- प्रति चरण बीस मात्रा। पहिल, छअम, एगारहम आ सोलहम मात्रा ह्रस्व।

बहरे मुतदारिक मुतदारिक आठ–रुक्न फा इ लुन (।U।) – चारि बेर

वर्ण वृत्त स्रग्विणी रगण (।U।) – चारि बेर। बारह वर्ण। दोसर, पाँचम, आठम आ एगारहम ह्रस्व आ शेष दीर्घ। छअम आ आखिरी वर्णक बाद अर्द्ध-विराम।

मात्रिक रूप- प्रति चरण बीस मात्रा। तेसर, आठम, तेरहम आ अठ्ठारहम मात्रा ह्रस्व।


महजूफ: बहरे रमल मुसम्मन महजूफ फा–इ–ला–तुन ।U।। फा–इ–ला–तुन ।U।। फा–इ–ला–तुन ।U।। फा इ लुन । U ।

मात्रिक छंद गीतिका -प्रति चरण २६ मात्रा। तेसर, दसम, सत्रहम आ चौबीसम मात्रा ह्रस्व।


गीतिका-वर्णवृत्त २० वर्ण एकटा सगण, दूटा जगण, एकटा भगण, एकटा रगण, एकटा सगण, एकटा लगण आ एकटा गगण। तेसर, पाँचम, आठम, दसम, तेरहम, पन्द्रहम, अठारहम आ बीसम वर्ण दीर्घ आ शेष ह्रस्व। पाँचम, बारहम आ अन्तिम वर्णक बाद अर्द्ध-विराम।


महजूज: बहरे मुतदारिक मुसम्मन महजूज (एहिमे सभटा मुज़ाहिफ अरकान) फा इ लुन । U । फा इ लुन । U । फा इ लुन । U । फा ।

वर्ण वृत्त बाला-१० वर्ण। प्रति चरण रगण । U । तीन बेर आ फेर एकटा दीर्घ ।

मात्रिक रूप- प्रति चरण सत्रह मात्रा। तेसर, आठम, तेरहम मात्रा ह्रस्व आ आखिरीमे एक दीर्घ । आकि दूटा ह्रस्व U

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बृहस्पतिवार, 23 दिसम्बर 2010

मैथिली गजलशास्त्र - ११

१.आब सामिल अराकानक आठ–रुक्नक छः–रुक्न - तीन बेर/ आ चारि–रुक्न - दू बेरक प्रयोग देखब। ई सभ मुफरद बहर अछि माने रुक्नक बेर-बेर प्रयोग होइत अछि।

२.एकर अतिरिक्त सामिल अराकानक १२ टा मुरक्कब बहर अछि माने दू प्रकारक अरकानक बेर-बेर अएलासँ १२ सालिम बहर, संगीतक भाषामे मिश्रित। ई तीन तरहक अछि:- ४ रुक्नक बहर, ६ रुक्नक बहर, ८ रुक्नक बहर / मुरक्कब (मिश्रित) पूर्णाक्षरी (सालिम) बहर- १२ टा –तवील, मदीद, मुनसरेह, मुक्तज़ब, मज़ारे, मुजतस, ख़फीफ, बसीत, सरीअ, जदीद, क़रीब, मुशाकिल।

३.आ तकर बाद सामिल आ मुजाहिफ अराकान दुनूक मेलपेँचसँ बनल १२ टा बहर मख्बून, अखरब, महजूफ, मक्तूअ, मक्बूज, मुज्मर, मरफू, मासूब, महजूज, मकफूफ, मश्कूल, आ अस्लम बहरक चर्च होएत।

४.आ एहिमे मात्र मुजाहिफ अराकानसँ बनल बेशी प्रयुक्त चारिटा बहर (मुक्तजब, मजारे, मुजतस आ खफीफ) क चर्च करब।


१.आब सामिल अराकानक आठ–रुक्नक छः–रुक्न - तीन बेर/ आ चारि–रुक्न - दू बेरक प्रयोग देखब। ई सभ मुफरद बहर अछि माने रुक्नक बेर-बेर प्रयोग होइत अछि।


