बुधवार, 26 जनवरी 2011

महासुन्दरी देवीकेँ मिथिला चित्रकला लेल 2011 लेल पद्म श्री

महासुन्दरी देवी (89 बर्ख) केँ मिथिला चित्रकला लेल 2011 लेल पद्म श्री देल जाएत। हिनका पहिने तुलसी सम्मान, शिल्पगुरू सम्मान भेटल छन्हि।
भारतक राष्ट्रपति 128 पद्म पुरस्कारक देलन्हि, जइमे 13 टा पद्म विभूषण, 31 टा पद्म भूषण आ 84 टा पद्म श्री पुरस्कार अछि। ऐ 128 मे 31 टा महिला छथि, एकटा डुओ( गणना लेल एक) आ 12 टा विदेशी/ एन.आर.आइ./ पी.आइ.ओ/ मृत्योपरांत वर्गसँ छथि ।

पद्म पुरस्कार कला, सामाजिक कार्य, सार्वजनिक सेवा, विज्ञान आ आभियांत्रिकी, व्यापार आ उद्योग, चिकित्सा, साहित्य आ शिक्षा, खेलकूद आ लोकसेवा लेल देल जाइत अछि। पद्म विभूषण उत्कृष्ट आ नीक, पद्म भूषण उच्च कोटिक नीक आ पद्म श्री नीक सेवा लेल देल जाइत अछि। गणतंत्र दिवसक अवसरपर एकर घोषणा होइत अछि आ राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रपति भवनमे मार्च-अप्रैलमे देल जाइत अछि।

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भारतीय भाषा परिषदक युवा पुरस्कार गौरीनाथ (अनलकांत) केँ मैथिली लेल देल गेल

22 जनवरी, 2011 केँ भारतीय भाषा परिषद, कोलकाताक युवा पुरस्कार (2009-10 ) गौरीनाथ (अनलकांत) केँ मैथिली लेल देल गेल।संगमे युवा पुरस्कार (2009-10 ) हिन्दी लेल नीलेश रघुवंशी, कोंकणी लेल राजय रमेश पवार आ गुजराती लेल जातून जोशीकेँ देल गेल अछि। 12 मार्च 2011 केँ युवा पुरस्कारसँ हुन्दी लेल कुणाल सिंहकेँ, उड़िया लेल दिलीप स्वयंकेँ, नेपाली लेल उदय क्षेत्रीकेँ आ कन्नड़ लेल विक्रम विसाजीकेँ सम्मानित कएल जाएत।

अनलकांत मैथिली त्रिमासिक "अंतिका"क सम्पादक छथि।

19 फरबरी, 2011 केँ भारतीय भाषा परिषद, कोलकाताक रचना समग्र सम्मान हिन्दी लेल केदारनाथ सिंहकेँ, तेलुगु लेल ए. रामापति रावकेँ, बांग्ला लेल जय गोस्वामीकेँ मराठी लेल अरुण साधुकेँ, हिन्दी लेल उदय प्रकाशकेँ, असमिया लेल इन्दिरा गोस्वामीकेँ, उर्दू लेल गोपीचन्द नारंगकेँ आ मलयालम लेल एम.टी.वासुदेवन नायरकेँ देल जाएत।
समारोहक विशिष्ट अतिथि- ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त श्री ओ.एन.वी.कुरुप आ श्री शहरयार।




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रविवार, 16 जनवरी 2011

गजेन्‍द्र ठाकुर- १.बेसी छुट्टी कम इसकूल २.कोनो सजाए नै


१.बेसी छुट्टी कम इसकूल
 
बेसी छुट्टी कम इसकूल
खेली-धूपी आरि-धूरपर
रौद-बसाते घूमी खूब
मम्मी-पापा बाबी-बाबा
ताकि--थाकि कऽ आबथि घूरि
बाड़ी-झाड़ी कल्लम गाछी
मेला ठेला गामे-गाम
भरि दिन भागा-भागी पाछू
बौका बुधनी संग रसूल
बेशी छुट्टी कम इसकूल।
 
कनियाँ-पुतरा बना सजाबी
खर-पात सँ घर बनाबी
बेंतक छड़ी बनाबी घोड़ा
चढ़ी ताइपर आ दौगाबी
झुट्ठे लोक कहैछ उकाठी
देखए धीया-पुता कऽ भूल
बेसी छुट्टी कम इसकूल।
 
इसकूलोमे गलती केने
मास्टर साहेब बड्ड डेराबथि
बेंट पकड़ने छड़ी घुमाबथि
टेबुलपर ओ पटकि बजाबथि
सुतलोमे सपनाइत छी हम
कहीं हुअए नै कोनो भूल
बेसी छुट्टी कम इसकूल।
 
 
कनियाँ-पुतरा चलू घुमाबी
बेंतक छड़ी हम किए बनाबी?
घर बनाबी बत्ती-कड़चीसँ
करची कलमसँ लिखी खूब
चित्र लिखि टांगी स्कूलमे,
आ सपना देखी खुब्बे-खूब
बेसी छुट्टी कम इसकूल।
 
बोने-बोन बिसरी रस्ता तँ
वनसप्तो घर घुराबै छथि
इसकूलमे गलती केने मुदा जे
मास्टर साहेब मारै छथि
बेंट पकड़ने छड़ी घुमाबथि
मास्टर साहेब बड्ड डराबथि
मोन बेकल अछि भय भागल नै
छड़ी-बेंत सपनाइत छी हम
छड़ी-बेंत सभ फेकथि दूर
आ साँझ घूरि घर सूती हम खूब
बेशी छुट्टी कम इसकूल।
 
 
 
 
२.कोनो सजाए नै
बदमस्ती हम खूब करी
आ हल्ला घरमे सेहो
बस्तुजात फेकी एम्हर
लोटी गर्दामे फेरो
कादो-कदवा बीच लोटाइ
आ छप-छप पानिमे भागी
मुदा सजाए कोनो नै भेटए
निअम एहेन बनाबी

 
रंग लगाबी कपड़ा-लत्तामे
हाथ-पएरमे सेहो
मम्मी-पापा भागि-भागि
पकड़ए चाहथि नै पकड़ाइ
आस-पड़ोसी करथि शिकाइत
पापा-मम्मी मानथि नै
खूब सुनाबी खूब बनाबी
मुदा सजाए भेटए नै
 
पंक्ति तोड़ि नवका पाँतीमे
सभ बच्चा जे जाएत
पुरना पाँतिक छोटका बड़का
अंतर तखन मेटाएत
आ ई देखत आ देत सजाए
मुदा तखन हे मैय्या
टूटत पाँति नव बनत कोना
जे भेटत सभकेँ सजाए
 
द्वेष मुदा नै राखी ककरोसँ
मुदा करी खूब बदमस्ती
धार जेना बहैए आगू दिस
हमहूँ बढ़िते जाइ छी
भेक जेना भदबरियामे
टर्र-टर्र कऽ गीत गबैए
हम गाबी भरि साल
मुदा सजाए कोनो भेटए नै

