शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011

गजलक साक्ष्य- आशीष अनचिन्हार

हमरा आगूमे पसरल अछि “अपन युद्धक साक्ष्‍य‍” तारानंद ि‍वयोगीक गजल संग्रह। चालीस गोट गजलकेँ समेटने। लोककेँ छगुन्‍ता लागि‍ सकैत छैक जे मैथि‍लीमे गजलक आलोचना कहि‍आसँ शुरू भए गेलैक। ऐ छगुन्‍ताक कारण मुख्‍यत: हम दू रूपेँ देखैत छी पहि‍ल तँ ई जे गजल कहि‍ओ मैथि‍ली साहि‍त्‍यक मुख्‍यधारामे नै आएल दोसर-मैथि‍ल-जन एखनो गजलक समान्‍य नि‍अम आ ओकर बनोत्तरीसँ परि‍चि‍त नै छथि‍। समान्‍ये कि‍एक अपने-आपकेँ गजल बुझनि‍हारक सेहो हाल एहने छन्‍हि‍। बेसी दूर नै जाए पड़त। “‍घर-बाहर” जुलाइ-सि‍तम्‍बर 2008ई.मे प्रकाशि‍त अजि‍त आजादक लेल “कलानंद भट्टक बहन्ने मैथि‍ली गजलपर चर्च‍” पढ़ि‍ लि‍अ मामि‍ला बुझबामे आबि‍ जाएत।
जँ वि‍ष्‍यान्‍तर नै बुझाए तँ थोड़ेक देरले तारानंद वि‍योगीक पोथीसँ हटि‍ अजाद जीक लेखक चर्च करी। ऐ लेखक पहि‍ले पाँति‍ थि‍क- मैथि‍लीमे गजल लि‍खबाक सुदीर्ध परम्‍परा रहल अछि.....। मुदा कतेक सुर्ढीध तकर कोनो ठेकाना अजादजी नै देने छथि‍न्‍ह। फेर एही लेखक दोसर पैरामे अजि‍त जी दूमरजामे फँसल छथि‍। ओ मैथि‍ल द्वारा समान्‍य गप-सप्‍पमे गजलक पाँति‍ नै जोड़बाक प्रथम कारण मानैत छथि‍। जे मैथि‍लीमे शेर एकदम्‍मे नै लि‍खल गेल। आब पाठकगण कने घि‍यान देल जाए। लेखक पहि‍ल पाँति‍ तँ अपनेकेँ धि‍यान हेबोटा करत जे मैथि‍लीमे गजलक सुर्दीध....।” सभसँ पहि‍ल गप्‍प जे गजल कि‍छु शेरक संग्रह होइत छैक आ दोसर गप्‍प ई जे जँ अजाद जीक मोताबि‍क शेर लि‍खले नै गेलैक तँ फेर कोन प्रकारक सुर्दीध परंपराकेँ मोन पाड़ि‍ रहल छथि‍ अजादजी। एेठाम गलती अजाद जीक नै मैथि‍लीक ओहि‍ गजलकार सभक छन्‍हि‍ जे गजल तँ लि‍खैत छथि‍ मुदा पाठककेँ ओकर परि‍चए, गठन, नि‍अम आदि‍ देबासँ परहेज करैत छथि‍। ओना प्रसंगवश ई कहबामे कोनो संकोच नै जे गजल कखनो लि‍खल नै जाइत छैक। मुदा मैथि‍लीक धुरंधर सभ गजल लि‍खैत छथि‍। मूल रूपसँ अरबी-फारसी-उर्दूमे गजल कहल जाइत छैक लि‍खल नै। पाठकगण गजलक ई नि‍अम भेल। आब फेरो अजि‍त जीक लेखकेँ आगू पठू आ अपन कपार पीट अपनाकेँ खुने-खूनामे कए लि‍अ। अजि‍त जी अपन संपूर्ण लेखमे जै शेर सभ मक्‍ता कहलखि‍न्‍ह अछि वस्‍तुत: ओ मक्‍ता छैके नै। पाठकगण मोन राखू, मक्‍ता गजलक ओहि‍ अंति‍म शेरकेँ कहल जाइत छैक जैमे गजलकार (एकरा बाद हम शाइर शब्‍द प्रयुक्त करब, अहूठाम मोन राखू शायर गलत उच्‍चारण थि‍क।) अपन नाम वा उपनामक प्रयोग करैत छथि‍। (अहूठाम मोन राखू हरेक गजलमे नाम वा उपनामक समान प्रयोग होएबाक चाही ई नै जे एकरा गजलक मक्‍ता तारानंदसँ होअए आ दोसर गजलक मक्‍ता वि‍योगीक नामसँ नामसँ।) मुदा आश्‍चर्य रूपेण अजादजी जै शेर सभकेँ मक्‍ता कहलखि‍न्‍ह अछि ओइमे कोनो शाइरक नाम- उपनाम नै भेटत। ओना अजि‍तजी हि‍न्‍दीक सुप्रसि‍द्ध शाइर छथि‍ तकर प्रमाण ओ लेखक प्रारंभेमे दए देने छथि‍।
हँ तँ ऐ लेखक संक्षि‍प्‍त अवलोकनक पछाति‍ फेरसँ वि‍योगी जीक गजल संग्रहपर चली। तँ शुरूआत करी स्‍पष्‍टीकरणसँ, हमर नै वि‍योगी जीक। सभसँ पहि‍ने ई जे अन्‍य मैथि‍ली शाइर जकाँ वि‍योगीओ जी मानैत छथि‍ जे गजल लि‍खल जाइत छैक। देासर गप्‍प जे वि‍योगीजी द्वारा देल अपन भाषा संबंधी वि‍चारसँ लगैत अछि जे भनहि‍ं ि‍वयोगी जी उर्दु सीख उर्दूक पोथी पढ़ैत हेताह मुदा गजल तँ कि‍न्नहुँ नै लि‍खैत हेताह, कारण, पाठकगण धि‍यान देल जाए। अरबी-फारसी-उर्दू तीनू भाषाक छंद शास्‍त्र एकमतसँ कहैए जे दोसर भाषाकेँ तँ छोड़ू अपनो भाषाक कठि‍न शब्‍दक प्रयोग गजलमे नै हेबाक चाही। ठीक उपरोक्‍त भाषाक नि‍अम जकाँ मैथि‍लीओ मे नि‍अम छैक। तँए महाकवि‍ वि‍द्यापति‍ अपन कोनहुँ गीतमे कृष्‍ण, वि‍ष्‍णु आदि‍क प्रयोग नै केने छथि‍। मुदा वि‍योगी जी अपन पोथीक नाम रखने छथि‍ “अपन युद्धक साक्ष्‍य‍”। जनसमान्‍य युद्ध तँ कहुना बुझि‍ जेतैक मुदा साक्ष्‍य....। ऐठाम प्रसंगवश ई कहब बेजाए नै जे वि‍योगीजी अपनाकेँ अभि‍जात शब्‍दक प्रयोग मानैत छथि‍।