बहरे मुतकारिब छः–रुक्न फ ऊ लुन (U।।) – तीन बेर


एके बेरमे जे कएलौं

बड़े भेर भेनेँ सुनेलौँ



बहरे मुतकारिब चारि–रुक्न फ ऊ लुन (U।।) – दू बेर


बड़ी दूर ठाढ़े

कनी दूर नाचे



बहरे मुतदारिक छः–रुक्न फा इ लुन (।U।) – तीन बेर


एकरे केलहा केलहीं

तैं अनेरे दुर्गा भेलहीं




बहरे मुतदारिक चारि–रुक्न फा इ लुन (।U।) – दू बेर


काहि काटी एतै

बात बाँटी एतै





बहरे हजज :- छः–रुक्न म फा ई लुन (U।।।) – तीन बेर


अनेरे भऽ गेलैं ऐ लड़ैले गै

तखैनो जे भऽ जेतै की गमैए गै






बहरे हजज :- चारि–रुक्न म फा ई लुन (U।।।) – दू बेर


कने बेगार बेमारी

कते की बात सुनाबी




बहरे रजज़ छः–रुक्न मुस तफ इ लुन (।।U।) – तीन बेर


ई जे धरा देखैसँ छै हेतै तँ नै

ई जे घटा घूमैसँ घूमै ने तँ नै





बहरे रजज़ चारि–रुक्न मुस तफ इ लुन (।।U।) – दू बेर


भोरे अएलै कोन गै

सोझे न एलै फोन गै


बहरे रमल छः–रुक्न फा इ ला तुन (।U।।)– तीन बेर


की गरीबो की धनीको तैँ सभे छी

की समीपो की कतेको जे घुमै छी


बहरे रमल चारि–रुक्न फा इ ला तुन (।U।।)– दू बेर


की कतेको बात भेलै

की जतेको लात खेलै


बहरे वाफ़िर छः–रुक्न म फा इ ल तुन (U।UU।) – तीन बेर


कने ककरा कहेबइ आ बतेबइ की

जते सुनबै तते कहता बतेबइ की


बहरे वाफ़िर चारि–रुक्न म फा इ ल तुन (U।UU।)– दू बेर


करेजक बात छै कतबो

करेजक हाल ई नञि हो


बहरे कामिल छः–रुक्न मु त फा इ लुन (UU।U।) – तीन बेर


अनका कतौ कहबै कने सुनतै कहाँ

सुनि ओ बजौ करतै कने जितबै जहाँ


बहरे कामिल चारि–रुक्न मु त फा इ लुन (UU।U।) – दू बेर


पहिले अनै तखने सुनै

कहबै कते कखनो करै



२.एकर अतिरिक्त सामिल अराकानक १२ टा मुरक्कब बहर अछि माने दू प्रकारक अरकानक बेर-बेर अएलासँ १२ सालिम बहर, संगीतक भाषामे मिश्रित। ई तीन तरहक अछि:- ४ रुक्नक बहर, ६ रुक्नक बहर, ८ रुक्नक बहर / मुरक्कब (मिश्रित) पूर्णाक्षरी (सालिम) बहर- १२ टा –तवील, मदीद, मुनसरेह, मुक्तज़ब, मज़ारे, मुजतस, ख़फीफ, बसीत, सरीअ, जदीद, क़रीब, मुशाकिल।

बहरे तवील फ–ऊ–लुन U।। मफा–ई–लुन U।।।


कहेबै सुनेबै की मुदा जे कहेतै से

सुनेतै उकारो की मुदा जे बजेतै से


बहरे मदीद फा–इ–ला–तुन ।U।। फा–इ–लुन।U।


सूनि बाजू मूँहमे कैकटा छै बातमे

बूझि बाजूमीत यौ कैकटा छै घातमे


बहरे मुनसरेह मुस–तफ–इ–लुन ।।U। मफ–ऊ–ला–तु ।।।U


की की रहै की की भेल कोनो भला कोनो सैह

माँ माँ करी पैघो भेल सेहो जरौ सेहो जैह


बहरे मुक्तजब मफ–ऊ–ला–तु ।।।U मुस–तफ–इ–लुन ।।U।


रामोनाम सेहो उठा रामोनाम सेहो जरा

रामोनाम मोहो लए रामोनाम बातो करा


बहरे मजारे मफा–ई–लुन U।।। फा–इ–ला–तुन ।U।।


अरे की छी सैह नै की अरे छी छी वैह ने छी

बिसारी की उघारी की अरे की की देब ने की


बहरे मुजतस मुस–तफ–इ–लुन ।।U। फा–इ–ला–तुन ।U।।

नै छै रमा नै रहीमो नै छै मरा नै मरीजो

नै ई कनेको मृतो छै नै ई कनेको जियै ओ


बहरे खफीफ फा–इ–ला–तुन ।U।। मुस–तफ–इ–लुन ।।U। फा–इ–ला–तुन ।U।।


रेख राखू फेकू तँ नै देख लेलौं

सूनि राखू बेरो तँ नै बीति गेलौं


बहरे बसीत मुस–तफ–इ–लुन ।।U। फा–इ–लुन।U।


की की रहै की भऽ गै की की छलै की भऽ नै

रीतो बितै ने कऽ गै गीतो बितै गाबि नै


बहरे सरीअ मुस–तफ–इ–लुन ।।U। मुस–तफ–इ–लुन ।।U। मफ–ऊ–ला–तु ।।।U


सेहो कने छै ने अते की केहैत

लेरो चुबै छै ने अते की केहैत


बहरे जदीद फा–इ–ला–तुन ।U।। फा–इ–ला–तुन ।U।। मुस–तफ–इ–लुन ।।U।


लेलहेँ ई बेगुणो आ भेलै भने

बेलगो ई नैहरो आ गेलै भने


बहरे करीब मफा–ई–लुन U।।। मफा–ई–लुन U।।। फा–इ–ला–तुन ।U।।


चलै छै ई कने बाटो जाइ छै नै

गतातोमे भने कोनो बात छै नै


बहरे मुशाकिल फा–इ–ला–तुन ।U।। मफा–ई–लुन U।।। मफा–ई–लुन U।।।


मोदमानी अहोभागी कनी छै की

क्रोध जानी प्रणो खाली बनै छै की


३.आ तकर बाद सामिल आ मुजाहिफ अराकान दुनूक मेलपेँचसँ बनल १२ टा बहर मख्बून, अखरब, महजूफ, मक्तूअ, मक्बूज, मुज्मर, मरफू, मासूब, महजूज, मकफूफ, मश्कूल, आ अस्लम बहरक चर्च होएत।


मख्बून: बहरे रमल मुसद्दस मख्बून

फा–इ–ला–तुन ।U।। फ–इ–ला–लुन UU।। फ–इ–ला–लुन UU।।


खेल खेला असली ऐ अगबे नै

मिलमिला अँखिगौरो बतहा नै


अखरब: बहरे हजज मुरब्बा अखरब

मफ–ऊ–लु ।।U मफा–ई–लुन U।।।


की भेल लटू बूड़ू

के गेल अत्ते जोड़ू


महजूफ: बहरे रमल मुसम्मन महजूफ

फा–इ–ला–तुन ।U।। फा–इ–ला–तुन ।U।। फा–इ–ला–तुन ।U।। फा इ लुन । U ।

एनमेनो भेल गेलौ आश आगाँ बीतलौ

सूनि गेलौं नै भगेलौं नाश नारा गीत यौ


मक्तूअ: बहरे मुतदारिक मुसद्दस मक्तूअ

फा–इ–लुन।U। फा–इ–लुन।U। फै–लुन ।।


कीसँ की भेल छी बाबू

कीसँ की कैल छी आगू

मक्बूज: बहरे मुतकारिब मुसम्मन मक्बूज (एहिमे सभटा मुज़ाहिफ अरकान)

फ ऊ लुन U । । फ ऊ लुन U । । फ ऊ लुन U । । फ–ऊ–लु U।U


अरे रे अहाँ जे कहेलौं सिनेह

अरे रे अहाँ जे बजेलौं सिनेह



मुज्मर: बहरे कामिल मुसद्दस मुज्मर (एहिमे सभटा अरकान सामिल)