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शनिवार, 15 जनवरी 2011

डॉ. योगानन्‍द झा- वनदेवी आ नारी अस्‍मि‍ताक गाथा

डाॅ. योगानन्‍द झा

वनदेवी आ नारी अस्‍मि‍ताक गाथा
कथा, उपन्‍यास, नाटक आदि‍ वि‍भि‍न्न वि‍धामे गरि‍मामय लेखनक हेतु प्रख्‍यात, आधुनि‍क मैथि‍ली महि‍ला लेखनमे अग्रि‍म पाङक्‍तेय आ डा. श्रीमती उषा कि‍रण खानक जाइ सँ पहि‍ने एक गोट गद्यात्‍मक खण्‍डकाव्‍य थि‍क। ऐमे सीताक व्‍याथा-कथाकेँ उपजीव्‍य बनाए नारी-अस्‍मताक अन्‍वेषण कएल गेल अछि‍। स्‍वभावत: पौराणि‍क पात्रक आश्रए लऽ अत्‍याधुनि‍क युगीन वृत्ति‍क प्रतीक्षा साकांक्ष दृष्‍टि‍ ऐ काव्‍यक महत्‍वपूर्ण उपलब्‍धि‍ थि‍क।
मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम आ सती शि‍रोमणि‍ सीताक कथा भारतीय जीवनादर्शनक प्रतीक बनल रहल अदि‍। सीता अदौसँ मि‍थि‍लाक पहचान बनलि‍ रहलि‍ छथि‍। मुदा भूमि‍जा सीताक उत्तरचरि‍तमे ग्रथि‍त सीता-वनवासक कथा मैथि‍ल मानसकेँ सदति‍ उद्वेलि‍त कएने रहलैक अछि‍। एतऽ धरि‍ जे सीताक वि‍वाहक दि‍न वि‍वाह पंचमीकेँ एखनो धरि‍ लोक सरि‍ भऽ कऽ अपन बेटीक वि‍वाहक दि‍वसक रूपमे स्‍वीकार करबामे धखाइत रहल अछि‍। सीताक जन्‍म वि‍रोगहि‍ गेल लोककंठमे हुनका प्रतीक्षा सहानुभूति‍क रूपमे वि‍द्यमान अछि‍। ऐ ठामक सन्‍त परम्‍परामे एकटा समुदाय तँ एतबो धरि‍ मानबाक लेल तत्‍पर नै जे सीता द्वि‍रागमनक बाद अपन सासुर अयोध्‍यो गेलीह आ तत:पर कखनो राम वनवासक कारणे तँ कखनो अपन वनवासक कारणे दु:ख भरल जीवन बि‍तबैत रहलीह। हि‍नकालोकनि‍क तँ ई मान्‍यता छन्‍हि‍। जे वि‍वाहोपरान्‍त दुल्‍लह श्रीराम सभ दि‍नक हेतु मि‍थि‍लेक बनल रहि‍ गेलाह आ मि‍थि‍लाक सखी-लोकनि‍ हुनक दुलार-मलार करैत हुनका सासुरेमे छेकने रहि‍ गेलखि‍न। सीताक दु:खक जीवन-प्रसंगकेँ ओलोकनि‍ ऐ माध्‍यमे बि‍सरबाक आयोजन कएलनि‍।
मैथि‍ली दधीचि‍ पं. सुरेन्‍द्र झा सुमन अपन सीतावन्‍दनामे अत्‍यन्‍त कटु शब्‍दें सीता वनवासक प्रति‍ अपन आक्रोश प्रकट कएलनि‍-
कि‍ए बनलि‍ वनवासि‍नी
पति‍-पद-रेणु सुता हमर।
ज्‍वालामुखी न थीक ई
ज्‍वलि‍त प्रश्‍न धरणी उरक।।
वस्‍तुत: पत्नीक रूपमे सीता पति‍-पद- अनुगमनक भारतीय आदर्श प्रस्‍तुत कएलनि‍ तथापि‍ राजधर्म हुनका वनवासक दण्‍ड दऽ प्रताड़ि‍त कएने छल, जकरा हुनक माता पृथ्‍वी आइयो धरि‍ पचा नै सकलीह अछि‍ आ हुनक आक्राेश आइयो ज्‍वालामुखीक रूपमे प्रकट अछि‍। ई केवल कवि‍कल्‍पने नै, मैथि‍ल मानसक आक्रोशो थि‍क।
सीता मि‍थि‍लाक बेटी छलीह। परवर्ती कालमे ओ अयोध्‍याक पुतहु बनलीह आ अपन कर्त्तव्‍य भावना ओ पति‍व्रत्‍य द्वारा एहेन आदर्श उपस्‍थि‍त कएलनि‍ जे भातीय लोकजीवनक आदर्शक रूपमे आइयो प्रथि‍त अछि‍। ओ नैहर आ सासुर दुनू कुलक मान रक्षाक हेतुक यज्ञमे ि‍नरन्‍तर आहुति‍ प्रदान करैत रहलीह। मुदा समाज हुनक चरि‍त्रपर आशंका करैत रहलनि‍। ऐ आशंकाक नि‍वारणर्थ हुनका सर्वसामान्‍यक बीच अग्नि‍ परीक्षा देबए पड़लनि‍। अग्‍नि‍ परीक्षाक बाद जखन ओ अयोध्‍या आपस आएलनि‍, तकर बादो पुनश्‍च हुनक चरि‍त्रपर आक्षेप कएल गेलनि‍ आ मर्यादापुरूषोत्तम राम राजधर्मक अनुदेशे हुनका वनवासक दण्‍ड प्रदान कऽ देलखि‍न सेहो एहन स्‍थि‍ति‍मे जखन ओ दुजीवा छलीह। अग्‍नि‍ परीक्षाक साक्षी राम, अक्षय अनुरागसँ संबलि‍त पति‍ राम हुनका प्रतीक्षा कएल गेल आक्षेपक कोनो प्रति‍रोध नै कऽ सकलखि‍न। नारीक प्रति‍ ई उपेक्षाभाव संभवत: सीताकेँ सहन नै भऽ सकलनि‍ जकर परि‍णाम पाताल-प्रवेशक रूपमे आएल जे आइयो पुरूष समाजक नारीक प्रति‍ हीन मनोभावनाक द्योतक थि‍क आ द्योतक थि‍क नारीक नारीक आक्रोश, वि‍रोध आ वि‍द्रोहक, जकरा श्रीमती खान अपन ऐ गद्य खण्‍डकाव्‍यमे रूपायि‍त कएलनि‍ अछि‍।
श्रीराम अयोध्‍याधि‍पति‍ छलाह। प्रजावत्‍सलता हुनक राजधर्म छलनि‍। ऐ राजधर्मक वशीभूत भऽ ओ धोबि‍ द्वारा लांछि‍त सीताकेँ, पूर्वहि‍ अग्‍नि‍ परीक्षि‍ता सीताकेँ वनवास देबाक दण्‍ड सुनौलनि‍। रामक ई मानसि‍कता मर्यादापुरूषोत्तमत्‍वक प्रति‍ हुनक भावनाक अति‍रेकक प्रदर्शन छल। ओ प्रजासँ वाहवाही पएबाक फेरमे एकटा सती सावि‍त्रीक आहि‍पर ध्‍यान नै दऽ सकल छलाह। हीरानन्‍द झा शास्‍त्री ऐ वाहवाहीक फेरमे पड़ल भीष्‍मक मानसि‍कताकेँ उजागर करैत अपन सोचो तो भीष्‍म दीर्धकवि‍तामे कहने छथि‍-
सुनते भी कैसे भीष्‍म
तुम तो थे
वाहवाही लूटने की धुन में
बड़ा तेज होता है, यह
वाहवाही लूटने का नशा
इस नशे में तो मनुष्‍य
सब कुछ भूल जाता है
बहरे हो जाते हैं, उसके कान
ि‍सर्फ एक ही शब्‍द सुनाई देता है
उसके कानों को
और शायद उसी शब्‍द को
वह सुनना भी चाहता है बार-बार
जानते हो, क्‍या है वह शब्‍द
वह शब्‍द है वाह वाह
अहंभाव का ही शायद
वि‍कृत रूप है, यह
जब मनुष्‍य अपने हर कार्य पर
लोगों के मुँह से ि‍सर्फ
वाह-वाह ही सुनना चाहता है।
भूमि‍जा, रामक ऐ अहंभावक परि‍तुष्‍टि‍क यज्ञाग्‍नि‍मे झोंकि‍ देल गेल छलीह। मुदा हुनको दि‍न फि‍रलनि‍। लव-कुश सन सन्‍तानक माता भेलाक बाद सीताक आत्‍मगौरव उद्दीप्र भेलनि‍। श्रीमती खान सीताक ओइ स्‍वरूपक चि‍त्रण करैत कहैत छथि‍-
मंजरायि‍ता गाछ
गदरायल माछ
बाधवाली गाय
आ सन्‍तानवती माय
के छथि‍?
सभ सि‍या सुकुमारि‍ये तँ छथि‍।

आ सन्‍तानवती वनदेवीक पुत्र द्वय राजा रामक अश्‍वेमेध यज्ञक घोड़ाकेँ रोकि‍ लैत छन्‍हि‍, हुनक सैन्‍य समूहकेँ पराजि‍त कऽ दैत छन्‍हि‍। सीता हस्‍क्षेप कऽ कऽ यज्ञक ओइ घोड़ाकेँ ि‍वमुक्‍त करबैत छथि‍। महर्षि वाल्‍मीकि‍ द्वारा सीताक पाति‍व्रत्‍य अभ्‍यर्थनापर राम अपन कृत्‍यपर लज्‍जि‍त होइत छथि‍ आ सीताकेँ वाल्‍मीकि‍ आश्रमसँ अयोध्‍या लऽ चलबाक हेतु तैयार भऽ जाइत छथि‍। रामक उक्‍ति‍ श्रीमती खानक शब्‍दमे द्रष्‍टव्‍य अछि‍-
बदलि‍ देब सभटा
जे हेबाक छैक से होएत
जे नि‍यत छैक से नहि‍
वि‍धि‍क वि‍धान हम
तहस नहस कए देब।

मुदा सीता अयोध्‍या आपस होएब स्‍वीकार नै करैत छथि‍ आ भूमि‍ पुत्रीमे भूमि‍मे बि‍ला जाइत छथि‍। हुनक भूमि‍मे जयबा सँ पहि‍ने'क उद्घोष ऐ खण्‍डकाव्‍यक परि‍णति‍ थि‍क आ नारी अस्‍मि‍मताक उत्‍कर्षक द्योतक सेहो-
हम नहि‍ छी पाषाणी अहल्‍या
वातभक्षा नि‍राहारा
जनकर कयल प्रभू उद्धार
मि‍लाओल स्‍वामी गौतक सँ
हम छी सशक्‍त, स्‍वयंपूर्ण सीता
श्रीमती खान ऐ खण्‍डकाव्‍यमे सीता धरि‍तक अनुगायनक माध्‍यमे सासुरवास बेटीक मनोभावकेँ अत्‍यन्‍त मनोरम ढंगे प्रस्‍तुत करैत भाव व्‍यक्‍त कएने छथि‍-
वि‍आह होइत देरी नारीक स्‍तरीयतामे आकस्‍मि‍क परि‍वर्त्तन भऽ जाइत छैक। ओकर अस्‍मि‍ताकेँ जेना बाकसमे बन्न कऽ देल जाइत छैक, ओकर स्‍वातंत्र्यकेँ बेढ़ि‍ देल जाइत छैक।
हुनकहि‍ शब्‍दमे-
बि‍सरलहुँ छल्‍हि‍गर दही, हरि‍यर चूड़ा
सपना भेल भुन्नाक पेटी, रहूक मूड़ा
छूटल एकछि‍न्ना नूआ
नौगज्‍जीमे हेरायल तनुक धूआ
घरे-घर, गलि‍ये गली, जतय मोन करय ततय चली
एतय कनक मन्‍दि‍रक चतुष्‍कोण देहरि‍ के कहय
साधंस कतय कि‍ कक्ष कौखन पार करी

नारीकेँ पुरूषक समकक्ष कि‍ंवा पुरूषहुसँ अधि‍क सबला स्‍वरूपमे प्रस्‍तुत करबाक भावाभि‍व्‍यक्‍ति‍क कोनो अवसर श्रीमती खान ऐ खण्‍डकाव्‍यमे छोड़लनि‍ नै अछि‍ जे नारी अस्‍मि‍ताक अन्‍वेषणक प्रति‍ हि‍नक साकांछ दृष्‍टि‍क द्योतक अछि‍।
ऐमे एक गोट प्रसंग अछि‍ धनुष यज्ञक। धनुष वास्‍तवमे अनेकानेक बलशाली राजालोकनि‍क द्वारा टकसाओलो नै भेल छलनि‍ तकरा राजा राम सहजहि‍ं तोड़ि‍ देलनि‍। मुदा तैसँ हुनक अपौरूषेय बलवि‍क्रम बूझि‍ पुरूष समाजकेँ गर्व करबाक कोनो कारण नै छल, कारण सीता अत्‍यन्‍त सहज रूपसँ ओकरा उठा कऽ प्रति‍दि‍न ठाँव कऽ लेल करैत छलीह। श्रीमती खान कहने छथि‍-
केहन केहन मोँछबला अयलाह अएलाह
धोंछ भेल मुँह गेलाह
एकहु रत्ती कहाँ टसकलनि‍
धनुषा.....
कमल नाल सन कोमल कान्‍त कि‍शोर
सहजहि‍ उठाओल
जनु फूल सि‍ंगरहारक हो
हल्‍लुक
गे दाइ! ताहू सँ कोमल हमर सि‍या सुकुमारि‍
उठबथि‍ नि‍त दि‍न ठाँव करैक काल
जेना सि‍मरक फाहा होइक
 