आब हमरा लोकनि‍ ऐ पाेथीमे प्रस्‍तुत चालीसो गजलक चर्च करी। पहि‍ले भाषाकेँ देखी। ओना वि‍योगीजी भाषा संबंधी गलती जानि‍ बूझि‍ कए लौल-वश ततेक ने कएल गेल छैक जकरा अनठा कए आँगा बढ़ब संभब नै। एकर कि‍छु उदाहरण प्रस्‍तुत अछि- दोसर गजलक मतलाक दोसर पाँति‍मे दुखक बदला यातना। अही गजलक दोसर शेरक पहि‍ल पाँति‍मे नाराक बदला जुमला। तेसर गजलक दोसर गजलक दोसर शेरक दोसर पाँति‍ धधराक बदला ज्‍वलन। अही गजलक अंति‍म शेरमे प्रयुक्‍त तन्‍वंग, आब एकर अर्थ जनताकेँ बुझबि‍औ। फेर आगू गजलक दोसर शेरमे नजरि‍ केर बदला दृष्‍टि‍, दसम गजलक दोसर शेरमे उन्‍यक जगह वि‍परीत। एगारहम गजलक मतलामे दुबि‍धाक जगह द्धैध। तेरहम गजलक तेसर शेरमे नेकदि‍ली आ बदीक प्रयोग। तइसम गजलक अंति‍म शेरमे भटरंगक बदला बदरंग। पचीसम गजलक तेसर शेरमे इजोरि‍आक बदला ज्‍योतसना। चौतीसम गजलक मतलामे दुख केर बदलामे पीड़-इत्‍यादि‍। ओना ऐ उदाहरणक अति‍रि‍क्‍त हरेक गजलमे हि‍न्‍दी, उर्दू, संस्‍कृत आदि‍ भाषाक तत्‍सम बहुल शब्‍दक ततेक ने प्रयोग भेल छैक जे गजलक मूल स्‍वर, भाव-भंगि‍मा, रसकेँ भरि‍गर बना देने छैक। तैपर वि‍योगीजी गर्व पूर्वक घोषण केने छथि‍ जे ओ ओइ परि‍वारक नै छथि‍ जि‍नका संस्‍कारमे अभि‍जात शब्‍द भेटल हो। बि‍डंबना छोड़ि‍ एकरा कि‍छु नै कहल जा सकैए। जँए चालीसो गजलक भाषाकेँ धि‍यानसँ देखल जाए तँ हमरा हि‍साबें वि‍योगीजी ऐ गजल सबहक मैथि‍ली अनुवाद कए देथि‍न्‍ह तँ वेसी नीक हेतैक।
भाषासँ उतरि‍ आब गजलक वि‍चारपर आएल जाए। बेसी दूर नै जाए पड़त-तेसर गजलक अंति‍म शेरसँ मामि‍ला बुझबामे आबि‍ जाएत। सोझे-सोझ ई शेर कहैए जे- लोककेँ अपन जयघोष करबामे देरी नै करबाक चाही आ काज केहनो करी चान-सुरूजक पाँति‍मे अएबाक जोगाड़ बैसाबी। ओना हम एतए अवश्‍य कहब जे ई कोनो राजनीति‍क वि‍चार नै छैक जकर स्‍पष्‍टीकरण दए-वि‍योगीजी अपन पति‍आ छोड़ा लेताह। ई वि‍शुद्ध रूपे समाजि‍क वि‍चार छैक आ ऐ वि‍चारसँ समाजपर की नकारात्‍मक प्रभाव पड़लैक वा पड़तैक तकर अध्‍ययन अवश्‍य कएल जेबाक चाही। मुदा एहन नकारत्‍मक वि‍चार ऐ संग्रहमे कम्‍मे अछि। संग्रहक कि‍छु सकारात्‍मक ि‍वचार प्रस्‍तुत अछि। दसम गजल केर अवलोकन कएल जाउ। नि‍श्‍चि‍त रूपसँ वि‍याेगीजी एकरा परि‍र्वतनीय वि‍चार रखलाह अछि ई कहि‍ जे-
देस हमर जागत अच्रक एना चलि‍ ने सकत
हारि‍ लि‍खब झण्‍डा के आदमीक जीत लि‍खब।
पाठकगण आजुक समएमे झण्‍डाक वि‍परीत गेनाइ सहज गप्‍प नै। तहि‍ना चारि‍म गजलक तेसर शेरक पहि‍ल पाँति‍- राम राज्‍यक स्‍थापना लेल भरत-लक्ष्‍मण झगड़ि‍ रहला। कतेक सटीक व्‍यंग अछि से सभ गोटे बुझैत हेबैक। ओतै आजुक भ्रमोत्‍पादक सरकारपर तै दि‍नमे लि‍खल अड़तीसम गजलक मतलाक पहि‍ल पाँति‍ देखू-
राजनीति‍ भटकल तँ डूबल मझधार जकाँ।
वि‍चार संबंधी प्रस्‍तुत उदाहरणसँ स्‍पष्‍ट अछि जे सकारात्‍मक वि‍चार बेसी अछि। मुदा कहबी तँ सुननहि‍ हेबैक अपने जे एकैटा सड़ल माछ.....।
अस्‍तु आब ऐ गजल संग्रहक व्‍याकरण पक्षकेँ देखल जाए। ऐठाम ई स्‍पष्‍ट करब आवश्‍यक जे मैथि‍ली गजल अखनो फरि‍च्‍छ भए कए नै आएल अछि जैसँ हम बहर (छंद) आदि‍पर वि‍चार करब। तँए ऐठाम हम मात्र रदीफ आ काफि‍याक प्रयोगपर वि‍चार करब। पाठकगण गजलमे रदीफ ओइ शब्‍द अथवा शब्‍द समूहकेँ कहल जाइ छैक जे गजलक मतलाक (गजलक पहि‍ल शेरकेँ मतला कहल जाइत छैक।) दुनू पाँति‍मे समान रूपसँ आबए आ तकरा बाद हरेक शेरक अंति‍म पाँति‍मे सेहो समान यपे रहए। तहि‍ना काफि‍या ओइ वर्ण अथवा मात्राकेँ कहल जाइत जे रदीफसँ तुरंत पहि‍ने आबैत हो जेना एकटा उदाहरण देखू- दूटा शब्‍द लि‍अ, पहि‍ल भेल अनचि‍न्‍हार ओ दोसरमे अन्‍हार। आब मानि‍ लि‍अ जे ई दुनू शब्‍द कोनो गजलक मतलामे रदीफक तुरंत बादमे अछि। आब जँ गौरसँ देखबै तँ भेटत जे दुनू शब्‍दक तुकान्‍त “र‍” छैक। तँ एकर मतलब जे “र‍” भेल काफि‍या (काफि‍या मतलब तुकान्‍त बूझू) तेनाहि‍ते मात्राक काफि‍या सेहो होइतैक जेनाकि‍- राधा आ बाधा दुनू शब्‍द आ'क मात्रासँ खत्‍म होइत अछि तँए ऐमे आ'क मात्रा काफि‍या अछि। “एहि‍‍” आ “रहि‍‍” दुनूमे इ‍'क मात्राक काफि‍या अछि। अन्‍य मात्राक हाल एहने सन बूझू। तँ फेर चली ऐ संग्रहक व्‍याकरण पक्षपर- एे संग्रहक कि‍छु गजलमे काफि‍याक गलत प्रयोग भेल छैक- उदाहरण लेल सातम गजलकेँ देखू। मतलाक शेरमे काफि‍या अछि “न‍” (भगवान आ सन्‍तान)। मुदा वि‍योगीजी आगू देासर शेरमे काफि‍या “म‍” (गुमनाम) केँ लेलखि‍न्‍ह अछि जे सर्वथा अनुचि‍त। तेनाहि‍ते सताइसम गजलक उपरोक्त “म‍” काफि‍या बदलामे “न‍” काफि‍याक प्रयोग।
कुल मि‍ला कए ई गजल संग्रह ओतेक प्रभावी नै अछि जतेक की शाइर कहैत छथि‍। हँ एतेक स्‍वीकार करबामे हमरा कोनो संकोच नै जे ई गजल संग्रह ओइ समएमे आएल जै समएमे गजलक मात्रा कम्‍मे छल। आ शाइर आ गजल संग्रह सेहो कम्‍मे जकाँ छल।