मु–त–फा–इ–लुन UU।U। मु–त–फा–इ–लुन UU।U। मुस–तफ–इ–लुन ।।U।

अनठयने रहबै रहबै हरे हे रोमबै

अनठयने रहबै रहबै अरे हे घूरिऐ



मरफू: बहरे मुक्तजिब मुसद्दस मरफू


मफ–ऊ–ला–तु ।।।U मफ–ऊ–ला–तु ।।।U मफ–ऊ–लु ।।U

की की रेह की की सैह निंघेस

की की रेह की की यैह निंघेस


मासूब – बहरे वाफिर मुसद्दस (एहिमे सभटा अरकान सामिल)

मफा–इ–ल–तुन U।UU। मफा–इ–ल–तुन U।UU। मफा–ई–लुन U।।।


अरे अनलौं सुहागिन यै अनेरो की

अरे अनलौं मुहोथरिमे जनेरो की


महजूज: बहरे मुतदारिक मुसम्मन महजूज (एहिमे सभटा मुज़ाहिफ अरकान)


फा इ लुन । U । फा इ लुन । U । फा इ लुन । U । फा ।

के रहै सूनि यै ई अहाँकेँ

के रहै कूदि यै ई अहाँकेँ


मकफूफ: बहरे हजज मुसम्मन मकफूफ

मफा–ई–लुन U।।। मफा–ई–लुन U।।। मफा–ई–लुन U।।। म–फा–ई–लु U।।U

अनेरे की अनेरे की धुनेरे की कहेलौं हँ

अनेरे की अनेरे की धुनेरे की कहेलौं हँ


मश्कूल: बहरे रमल मुसम्मन मश्कूल

फा–इ–ला–तुन ।U।। फा–इ–ला–तुन ।U।। फा–इ–ला–तुन ।U।। मफ–ऊ–लु ।।U

सूनि सुन्झा केलियै ने कोन पापी छोड़ाइ

सूनि सुन्झा केलियै ने कोन पापी छोड़ाइ


अस्लम: बहरे मुतकारिब मुसद्दस अस्लम

फ–ऊ–लुन U।। फ–ऊ–लुन U।। फ–अल् U।

अरे की अरे की अहाँ

अरे की अरे की अहाँ


४.आ एहिमे मात्र मुजाहिफ अराकानसँ बनल बेशी प्रयुक्त चारिटा बहर (मुक्तजब, मजारे, मुजतस आ खफीफ) क चर्च करब।

बहरे मुक्तजब (मुजाहिफ रूप) (अपूर्णाक्षरी आठ रुक्न):फ ऊ लु U । U फै लुन U । फ ऊ लु U।U फै लुन। ।

कतेक गपो कतेक सप्पो

कतेक मिलै रहैत छै ओ



बहरे मज़ारे (मुजाहिफ रूप) (अपूर्णाक्षरी आठ रुक्न):मफ ऊ लु । । U फा इ ला तु । U । U म फा ई लु U । । U फा इ लुन। U । / फा इ ला न। U । U


ने छैक नै इनाम कते कोन छानि गै

ने छैक नै नकाम कते कोन काज गै


बहरे मुजतस (मुजाहिफ रूप) (अपूर्णाक्षरी आठ–रुक्न):म फा इ लुन U । U । फ इ ला तुन U U । । म फा इ लुन U । U । फै लुन। ।/ फ–इ–लुन UU।


भने भले करतै की भने भले भेटौ

कते कते जरतै ई कते कने देखौ


बहरे ख़फीफ़ (मुजाहिफ रूप) (अपूर्णाक्षरी छः रुक्न):फा इ ला तुन । U । । म फा इ लुन U । U । फै लुन। । / फ इ लुन U U ।


देख लेलौं दिवारसँ बेचै कखनो

बेख देखै गछारसँ हेतै निक ओ

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शुक्रवार, 17 दिसम्बर 2010

डॉ. नरेश कुमार ‘वि‍कल’- दूटा गजल-

(1)
नयन केर नीन्न पड़ाएल की छीनि‍ लेल कोनो
मोन केर बात मोनमे रहि‍ गेल कोनो
      उन्‍हरि‍या राति‍ ई गुज-गुज एना कत्ते दि‍न धरि‍ रहत
      कम्‍बल कएक काजर केर तानि‍ देल कोनो
काँटक झार राखल छै चौकठि‍ केर दुनू दि‍स
तैयो अयाचि‍त डेग नापि‍ देल कोनो
      छाहरि‍ ने झरक लागय हमरा नीम गाछीमे
      बसातक संग बि‍रड़ो फेर आनि‍ देल कोनो
हमर खटक सि‍रमामे करैए नाग सभ सह-सह
काँचक घरमे पाथर राखि‍ देल कोनो
      बि‍हुँसल ठोर ने खुजतै कोनो कामि‍नी आगाँ
      प्रीतक सींथमे भुम्‍हूर राखि‍ देल कोनो

(2)
पसारल छैक परतीमे हमर पथार सन जि‍नगी।
कहू हम लऽ कऽ की करबै एहन उधार सन जि‍नगी।।
पड़ल छै लुल्ह-नाङर सन कोनो मंदि‍र केर चौकठि‍पर।
माँगय भीख जि‍नगी केर हमर लाचार सन जि‍नगी।।
साटल छैक फाटल सन कोनो देवालपर परचा।
केओ पढ़बा लेल चाहय ने हमर बीमार सन जि‍नगी।
बाटक कातमे रोपल जेना छी गाछ असगरूआ।
ने फड़ैए-फुलाबैए हमर बेकार-सन जि‍नगी।।
कतबा ि‍दनसँ हैंगरमे छी कोनो कोट-सन टाँगल।
कुहरैत कोनमे पड़ल ई ति‍रस्‍कार-सन जि‍नगी।।
ई ि‍जनगीकेँ कोनो ि‍जनगी जकाँ हम जि‍नगि‍ये बूझी।
ने जि‍नगी देल जि‍नगीमे जि‍नगी सन हमर जि‍नगी।।

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मैथि‍ली नाटकक वि‍कासमे आनंद जीक योगदान- शि‍वकुमार झा टि‍ल्‍लू