एही प्रकारक दोसर प्रसंग अछि‍ सहस्रबाहु वधक जैमे अद्भुत रामायणक अनुरूप ई कथा आएल अछि‍ जे सहस्रबाहु राजा रामकेँ अपन बलसँ परास्‍त करबामे सक्षम छल, युद्धभूमि‍मे राजा राम अचेत भऽ गेल छलाह। तखन सीता कालीक रूप धऽ सहस्रबाहुकेँ पराजि‍त करबामे अपन सामर्थ्‍य देखैने छलीह। श्रीमती खान द्वारा अहू कथाक समावेशसँ हुनक काव्‍यमे अभि‍व्‍यक्‍त नारी-भावनाक परि‍चए भेटैत अि‍छ।
श्रीमती खानक ऐ खण्‍डकाव्‍यमे वाल्‍मीकीय रामायणमे उद्धतृ ओहू अंशक सवि‍शेष उल्‍लेख अछि‍ जैमे राम द्वारा लंका वि‍जयक उपरान्‍त सीताकेँ परि‍त्‍याग कऽ देबाक कथा अनुस्‍यूत अछि‍ आ जकर मार्जन अग्‍नि‍ परीक्षासँ होइत अछि‍। ऐ सन्‍दर्भमे वाल्‍मीकि‍क कि‍छु श्‍लोकक भावराशि‍केँ श्रीमती खान यथावत् पि‍रगृहीत कऽ लेलनि‍ अछि‍ जे हुनक बहुश्रुति‍क प्रतीक थि‍क यथा-
ि‍वदि‍तश्चस्‍तु भद्रं ते योऽ यं रण परि‍श्चम:।
सुतीर्ण: सुहृदां वीर्यान्न त्‍वदर्थ मया कृत:।।
रक्षता तु मया वृत्तपवादं च सर्वत:।
प्रख्‍यातस्‍यात्‍म वंशस्‍ न्‍याङ्गं च परि‍मार्जिता:।।
लक्ष्‍मणे वाथ भरते कुरू बुद्धि‍ यथासुखम्।।
शत्रुध्‍ने वाथ सुग्रीवे राक्षसे वा वि‍भीषणे।
नि‍वेशय मन: सीते यथा वा सुखमात्‍मना।।6/115/।

श्रीमती खानक शब्‍दमे ऐ भावकेँ ऐ रूपेँ उपस्‍थापि‍त कएल गेल अि‍छ-
सीत हम अहाँक लेल नहि‍ कयलहुँ
युद्ध
रावण केँ करक परास्‍त
देवसत्ता केँ स्‍थापि‍त करक
पत्नी जनि‍कर हरण भेल
ताहि‍ राजाक कलंक मेटब
छल अभि‍ष्‍ट
से भेल सि‍द्ध
तेँ कयल युद्ध
हे सीते, आइ अहाँकेँ कएलहुँ मुक्‍त पत्नी धर्मसँ
रहू लंका मे
कि‍ंवा जाउ भारतवर्ष
भरत कि‍ंवा शत्रुध्‍न आि‍क लक्ष्‍मण
जकरा संग रहबाक हो रहू-

रामक ई प्रसंग अत्‍यन्‍त कारूणि‍क अछि‍। अहूठाम ि‍नर्दोष सीतापर रामक वचन वाणक प्रहार भेल अछि‍ जकरा नारी अस्‍मि‍तापर प्रहार कहल जा सकैछ। महात्‍मा तुलसीदासकेँ श्रीरामक ई कटूक्‍ति‍पूर्ण वचनसँ ततेक अप्रि‍य बुझना गेलनि‍ जे ओ अपन रामकथामे वस्‍तुक आग्रहेँ ऐ घटनाक अल्‍पतम शब्‍दावलीमे उल्‍लेख कऽ कऽ आगू बढ़ि‍ गेलाह-
सीता प्रथम अनल मुह राखी।
प्रकट कीन्‍ह चह अंतर साखी।।
तेहि‍ कारण करूणानि‍धि‍ कहे कछुक दुर्बाद।
युपत जातु धानी सब लागी करै वि‍षाद।।

मुदा ऐ प्रसंगमे वाल्‍मीकि‍क सीतामे जै अपार ऊर्जाक दर्शन होइत अछि‍, तकर श्रीमती खानक खण्‍डकाव्‍यमे अभाव देख पड़ैत अछि‍, जकरा आश्‍चर्यजनक कहल जा सकैछ। वाल्‍मीकि‍कि‍ सीता अग्‍नि‍ परीक्षासँ पूर्व प्रगल्‍यतार्वक अपनापर कएल गेल शंकाक प्रति‍वाद करैत छथि‍ जे नारी अस्‍मि‍ताक
प्रति‍ हुनक दृढ़ भावनाक प्रति‍क थि‍क यथा-
कि‍ं माम सदृशं वाक्‍यमीदृशं शोकदारूणम्।
रूक्षं प्रावयसे वीर प्रकृत: प्राकृतामि‍व।।
पृथक्‍स्‍त्रीणां प्रचारेण जाति‍त्‍वं परि‍शङ्कसे।
परि‍त्‍यजैनां शंङ्कं तु यदि‍ तेऽहं परीक्षि‍ता।।
यदहं गात्रसंस्‍पर्शं गतास्‍मि‍ वि‍वशा प्रभो।
कामकारो न मे तत्र दैवं दत्राापराध्‍यति‍।।
सह संवृद्धभावेन संसर्गेण च मानद।
यदि‍ तेऽहं न वि‍ज्ञाता हता तेनास्‍मि‍ शाश्‍वतम्।।
त्‍वया तु नृपशार्द्ल शेषमेवानुवर्तता।
लघुनेव मनुष्‍येण स्‍त्रीत्‍वमे पुरस्‍कृतम्।।
न प्रमाणीकृत: पणि‍र्बाल्‍ये मम नि‍पीडि‍त:।
मम भक्‍ति‍श्‍च शीलंच सर्वं ते पृष्‍टत: कृतम्।। इत्‍याति‍।
 
तथापि‍ श्रीमती खानक ऐ खण्‍डकाव्‍यक ई वि‍शि‍ष्‍टता थि‍क जे ऐमे मि‍थि‍लामे रामजानकी वि‍षयक रूढ़ि‍ सभकेँ सेहो महत्‍वपूर्ण स्‍थान देल गेल अछि‍। मि‍थि‍लामे प्रत्‍येक कन्‍याकेँ सीताक प्रतीक मानल जाइत छन्‍हि‍ आ मि‍थि‍लाक लोकगीतमे सीता प्रत्‍येक जनकक पुत्रीक रूपमे गृहीत छथि‍। मैथि‍ली लोकगीतमे सीताक वैवाहि‍क प्रसंगक बहुलय अछि‍ आ लोक सीताक व्‍यथा-कथाकेँ जेना बि‍सरि‍ गेल छथि‍। ऐ तथ्‍यकेँ श्रीमती खान ऐ शब्‍दें अभि‍व्‍यक्‍त कएने छथि‍-
सीकी खोंटैत
लि‍खि‍या करैत
सुआसि‍म लोकनि‍ गओतीह गीत
ढौरतीह कोबर
बि‍सरि‍ जयतीह सायास
सि‍या धि‍याक अनसोहाँत पीर।

श्रीमती खान नारी ओ पुरूषक समकक्षता ओ सहभवहि‍ केँ प्रेय रूपमे ऐ साहि‍त्‍यि‍क कृति‍मे प्रस्‍तुत कएलनि‍ अछि‍ जे ऐति‍हासि‍क-पौराणि‍क कथावस्‍तुकेँ अधुनातन युगजीवनक परि‍प्रेक्ष्‍यमे देखबाक अन्‍वेषक दृष्‍टि‍क काणे हि‍नका साहि‍त्‍यकार वरेण्‍य श्रेणीमे पाङ्केय सावि‍त करै छन्‍हि‍। द्रष्‍टव्‍य अछि‍ रामक प्रतीक्षा सीताक ई उक्‍ति‍-
हमरा लेल अहाँ प्राणहरि‍ छी राम
ने छी साध्‍य, ने साधन
अहाँ साक्षत वि‍जय थि‍कहुँ
हम मुदा
पराजय नहि‍ थि‍कहुँ
नहि‍ होइत छैक
प्रत्‍येक प्रति‍स्‍पर्द्धामे
जय आ पराजय

सहजता, सरलता ओ प्रसाद गुण सम्‍पन्नतासँ मण्‍डि‍त तत्‍सम् ओ तद्भवबहुल श्रीमती खानक ऐ खण्‍डकाव्‍यमे उपमा, उत्‍प्रेक्षादि‍ अलंकार सहजहि‍ं आकृष्‍ट करैत अछि‍ आ भवभूति‍क एको रस: करूण एवं प्रति‍ध्वनि‍त होइत देख पड़ैछ। ऐ पठनीय, मननीय ओ संग्रहणीय कृति‍क हेतु श्रीमती खान साधुवादक पात्र छथि‍। मैथि‍ली जगतक तँ सहजहि‍ं, रामकथाक प्रत्‍येक अध्‍येताकेँ हि‍नक ई खण्‍डकाव्‍य आकर्षित करतनि‍, से अपेक्षा कएल जएबाक चाही। कि‍छु परि‍मार्जनक संग ई कृति‍ कालजयीक श्रेणीमे गण्‍य होएबाक योग्‍यता रखैछ। मैथि‍ली रामकथाक आयामकेँ संवद्धि‍त करैबला ऐ कृति‍केँ वि‍भि‍न्न दृष्‍टि‍ये समीक्षा-समालोचनाक वि‍मर्श परक आयाम भेटक चाही।