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मैथि‍ली उपन्‍यास साहि‍त्‍यमे दलि‍त पात्रक चि‍त्रण- शिव कुमार झा


उपन्‍यास कोनो गद्य साहि‍त्‍य रूपी व्‍यष्‍टि‍क आत्‍मा मानल जाइत अछि‍। मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे लगभग सए वर्ख पूर्व धरि‍ उपन्‍यास वि‍धाक रचना लगभग शून्‍य छल। एे‍‍ कारण ओइ‍‍ अवधि‍ धरि‍ मैथि‍लीकेँ पूर्ण साहि‍त्‍यि‍क भाषा नै‍‍ मानल जाइत छल। जनसीदन जी एे‍‍ भाषा साहि‍त्‍यक पहि‍ल मान्‍य उपन्‍यासकार छथि‍। हि‍नक पाँच गोट उपन्‍यासक पश्‍चात् एखन धरि‍ देसि‍ल वयनामे साहि‍त्‍यक समग्र वि‍धाक चि‍त्रण करैत बहुत रास उपन्‍यास पाठक धरि‍ पहुँचल अछि‍। परंच एे‍‍ साहि‍त्‍यक संग सभसँ पैघ बि‍डम्‍वना रहल जे पछाति‍क समाज जकरा सामाजि‍क शब्‍दमे दलि‍त कहल जाइत अछि‍, ओकर महि‍मामंडनक गप्‍प तँ दूर प्राय: एे‍‍ साहि‍त्‍यमे अकस्‍मात् अवांछि‍त अभ्‍यागत्तक रूपमे क्षणप्रभा जकाँ कतौ-कतौ चर्चित अछि‍। दलि‍त वर्ग तँ सामाजि‍क, सांस्‍कृति‍क आ शैक्षणि‍क रूपेँ सम्‍पूर्ण आर्यावर्त्तमे पि‍छड़ल छथि‍ मुदा मि‍थि‍ला-मैथि‍लीमे हि‍नक स्‍थानक वि‍वेचन हि‍नका सबहक जाति‍ जकाँ अछोप अछि‍। एकर प्रमुख कारण मि‍थि‍लामे धर्मसुधार आन्‍दोलन, वि‍धवा वि‍वाहक सकारात्‍मक दृष्‍टकोण प्राय: मृतप्राय रहि‍ गेल। दार्शनि‍क उदयानाचार्य, भारती-मंडन, आयाचीक एे‍‍ भूमि‍पर सनातन संस्‍कृति‍क पुनरूद्वार तँ भेल मुदा एे‍‍ पुनरूद्वारपर आडंवर धर्मी व्‍यवस्‍थाक अमरतत्ती मूल संस्‍कृति‍क बि‍म्‍बकेँ सुखा देलक। समाजक साम्‍यवादी सोच भगजोगि‍नी बनि‍ सवर्ण-दलि‍तक मध्‍य भि‍न्न सामाजि‍क दशाक मध्‍य मात्र टि‍मटि‍माइत रहल। एे‍‍ कारण सम्‍यक दृष्‍टि‍कोण रहि‍तहुँ मैथि‍ली भाषाक स्‍थापि‍त रचनाकारक लेखनी व्‍यथि‍त आ शोषि‍त दलि‍तक मर्मस्‍पर्शी जीवन गाथाकेँ प्रकाशि‍त नै‍‍ कऽ सकल। कथा-कवि‍ता आ गल्‍पमे तँ दलि‍तक चि‍त्रण भेटैत अि‍छ मुदा उपन्‍यासमे अत्‍यल्‍प। अपन व्‍यथाक वि‍वेचन दलि‍त वर्गक साहि‍त्‍यकार सेहो नै‍‍ कऽ सकलाह, कि‍एक तँ हि‍नक संख्‍या एखन धरि‍ नगन्‍य अछि‍। संभवत: दलि‍त रचनाकारक उपन्‍यास अपन वयनामे मैथि‍लीकेँ एखन धरि‍ नै‍‍ भेटलनि‍।
सभसँ जनप्रि‍य उपन्‍यासकार हरि‍मोहन झाक साहि‍त्‍यमे दलि‍त वर्ग अनुपस्‍थि‍त जकाँ छथि। यात्रीक बलचनमा ओना एे‍‍ वर्ग दि‍स संकेत करैत अछि‍ ओहि‍ना जेना ललि‍तक पृथ्‍वीपूत्र, धूमकेतुक मोड़ पर आ रमानंद रेणुक दूध-फूल। यात्रीक पारो आ नवतुरि‍या वि‍षएक चयनक कारण दलि‍त वर्ग दि‍स धि‍यान नै‍‍ दऽ सकल। धीरेश्‍वर झा धीरेन्‍द्रकादो ओ कोयला छोट लोकक वि‍रनीक कथा कहैत अछि‍ तँ हुनकर ठुमकि‍ बहू कमलामे दलि‍त वर्गक संघर्षक कथा ठीठर आ रामकि‍सुनक माध्‍यमसँ कहल गेल अछि‍। मणि‍पद्ममक उपन्‍यासक राजा सहलेस दलि‍त दुसाधक नायक सहलेसक कथा कहैत अछि‍ तँ लोरि‍क वि‍जय उपन्‍यासक नायक तँ यादव छथि‍ मुदा हुनका मि‍त्र वर्गमे बंठा चमार, वारू पासवान, राजल धोबी, ई सभ दलि‍त वर्गक छथि‍- लोरि‍कक कि‍छु वि‍रोधी सेहो दलि‍त वर्गक शासक छथि‍- मोचलि‍- गजभीमलि‍, हरवा आदि‍ बंठाक संहार परि‍स्‍थि‍ति‍वश करैत छथि‍ आ तइसँ लोरि‍क वि‍जयमे दलि‍त कथाक ढेर रास प्रसंग आएल अछि‍। नैका बनि‍जारामे सेहो नैकाक पत्नी फुलेश्‍वरीकेँ कि‍नवाक वर्णन अछि‍। हुनकर फुटपाथ भि‍खमंगा सबहक कथा कहैत अछि‍ तँ लि‍लीरेक पटाक्षेप भूमि‍हीनक नक्‍सलवाड़ी आन्‍दोलनक कथा कहैत अछि‍।
आधुनि‍क कालक प्रसि‍द्ध उपन्‍यासकार वि‍द्यानाथ झा वि‍दि‍तजी एे‍‍ वि‍षएपर अपन लेखनीकेँ कोशीक भदैया धार जकाँ झमाड़ि‍ कऽ प्रयोग कएलनि‍। ओना तँ वि‍दि‍त जी एखन धरि‍ आठ-नौ गोट उपन्‍यासक रचना कएलनि‍ अछि‍, परंच हि‍नक तीन गोट उपन्‍यासमे दलि‍तक दशाक चि‍त्रण मैथि‍ली साहि‍त्‍यक लेल अपूर्व नि‍धि‍ मानल जा सकैछ। हि‍नक वि‍प्‍लवी बेसराक कथामे आदि‍वासीक कथा धौना, टेकू सुफल, बांसुरी, मोहरीलाल, गौरी, मारसक संग सफलता पूर्वक कहल गेल अछि‍। कौसि‍लि‍या उपन्‍यासमे तँ फुलि‍या चमैनक पात्रताक चि‍त्रण अनुपमेय अछि‍। वि‍दि‍त जीक तेसर उपन्‍यास मानव कल्‍पमे मि‍थि‍ला, अंग आ झारखंडक ऑचरमे बसल लगभग सम्‍पूर्ण दलि‍त समाजक वि‍वेचन कएल गेल।
ओना तँ श्रीमती शेफालि‍का वर्मा जी मानव धर्मी रचनाकार छथि‍। हि‍नक समग्र साहि‍त्‍यि‍क कृति‍मे जाति‍ शब्‍द भूमंडलीकृत अछि‍। नाग फांस उपन्‍यासमे जाति‍वादी व्‍यवस्‍थासँ शेफालि‍का जी बचबाक प्रयास कएलनि‍, परंच एे‍‍ उपन्‍यासक एकटा पात्र आकाशक पत्नी तरंगक प्रकृति‍सँ बुझना जाइत अछि‍, जे ओ दलि‍त छथि‍।
कहबाक लेल तँ सभ साहि‍त्‍यकार अपनाकेँ साम्‍यवादी कहैत छथि‍ मुदा साम्‍यवादी जीवन शैलीक जौं चर्च कएल जाए तँ संभवत: मैथि‍लीक सर्वकालीन साहि‍त्‍यमे ध्रुवताराक स्‍थान श्री जगदीश प्रसाद मंडल जीकेँ भेटबाक चाही। हि‍नक सभ उपन्‍यास (मौलाइल गाछक फूल, जि‍नगीक जीत, जीवन-मरण, जीवन-संघर्ष, उत्‍थान-पतन)मे दलि‍तक चि‍त्रण अनायास भेटि‍ जाइत अछि‍। लि‍खबाक शैली ओ बि‍म्‍बक चयन ततेक पारदर्शी जे सवर्ण- दलि‍तक मध्‍य कोनो खाधि‍ नै‍‍। सम्‍पूर्ण समाजमे सकारात्‍मक तारतम्‍य स्‍थापि‍त करबाक जगदीश जीक स्‍वप्‍न मात्र उपन्‍यासमे नै‍‍ रहत, एे‍‍सँ मि‍थि‍लाक समाजि‍क परि‍स्‍थि‍ति‍मे भवि‍ष्‍यमे सर्वे भवन्‍तु सुखि‍न:....। सि‍द्धान्‍तक स्‍थापना अवश्‍य हएत। हि‍नक अवि‍रल मर्मस्‍पर्शी आ प्रयोगधर्मी कृति‍ मौलाइल गाछक फूलमे दलि‍त समाजक महादलि‍त मुसहर जाति‍क रोगही, बेंगवा, कबुतरीक मनोदशा आ नि‍त्‍यकर्मसँ समाजमे शांति‍क ज्‍योति‍ जगएबाक कल्‍पना अनमोल अछि‍। दड़ि‍भंगाक प्‍लेटफार्मपर सँ भंगी डोमक मानवीय भावनाक मारीचि‍का एकठॉ भक्क दऽ उगि‍ जाइत अछि‍। भजुआ, झोलि‍या आ कुसेसरी सभ सेहो डोम जाति‍क छथि‍ जि‍नकर सहायता सम्‍यक सोचबला ब्राह्मण रमाकान्‍त जी करैत छथि‍। एे‍‍ कृति‍क सभसँ अजगुत पात्र छथि‍ रमाकान्‍त जी। हि‍नक छोट पुत्र कालक डाँगसँ अधमरू वनि‍ता सुजाता जे धोवि‍न छथि‍ ति‍नकासँ वि‍वाह कऽ लैत छथि‍। वि‍वाहे टा नै‍‍ वि‍वाहसँ शि‍क्षा ग्रहन करबाक लेल प्रेरणा आ अर्थ सेहो सुजाताकेँ भेटलनि‍ जइसँ ओ डाॅ. सुजाता बनि‍ गेली। गाममे रहनि‍हार आ अपन मातृभूमि‍क प्रति‍ असीम श्रद्धा रखनि‍हार रमाकान्‍त बाबूकेँ अपन पुत्र महेन्‍द्रक एे‍‍ नि‍र्णएसँ कोनो पीड़ा नै‍‍ भेलनि‍। हि‍नक सम्‍पूर्ण परि‍वार एे‍‍ नि‍र्णएकेँ सहृदए स्‍वीकार कऽ लेलकनि‍।