जखन-जखन मैि‍थली भाषा साहि‍त्‍यमे नाट्य वि‍धाक चर्च होइत अछि‍ तँ हठात् पंडि‍त जीवन झासँ लऽ कऽ झि‍झि‍रकोना आ तालमुट्ठी सन नाटकक नाटककार अरवि‍न्‍द कुमार अक्‍कू जीक वि‍वेचन स्‍वभावि‍क भऽ जाइछ। एहि‍ एक सय छ: बरखक नाट्य रचनमे बहुत रास नाटककार वि‍वि‍ध शैलीक साहि‍त्‍यि‍क नाटकक संग-संग लोकप्रि‍यताक लेल चलन्‍त आ ओछ नाटक सेहो लि‍खलनि‍। कि‍छु रचनाकार तँ नाटककारेक रूपेँ वेस चर्चित छथि‍ संग-संग हुनका सभकेँ पुरस्‍कृत सेहो कएल गेल अछि‍। उदाहरणस्‍वरूप श्री महेन्‍द्र मलंगि‍या मैथि‍ली साहि‍त्‍यक प्रति‍ष्‍ठत सम्‍मान प्रबोध सम्‍मानसँ सम्‍मानि‍त कएल गेल छथि‍। मलंगि‍या जी बहुत रास नाटक लि‍खलनि‍- लक्ष्‍मण रेखा : खण्‍डि‍त, जुअाएल कनकनी, एक कमल नोरमे, ओकरा अॉगनक बारहमासा, कमलाकातक राम, लक्ष्‍मण ओ सीता आर काठक लोक। एहि‍ नाटक सभमे 'एक कमल नोरमे' साहि‍त्‍यक समग्र बि‍न्‍दुकेँ वि‍म्‍बि‍त करएबला नीक नाटक मानल जाइत अछि‍। मुदा 'काठक लोक' पढ़लासँ पाठक स्‍वयं ि‍नर्णय सुनाबथि‍ जे कतए धरि‍ एकरा 'मैथि‍ली नाटक' मानल जाए। बि‍म्‍व लोकगाथा आ वि‍वेचन मैथि‍लीसँ बेसी हि‍न्‍दीमे। ओना सभ साहि‍त्‍यि‍क कृति‍मे भाषाक प्रयोग ठाम-ठाम कएल जाइत अछि‍ मुदा मात्र पात्रक दशा आ परि‍स्‍थि‍ति‍मे तारतम्‍य स्‍थापि‍त करबाक लेल। मलंगि‍याजी एहि‍ पोथीमे हि‍न्‍दीक प्रयोग कोन रूपेँ कएने छथि‍ ई गप्‍प झारखंडक अंत:स्‍थ कक्षाक (मैथि‍ली भाषी जौ उपलब्‍ध होथि‍) छात्र-छात्रासँ पुछल जा सकैत अछि‍ कि‍एक तँ 'काठक लोक' झारखण्‍ड अधि‍वि‍द्य परि‍षद्क मैि‍थली पाठयक्रममे सम्‍मि‍लि‍त अछि‍।

मैि‍थलीक संग दुभाग्‍य मानल जाए वा वि‍डम्‍वना कि‍छु कथाकथि‍त साहि‍त्‍यकार आ समीक्षकक दलपुंज भाषापर अपन अधि‍कार चमौकनि‍ जकाँ छथि‍। 'अहाँक सोहर हम गाएब आ हमर डहकन अहाँ बि‍दबि‍दाउ' एहि‍ परि‍पेक्ष्‍यमे कि‍छु प्रति‍भा झॉपले रहि‍ गेल, कतहु कोनो चर्च नहि‍।

एहि‍ बज्र पातक शि‍कार छथि‍ आधुनि‍क पिरहीक सनसनाइत युगान्‍कारी नाटककार- 'श्री आनंद कुमार झा' आनंद जीक एखन धरि‍ पॉच गोट नाटक प्रकाशि‍त भेल अछि‍ 'टाकाक मोल (2000), 'कलह (2001), 'बदलैत समाज (2002), धधाइत नवकी कनि‍याँक लहास (2003) आ हठात् परि‍वर्त्तन 2005ई.मे। एहि‍ नाटकक संग-संग आनंदजीक अप्रकाशि‍त नाटकक गणना दू अंक धरि‍ पहुँचि‍ गेल अछि‍।

आनंद जीक जन्‍म 1977ई.मे मि‍थि‍लाक सांस्‍कृति‍क संहंति‍त भूखण्‍ड 'मधुबनी जि‍ला'क मेंहथ गाममे भेल। जौं समस्‍तीपुर खगड़ि‍या आ बेगूसराय जि‍लाक लाल रहि‍तथि‍ तँ उपेक्षाक दंश स्‍वाभावि‍क छल मुदा ठामक वासी उपेक्षि‍त भेलाह कनेक संत्रास जकाँ लगैछ। गाम-गामसँ लऽ कऽ कोलकाता शहर धरि‍ मंचि‍त एहि‍ नाटकक कोनो समीक्षा नहि‍ भेल, ई सभ मात्र मैथि‍ली भाषामे संभव छैक। जौं बि‍म्‍वक उपयोगि‍ताकेँ केन्‍द्र बि‍न्‍दु मानल जाए तँ मैथि‍ली साहि‍त्‍यक प्रवीण नाटक कारक समूहमे आनंद जीक स्‍थान नि‍श्‍चि‍त अछि‍।