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दौगल चलि जायब गाम -किशन कारीगर

दौगल चलि जाएब गाम।

मनुक्ख दौग रहल अछि मचल अछि आपा-धापी
जतए केकरो कियो ने चिन्ह रहल अछि
एहेन नगर आ पाथर हृद्य सॅं दूर
एखने होइए जे दौगल चलि जाएब गाम।।

लोहाक छड़ आ सीमेंट कंक्रीट सॅं बनल
ओना तऽ ई एकटा आधुनिक महानगर अछि
मुदा शहरक एहि आपा-धापी मे
मनुक्खक हृद्य जेना पाथर भऽ गेल अछि।।

किएक मचल अछि आधुनिकताक ई हरविड़ो ?
कि भेटत एहि सॅं कियो ने किछू बूझि रहल अछि
जेकरे दूखू रूपैयाक ढ़ेरी लेल अपसियॉंत रहैत अछि
पाथर हृद्य मनुक्ख मानवताक मूल्य केने अछि जीरो।।

लिफट लागल उ दसमंजिला मकान
एक्के फलैट पर रहितौ लगैत छी अनजान
ओ अड़ोसी हम पड़ोसी मुदा
एक दोसर के नहि कोनो जान-पहचान।।

कहू एहेन कंक्रीटक शहर कोन काजक
आधुनिकताक काल कोठरी अछि साजल
एहि चमचमाईत कोठरी मे कियो ने केकरो चिन्ह रहल अछि
रूपैयाक खातिर आबक मनुक्ख की कि ने कऽ रहल अछि।।

अतियौत-पितियौत ममियौत-पिसियौत जेकरा देखू
अपने मे मगन चिन्हा परिचे सॅं कोन काज
आधुनिकताक काल कोठरी मे आब
अनचिन्हार भऽ गेलाह जन्मदाता बूढ़ माए-बाप।।

शहरक एहेन अमानवीय आपा-धापी देखि केॅं
पसीज गेल हमर हृद्य
एहेन अनचिन्हार नगर छोड़ि केॅं मोन होइए
एखने आब दौगल चलि जाएब गाम।।

हे यौ भलमानुस आधुनिक मनुक्ख
एहेन अनचिन्हार नगर ने नीक
एहि कंक्रीटक महल सॅ एक बेर तऽ देखू
गामक कोनो टूटली मरैया बड्ड नीक।।

मनुक्ख एक दोसर के चिन्ह रहल अछि
चिड़ै चुनमून चॅू चॅू कए रहल अछि
रस्ता-पेरा निश्छल प्रेमक धार बहि रहल अछि
हरियर-हरियर खेत-पथार आई सोर कऽ रहल अछि।।

टूटलाहा टाट खर-पतारक किछू घर
जतए नहि कियो अनचिन्हार नहि कोनो डर
चौवटिया लग फरैत अछि खूम आम
एहने नगर के औ बाबू लोग कहैत छैक गाम।।


लेखक:- किशन कारीग़र


परिचय:- जन्म- 1983ई0(कलकता में) मूल नाम-कृष्ण कुमार राय ‘किशन’। पिताक नाम- श्री सीतानन्द राय ‘नन्दू’ माताक नाम-श्रीमती अनुपमा देबी।मूल निवासी- ग्राम-मंगरौना भाया-अंधराठाढ़ी, जिला-मधुबनी (बिहार)। हिंदी में किशन नादान आओर मैथिली में किशन कारीग़र के नाम सॅं लिखैत छी। हिंदी आ मैथिली में लिखल नाटक आकाशवाणी सॅं प्रसारित एवं दर्जनों लघु कथा कविता राजनीतिक लेख प्रकाशित भेल अछि। वर्तमान में आकशवाणी दिल्ली में संवाददाता सह समाचार वाचक पद पर कार्यरत छी। शिक्षाः- एम. फिल(पत्रकारिता) एवं बी. एड कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय कुरूक्षेत्र सॅं।

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सोमवार, 10 जनवरी 2011

गद्य कविता - डॉ. काञ्चीनाथ झा ‘किरण’क नामक अद्वैत मीमांसा

रमेश 1961-
जन्म स्थान मेंहथ, मधुबनी, बिहार। चर्चित कथाकार ओ कवि । प्रकाशित कृति: समांग, समानांतर, दखल (कथा संग्रह), नागफेनी (गजल संग्रह), संगोर, समवेत स्वरक आगू, कोसी धारक सभ्यता, पाथर पर दूभि (काव्य संग्रह), प्रतिक्रिया (आलोचनात्मक निबंध)।
गद्य कविता-  डॉ. काञ्चीनाथ झा ‘किरण’क नामक अद्वैत मीमांसा
अहाँ स्वभिमानी छी, तँ किरण जी छी।
जनमानसक पक्षमे सामाजिक छी, तँ किरणजी छी।
अहाँ किरणजी छी, तँ मह-महाइत मिथिला छी।
अहाँ मह-महाइत मिथिला छी, तँ निश्चिते कह-कह भुन्हूर सन किरणजी छी।
अहाँ मानसिकता आ मोहविरा मे ‘सोइत’ छी, तँ किरणजी नहि छी। मोहविरा मे पञ्जी-प्रबन्धक ‘बाबू साहेब’ छी, तँ किरणजी नहिए टा छी।
अहाँ वास्तव मे ‘जयवार’ छी, तँ चलू कहुना कऽ किरणजी छी।
जँ ब्राह्मण-वर्गीकरण मे कत्तहु टा नहि छी अहाँ, तँ जरूर किरणजी छी।
आ जँ दसो दिकपालमे सँ क्यो अहाँक पैरवीकार नहि छथि, तँ ध्रुव सत्य मानू, अहाँ आर क्यो नहि, किरणेजी टा छी।
अहाँक मन-बन्ध सुमनजी-अमर जी सँ हो, तँ भऽ सकैए, संज्ञा रूपें अथवा मोहविरामे अहाँ साहित्यिक आ धार्मिक ब्राह्मण भऽ जाइ। अहाँक मन-बन्ध मधुपजी सँ हो, तँ निश्छल भक्त-हृदय मैथिल जीवनक लोकगायक अहाँकेँ मानबामे कोनो असौकर्य नहि। जँ मणिपद्ध जी सँ मन-बन्ध हो, तँ, अपना केँ मिथिलाक लोक-संस्कृति-चेताक उदात्त उदाहरण बूझि सकैत छी। आ जँ अहाँक मन-बन्ध किरणेजी टा सँ हो, तँ सय प्रतिशत मनुक्खक अलावा अहाँ आर किच्छु भैय्ये नहि सकैत छी।

कविवर सीताराम झाक अन्योक्ति-वक्रोक्ति आइयो मिथिलाक जड़ता-जटिलतापर मुङरी पटकि रहल अछि।
अपन मुक्तिक प्रसंग तकैत आइयो राजकमल मिथिलाक ‘महावन’ मे अहुरिया काटि रहल छथि।
बाबा बैद्यनाथकेँ पाथर कहैत आइयो किरण-शिष्य यात्रीक अनवरत ब्रह्माण्ड-विलाप जारी अछि। धूमकेतु ‘मनुक्खक देवत्वे’पर एखनो ‘रिसर्च’ कऽ रहल छथि। मुदा साक्षात् किरणजी आइयो मनुखताक उपेक्षापर गुम्हरैत। पुरातनपंथीकेँ कान पकड़ैत/ माटिक महादेवकेँ छोड़ि मनुक्ख-पूजनक-सुस्पष्ट  उद्घोषणा कऽ रहल छथि।

अहाँ खट्टर कका छी, तँ, माङुरक झोड़सँ चरणामृत लऽ सकैत छी। मुदा किरणजी जकाँ माङुरक ओही झोड़सँ सर्वहारा वर्गक अरूदा बढ़ेवाक बैदगिरी नहि कऽ सकैत छी। अहाँ कञ्चन-जंघासँ कूच-विहार धरिक यात्रा कऽ सकैत छी, मुदा डोमटोलीसँ मुसहरी धरिक नहि। अहाँ समाजिक सरोकारमे सुधारवादी भऽ सकैत छी, मुदा, किसान-आन्दोलन केँ मिथिलाक जमीनपर उतारि परिवर्त्तनकामी नहि।

अहाँ भाङ पीबि वसंतक स्वागत करब, तँ, अहाँ केँ, बताह कहबामे हुनकर संघर्ष-गीतक भास कनियो बे-उरेब हेबाक प्रश्ने कहाँ अछि? जहिना रूसोक पष्ठभूमि बिना फ्रांसीसी क्रांति संभव नहि छल, तहिना ‘मधुरमनि’क पृष्ठभूमि बिना ‘जोड़ा-मन्दिर’क अस्तित्व संभव कहाँ छल? ‘जगतारानि’ नहि तँ ‘बाँसक ओधि’ की? माटिक अभ्यर्थना नहि आ जनोन्मुखी सोचक सर्जना नहि तँ, आलोचनाक राज हंसक धोधि की?
 