जगदीश बाबूक दोसर उपन्‍यास जीवन-मरणमे हेलन-गुदरी डोम दम्‍पति‍क चर्च कएल गेल अछि‍। जीबछ, छीतन, रंगलाल चमार जाति‍सँ सम्‍बन्‍ध रखैत छथि‍। जि‍नगीक जीत उपन्‍यासमे पलहनि‍क नेपथ्‍यक पात्रता दर्शित अछि‍।
गजेन्‍द्र ठाकुरक सहस्‍त्रबाढ़नि‍मे दम्‍माक जड़ी एकटा आदि‍वासी द्वारा आनव आ ि‍कछु वर्ख बाद ओ जड़ी जंगलमे नै भेटब वोन कम होएवा दि‍स संकेत करैत अछि‍ तँ हुनकर सहस्‍त्रशीर्षा मि‍थि‍लाक लगभग सभ दलि‍त जाति‍क वि‍ष्‍तृत वि‍वेचना करैत अछि‍। तीनटा घरक रहलोपर धोवि‍या टोली एकटा टोल बनि‍ गेल अछि‍। झंझारपुर धरि‍ मारवाड़ीक कपड़ा एतए साफ कएल जाइत अछि‍। महि‍सवार ब्रह्मण सभ जे बरि‍यातीमे बेलवटम झाड़ि‍ कऽ सीटि‍-सीटि‍ कऽ नि‍कलैत छथि‍ से कोनो अपन कपड़ा पहि‍रि कऽ। बैह मंगनि‍या कपड़ा, महगौआ मारवाड़ी सभक। मारवाड़ी सभक ई कपड़ा रजक भाय दू दि‍न लेल भाड़ापर हि‍नका सभकेँ दैत छथि‍न्‍ह। कोरैल बुधन आ डोमी साफी, धोवि‍। डोमी साफी आब डोमी दास छथि‍, कारण कबीरपंथी जोतै छथि‍। फेर एकटा आर टोल, चमरटोली अछि‍। चमार- मुखदेब राम आ कपि‍लदेव राम। पहि‍ने गामसँ बाहर रहए, बसबि‍ट्टीक बाद। मुदा आब तँ सभ बाॅस काटि‍ कऽ उपटाए देने अछि‍ आ लोकक वसोबास बढ़ैत-बढ़ैत एे‍‍ चमरटोली धरि‍ आबि‍ गेल अछि‍। घरहट आ ईंटा-पजेबा सभ अगल-बगलमे खसि‍ते रहैत अछि‍। ढोलहो देबासँ लऽ कऽ सि‍ंगा बजेबा धरि‍मे हि‍नकर सबहक सहयोग अपेक्षि‍त। गाए-माल मरलाक बाद जा धरि‍ ई सभ उठा कऽ नै‍‍ लऽ जाइत छथि‍ लोकक घरमे छुतका लागले रहैत अछि‍। भोला पासवान आ मुकेश पासवान, दुसाध। गेना हजारीक नि‍चुलका खाड़ीक संबंधी। वएह गेना हजारी जे कुशेश्‍वर स्‍थानमे एकटा कुशपर गाए द्वरा आबि‍ कऽ दूध दैत देखने रहथि‍ तँ ओइ‍‍ स्‍थानकेँ कोड़ए लगलाह, महादेव नीचाँ होइत गेलाह, सीतापुत्र कुश द्वारा स्‍थापि‍त ई महादेव गेना हजारीक ताकल।
मुकेश पासवानक बेटी मालती बैंक अधि‍कारी छथि‍न्‍ह आ जमाए मथुरानंद डी.पी.एस. स्‍कूलक प्रचार्य छथि‍, वसंत-कुंज लग फार्म हाउसमे रहै जाइ छथि‍। भोला पासवान आ मुकेश पासवान गामेमे रहै जाइ छथि‍।
१९६७ई.क अकालमे जखन सभटा पोखरि‍, गड़खै सुखा गेल मुदा डकही पोखरि‍ नै‍‍ सुखाएल प्रधानमंत्री आएल रहथि‍ तँ हुनका देखेने रहन्‍हि‍ सभ जे कोना एतए सँ बि‍सॉढ़ कोड़ि‍ कऽ मुसहर सभ खाइत छथि‍। चर्मकार मुखदेव रामक बेटा उमेश सेहो ओइ‍‍ मुक्‍ताकाश सैलूनक बगलमे अपन असला-खसला खसा लेने अछि‍, रहैए मुदा कि‍शनगढ़मे। चप्‍पल, जुताक मरो-म्‍मति‍क अलावे तालाक डुप्‍लीकेट चाभी बनेबाक हुनर सेहो सीख‍ लेने अछि‍। कुंजी अछि‍ तँ ओकर डुप्‍लीकेट पंद्रह टाकामे। कुंजी हेरा गेल अछि‍ तँ तकर डुप्‍लीकेट सए टाकामे। आ जे घर लऽ जएवन्‍हि‍ तँ तकर फीस दू सए टाका अति‍रि‍क्‍त। मुसहर बि‍चकुन सदायक बेटा रघुवीर ड्राइवरी सीख‍ लेने अछि‍। वसंत कुंजक एकटा व्‍यवसायीक ओइ‍‍ठाम ड्राइवरी करैए आ रहैत अछि‍ कि‍सनगढ़मे। डोमटोलीक बौधा मल्‍लि‍क बेटा श्रीमंत सेक्‍टरक मेन्‍टेन्‍सक ठेका लेने छथि‍। हुनका लग दू सए गोटे छन्‍हि‍ जे सभ क्‍वार्टरक कूड़ा सभ दि‍न भोरमे उठेवाक संग रोड आ पार्किगक भोरे-भोर सफाइ करै छथि‍। एे‍‍मे सँ कि‍छु गोटे वि‍शेष कऽ नेपालक भोरे-भोर लोकक शीसा महि‍नवारी दू सए टाकामे पोछै छथि‍ आ अखबारक हॉकर बनल छथि‍। रहै छथि‍ कि‍शनगढ़मे मुदा अपन मकानमे- मुसहर बि‍चकुन सदाय।
दलि‍त संस्‍कृति‍क प्रति‍ उदासीनताक मुख्‍य कारण अछि‍ समाजमे पसरल छूति‍ व्‍यवस्‍था। ओना तँ एे‍‍ प्रकारक अवस्‍था प्राय: सम्‍पूर्ण आर्यावर्त्तमे रहल अछि‍, परंच आन ठामक जनभाषासँ दोसर धर्मक लोकक हृदेगत स्‍पर्शक कारण दलि‍त संस्‍कारक चि‍त्रण आन भाषामे मैथि‍लीसँ बेसी भेटैत अछि‍। मि‍थि‍लामे तँ इस्‍लाम धर्मी छथि‍, परंच मातृभाषा मैथि‍ली रहलाक वादो हुनका सबहक मध्‍य साहि‍त्‍यक सृजनशीलता उदासीन रहल। एकरा मैथि‍लीक दुर्भाग्‍य मानल जा सकैत अछि‍ जे एखन धरि‍ एे‍‍ भाषामे दलि‍त वर्गसँ उपजल साहि‍त्‍यकार उपन्‍यास नै‍‍ लि‍ख‍ सकलनि‍। प्राय: यएह स्‍थि‍ति‍ इस्‍लाम धर्मी साहि‍त्‍यकारक संग सेहो अछि‍। फजलुर रहमान हासमी, मंजर सुलेमान सन साहि‍त्‍यकार तँ मैथि‍लीकेँ आत्‍मसात कएलनि‍ परंच उपन्‍यासकार नै‍‍ बनि‍ सकलाहेँ। ई लि‍खबाक तात्‍पर्य जे इस्‍लाममे जाति‍वादी व्‍यवस्‍था सनातन सांस्‍कृति‍क अपेक्षाकृत न्‍यून अछि‍।
दलि‍त वर्गक संख्‍या मि‍थि‍लामे लगभग आठ आना अछि‍, संपूर्ण समाजक मातृभाषा मैथि‍ली मुदा शि‍क्षा-चेतनाक अभावक कारण एे‍‍ वर्गमे मैथि‍ली साहि‍त्‍यक प्रति‍ सृजनात्‍मक दृष्‍टि‍कोण नै‍‍ पनपि‍ सकल। आगॉक जाति‍मे सम्‍यक् ि‍वचारक अभाव रहल अछि‍, कि‍छु साहि‍त्‍यकार एे‍‍ परि‍धि‍सँ तँ बाहर छथि‍ परंच वर्गक बीचक खाधि‍ लक्ष्‍मण रेखा बनि‍ हुनको सभमे जनभाषा वाचकक प्रति‍ सि‍नेह नै‍‍ आबए देलक। संभवत: मैथि‍ली आर्यभाषा समूहक पहि‍ल जनभाषा थि‍क जकरापर जाति‍वादी कलंक लागल अछि‍। संस्‍कृतक संग यएह वि‍डंवना रहल परंच ओ कहि‍ओ जनभाषा नै‍‍ रहल। जखन कि‍ मैथि‍ली वर्तमान कालमे सवर्णसँ बेसी दलि‍त-पछाति‍क मातृभाषा अछि‍। पलायन तँ सभ जाति‍ समूहमे भऽ रहल अछि‍ परंच मजदूरी केनि‍हार दलि‍त प्रवासमे सेहो मैथि‍लीकेँ आत्‍मसात कएने छथि‍। एकर वि‍परीत मि‍थि‍लामे रहनि‍हार सवर्ण परि‍वारक आधुनि‍क पि‍रहीक नेना वर्गमे मातृभाषाक स्‍थान हि‍न्‍दी लऽ रहल अछि‍। ज्‍योति‍क-कोखि‍ अन्‍हार जकाँ मातृभाषाक वास्‍तवि‍क संरक्षकक वि‍वेचन एे‍‍ साहि‍त्‍यक उन्नयनक नै‍‍ कऽ रहल छथि‍। उतर वि‍हारक बेस रास स्‍थानमे पसरल मैथि‍ली तँ कखनो-कखनो मात्र मधुबनी दड़ि‍भंगाक मातृभाषा प्रमाणि‍त कएल जाइत अछि‍।
रचनाकारक दृष्‍टि‍कोण रचनामे कि‍छु आर आ वास्‍तवि‍क जीवनमे कि‍छु आर रहल। साम्‍यवादी व्‍यवस्‍थापर सि‍याहीक प्रयोग केनि‍हार उपन्‍यासकारमे वास्‍तवि‍कता जौं रूढ़ि‍वादी रहत तँ सम्‍यक समाजक कल्‍पनो करब असंभव। व्‍यथा वएह बूझि‍ सकैत ‍अछि‍ जकरामे जीवन्‍त अवि‍रल हृदए हो वा स्‍वयं व्‍यथि‍त हुअए।
नि‍ष्‍कर्षत: आशक संग-संग विश्‍वास अछि‍ जे वर्तमान युगक साहि‍त्‍यकार समाजक कात लागल वर्गक प्रति‍ सि‍नेही बनि‍ मैथि‍ली साहि‍त्‍यकेँ गरि‍मामयी बनाबथु। पूर्वाग्रहकेँ अनुगृहीत करबाक पश्‍चात एहेन कल्‍पना-वास्‍तवि‍क भऽ सकैत अछि‍। जौं अपमानि‍त अछोपकेँ सम्‍मानि‍त कएल जाए तँ मि‍थि‍ला पुनि‍ ओइ‍‍ मि‍थि‍लामे परि‍णत भऽ सकैत अछि‍ जतए राजा जनक परि‍वार, समाज आ राज्‍यहि‍तमे धर्मक पालनक हेतु राजासँ हरबाह बनि‍ गेलनि‍।