टाटाक मोल : आर्य भूमि‍क एकटा पैघ व्‍याधि‍ काटर प्रथाक दु:स्‍थि‍ति‍पर केन्‍द्रि‍त एहि‍ नाटकमे मि‍थि‍ला संस्‍कृति‍ कोढ़ि‍क चि‍त्रण नीक ढंगसँ कएल गेल अछि‍। कन्‍याक पि‍ता नाओ गरीवनाथ संग-संग दरि‍द्र सेहो। अपन धर्मपत्नी सुमि‍त्राक आश पूर्ण करवाक लेल 'पुत्र कामनार्थ' पॉच गोट कन्‍याकेँ जन्‍म देलनि‍। पहि‍ल बेटीक वि‍वाहमे डॉड़ टुटि‍ गेलनि‍ सभटा खेत बि‍का गेलनि‍। दोसर बेटीक कन्‍यादानक लेल आतुर छथि‍ मात्र बारह कट्ठा जमीन बॉचल छन्‍हि‍। बेटी प्रभा कॉलेजमे पढ़ैत छथि‍, वि‍वाह अपना मोने नहि‍ करए चाहैत छथि‍- मात्र समाजक हेय दृष्‍टि‍सँ बचवाक लेल बेटीक वि‍आह एहि‍ शुद्धमे करवाक लेल परेशान छथि‍। हमरा सबहक समाजक कतेक कलुष रूप अछि‍ अप्‍पन टेटर नहि‍ देखि‍ कऽ लोक सभ दोसरक फुसरीपर काग-दृष्‍टि‍ लगौने रहैत छथि‍। कुमारि‍ बेटी छन्‍हि‍ गरीब झाक घरमे आ परेशान छथि‍ समाजक लोक। एहि‍ लेल नहि‍ जे मि‍थि‍लाक बेेटीक उद्धार कएल जाए मात्र बारह कट्ठा जमीन लि‍खएबाक लोभमे। प्रभा अपन बहि‍नक देअर प्रभाकरसँ सि‍नेह करैत छथि‍ लेकि‍न आंडबरधर्मी समाज एहि‍ सि‍नेहक मंजूरी नहि‍ देत तँए चुप्‍प।

गरीव झा दलाल काकासँ संपर्क करैत छथि‍। जेहन नाअो तेहने कार्य। हुनक चेला कक्कासँ बेसी पारखी। दुनूक जोड़ी शुभ्‍म नि‍सुम्‍भ जकाँ दुष्‍ट आ धृष्‍ठतासँ भरल। हर्षदमेहताक दलाली हि‍नका लग ओछ पड़ि‍ जाइत। बालकक पि‍ता लीलाम्‍बर बाबू वास्‍तवमे लीलाधारी छथि‍। भाति‍ज सभसँ कम कैंचा पुत्रक वि‍आहमे कोना लेतथि‍ तँए पचहत्तरि‍ हजारसँ कम टाका नहि‍ चाही। दलाल काकाक मोहि‍नी मंत्रक जाइमे आबि‍ पैंसठ हजारमे वि‍आह करबाक ि‍नर्णय सुनौलनि‍। शर्त्त छनि‍ जे समाजमे पचहत्तरि‍ हजारक उद्धोष कएल जाए। दलाल काकाक लि‍षुगी उगना एहि‍ उद्धोषणक लाभ लेवाक प्रयासमे सफल भेलनि‍।

दलालीक दस हजार कमीशन दुनू चेला गुरूक पेटमे। गरीब झा अपन वॉचल जमीन 50 हजारमे बेि‍च लेलनि‍। मि‍त्र गुणनंद जीसँ दस हजार टाकाक मदति‍ भेटलनि‍, शेष प्रश्‍न ओझराएल पंद्रह हजार आव कोना हएत? येन केन प्रकारेन वरि‍याती दलान लागल। फेर धमगि‍ज्‍जड़ि‍। माथक पाग खसि‍ पड़लनि‍ मुदा वरि‍याती आपि‍स। अंतमे प्रभाकरक संग प्रभाक वि‍आह होइत अछि‍। लीलांवर जी काटर टाका पचास हजार कन्‍यागतकेँ आपि‍स कएलनि‍। मुदा नाटककार ई स्‍पष्‍ट नहि‍ कऽ सकलनि‍ जे दलाल काका दलालीक दस हजार कन्‍यागतकेँ देलनि‍ वा नहि‍। कथानकक कि‍छु तथ्‍य वास्‍तवि‍कता नहि‍ भऽ कऽ कल्‍पना मात्र लागल। गरीब नाथक बेटी प्रभा काॅलेजमे पढ़ैत छथि‍ आ छोट मांगल-चांगल भाए महीस चरबैत छन्‍हि‍। ओना तँ पुत्रक आकांक्षामे पॉच गोट पुत्रीक जन्‍म देमएबला माए-बापक अर्थव्‍यवस्‍था अव्‍यवस्‍थि‍त हएव स्‍वाभावि‍क अछि‍। परंच मैथि‍ल संस्‍कृति‍क ग्रामीण व्‍यवस्‍थामे रहनि‍हार माता-पि‍ताक जीवनमे संतानक रूपेँ पुत्रसँ पुत्रीक बेसी महत्‍व देव कल्‍पना मात्र छैक, वास्‍तवमे तँ बेटी जन्‍महि‍सँ आनक धरोहरि‍ मानल जाइत अछि‍ तँए बेटा महीस चराबथि‍ आ बेटी कॉलेजमे पढ़तीह, आश्‍चर्य जनक लागल।

कथानकक बीच-बीचमे अंग्रेजी शब्‍दक प्रयोग कऽ नाटककार आधुनि‍कता लेबन करवाक प्रयास कएलनि‍ ई उचि‍त अछि‍ वा नहि‍, पाठकपर छोड़ि‍ देवाक चाही। एकटा अनसोहॉत अवश्‍य लागल जे मैथि‍लीमे 'चुकल' शब्‍दक प्रयोग कहि‍या धरि‍ रहत। नि‍ष्‍कर्षत: ई नाटक मंचनक योग्‍य अछि‍।

कलह : कलह आनंदजी लि‍खि‍त दोसर नाटक थि‍क। समाजमे जीवन्‍त धटना सभकेँ एक सूत्रमे जोड़ि‍ कऽ एहि‍ नाटकक सृजन कएल गेल। आकाश एकटा बेरोजगार नौजवान छथि‍। टाकाक लोभमे पि‍ता सुरेश्‍वर हि‍नक वि‍आह करा दैत छथि‍न्‍ह। आकाश सुरेश्‍वर बाबूक पहि‍ल पत्नीक संतान छथि‍ तँए वि‍भाता सुमि‍त्राक दृष्‍टि‍मे हि‍नक कोनो स्‍थान नहि‍। सुमि‍त्रा तँ अपन कोखि‍सँ जनमल पुत्र राजीव आ ओकर कनि‍याँ कोमलक लेल ज्‍येष्‍ठ पुत्रक संग यातनाक सभटा बान्‍ह लॉधि‍ देलनि‍। प्रौढ़ पि‍ता मूक पि‍रस्‍थि‍ति‍क मारल मात्र दर्शक बनि‍ कऽ रहि‍ गेलाह। काल मारि‍सँ भटकैत-भटकैत दुनू परानीक ि‍नर्मम अंत होइत अछि‍। एकटा अबोध नेनाक जन्‍म भेल जे आकाशक अंतरंग मि‍त्र योगेशक कोरमे कथाक अंत धरि‍.....।