ओ प्राचीन गीतक ‘लाउड-स्पीकर’ बनि सकैत छलाह, नवीन गीतक सी.डी.क उद्गाता नहि। ओ राज-सरोवरक हंस बनि नीर-क्षीर-विवेक(?) सँ आभिजात्य मीमांसाक पथार लगा कऽ साहित्यालोचनक खुट्टा गाड़ि सकैत छलाह। मुदा नव-चेतनाक प्रगति-शील गीतक गाता आ ज्ञाता नहि। ओ किरणजीकेँ काव्योपेक्षाक दंश दऽ सकैत छलाह, मुदा हुनका काल-निर्णय आ आगत-पीढ़ीक ‘मूड’ अज्ञात छल। ओ वस्तुतः ‘शास्त्रीय’ छलाह, आ किरणजी ‘तृणमूल’क कार्यकर्त्ता। ओ ‘उरोज’ केँ सरोजक उपमान बना श्रृंगार-काव्यक प्राचीन परंपराकेँ सम्पुष्ट कऽ सकैत छलाह। मुदा धानक उरोजमे दूध भरबाक सामर्थ्य हुनका कतय? ओ हुनकर जीवनक जड़त्व आ साहित्यक सीमा छल।

आँहाँ भासा-मंचपर लोक-चेतनाक सर्जक छी-तँ किरणजी छी।
साहित्यिक-मंचपर सामाजिक-चेतनाक पोषक छी-तँ किरणजी छी।
संस्कृतिक मंचपर जन-संस्कृतिक गायक छी- तँ किरणजी छी।
राजनीतिक मंचपर दिशाहारा-वर्गक पुष्टिवर्द्धन मे ‘महराइ’ गबैत छी-तँ किरणजी छी।
विद्यापतिक-मंचपर जनवादी गीत-संस्कृतिक उद्घाटक छी-तँ किरणजी छी।
अहाँक जीवन-दर्शन सुचिंतित ऊर्ध्वगामी अछि-तँ किरणजी छी।
जीवन आ साहित्य मे समरूप दृष्टिकोण हो-तँ अहाँ किरणेजी टा भऽ सकैत छी।

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उषा किरण खानकेँ मैथिली लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार 2010

उषाकिरण खानकेँ मैथिली लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार २०१० भामती उपन्यास लेल देल जाएत।


उषाकिरण खान 1945- जन्म:४ अक्टूबर १९४५,कथा एवं उपन्यास लेखनमे प्रख्यात । मैथिली तथा हिन्दी दूनू भाषाक चर्चित लेखिका ।प्रकाशित कृति:अनुंत्तरित प्रश्न, दूर्वाक्षत, हसीना मंज़िल, भामती (उपन्यास) ।


नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानक सदस्यता (नेपाल देशक भाषा-साहित्य,  दर्शन, संस्कृति आ सामाजिक विज्ञानक क्षेत्रमे  सर्वोच्च सम्मान)

नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानक सदस्यता
श्री राम भरोस कापड़ि 'भ्रमर' (2010)
श्री राम दयाल राकेश (1999)
श्री योगेन्द्र प्रसाद यादव (1994)

नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान मानद सदस्यता
स्व. सुन्दर झा शास्त्री

नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान आजीवन सदस्यता
श्री योगेन्द्र प्रसाद यादव



फूलकुमारी महतो मेमोरियल ट्रष्ट काठमाण्डू, नेपालक सम्मान
फूलकुमारी महतो मैथिली साधना सम्मान २०६७ - मिथिला नाट्यकला परिषदकेँ
फूलकुमारी महतो मैथिली प्रतिभा पुरस्कार २०६७ - सप्तरी राजविराजनिवासी श्रीमती मीना ठाकुरकेँ
फूलकुमारी महतो मैथिली प्रतिभा पुरस्कार २०६७ -बुधनगर मोरङनिवासी दयानन्द दिग्पाल यदुवंशीकेँ


साहित्य अकादेमी  फेलो- भारत देशक सर्वोच्च साहित्य पुरस्कार (मैथिली)


           १९९४-नागार्जुन (स्व. श्री वैद्यनाथ मिश्र यात्री १९११-१९९८ ) , हिन्दी आ मैथिली कवि।


           २०१०- चन्द्रनाथ मिश्र अमर (१९२५- )- मैथिली साहित्य लेल।




साहित्य अकादेमी भाषा सम्मान ( क्लासिकल आ मध्यकालीन साहित्य आ गएर मान्यताप्राप्त भाषा लेल):-
           

२०००- डॉ. जयकान्त मिश्र (क्लासिकल आ मध्यकालीन साहित्य लेल।)          
२००७- पं. डॉ. शशिनाथ झा (क्लासिकल मध्यकालीन साहित्य लेल।)
            पं. श्री उमारमण मिश्र


साहित्य अकादेमी पुरस्कार- मैथिली

१९६६- यशोधर झा (मिथिला वैभव, दर्शन)
१९६८- यात्री (पत्रहीन नग्न गाछ, पद्य)
१९६९- उपेन्द्रनाथ झा “व्यास” (दू पत्र, उपन्यास)
१९७०- काशीकान्त मिश्र “मधुप” (राधा विरह, महाकाव्य)
१९७१- सुरेन्द्र झा “सुमन” (पयस्विनी, पद्य)
१९७३- ब्रजकिशोर वर्मा “मणिपद्म” (नैका बनिजारा, उपन्यास)
१९७५- गिरीन्द्र मोहन मिश्र (किछु देखल किछु सुनल, संस्मरण)
१९७६- वैद्यनाथ मल्लिक “विधु” (सीतायन, महाकाव्य)
१९७७- राजेश्वर झा (अवहट्ठ: उद्भव ओ विकास, समालोचना)
१९७८- उपेन्द्र ठाकुर “मोहन” (बाजि उठल मुरली, पद्य)
१९७९- तन्त्रनाथ झा (कृष्ण चरित, महाकाव्य)
१९८०- सुधांशु शेखर चौधरी (ई बतहा संसार, उपन्यास)
१९८१- मार्कण्डेय प्रवासी (अगस्त्यायिनी, महाकाव्य)
१९८२- लिली रे (मरीचिका, उपन्यास)
१९८३- चन्द्रनाथ मिश्र “अमर” (मैथिली पत्रकारिताक इतिहास)
१९८४- आरसी प्रसाद सिंह (सूर्यमुखी, पद्य)
१९८५- हरिमोहन झा (जीवन यात्रा, आत्मकथा)
१९८६- सुभद्र झा (नातिक पत्रक उत्तर, निबन्ध)
१९८७- उमानाथ झा (अतीत, कथा)
१९८८- मायानन्द मिश्र (मंत्रपुत्र, उपन्यास)
१९८९- काञ्चीनाथ झा “किरण” (पराशर, महाकाव्य)
१९९०- प्रभास कुमार चौधरी (प्रभासक कथा, कथा)
१९९१- रामदेव झा (पसिझैत पाथर, एकांकी)
१९९२- भीमनाथ झा (विविधा, निबन्ध)
१९९३- गोविन्द झा (सामाक पौती, कथा)
१९९४- गंगेश गुंजन (उचितवक्ता, कथा)
१९९५- जयमन्त मिश्र (कविता कुसुमांजलि, पद्य)
१९९६- राजमोहन झा (आइ काल्हि परसू, कथा संग्रह)
१९९७- कीर्ति नारायण मिश्र (ध्वस्त होइत शान्तिस्तूप, पद्य)
१९९८- जीवकान्त (तकै अछि चिड़ै, पद्य)
१९९९- साकेतानन्द (गणनायक, कथा)
२०००- रमानन्द रेणु (कतेक रास बात, पद्य)
२००१- बबुआजी झा “अज्ञात” (प्रतिज्ञा पाण्डव, महाकाव्य)
२००२- सोमदेव (सहस्रमुखी चौक पर, पद्य)
२००३- नीरजा रेणु (ऋतम्भरा, कथा)
२००४- चन्द्रभानु सिंह (शकुन्तला, महाकाव्य)
२००५- विवेकानन्द ठाकुर (चानन घन गछिया, पद्य)
२००६- विभूति आनन्द (काठ, कथा)
२००७- प्रदीप बिहारी (सरोकार, कथा
२००८- मत्रेश्वर झा (कतेक डारि पर, आत्मकथा)
२००९- स्व.मनमोहन झा (गंगापुत्र, कथासंग्रह)
२०१०-श्रीमति उषाकिरण खान (भामती, उपन्यास)

साहित्य अकादेमी मैथिली अनुवाद पुरस्कार

१९९२- शैलेन्द्र मोहन झा (शरतचन्द्र व्यक्ति आ कलाकार-सुबोधचन्द्र सेन, अंग्रेजी)
१९९३- गोविन्द झा (नेपाली साहित्यक इतिहास- कुमार प्रधान, अंग्रेजी)
१९९४- रामदेव झा (सगाइ- राजिन्दर सिंह बेदी, उर्दू)
१९९५- सुरेन्द्र झा “सुमन” (रवीन्द्र नाटकावली- रवीन्द्रनाथ टैगोर, बांग्ला)
१९९६- फजलुर रहमान हासमी (अबुलकलाम आजाद- अब्दुलकवी देसनवी, उर्दू)
१९९७- नवीन चौधरी (माटि मंगल- शिवराम कारंत, कन्नड़)
१९९८- चन्द्रनाथ मिश्र “अमर” (परशुरामक बीछल बेरायल कथा- राजशेखर बसु, बांग्ला)
१९९९- मुरारी मधुसूदन ठाकुर (आरोग्य निकेतन- ताराशंकर बंदोपाध्याय, बांग्ला)
२०००- डॉ. अमरेश पाठक, (तमस- भीष्म साहनी, हिन्दी)
२००१- सुरेश्वर झा (अन्तरिक्षमे विस्फोट- जयन्त विष्णु नार्लीकर, मराठी)
२००२- डॉ. प्रबोध नारायण सिंह (पतझड़क स्वर- कुर्तुल ऐन हैदर, उर्दू)
२००३- उपेन्द दोषी (कथा कहिनी- मनोज दास, उड़िया)
२००४- डॉ. प्रफुल्ल कुमार सिंह “मौन” (प्रेमचन्द की कहानी-प्रेमचन्द, हिन्दी)
२००५- डॉ. योगानन्द झा (बिहारक लोककथा- पी.सी.राय चौधरी, अंग्रेजी)
२००६- राजनन्द झा (कालबेला- समरेश मजुमदार, बांग्ला)
२००७- अनन्त बिहारी लाल दास “इन्दु” (युद्ध आ योद्धा-अगम सिंह गिरि, नेपाली)
२००८- ताराकान्त झा (संरचनावाद उत्तर-संरचनावाद एवं प्राच्य काव्यशास्त्र-गोपीचन्द नारंग, उर्दू)
२००९- भालचन्द्र झा (बीछल बेरायल मराठी एकाँकी-  सम्पादक सुधा जोशी आ रत्नाकर मतकरी, मराठी)