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पुरस्कार

हमरा इ सूचित करैत अपार हर्ख भए रहल अछि जे मैथिलीक एक मात्र गजलक ब्लाग " अनचिन्हार आखर" http://anchinharakharkolkata.blogspot.com/नव शाइर के प्रोत्साहित आ पुरान शाइरक निन्न तोड़बाक लेल एकटा तुच्छ मुदा भावना सँ ओत-प्रोत पुरस्कार अहाँ लोकनिक माँझ लाबि रहल अछि जकर नाम "गजल कमला-कोशी-बागमती-महानंदा" रखबाक नेआर अछि।
इ पुरस्कार दू चरण मे पूरा कएल जाएत जकर विवरण एना अछि--------
पहिल चरण-----------हरेक मास मे प्रकाशित गजल, रुबाइ, कता, फर्द, समीक्षा, आलोचना, समालोचना, इतिहास ( गजल, रुबाइ, कता, फर्द आदिक) मे सँ एकटा रचना चूनल जाएत जे सालक बारहो मास चलत (साल मने १ जनवरी सँ ३१ दिसम्बर) ।
एहि तरहें चयन कर्ता लग अंतिम रूप सँ बारह रचना प्राप्त हेतन्हि।
दोसर चरण------ चयनकर्ता अंतिम रुप सँ मे प्राप्त रचना के ओकर भाव, व्याकरण आदिक आधार पर एकटा रचना चुनताह, जे अंतिम रुप सँ मान्य हएत आ ओकरे इ पुरस्कार देल जाएत।

रचना चुनबाक नियम-------------

१) रचना अनिवार्य रुपें "अनचिन्हार आखर"http://anchinharakharkolkata.blogspot.com/ पर प्रकाशित होएबाक चाही। जँ कोनो रचनाकारक रचना अन्य द्वारा प्रस्तुत कएल गेल छैक सेहो मान्य हएत।

२) रचना मौलिक होएबाक चाही। जँ कोनो रचनाक अमौलिकता पुरस्कार प्राप्त भेलाक बाद प्रमाणित हएत तँ रचनाकार सँ अबिलंब पुरस्कार आपस लए लेल जाएत आ भविष्य मे एहन घटना के रोकबाक लेल " अनचिन्हार आखर" कानूनी कारवाइ सेहो कए सकैत अछि।
३) रचना चयन प्रकिया के चुनौती नहि देल जा सकैए।
४) एहन रचनाकार जे मैथिलीक रचना के अन्य भाषाक संग घोर-मठ्ठा कए लिखैत छथि से एहि पुरस्कारक लेल सवर्था अयोग्य छथि, हँ ओहन रचनाकार जे मैथिली आ अन्य भाषा मे फराक-फराक लिखैत छथि तिनकर रचना के पुरस्कार देल जा सकैए, बशर्ते कि ओ अन्य पात्रता रखैत होथि।

५) पहिल चरणक प्रकिया हरेक मासक ५ सँ १० तारीखके बीच आ दोसर चरण हरेक तिला-संक्रान्ति के पूरा कएल जाएत।

६) एहि पुरस्कारक चयन पूर्णतः आन-लाइन होएत ।

७) रचनाकार कोनो देशक नागरिक भए सकैत छथि।

८) " अनचिन्हार आखर"क संस्थापक एहि पुरस्कार मे भाग नहि लए सकैत छथि।
९) पुरस्कार राशिक घोषणा बाद मे कएल जाएत।

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बृहस्पतिवार, 28 अप्रैल 2011

हाइकू

1
हरित-कञ्च
लाल-उज्जर ठोप
हृदै संगोर
2
मरुद्यान नै
जलोदीपमे द्वीप
बालु नै पानि
3
ओ नील मेघ,
समुद्र पृथ्वी छोड़ि
भेल अकासी
4
पात आ चिड़ै
एक दोसरा सन
स्किन कलर
5
अकासी जल
पानिक अकासमे
रस्ता चीरैए
6
ई हिमपात
हिम सन अकास
आ धरा गाछ
7 सूर्यक पूब आशाक छै किरण
मुदा रक्ताभ
8
प्रकृति पानि
हहारोहक बाद
शांत प्रशांत
9
व्याकुल चिड़ै
ठूठ गाछ सुखौंत
छै हतप्रभ
10.
प्रकृति नृत्य
प्रकृति संग जीब प्रकृति भऽ कऽ
११
प्रकृति प्रेम
प्रकृति संग जीब
प्रकृति भऽ कऽ
११
अलैचढ़ल
उत्साह हमर जे
देखी दोहारा

१२
अमरलत्ती
पनिसोखा जकाँ की
छूत अकास
13
कजराएब
अकासक ऐ गाछ,
मेघक संग
14
देव डघर
अकाससँ उतरि
पृथ्वी अबैत
15
धुरिया साओन
फेर भदबरिया
रेत पयोधि
16
कचौआबध
मनोरथ गामक
जबका मारल