नाटककार एहि‍ नाटकक रचना भऽ सकैत अछि‍ जे कथानकमे संत्रास भरबाक संग-संग दर्शकक मध्‍य लोकप्रि‍य बनएवाक लेल केने होथि‍ मुदा एहि‍ सभसँ नाटकक प्रासंगि‍कतापर प्रश्‍न चि‍न्ह नहि‍ लगाओल जा सकैत अछि‍। कतहु-कतहु बि‍म्‍व वि‍श्‍लेषण चलंत आ हि‍न्‍दी भाषाक व्‍यवसायि‍क चलचि‍त्र जकाँ लागल मुदा मैथि‍लीमे नवल प्रयोगकेँ कि‍ओ झॉपि‍ नहि‍ सकैत छथि‍, जतए-जतए एहि‍ नाटकक ि‍चत्रण होएत अवश्‍य छाप छोड़त।

बदलैत समाज : बदलैत समाज नाटकक आरंभ एकटा ब्‍लड कैंसर पीड़ि‍त बालकक अपन पत्नीक संग वार्तालापक संग होइत अछि‍।

कर्जसँ मुक्‍ति‍क लेल घूरन जी अपन बीमार पुत्रक वि‍आह करा दैत छथि‍। हुनका ओना बूझल नहि‍ छलनि‍ जे पुत्र अवधेश ब्‍लड-कैंसरसँ पीड़ि‍त अछि‍। भजेन्‍द्र मुखि‍याक पुत्र दीपक अवधेशक बाल संगी छथि‍। ओ पहि‍नेसँ जनैत छलाह जे अवधेशक मृत्‍युक दि‍वस नजदीक छन्‍हि‍। तथाि‍प ओ खुलि‍ कऽ बजलनि‍ कि‍एक तँ घूरन बाबू स्‍वयं बूढ़ लोक छथि‍। एकटा पि‍ता अपन कान्‍हपर पुत्रक लाशक कल्‍पना मात्रसँ सि‍हरि‍ सकैत अछि‍, वास्‍तवि‍कता.........।।

वि‍वि‍ध घटनाक्रममे अवधेशक मृत्‍युक भऽ गेलनि‍। समाज हुनक वि‍धवा शोभापर चरि‍त्रदोष सेहो लगौलक। समाज की जाहि‍ अवलापर ओकर सासुक वि‍श्‍वास नहि‍ हुअए ओकरापर आन के वि‍श्‍वास करत। नाटकक अंतमे सबहक भ्रम टुटैत अछि‍ जखन शोभा दीपककेँ 'भैया' कहि‍ कऽ सश्रुलाप करैत छथि‍। अंतमे वि‍धवा शोभाक एकटा सच्‍चरि‍त्र युवक वीजेन्‍द्रसँ पुर्नवि‍वाहक कल्‍पना कएल गेल। ओना तँ एहि‍ नाटकमे जात-पाति‍क कोनो चर्च नहि‍ मुदा प्रसंगसँ स्‍पष्‍ट होइत अछि‍ जे सवर्ण परि‍वारक पृष्‍ठभूमि‍मे नाटक केन्‍द्रि‍त अछि‍। नाटककारक ई कल्‍पना नीक लागल जे सर्वण घरक वि‍धवा युवतीक पुनर्विवाह भऽ सकैत अछि‍। नाटकक संवादमे ठाम-ठाम अलंकार आ लोकोक्‍ति‍क लेपन नीक लागल। 'सम्‍भावनाक आधारपर मनुष्‍य कल्‍पना करैत अछि‍। मुदा प्रकृति‍क शास्‍वत नि‍यमकेँ कि‍ओ नहि‍ बदलि‍ सकैत अछि‍' एहि‍ संवादक माध्‍यमसँ अवधेश अपन मृत्‍युक संकेतकेँ बूझि‍ रहल छथि‍। हुनक दोसर संवादमे- 'हम मृत्‍युसँ भयभीत नहि‍ छी। भय अछ ओइ नि‍स्‍सहाय अवला नारीक असीम दु:ख, पीड़ आ वेदनासँ। भय अछि‍ अनजानमे हमरासँ भेल गलतीसँ।' श्रंृगारक प्रवल लालसा रहि‍तहुँ परि‍स्‍थि‍ति‍ मनुक्‍खकेँ वैरागी बना दैछ। जनतंत्रक कुटि‍ल व्‍यवस्‍थापर सेहो एहि‍ नाटकमे कटाक्ष कएल गेल। भजेन्‍द्रजी सन कुटि‍ल गामक मुखि‍या छथि‍ तँ वि‍पक्ष हुनकेँसँ बेसी कुटि‍ल। तँए ने फुराइतो छन्‍हि‍ हुनका 'ओ बनि‍याँ बुड़ि‍वक होइत अछि‍ जे पलड़ापर बटखड़ा रखलासँ पहि‍ने समान चढ़ा दैत अछि‍।''

आनंदजीक चारि‍म नाटक धधाइत नवकी कनि‍याॅक लहास : कोनो काटक प्रथाक नाटक नहि‍। मात्र कि‍छु गहनाक खाति‍र शि‍खाक आत्‍महत्‍याक प्रयास अजीव कहल जा सकैछ।

हठात् परि‍वर्त्तन : देशभक्‍ति‍ मूलक नाटक थि‍क।

नि‍ष्‍कर्षत: ई कहल जा सकैत छथि‍ जे आनंद जीक नाटक शैलीमे गोवि‍न्‍द झाक हास्‍य समागम, ईशनाथ झाक अलंकार, जगदीश प्रसाद मंडल जीक साम्‍यवाद, अक्कूजीक आधुनि‍कता, लल्‍लन ठाकुर जीक मंचन शैली आ शेखर जीक जनभाषा कलकल अछि‍।