साहित्य अकादेमी मैथिली बाल साहित्य पुरस्कार
 
२०१०-तारानन्द वियोगीकेँ पोथी "ई भेटल तँ की भेटल"  लेल

प्रबोध सम्मान

प्रबोध सम्मान 2004- श्रीमति लिली रे (1933- )
प्रबोध सम्मान 2005- श्री महेन्द्र मलंगिया (1946- )
प्रबोध सम्मान 2006- श्री गोविन्द झा (1923- )
प्रबोध सम्मान 2007- श्री मायानन्द मिश्र (1934- )
प्रबोध सम्मान 2008- श्री मोहन भारद्वाज (1943- )
प्रबोध सम्मान 2009- श्री राजमोहन झा (1934- )
प्रबोध सम्मान 2010- श्री जीवकान्त (1936- )
प्रबोध सम्मान 2011- श्री सोमदेव (1934- )

यात्री-चेतना पुरस्कार


२००० ई.- पं.सुरेन्द्र झा “सुमन”, दरभंगा;
२००१ ई. - श्री सोमदेव, दरभंगा;
२००२ ई.- श्री महेन्द्र मलंगिया, मलंगिया;
२००३ ई.- श्री हंसराज, दरभंगा;
२००४ ई.- डॉ. श्रीमती शेफालिका वर्मा, पटना;
२००५ ई.-श्री उदय चन्द्र झा “विनोद”, रहिका, मधुबनी;
२००६ ई.-श्री गोपालजी झा गोपेश, मेंहथ, मधुबनी;
२००७ ई.-श्री आनन्द मोहन झा, भारद्वाज, नवानी, मधुबनी;
२००८ ई.-श्री मंत्रेश्वर झा, लालगंज,मधुबनी
२००९ ई.-श्री प्रेमशंकर सिंह, जोगियारा, दरभंगा
२०१० ई.- डॉ. तारानन्द वियोगी, महिषी, सहरसा



कीर्तिनारायण मिश्र साहित्य सम्मान

२००८ ई. - श्री हरेकृष्ण झा (कविता संग्रह “एना त नहि जे”)
२००९ ई.-श्री उदय नारायण सिंह “नचिकेता” (नाटक नो एण्ट्री: मा प्रविश)
२०१० ई.- श्री महाप्रकाश (कविता संग्रह “संग समय के”) 

भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता
युवा पुरस्कार (२००९-१०) गौरीनाथ (अनलकांत) केँ मैथिली लेल।

भारतीय भाषा संस्थान (सी.आइ.आइ.एल.) , मैसूर
रामलोचन ठाकुर:- अनुवाद लेल भाषा-भारती सम्मान २००३-०४ (सी.आइ.आइ.एल., मैसूर) जा सकै छी, किन्तु किए जाउ- शक्ति चट्टोपाध्यायक बांग्ला कविता-संग्रहक मैथिली अनुवाद लेल प्राप्त। 
रमानन्द झा 'रमण':- अनुवाद लेल भाषा-भारती सम्मान २००४-०५ (सी.आइ.आइ.एल., मैसूर) छओ बिगहा आठ कट्ठा- फकीर मोहन सेनापतिक ओड़िया उपन्यासक मैथिली अनुवाद लेल प्राप्त। 

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अनुभूतिः एकटा पाठकीय प्रतिक्रिया- उषाकिरण खान




जखन पन्ना जी लिखल कथा संग्रह अनुभूतिहमरा हाथमे आएल तखन अतिशय प्रसन्नता भेल। किएक तँ पन्ना जीक संगे हम कएक बेर अस्सीक दशक मे संगहि कथा पाथ कएने छलहुँ। हुनका कथाक मानसिक धरातल आ लेखकीय सावधानी बूझल छल। कथाकारक अनुभूतिक परिचय छल स्थिरचित्तक बुझनुक लेखिका सहजहि श्रोता एवं पाठक सँ सोझा सोझी गप्प करैत छथि। अनुभूतिक वेष्टन मोनक आगाँ पाछाँ रहैत छन्हि, तैं कथाक विकास एकटा सुष्पष्ट विचार यात्रा जकाँ छन्हि। पन्ना जी अनेक परिवेशक कथा लिखैत छथि। ठोस धरातल पर चलय बाली आइ काल्हिक स्त्रीक कथा ओ संवेदना संग नहि पएरक धमक संगे लिखने छथि। जेना सेवानिवृत्ति। सेवानिवृत्तिक पश्चात् संतान आ स्वजन परिजन मुँह बओने रहैत छथि, जीवन चरित कमाई आ बचत के कोना आलसात कए लेल जाए तकर ब्योंत मे लागल रहैत छथि मुदा वृद्ध माता पिताक चिंता नहिये टा करैत छथि। पन्ना झा जीक कथाकार स्वानुभूति केँ सोझाँ धए टा देलन्हि अछि ओकरा विवछओलन्हि अछि नहि। इएह हिनक विशेषता छन्हि। अपन दृढ़ पद चाप छोड़ब। सेवानिवृत्ति कथाक चर्च हम बारंबार करए चाहैत छी, ओ कथा बूँद मे समुद्र तँ थिके, एकटा पइघ संदेश दैत अछि। मनहि ओ स्वयं दुलारपुर सन नगरक कात बला गामक बेटी छथि तरौनी सन बुद्धिजीवी गामक पुतहु परंच मिथिलाक असूर्यम्पश्या ग्राम ललनाक ज्ञान छलन्हि, कलकत्ता जाए आ ओतए शिक्षा प्राप्त कए, ओतुक्का सामाजिक जीवन के अनुभव लए जे किछु अपना क्षेत्रक विकासक कामना कएलन्हि तकर सत्व ओ सेवानिवृत्तिकथामे देने छथिन्ह, एकटा गाम जे आदर्श अछि, विद्यालय, अस्पताल इत्यादि छैक महाविद्यालय नहि छैक। महिला महाविद्यालय फोलब हाइ-रिस्ककाज छैक, छात्रा जुटतैक कि नहि? मुदा कल्पना शील लेखिका आधुनिक शिक्षाक आवश्यकता बलें महाविद्यालय फोललनि आ सफल भेलीह। कथामे स्वयं कथानायिका श्राद्धा केर विकास क्रमशः भेल छन्हि ओहिना जेना हुनक महिला शिक्षाक प्रयोजनक।
आइ काल्हि शिक्षा सभक जन्मसिद्ध अधिकार छैक तकर कानूनी व्याख्या खूब प्रचारित भऽ रहल छैक। गुल्ली-डंटा खेलए बला बालकसँ लए गइचरवाही मे खैनी ठोकए बला नेन्ना सभ केँ धऽ कऽ स्कूल आनल जाइत छैक। भनहि ओ लोकनि मिड डे लंच लऽ कऽ पड़ा जाइत छथि। लेखिका कमौशा कथामे एकटा निरसय परसनक बालक निरसू केँ अपना संगे आनि गृहकार्यमे लगौलनि आ ओकरा शिक्षा देमए लागलीह। मुदा जखन ओ स्वस्थ सबल बला भऽ गेल। हिनकर सभटा शिक्षा बिसरि पुनः परिवारक अंतहीन जालमे ओझरा। कथामे कचोटक मात्रा स्वल्प छैक आ कमजोर वर्गक दारूण स्थितिक मात्रा अधिक छैक प्रायः सभकेँ बूझल छैक जे व्यक्तिगत आ सामाजिक प्रयाससँ गामे टा नहि घर सेहो खुशहाल आ चिंताहीन हेतैक मुदा से नहि होइत छैक। दूरदृष्टिक अभाव मे ग्रामीण अपन हर्ज करैत अछि, ओकरा अनकर दृष्टि केर लाभ लेबाक क्षमता नहि छैक। क्रमशः आधुनिक होइत समाजक एकटा सटीक कथा अछि-पुनरावृत्तिचारूकात लौह कवार लागल हो कतहुँ सँ हवाक सिहकी नहि प्रवेश करैक, सूर्यदेवक किरण नहि प्रवेश करैक तैं कि भोअ-साँझक अस्तित्व मेटा जाएत? नहि ने? न मिथिला मे प्रकाश आएल। पति सँ अकारणे प्रताड़ित स्त्री पिताक आशीर्वाद सँ स्वाबलम्बी भऽ जाइत छथि। पुत्रीक शिक्षाक प्रति सजग तँ छथि मुदा हुनकर भाग्य अपने सन होएतैन्ह से नहि बिचारने छलीह। मुदा अधिक आगाँ ससरल समय मे बेटी सुधा मान्यता केँचुल उतारि फेकलक आ स्पष्ट विचार संगे आगाँ पएर बढ़ओलक, मनहि ओ परिस्थिति जन्य पुनरावृत्तिक शिकार भेलीह मुदा सिनुर चुड़ी आ मिथ्या संस्कार केँ निषेध कएलन्हि। ओ उहापोहक अन्हारसँ उबरि एकटा सेविका सँ उद्गार व्यक्त करैत छथि जे माथ हल्लुक करक लेल- एक कप चाय बना दे
पन्ना जीक लेखिका मनोविज्ञानविद् छथिन्ह से- असमान्य केँ सनक सामान्य केस हिस्ट्री बला कथा पढ़ि परिलक्षित होइत अछि। अही वजनकेँ कथा छैक सरोकार। पति-पत्नी संगे रहथि, दुनू एके शिक्षा प्राप्त करैथ आ एके जीविका मे संलग्न रहथि तथापि स्त्रीपर परिवार, समाज आ आजीविका तेहराएल बोझ रहैत छैक आ पति निश्चिंत; ई अजुका त्रासदी छैक जकरा सँ प्रत्येक शिक्षिताजूझैत अछि तँ मूल्यांकनकनायिका किएक ने जूझती?
नीति प्रकरणकथामे बिचमाइनकभूमिका महत्वपूर्ण छैक? जकर अप्पन घर बिगड़ल रहैत छैक ओ अनकर सुखी घर उजाड़य पर तुलल रहैत अछि। समय रहितहि यदि पति-पत्नी ई बूझि लेथि तखन कएक टा परिवार विघटित होअऽ सँ बाँचि जाएत। सघन संवेदनाक कथा छैक- बऽर घुरिए गेल। कतेको गीत कवित्त लिखलनि कवि विद्यापति, पं. हरिमोहन झा, यात्रीजी तथापि एकटा आडम्बर पूर्ण समाज नायक अविश्वस्तरीय, तरल प्रकारक वस्तुक अस्तित्व आइयो अछि। मिथ्या अहंकार, घोर लिप्साक प्रतीक मिथिलाक सर्वाध्जिक सोचबा पर विवश करैत छैक।  
पन्ना जीक प्रत्येक कथा किछुने कि अनुभव करबापर विवश करैत छैक आ तैं कथा-संग्रहक नामकरण अनुभूति बहुत नीक। एकटा नयनाभिराम आ बीछल पौथी मैथिली मे आबए से स्वागत योग्य अछि। प्रत्येक छोट कथा जे या तँ आकाशवाणीक लेल लिखल गेल आ कथा गोष्ठी मे पढ़बाक लेल लिखल गेल अछि महत्वपूर्ण। एकदम बूंदमे समुद्र। कथा, कथा सूत्र जकाँ बुझाइत अछि। पन्ना जी केँ हम आग्रह करबनि जे पलखति पाबि आब कथा सूत्रक विस्तार करथु आ पूर्ण कथा लिखथु जाहिसँ पाठकक छाँक पुस्तै।
कथा संग्रह फ्लैपपर वांछित अवांछित शब्द संचयन छैक जाहिसँ बचल जा सकैत छलैक। दू आखरलेखिकाक दृष्टिक निर्विविवाद टिप्पणी अछि आ हुनक स्वयं केर विकासक एकटा संक्षिप्त सूचना। पन्ना झा जी जन नन कन्त्ये वर्सियल व्यक्तित्वक जे अनुभूति सबकम हाथमे अछि से उत्तर आधुनिक मिथिलाक निर्माणक अनुभूति छैक जाहिमे बालक-बालिका युवजन आ वृद्ध-वृद्धा, दादा-दादी सब छथि। अर्थात् उत्तर आधुनिक विचार एसकरूआ नहि अछि, सभाराज बला परिवारक कामना करैत अछि समाज निर्वीथ नहि अछि, मदतिक हाथ चारू भागसँ बढ़ैत अछि।
पन्ना जीक लेल शुभकामना।  