17

गाछ बृच्छ आ
चिड़ै चुनमुनीक
बीच खेबै छी
18
संगोर राति
दिन राति सन-ए
आ राति राति
19
दूर क्षितिज
मुँह घुरौने सभ
अपने भेर
20
दूर क्षितिज
वृत्तक नहि अंत
लगक छद्म
21
मेघक सीढ़ी
अकासक मचान
हिम छारल

22
अन्हार जोति
कएल प्रकाशित
अंतःप्रकाशे
23
सलाढ़ आब
अरियालङ्घनक
बादक हाल
24
अगरजित
खसब नै उठब
ओतै रहब
25
साँप घुमैत
पहुँचैए शिखर
रस्ता बनैए
26
जलपै बेढ़ी
बोनाठ धमाउर
उपटाएब
गजल
27
डलबाह नै
पंजियार भगता
भगैतिया नै
28
केराक बीर
काज करब कनी
खाएब टुस्सा
29
घुमौआ मोड़
चौबटिया बनि कऽ
आनैए आस
30
झरैए पानि
बनबैए धार आ
बढ़ैए आगाँ

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हाइकू- निमिष झा


निमिष झा

हाइकू

चाँदनी राति
नीमक गाछ तर
जरैछ आगि।

गरम साँस
छिला गेलैक ठोर
प्रथम स्पर्श।

परिचित छी
जीवनक अन्तसँ
मुदा जीयब।

बहैछ पछबरिया
जरै उम्मिदक दीया
उदास मोन।

पीयाक पत्र
किलकिञ्चत् भेल
उद्दीप्त मोन

श्रम ठाढ़ छै
श्रमिक पड़ल छै
मसिनि युग।

मृत्युक नोत
जीबाक लेल सिखु
देब बधाइ।

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गजल

मोन मुंगबा फुटईया मीत हमर ,

सोझा अबैईथ जखन प्रीत हमर !


हुनक जूट्टी में गूहल भबित हमर ,

हुनक गजरा गछेरने अतीत हमर !


खाम्ह कोरो बनल मोन चीत हमर ,

हुनक लेपट सौं छारल अई भीत हमर !


हुनक नख शिख में नेह निहीत हमर ,

हुनक कोबरे करत मोन तिरपित हमर !


हम हुनके सिनेह ओ सरीत हमर ,

हुनक मुस्की सौं जागे कबीत हमर !


सा- स्नेह
विकाश झा

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मित्र-बंधु-बहिन सभ




एहि में दू मत नहि जे फेशबुक सऽ आन्दोलन के पूर्ण परिचालन भऽ सकैछ, लेकिन आधार-स्तम्भके निर्माण, कार्यक्रम योजना, कार्यकर्ताके खोज - इ सभ कार्य समाजिक संजालरूपी फेशबुक पेज सऽ सेहो संभव छैक।


आब जेना दहेज मुक्त मिथिलाके उदाहरण लेल जाय - भेलै कि जे किछु मित्र सभ आपसमें गप करैत समय मिथिला ऊपर दहेज के बढावा वा पोषण करैक आरोप लगाबैछ - आरोप कि - जे वास्तविकता अछि से बात करैछ आ ताहि अनुरूप दोसर मित्र ओहि विन्दुपर किछु करबाक लेल बात करैछ... एवम्‌ प्रकारेन बहुत मित्र-बंधु-बहिन लोकनि जुटैत छथि आ फेशबुक पर दहेज के धज्जी उड़ैछ। प्रश्न उठैछ - कि वास्तवमें युवा के हृदयमें परिवर्तन आबि रहल छैक? कि जेना इ थोड़ेक युवा उत्साहित छथि दहेजके दानवके भगाबय लेल, तहिना हर गाम आ घर-शहर-नगरमें युवा सब आतुर छथि अपन समाजके एहि दानव सऽ छुटकारा दियाबैक लेल? सुन्दर विन्दु अछि इ दहेज एवं एकर समर्थन कोन रूपें हेवाक चाही, कोन प्रकार के विरोध होयबाक चाही आ युवा लोकनिक इच्छाके सार्थकता दैक लेल किछु कार्य सेहो हेबाक चाही। बस निर्णय होइछ जे किऐक नहि धरातलपर एहि मूहिम के उतारल जाय। आ तदनुसार क्रमबद्ध रूपमें एहि मूहिम के निरंतरता वैह फेशबुक परका मित्र-बंधु-बहिन सभ देवय लगलथि। एक मोर्चा के निर्माण भऽ गेल। किछु प्रतिबद्ध सदस्य सेहो बनि गेला।


आ, चूँकि बाहुल्य सदस्य सभ दहेज विरोध के सुन्दर स्वरूप सौराठके सभागाछीवाला परिकल्पनाके पुनरुत्थान एवं पुनर्जीवित करैत होयबाक चाही - अतः वर्तमान मूहिम जे अछि से सौराठके पुनरुत्थान हेतु सेहो सक्रिय होयत, प्रथमतः एहि परंपराके लेल लड़त आ ताहि संग-संग जे केओ बिना दहेज लेन-देन आदर्श विवाह करैत छथि, हुनका लोकनिक यशगान करनै एहि बेरके योजनामें शामिल भेल। संगहि दहेज मुक्त मिथिलाके अपन एक पोर्टल निर्माण कैल जायत जाहि ऊपर दहेज मुक्त विवाह केनिहार के ऊपर विभिन्न रिपोर्ट आ आगू इच्छूक व्यक्ति सभ जे दहेज मुक्त विवाह करता तिनक पूर्ण परिचय सेहो उपलब्ध कराओल जायत। संगहि मासिक वा अर्धमासिक बूलेटिन जे दहेज मुक्त मिथिला के कोन काज पृथ्वीपर भऽ रहल छैक तेकर जानकारी उपलब्ध कराओल जायत। अन्य कार्यमें दहेज मुक्त मिथिलाके तरफ सऽ गाम-गाम आ शहर-शहर एहेन कैम्पेनिंग होयत जाहिमें दहेज मुक्त विवाह केनिहार के यशगान एवं आम जनमानसके जागृति हेतु विभिन्न कार्यक्रम आदि समाहित होयत। सदस्यता अभियान लेल सेहो प्रत्येक गाम आ शहरमें एक प्रमुख के चुनाव आ तदनुसार एक स्थानीय कमिटीके गठन करैत शाखा विस्तार कयल जायत। पुनः दहेज मुक्त मिथिला के तरफ सऽ सामूहिक विवाह, सौराठके तर्जपर सभागाछी विभिन्न जगह पर लगौनै, जागृतिमूलक सांस्कृतिक कार्यक्रम, सभा आयोजन, अन्य सम्बोधन आदि कैल जायत। एहि संस्थाके राजनीति सऽ कुनु लेना देना नहि रहत मुदा कानून विरुद्ध कतहु किनको ऊपर अत्याचार भेलापर सामाजिक नियमके अनुरूप ओहि प्रकार के अत्याचार विरुद्ध लड़ाई सेहो लड़त। दहेज मुक्त विवाह केनिहार लोक सभके यशगान-सम्मान आदि करैत अन्य व्यक्तिमें सेहो एहि प्रकारके वातावरणके सृजना कैल जाय से मुख्य लक्ष्य रहत।


वर्तमान में इ संस्था पंजीकरण प्रक्रियामें अछि - एकर सदस्यता हेतु एखन स्थानीय कर्मठ कार्यकर्ता श्री प्रकाश चन्द्र चौधरी के व्यक्तिगत खाताके प्रयोग कैल जा रहल छैक, जेकर विवरण दहेज मुक्त मिथिला नामके ग्रुपपर उपलब्ध अछि। सदस्यताके चारि प्रकार राखल गेल छैक - संरक्षक सदस्य (५१०१/-), संस्थापक सदस्य (२१०१/-), आजीवन सदस्य (५०१/-) आ साधारण सदस्य (१५१/-) - सदस्य के जिम्मेवारी, अधिकार आदिके नियमन्‌ होयबाक बाकी छैक, जे क्रमशः कानून-विधान अनुरूप हेतैक। कार्यकारिणीके गठन सेहो पूर्ण प्रजातान्त्रिक मूल्य के अनुरूप हेतैक। पदके लोभ एहेन होइत छैक जे संस्थाके जन्म सऽ पहिने एकरा मारयके फेर में पड़ैत देखल गेलैक अछि। ताहि हेतु एहि बेर जेना-तेना सौराठ सभाके आयोजन तक एक एडहॅक कमिटी बनाके कार्य सम्पादित कैल जाय, आ तेकर बाद एक आमसभाके आयोजन करैत ओहिठाम विधान अनुरूप निर्वाचन प्रणाली द्वारा कार्यकारिणीके गठन होयत से विचार अछि।



एतेक कार्य मुख्यतः फेशबुक सऽ सम्पादित भेल - आब धरातल पर कि-कि होइछ इ देखबाक अछि।



हरिः हरः!!