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मैथिली गजलशास्त्र-१०


आब एक धक्का फेरसँ  मैथिलीक उच्चारण निर्देश आ ह्रस्व-दीर्घ विचारपर आउ।

शास्त्रमे प्रयुक्त ‘गुरु’ आ ‘लघु’ छंदक परिचय प्राप्त करू।

तेरह टा स्वर वर्णमे अ,इ,उ,ऋ,लृ - ह्र्स्व आर आ,ई,ऊ,ऋ,ए.ऐ,ओ,औ- दीर्घ स्वर अछि।


ई स्वर वर्ण जखन व्यंजन वर्णक संग जुड़ि जाइत अछि तँ ओकरासँ ‘गुणिताक्षर’ बनैत अछि।


क्+अ= क,


क्+आ=का ।


एक स्वर मात्रा आकि एक गुणिताक्षरकेँ एक ‘अक्षर’ कहल जाइत अछि। कोनो व्यंजन मात्रकेँ अक्षर नहि मानल जाइत अछि- जेना ‘अवाक्’ शब्दमे दू टा अक्षर अछि, अ, वा ।



१. सभटा ह्रस्व स्वर आ ह्रस्व युक्त गुणिताक्षर ‘लघु’ मानल जाइत अछि। एकरा ऊपर U लिखि एकर संकेत देल जाइत अछि।


२. सभटा दीर्घ स्वर आर दीर्घ स्वर युक्त गुणिताक्षर ‘गुरु’ मानल जाइत अछि, आ एकर संकेत अछि, ऊपरमे एकटा छोट -।


३. अनुस्वार किंवा विसर्गयुक्त सभ अक्षर गुरू मानल जाइत अछि।


४. कोनो अक्षरक बाद संयुक्ताक्षर किंवा व्यंजन मात्र रहलासँ ओहि अक्षरकेँ गुरु मानल जाइत अछि। जेना- अच्, सत्य। एहिमे अ आ स दुनू गुरु अछि।

जेना कहल गेल अछि जे अनुस्वार आ विसर्गयुक्त भेलासँ दीर्घ होएत तहिना आब कहल जा रहल अछि जे चन्द्रबिन्दु आ ह्रस्वक मेल ह्रस्व होएत।
माने चन्द्रबिन्दु+ह्रस्व स्वर= एक मात्रा

संयुक्ताक्षर: एतए मात्रा गानल जाएत एहि तरहेँ:-
क्ति= क् + त् + इ = ०+०+१= १
क्ती= क् + त् + ई = ०+०+२= २
क्ष= क् + ष= ०+१
त्र= त् + र= ०+१
ज्ञ= ज् + ञ= ०+१
श्र= श् + र= ०+१
स्र= स् +र= ०+१
शृ =श् +ऋ= ०+१
त्व= त् +व= ०+१
त्त्व= त् + त् + व= ० + ० + १
ह्रस्व + ऽ = १ + ०
अ वा दीर्घक बाद बिकारीक प्रयोग नहि होइत अछि जेना दिअऽ आऽ ओऽ (दोषपूर्ण प्रयोग)। हँ व्यंजन+अ गुणिताक्षरक बाद बिकारी दऽ सकै छी।
ह्रस्व + चन्द्रबिन्दु= १+०
दीर्घ+ चन्द्रबिन्दु= २+०
जेना हँसल= १+१+१
साँस= २+१
बिकारी आ चन्द्रबिन्दुक गणना शून्य होएत।
जा कऽ = २+१
क् =०
क= क् +अ= ०+१
किएक तँ क केँ क् पढ़बाक प्रवृत्ति मैथिलीमे आबि गेल तेँ बिकारी देबाक आवश्यकता पड़ल, दीर्घ स्वरमे एहन आवश्यकता नहि अछि।


U- ह्रस्वक चेन्ह
।- दीर्घक चेन्ह


एक दीर्घ =दूटा ह्रस्व U


बहरे मुतकारिब मुतकारिब आठ–रुक्न फ ऊ लुन (U।।) – चारि बेर

अनेरे धुनेरे जतेको ठकेलौं
बकैतो ढ़कैतो सुझेलौं घनेरौं



बहरे मुतदारिक मुतदारिक आठ–रुक्न फा इ लुन (।U।) – चारि बेर

बीकि गेलै तँ की जोतबै खेतमे
झीकि लेतै तँ की बोलतै बेरमे



बहरे कामिल कामिल आठ–रुक्न मु त फा इ लुन (UU।U।) – चारि बेर

इनसान जे कहबैत छै सकुचा कऽ छै जँ ठकैल यौ
बहरा कऽ जे कहतै जँ नै सहिते तँ छै कमजोर यौ



बहरे वाफिर वाफिर आठ–रुक्न म फा इ ल तुन (U।UU।) – चारि बेर

अबै अछि ओ सुनै अछि ओ जँ जाइत छै बसै अछि ओ
कहै अछि जे सुनै अछि ओ जँ खाइत छै ढकै अछि ओ


बहरे रमल रमल आठ–रुक्न फा इ ला तुन (।U।।) – चारि बेर

झूरझामो भेल छी से बात ने की काटने की
से समेटू से लपेटू आर की की आरने छी



बहरे रजज रजज आठ–रुक्न मुस तफ इ लुन (।।U।) – चारि बेर

ऐ ओतऽ की छै केहनो आ की अते की छी अए
नै छै कएलो नै सुनै छै की करै भेटैत-ए




बहरे हजज हजज :-आठ–रुक्न म फा ई लुन (U।।।) – चारि बेर

अबै छै नै सुनै छै नै बहीरो छै बुझै छै से
नरैमे छी कटै की से जजातो छै बुझै छै से



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मिथिलाक खानपान...