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बड़द करैए दाउन ने यौ

 
बड़द करैए दाउन ने यौ
हाथी अगत्त, पिछू, थाइत, माइल बिरि
हिर्र-हिर्र सुग्गर चलू संग घर घुरि
ती-ती परबा उड़ि गेल ऊपर
लिह लिह बकरी घास तूँ खो
बड़द करैए दाउन ने यौ
 
अतू कुकुड़ कुत-कुत डॉगी
कैटी पिसू-पिसू आएत की?
चेहै-चेहै सुनि पारा दौगल,
भागी छोड़ि बाट हम ताकी
अर्र बकरी घास तूँ खो
बड़द करैए दाउन ने यौ
 
 
ढेहै-ढेहै कऽ नहि खौंझाबू
साँढ़ आओत खरिहानमे यौ
आव ठामे रे हे, हौरे हौ
बड़द करैए दाउन ने यौ

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बृहस्पतिवार, 6 जनवरी 2011

मूरही कचरी- किशन कारीगर

मूरही-कचरी
एकटा हास्य कथा।


दिल्ली संॅ दरभंगा होयत अपन गाम मंगरौना जायत रही। रस्ते में एकटा नियार केलहूॅं जे एहि बेर महादेव मंठ जेबेटा करब। एतबाक सोचैते-सोचैते कखन गाम पहुॅंच गेलहूॅं सेहो नहिं बूझना गेल। चारि बजे भोरे अंधराठाढ़ी यानी वाचसपतिनगर रेलवे स्टेशन उतरलहूॅं रिक्शावला सभ के हाक देलियै। भोला छह हौ भोला। ताबैत दोसर रिक्शावला बाजल जे आई भोला नहि एलै कियो बाजल जे जोगींदर आयल हेतै तकियौ ओकरा। भोला आ जोगींदर दूनू गोटे गामक रिक्शावला रहैए कोनो बेर गाम जाइ तऽ ओकरे रिक्शा पर बैसि क स्टेशन सॅं गाम जाइत छलहूॅं। एतबाक मे जोगींदर ओंघायत हरबराएल आएल अनहार सेहो रहै। वो बाजल कतए जेबै अहॉं। हम मंगरौना जाएब कक्का हमरा नहि चिन्हलहूॅं की। हॅं यौ बच्चा आवाज़ सॅं आब चिन्हलहूॅं आउ-आउ बैसू रिक्शा पर। दूनू गोटे गप सप करैत बिदा भेलहूॅं ताबैत जोगींदर सॅं हम पूछलियै कक्का ई कहू जे एहि बेर बाबाक दर्शन केलहूॅ किनहि। हॅं यौ बच्चा एहि बेर सजमैन खूम फरल छलै से हमहूॅं चारि बेर बाबा के जल चढ़ा एलहॅू आओर हुनका लेल सजमैन सेहो नेने गेल रहियैन। एतबाक में भगवति स्थान आबि गेल हम रिक्शा पर सॅं उतरि के भगवति केॅं प्रणाम करैत तकरा बाद अपना आंगन गेलहूॅ।
हमरा गामक प्रारंभ में भगवति स्थान अछि। गाम पर गेलहूॅं सभ सॅं दिन भरि भेंट घांट होयत रहल। भिंसर भेलै संयोग सॅं ओहि दिन रवि दिन सेहो रहै। बाबा सॅं भेंट करबाक मोन आओर बेसी आतुर भऽ गेल नियार केलहूॅं जे आई महादेव मंठ जाके बाबाक दर्शन कए आबि। हमरा गाम सॅ किछूएक दूर देवहार गाम में मुक्तेश्वर नाथ महादेवक प्राचीन मंदिर अछि जकरा लोक बोलचाल में महादेव मंठ कहैत छैक। ओना तऽ सभ दिन बाबाक पूजा होइत छलैक मूदा रवि दिन के भक्त लोकनीक बड् भीड़ होइत छलैक किएक तऽ ओहि दिन मेला सेहो लगैत छलै त दसो-दीस सॅ लोग अबैत छल।दरभंगा पढैत रही तऽ हमहूॅं महिना मे एक आध बेर महादेव के जल चढा पूजा कए अबैत छलहॅू। गामे पर भिंसरे नहा के बिदा भेलहूॅं माए हमर फूल बेल पात ओरियान कके देलिह। गाम पर सॅ मुक्तेश्वर स्थान बिदा भेलहॅू पैरे-पैरे जायत रही तऽ जहॉं गनौली गाछी टपलहॅू कि रस्ते में एकटा पिपरक गाछ छलै। ओतए सॅं महादेव मंदिर लगे में रहै। ओहि पिपर गाछ लक एकटा जटाधारी साधू भेटलाह हम कहलियैन बाबा यौ प्रणाम।
एतबाक में बाबा बजलाह जे कहबाक छह से जल्दी कहअ हमरा आई बड् जार भऽ रहल अछि। बाबाक ई गप सूनी कें हमरा कनेक हॅंसी लागि गेल। हम बजलहॅू आईं यौ बाबा अपने सन औधरदानी के कहॅू जार भेलैए। अपने तऽ एनाहियों सौंसे देह भभूत लेप के मगन रहैत छी। बाबा बजलाह हौ बच्चा आब लोक सभ ततेक जल चढ़बैत अछि जे हमरा कॅपकॅपि धअ लैति अछि। तूहिं कहए तऽ एहि उचित जे भक्त सभ हमर देह भिजा के निछोहे परा जाइत अछि। आब तऽ लोक सभ पूजा करै लेल नहि ओ त मूरही-कचरी खाई लेल अबैत अछि। हम बजलहूॅं बाबा अपने किएक खिसियाएल छी आई तऽ हम अहॅाक लेल दूध सेहो नेने आइल छी चलू-चलू मंदिर चलू भक्त लोकनि ओहि ठाम अहॉं के तकैत हेताह। बाबा खिसियाअत बजलाह कियो ने तकैत होयत हमरा तू देख लिहक सभ मूरही कचरी खाए में मगन होयत। तूॅं दरभंगा पढ़ैत छलह तऽ दूध सजमैन लए के अबैत छेलह मुदा जहिया सॅं पत्रकार भए दिल्ली चलि गेलह हमर कोनो खोजो पूछारी नहि केलह।
देखैत छहक मंगरौना चैतीक मेला मे तोहर गामवला सभ लाखक लाख टका खर्च करैत अछि मूदा हमरा लेल भागेश्वर पंडा दिया छूछे विभूत टा पठा दैति अछि। मंगरौनाक चैती मेला बड्ड नामी छलैक ओतए कलकता सॅं मूर्ती बनौनिहार आबि के भगवतिक मूर्ती बनबैत छलैक एहि द्वारे दसो दिस सॅं लोक मेला देखबाक लेल अबैत छलाह। भागेश्वर झा महादेव मंदिरक पंडा रहैत हुनके दिया बाबाक पूजा लेल सभ किछू पठा देल जायत छलैक।बाबा फेर खिसियाअत बजलाह जे आइ हम मंदिर नहि जाएब। हम कहलियैन जे बाबा अपने चलू ने मंदिर अहॉ जे कहबै आई से हेतै आबौ अहॉंक कॅंपकॅंपि दूर भेल किनहि \ नहि हौ बच्चा आई त हमरा बूझना जाए रहल अछि जा धरि मूरही-कचरी नहि खाएब ताबैत हमर ई जार-बोखार नहि छूटत। कहू त बाबा अपने एतबाक गप जे पहिने कहने रहितहॅू त हम एतबाक देरी] बच्चा कतेक दिन मोन भेल जे तोरा कहिअ जे हमरो लेल किछू गरमा-गरम नेने अबिह मुदा नहि कहलियअ ।हम मंदिर सॅं बाहर निकैल देखैत छलहूॅं जे लोग सभ हमरा जल ढ़ारी के निछोहे मूरही-कचरी वला लक परा जाइत छल एमहर हम एसगर थर-थर कॅपैत रहैत छलहूॅं कियो पूछनिहार नहि। आब लोग हमर पूजा सॅं बेसी अपन पेट पूजा में धियान लगबैत छथि। चलअ आब तहूॅं देखे लिहक जे हम सत्ते कहैत छियअ कि झूठ।
ओही पिपर गाछ लक सॅं हम आओर बाबा बिदा भेलहूॅं रस्ता में बाबा बजलाह जे हम किछू काल मंदिर मे रहब पूजा केलाक बाद हमरा बजा लिहअ। हम कहलियैन हे ठिक छै बाबा हम अपनेक लेल मूरही-कचरी किन लेब तकरा बाद अहॉ के बजाएब त चलि आएब। ओही ठाम सॅं बाबाक संग हम मंदिर पहुॅंचलहूॅं। ओतए देखलिए जे लोग सभ बाबा के जल चढ़ा निछोहे परा जाइत छल। ओना त मिथिलांचल मे मूरही-कचरीक सुंगध सॅं केकर मोन ने लुपलुपा जाएत अछि। हमहूॅं बाबाक पूजा पाठ केलाक बाद मेला घूमए गेलहॅू तऽ सभ सॅं पहिने पस्टनवला लक कचरी किनबाक लेल गेलहूॅं। ओकर कचरी एहि परोपट्ा मे नामी छल। हमरा देखैते मातर ओ अहलाद बस बाजल आउ-आउ किशन’ जी कहू कुशल समाचार। हम कहलियै जे बड्ड निक अपन सुनाबहअ। कचरीवला बाजल जे हमहूॅ ठिके छी दोकान अपना खर्चा जोकर चलि जाएत अछि। अच्छा आब हमरा दस रूपयाक मूरही-कचरी झिल्ली अल्लू चप दए दिहक। ओ हरबराइत बाजल हयिए लिए अखने गरमा-गरम कचरी अल्लू चप सबटा निकालबे केलिए अहिमें सॅं दए दैत छी। हम कहलियै जे दए दहक गरमा गरम एहि मे सॅं।
ओकरा हम पाइ दैत मंदिर दिस बिदा भेलहॅू ओतए पहुॅचतैह हम बाबा के हाक देलियैन मुदा कोनो जवाब नहि भेटल। हम एक बेर फेर हाक लगेलहॅू जे बाबा छी यौ कतए छी \ जल्दी चलि आउ कचरी सेराए रहल अछि। मुदा बाबाक कोनो प्रत्युतर नहि भेटल। हमरा बुझना गेल जे बाबा फेर खिसियाकेॅे कतहूॅ अलोपित भए गेलाह। दुःखित मोन सॅं हम गाम पर बिदा भेलहूॅं। पैरे-पैरे जाएत रही तऽ जहॉ पिपर गाछ लक एलहूॅं कि ओ जटाधारी साधू फेर भेटलाह। हमरा देखैते ओ बजलाह आबह-आबह तोरे बाट तकैत छलहूॅं जल्दी लाबअ मूरही-कचरी दूनू गोटे मिलि कए गरमा गरमा खाए लैत छी। तकरा बाद पोटरी खौलैत हम बजलहॅू हयिए लियअ बाबा खाएल जाउ। मुदा ई कि ओ फेर ऑखिक सोझहा सॅं कतहॅू अदृश्य भए गेलाह। बाबा सॅं भेंट तऽ भेल ओहि पिपर गाछ लक मुदा बाबाक लेल किनल मूरही-कचरी रखले रही गेल।