प्रवीन   नारायण   चौधरी  

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बुधवार, 27 अप्रैल 2011

हाबड़ा पुल तोरा देखैबो


हाबड़ा पुल तोरा देखैबो @प्रभात राय भट्ट


पेन्ह्नेछे मेक्सी हाथ में पेप्सी,
तू लागैछे बड़ा सेक्सी गे,२ 
हाँ हाँ सेक्सी गे बड़ा सेक्सी गे २
आइग जिका धध्कई छे तू ,
बिजुली जिका चमकै छे तू ,
हवा में उड़इ छो तोहर दुपटा,
चल न चल गोरी कलकाता २
हाबड़ा पुल तोरा देखैबो,     
कलकाता के शयर करैबो,
रस से भरल रस्गुला खिलेबो,
ठनका जिका ठंकई छे तू ,
बदरा जिका बरषई छे तू ,
पारी जिका रम्कई छे तू ,
बात बात में पढाई छे गाईर,
राख तू राख अपन जोवन सम्हईर,२
रूप तोहर देखि भेलै बबाल,
तोहर दीवाना समूचा नेपाल,
अजबे गजबे छौ चाल ढाल,
कमर में खोसने छे तू रुमाल,
जर जुवान के बाते छोर,
बुढ्बो भेल तोरा लेल बेहाल,
कोई कहै छौ आई लव यु,
कोई कहै छौ हेलो सेक्सी हाउ आर यु,
रचनाकार:प्रभात राय भट्ट 

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सोमवार, 25 अप्रैल 2011

आब अप्पन कहू की बिचार भेल


प्रिय बंधुगन आय ग्रुपक सफलता के देखैत बहुत ख़ुशी होइत छले, जे हम सभ मिल के जे एक छोट छिन्ह सपना देखने छलों से आय अपन राह पर अग्रसर भो रहल अछि.....


खुशिक संगे संग बहुत रास गप एहनो अछि जहीं सँ ह्रदय बहुत दुखाबैत अछि..


ह्रदय के द्रवित करै बला एहने एक आर गपक हमरा पता चलल... दहेज़ मुक्त मिथिला के एक बहुत जिम्मेदार सदस्य जिनका सँ हम सभ बहुत आस राखैत छलों (फिलहाल नाम नै कहब) पता चलल जे अगला महिना हुनकर छोट भाई के विवाह छैन...१९ मई , सुईंन के आश्चर्य करब जे ओ अपन भाई के 1,५०००००/- (एक लाख पचास हजार ) दहेज़ लेना छलाह....



आब अहिं सब कहू हम सभ मिल के की की सपना देखैत छलों आ की भे रहल अछि ???



एहि तरहक सभ सदस्यसँ हम अपील करे चाहब जे अपनेक झूठ - मुठ आशाक एहि संस्था "दहेज़ मुक्त मिथिला" के कुनू जरुरत नै छैक... जिनका मोन में एहि तरहक भावना अछि कृपा के कs एहि ग्रुप सँ बाहर जेबाक कस्ट करी...


यदि हमर गप किनको खराब लागत ते तहि लेल छमा चाहब.....


आगू और सूनू की भेल ------

Pravin Narayan चौधरी जितमोहनजी! ओ जे केओ होइथ हुनका लेल एतेक अपील बहुत आँखि खोलयवाला होयबाक चाही। लेकिन नाम खोलबैक तखन ने आरो लोक सभ एहेन मिथ्याचार करनिहार के पहचान करतैक? आ, कहीं अहाँ के गलत जानकारी भेल होय... ओहो बात स्पष्ट भऽ जेतैक। जे-जेना, अपने एहि बातके पूरा स्पष्ट लिखियौक।


Jitmohan Jha
भैया इ बात पूरा स्पष्ट अछि, हम सब हुनका सँ संपर्क में छी संगे ओ गछने छलाह जे लेल गेल दहेज़ रूपी पाई १,५००००/- ओ बेटी पक्ष बला के वापस करता... एहि मुहीम में हुनक खिलाफ खुद हुनकर सार हमरा संग ठार छैथ.. ओ एता धरी हमरा कहला जे जाधरी ओ हमरा स्टं...प पेपर पर लिख के नै देता आ ओई पर बेटी बला के दस्खत नै देखेता हम पछा नै छोर्बैन...

तहि लेल जखन ओ इ बात स्विकारैत छैथ ते हमरा बुझला सँ हुनकर नाम सार्वजानिक केनाय ठीक नै हेत...

तहि लेल हम छमा चाहब... कारण हमरा सभ के किनको भावना के ठेस नै पहुचेबाक चाही....



Pravin Narayan Choudhary वाह जीतमोहनजी!! बहुत सुन्दर प्रकरण बुझैछ आ लगैछ जे इहो एक रिकार्ड बनल एहि दहेज मुक्त मिथिलाके मूहिम के... ग्रेट सिम्प्ली!! जे लेलाह आ रिटर्न करताह ओहो बहुत सभ्य लोक छथि आ हम हुनका केवल एहि लेल नमन्‌ करवैन जे अपने लोकनिक मान राखिके लड़कीवालाके लेल पाइ वापस करय लेल तैयार छथि। वीर पुरुष हुनक सार के सेहो नमन्‌ - अहाँ सदिखन अहिना वीरतापूर्वक दहेजके दानव सँग लड़ैत रही से प्रार्थना। जय मैथिली! जय मिथिला!


आब ओऊ मुद्दा के बात पर की ई उछित थिक नै, कियक नै की अहन सब अहैसे पहिने मिथिला से बहार छलो जे

नाजेर नै परल की अहाँ सब के , टोल परोस , गामा घर मे ई बात नै छैक

की अहाँ सब एक दोसर के खिलाप किछ कहै नै सकैत छी या अहाँ सब के डर होय्या ,अगर होय्या त से किय होय्या , से कियक की कारन छैक , आई जै किछ कारन छल ताहि दुरे ई गप्प उठायल गेल कियक ई गप्प मदन ठाकुर के छोट भाई के बियाह छियान ताहि दुवारे या मदन ठाकुर कुनुक कर्मक नै छैथि ताहि दुवारे , की किनका घर में बियाह नै होयत अछि ई गप्प छुपल छैक , से बताऊ या और कुनो कारन छैक



हम मिथिला के संतान छी ताहि दुवारे , हम '' दहेज़ मुक्त मिथिला '' के सदस्य आई १० दिन से भेलो जाही कारन अपनेक सबहक समक्ष शर्म से किछ नीच लागैत छी , की ना यो , मुद्दा नै हमर गर्व से हमर गर्दन आई उच्च अछि , जे हम लड़की बाला के रुपैय वापस करब आ दहेज़ मुक्त मिथिला बनायब हमर ई कसम और अपनेक सबहक वादा अछि , चाहे हमारा अपन परिवार , टोल परोस , या गावं से नाता तोरे परे , यदि अपनेक सबहक सहयोग रहत त , ई कदम हम उठारहल छी आगू से मगर अहुंके उठायब परत अप्पन कदम , पछु से , दहेज़ मुक्त मिथिला के लेल , की तैयार छी अपन गर्दन उच्चय देखाबैक लेल ता अहं सब कसम खाऊ , और वादा करू , मिथिला के खातिर ,

मदन कुमार ठाकुर

पट्टीटोल, कोठिया

भैरव स्थान , झंझारपुर

मधुबनी बिहार 847404

और कहब त कहू अहि पर

9312460150


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गजल (बहरे मुतकारिब )