मिथिलाक खानपान-नीलिमा चौधरी आ राखी साह... मखानक खीर सामग्री- दूध-१ १/२ किलो, चिन्नी-१०० ग्राम, मखान कुटल- १०० ग्राम, इलाइची पाउडर- स्वाद अनुसार, काजू- १० टा, किशमिश-२०टा बनेबाक विधि- मखानक पाउडर (कनी दरदरा)क पहिने १/२ किलो ठंढ़ा दूधमे घोरि लिअ, शेष दूध केँ खौला लिअ। आब गर्म दूधमे ई घोड़ल मखानक मिश्रण मिला दियौक आर करौछसँ लगातार चलबैत रहियौक जाहिसँ मिश्रण पेनीमे बैसय नहि। .... (आगाँ पढू)

मिथिलांचलक विकास..

मिथिलांचलक विकास... मिथिलांचल क्षेत्र बिहार मे सबस पिछड़ल मानल जाइत अछि, अगर प्रतिव्यक्ति आय , साक्षरता और प्रसवकाल मे जच्चा-बच्चा के मृत्यु के मापदंड बनायल जाय तो मिथिलांचल देश के सबस गरीब आ पिछड़ल इलाका अछि। एकर किछु कारण त अहि इलाका के भौगोलिक बनावट अछि... (आगाँ पढू)

मिथिला अरिपन....

मिथिला चित्रकला- स्त्री आ पुरुषक दशपात अरिपन / स्वास्तिक अरिपन... स्त्रीगणक दशपात अरिपनकन्याक मुण्डन,कान छेदन आ' विवाहक अवसर पर कुलदेवताक घर आकि मण्डप पर बनाओल जाइत अछि।बनेबाक- विधि। एकर बनेबाक विधि सूक्ष्म अछि।ऊपरमे तीन पातक पुष्प, ,ओकरनीँचा पाँच-पातक कमल-पुष्प,ओकर नीचाँ सात-पात युक्त्त कमल, बीचमे अष्टदल कमल अछि। दश पात चारू दिशि अछि। नौ टा माँछक चित्र सेहो अछि... (आगाँ पढू)

एक विलक्षण प्रतिभा...

एक विलक्षण प्रतिभा जिनका हम सदिखन याद करैत छी (प्रथम कड़ी) - कुसुम ठाकुर..... एक बेर हमारा एक पत्रिका में किछु लिखय लेल कहल गेल छल, ई सन् १९९६ क गप्प थिक। हम बस एतबे लिखी सकलौं "हम की लिखी हमर त लेखनिये हेरा गेल"। मुदा आई बुझना जैत अछि जे नै, हमारा एकटा कर्तव्यक निर्वाहन... (आगाँ पढू),
(दोसर कड़ी), (तेसर कड़ी), (चारिम कड़ी), (पाँचम कड़ी), (छठम कड़ी), (सातम कड़ी), (आठम कड़ी), (नवम कड़ी), (दसम कड़ी), (एग्यारहम कड़ी), (बारहम कड़ी), (तेरहम कड़ी), (चौदहम कड़ी), (पन्द्रहम कड़ी )

चिनबारक दीप...

चिनबारक दीप–उषा किरण खान... समस्तीपुर मे गाड़ी बदली कऽ महेसरी अइमे बैसलि सरिया कऽ। आब घर बेसी लग आयल जाइत छैक। चारि टीसन आ छैक, फे तऽ टीसन सऽ एक कोस जमीन हैतै। चारि-पाँच गोटाक हेंज छैक्। बौआइत-बतियाइत गाम पहुँचि जयतै। आठे दिनुका दिन छैक, की सब करतै? एह, करऽक की छैक? सभटा बस्तुजात तऽ कीननहिं जाइत छैक.... (आगाँ पढू)

बिदेसिया (संकल्पित नाटिका)

विद्यापतिक बिदेसिया (संकल्पित नाटिका).... भोजपुरीक साहित्य मैथिलीसँ कम समृद्ध अछि मुदा से अछि मात्र परिमाणमे, गुणवत्ताक दृष्टिमे ई कतेक क्षेत्रमे आगाँ अछि। भोजपुरीक भिखाड़ी ठाकुरक बिदेसियाक सन्दर्भमे हम ई कहि रहल छी। भिखाड़ी ठाकुर कलकत्तामे प्रवासी... (आगाँ पढू)

पाँच पत्र...

पाँच पत्र-हरिमोहन झा... प्रियतमे अहाँक लिखल चारि पाँती चारि सएबेर पढ़लहुँ तथापि तृप्ति नहि भेल। आचार्यक परीक्षा समीप अछि किन्तु ग्रन्थमे कनेको चित्त नहि लगैत अछि। सदिखन अहींक मोहिनी मूर्ति आँखिमे नचैत रहैत अछि। राधा रानी मन होइत अछि जे अहाँक ग्राम वृन्दावन बनि जाइत, जाहिमे केवल अहाँ आ हम राधा-कृष्ण जकाँ अनन्त काल धरि विहार करैत रहितहुँ... (आगाँ पढू)

कथा- माउगि

कथा- माउगि - विभा रानी.... माउगि, माउगि, गे माउगि, गे माउगि! तों माउगि, हम माउगि, ई माउगि, ऊ माउगि - सभ किओ माउगे-माउगि। ऊँहूँ - सभ किओ भला माउगि हुअए। ई तय कर' बाली तों के? अएं गे? तोरा कहिया स' भेटलौ ई हक? ई सभ काज-धंधा हमरा आओरक अछि - हमरे आओर के करे दें। देख त' कने, तोहरो आओर के कतेक रंग-बिरंगा रूप दिया देलियौ! माउगि, गे माउगि.... (आगाँ पढू)

मातृत्व...

डा. मंजू गीता मिश्राक आलेख : मातृत्व.... नारी जीवनक सबसँ गौरवशाली एवं सुखद अनुभव थिक मातृत्व ।ई नारी जीवनक परिपूर्णताक प्रतीक अछि । पूरा नौ मास अपन गर्भमे फलैत-फूलैत एक शिशुक अपन जान सँ बेसी देखभाल करैत छथि । तत्पश्चात एक फूल सन सुन्दर सुकोमल शिशु जन्म लैत अछि, यैह स्त्रीक सबसँ अनमोल उपहार एवं आनन्ददायक क्षण थिक । एहि नौ मासक दौरान गर्भवतीक भोजन एवं वातावरण पर निर्भर करैत अछि.... (आगाँ पढू)
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