लेखक:- किशन कारीग़र


परिचय:-जन्म- 1983ई0 कलकता में मूल नाम-कृष्ण कुमार राय किशन’। पिताक नाम- श्री सीतानन्द राय नन्दू’माताक नाम- श्रीमती अनुपमा देबी। मूल निवासी- ग्राम-मंगरौना भाया-अंधराठाढ़ी जिला-मधुबनी बिहार। हिंदी में किशन नादान आओर मैथिली में किशन कारीग़र के नाम सॅं लिखैत छी। हिंदी आ मैथिली में लिखल नाटक आकाशवाणी सॅं प्रसारित एवं दर्जनों लघु कथा कविता राजनीतिक लेख प्रकाशित भेल अछि। वर्तमान में आकशवाणी दिल्ली में संवाददाता सह समाचार वाचक पद पर कार्यरत छी। शिक्षाः- एम फिल पत्रकारिता एवं बी एड कुरूक्षे़त्र विश्वविद्यालय कुरूक्षेत्र सॅं।

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मिथिलाक खानपान...

मिथिलाक खानपान-नीलिमा चौधरी आ राखी साह... मखानक खीर सामग्री- दूध-१ १/२ किलो, चिन्नी-१०० ग्राम, मखान कुटल- १०० ग्राम, इलाइची पाउडर- स्वाद अनुसार, काजू- १० टा, किशमिश-२०टा बनेबाक विधि- मखानक पाउडर (कनी दरदरा)क पहिने १/२ किलो ठंढ़ा दूधमे घोरि लिअ, शेष दूध केँ खौला लिअ। आब गर्म दूधमे ई घोड़ल मखानक मिश्रण मिला दियौक आर करौछसँ लगातार चलबैत रहियौक जाहिसँ मिश्रण पेनीमे बैसय नहि। .... (आगाँ पढू)

मिथिलांचलक विकास..

मिथिलांचलक विकास... मिथिलांचल क्षेत्र बिहार मे सबस पिछड़ल मानल जाइत अछि, अगर प्रतिव्यक्ति आय , साक्षरता और प्रसवकाल मे जच्चा-बच्चा के मृत्यु के मापदंड बनायल जाय तो मिथिलांचल देश के सबस गरीब आ पिछड़ल इलाका अछि। एकर किछु कारण त अहि इलाका के भौगोलिक बनावट अछि... (आगाँ पढू)

मिथिला अरिपन....

मिथिला चित्रकला- स्त्री आ पुरुषक दशपात अरिपन / स्वास्तिक अरिपन... स्त्रीगणक दशपात अरिपनकन्याक मुण्डन,कान छेदन आ' विवाहक अवसर पर कुलदेवताक घर आकि मण्डप पर बनाओल जाइत अछि।बनेबाक- विधि। एकर बनेबाक विधि सूक्ष्म अछि।ऊपरमे तीन पातक पुष्प, ,ओकरनीँचा पाँच-पातक कमल-पुष्प,ओकर नीचाँ सात-पात युक्त्त कमल, बीचमे अष्टदल कमल अछि। दश पात चारू दिशि अछि। नौ टा माँछक चित्र सेहो अछि... (आगाँ पढू)

एक विलक्षण प्रतिभा...

एक विलक्षण प्रतिभा जिनका हम सदिखन याद करैत छी (प्रथम कड़ी) - कुसुम ठाकुर..... एक बेर हमारा एक पत्रिका में किछु लिखय लेल कहल गेल छल, ई सन् १९९६ क गप्प थिक। हम बस एतबे लिखी सकलौं "हम की लिखी हमर त लेखनिये हेरा गेल"। मुदा आई बुझना जैत अछि जे नै, हमारा एकटा कर्तव्यक निर्वाहन... (आगाँ पढू),
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चिनबारक दीप...

चिनबारक दीप–उषा किरण खान... समस्तीपुर मे गाड़ी बदली कऽ महेसरी अइमे बैसलि सरिया कऽ। आब घर बेसी लग आयल जाइत छैक। चारि टीसन आ छैक, फे तऽ टीसन सऽ एक कोस जमीन हैतै। चारि-पाँच गोटाक हेंज छैक्। बौआइत-बतियाइत गाम पहुँचि जयतै। आठे दिनुका दिन छैक, की सब करतै? एह, करऽक की छैक? सभटा बस्तुजात तऽ कीननहिं जाइत छैक.... (आगाँ पढू)

बिदेसिया (संकल्पित नाटिका)

विद्यापतिक बिदेसिया (संकल्पित नाटिका).... भोजपुरीक साहित्य मैथिलीसँ कम समृद्ध अछि मुदा से अछि मात्र परिमाणमे, गुणवत्ताक दृष्टिमे ई कतेक क्षेत्रमे आगाँ अछि। भोजपुरीक भिखाड़ी ठाकुरक बिदेसियाक सन्दर्भमे हम ई कहि रहल छी। भिखाड़ी ठाकुर कलकत्तामे प्रवासी... (आगाँ पढू)

पाँच पत्र...

पाँच पत्र-हरिमोहन झा... प्रियतमे अहाँक लिखल चारि पाँती चारि सएबेर पढ़लहुँ तथापि तृप्ति नहि भेल। आचार्यक परीक्षा समीप अछि किन्तु ग्रन्थमे कनेको चित्त नहि लगैत अछि। सदिखन अहींक मोहिनी मूर्ति आँखिमे नचैत रहैत अछि। राधा रानी मन होइत अछि जे अहाँक ग्राम वृन्दावन बनि जाइत, जाहिमे केवल अहाँ आ हम राधा-कृष्ण जकाँ अनन्त काल धरि विहार करैत रहितहुँ... (आगाँ पढू)

कथा- माउगि

कथा- माउगि - विभा रानी.... माउगि, माउगि, गे माउगि, गे माउगि! तों माउगि, हम माउगि, ई माउगि, ऊ माउगि - सभ किओ माउगे-माउगि। ऊँहूँ - सभ किओ भला माउगि हुअए। ई तय कर' बाली तों के? अएं गे? तोरा कहिया स' भेटलौ ई हक? ई सभ काज-धंधा हमरा आओरक अछि - हमरे आओर के करे दें। देख त' कने, तोहरो आओर के कतेक रंग-बिरंगा रूप दिया देलियौ! माउगि, गे माउगि.... (आगाँ पढू)

मातृत्व...

डा. मंजू गीता मिश्राक आलेख : मातृत्व.... नारी जीवनक सबसँ गौरवशाली एवं सुखद अनुभव थिक मातृत्व ।ई नारी जीवनक परिपूर्णताक प्रतीक अछि । पूरा नौ मास अपन गर्भमे फलैत-फूलैत एक शिशुक अपन जान सँ बेसी देखभाल करैत छथि । तत्पश्चात एक फूल सन सुन्दर सुकोमल शिशु जन्म लैत अछि, यैह स्त्रीक सबसँ अनमोल उपहार एवं आनन्ददायक क्षण थिक । एहि नौ मासक दौरान गर्भवतीक भोजन एवं वातावरण पर निर्भर करैत अछि.... (आगाँ पढू)
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मैथिल आर मिथिला
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