उचरि नरूप अपन लिखैब तखन किने
उतर दछिन डगहर    बहैब तखन किने
                         
कनकन करत बनत सदिखन तलिया यौ
सुअद पैब जौँ अहँ झखैब तखन किने

मनक भूख असगर नुकैब बुझल अछि
अपन बोल-वाणी घुरैब तखन किने

खधाइ गढ़ अछि भरल सभतरि दहारे
जलक धार बिच घर भरैब तखन किने

निमहतासँ निभता निभैब सिखल नहि
नव युग कनिक उगल बुझैब तखन किने

पड़ाइनपर कनैत अछि भाग जँ कतौ
गजेन्द्र मन बूझै हियैब तखन किने

बहरे मुतकारिब मुतकारिब आठरुक्न फ ऊ लुन (U।।) चारि बेर

बहर आ छन्दक मिलानी
गजल कोनो ने कोनो बहर (छन्द) मे हेबाक चाही। वार्णिक छन्दमे सेहो ह्रस्व आ दीर्घक विचार राखल जा सकैत अछि, कारण वैदिक वर्णवृत्तमे बादमे वार्णिक छन्दमे ई विचार शुरू भऽ गेल छल:- जेना
तकैत रहैत छी ऐ मेघ दिस
तकैत (ह्रस्व+दीर्घ+दीर्घ)- वर्णक संख्या-तीन
रहैत (ह्रस्व+दीर्घ+ह्रस्व)- वर्णक संख्या-तीन
छी (दीर्घ) वर्णक संख्या-एक
(दीर्घ) वर्णक संख्या-एक
मेघ (दीर्घ+ह्रस्व) वर्णक संख्या-दू
दिस (ह्रस्व+ह्रस्व) वर्णक संख्या-दू

मात्रिक छन्दमे द्विकल, त्रिकल, चतुष्कल, पञ्चकल आ षटकल अन्तर्गत एक वर्ण (एकटा दीर्घ) सँ छह वर्ण (छहटा ह्रस्व) धरि भऽ सकैए।
द्विकलमे- कुल मात्रा दू हएत, से एकटा दीर्घ वा दूटा ह्रस्व हएत।
त्रिकलमे कुल मात्रा तीन हएत- ह्रस्व+दीर्घ, दीर्घ+ह्रस्व आ ह्रस्व+ह्रस्व+ह्रस्व; ऐ तीन क्रममे।
चतुष्कलमे कुल मात्रा चारि; पञ्चकलमे पाँच; षटकलमे छह मात्रा हएत।
वार्णिक छन्द तीन-तीन वर्णक आठ प्रकारक होइत अछि जे “यमाताराजसलगम्” सूत्रसँ मोन राखि सकै छी।
आब कतेक पाद आ कतऽ काफिया (यति,अन्त्यानुप्रास) देबाक अछि; कोन तरहेँ क्रम बनेबाक अछि से अहाँ स्वयं वार्णिक/ मात्रिक आधारपर कऽ सकै छी, आ विविधता आनि सकै छी।


वर्ण छन्दमे तीन-तीन अक्षरक समूहकेँ एक गण कहल जाइत अछि। ई आठ टा अछि-

यगण U।।

रगण ।U

तगण ।। U

भगण । U U

जगण UU

सगण U U

मगण ।।।

नगण U U U


एहि आठक अतिरिक्त दूटा आर गण अछि- ग / ल

ग- गण एकल दीर्घ ।

ल- गण एकल ह्रस्व U

एक सूत्र- आठो गणकेँ मोन रखबा लेल:-

यमाताराजभानसलगम्

आब एहि सूत्रकेँ तोड़ू-

यमाता U।। = यगण

मातारा ।।। = मगण

ताराज ।। U = तगण

राजभा ।U। = रगण

जभान UU = जगण

भानस । U U = भगण

नसल U U U = नगण

सलगम् U U । = सगण
तेरह टा स्वर वर्णमे अ,,,,लृ - ह्र्स्व आर आ,,,,ए.ऐ,,औ- दीर्घ स्वर अछि।

ई स्वर वर्ण जखन व्यंजन वर्णक संग जुड़ि जाइत अछि तँ ओकरासँ गुणिताक्षरबनैत अछि।

क्+अ= क,

क्+आ=का ।

एक स्वर मात्रा आकि एक गुणिताक्षरकेँ एक अक्षरकहल जाइत अछि। कोनो व्यंजन मात्रकेँ अक्षर नहि मानल जाइत अछि- जेना अवाक्शब्दमे दू टा अक्षर अछि, , वा ।


१. सभटा ह्रस्व स्वर आ ह्रस्व युक्त गुणिताक्षर लघुमानल जाइत अछि। एकरा ऊपर U लिखि एकर संकेत देल जाइत अछि।

२. सभटा दीर्घ स्वर आर दीर्घ स्वर युक्त गुणिताक्षर गुरुमानल जाइत अछि, आ एकर संकेत अछि, ऊपरमे एकटा छोट -।

३. अनुस्वार किंवा विसर्गयुक्त सभ अक्षर गुरू मानल जाइत अछि।

४. कोनो अक्षरक बाद संयुक्ताक्षर किंवा व्यंजन मात्र रहलासँ ओहि अक्षरकेँ गुरु मानल जाइत अछि। जेना- अच्, सत्य। एहिमे अ आ स दुनू गुरु अछि।

जेना कहल गेल अछि जे अनुस्वार आ विसर्गयुक्त भेलासँ दीर्घ होएत तहिना आब कहल जा रहल अछि जे चन्द्रबिन्दु आ ह्रस्वक मेल ह्रस्व होएत।
माने चन्द्रबिन्दु+ह्रस्व स्वर= एक मात्रा

संयुक्ताक्षर: एतए मात्रा गानल जाएत एहि तरहेँ:-
क्ति= क् + त् + इ = ०+०+१= १
क्ती= क् + त् + ई = ०+०+२= २
क्ष= क् + ष= ०+१
त्र= त् + र= ०+१
ज्ञ= ज् + ञ= ०+१
श्र= श् + र= ०+१
स्र= स् +र= ०+१
शृ =श् +ऋ= ०+१
त्व= त् +व= ०+१
त्त्व= त् + त् + व= ० + ० + १
ह्रस्व + ऽ = १ + ०
अ वा दीर्घक बाद बिकारीक प्रयोग नहि होइत अछि जेना दिअऽ आऽ ओऽ (दोषपूर्ण प्रयोग)। हँ व्यंजन+अ गुणिताक्षरक बाद बिकारी दऽ सकै छी।
ह्रस्व + चन्द्रबिन्दु= १+०
दीर्घ+ चन्द्रबिन्दु= २+०
जेना हँसल= १+१+१
साँस= २+१
बिकारी आ चन्द्रबिन्दुक गणना शून्य होएत।
जा कऽ = २+१
क् =०
क= क् +अ= ०+१
किएक तँ क केँ क् पढ़बाक प्रवृत्ति मैथिलीमे आबि गेल तेँ बिकारी देबाक आवश्यकता पड़ल, दीर्घ स्वरमे एहन आवश्यकता नहि अछि।


U- ह्रस्वक चेन्ह
।- दीर्घक चेन्ह


एक दीर्घ । =दूटा ह्रस्व U
हाइकूसँ विपरीत रुबाइमे वार्णिक नै मात्रिक गणना होएत (गजलमे मुदा दुनू विकल्प उपलब्ध छै): 20 वा 21 मात्रा सभ पाँतीमे हेबाक चाही आ गणना होएत- देखलों जे अहाँ के रूप गोरी(2+1+2/ 2/ 1+2/ 2/ 2+1/ 2+2= 19 एतए 2 मात्रा पहिल पाँती मे कम अछि. संगे पहिल शब्द दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ सँ वा २.दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व सँ शुरू हेबाक चाही, सभ पाँती मे- अलग-अलग क्रम भ' सकैए मुदा 21 मात्रा आ प्रारम्भ दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ सँ वा २.दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व सँ हेबाक चाही...
मुदा हाइकू लेल बिना कम्प्लेक्सिटीबला वार्णिक छन्दक मैथिलीमे प्रयोग करू जेना अहाँ क' रहल छी..
वार्णिक दृष्टिसँ गणना आ मात्रिक दृष्टिसँ गणना: तकैत= 1+2+1 ( एतए तीनटा वर्ण अछि त, कै, त जतए पहिल ह्रस्व , दोसर दीर्घ आ तेसर ह्रस्व अछि).. ई भेल वार्णिक दृष्टिसँ, मात्रिक दृष्टिसँ मुदा तकैत= ह्रस्व+दीर्घ+ह्रस्व= 4 मात्राक वर्ण ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्वक क्रममे...

हाइकू: तीन पाँतीमे 5/7/5 क्रममे लिखू, निअम नीचाँ अछि:-

हैकू १७ अक्षरमे लिखू, आ ई तीन पंक्त्तिमे लिखल जाइत अछि- ५ ७ आ ५ केर क्रममे। अक्षर गणना वार्णिक छन्दमे जेना कएल जाइत अछि तहिना करू।

वार्णिक छन्दक परिचय लिअ। एहिमे अक्षर गणना मात्र होइत अछि। हलंतयुक्त अक्षरकेँ नहि गानल जाइत अछि। एकार उकार इत्यादि युक्त अक्षरकेँ ओहिना एक गानल जाइत अछि जेना संयुक्ताक्षरकेँ। संगहि अ सँ ह केँ सेहो एक गानल जाइत अछि।द्विमानक कोनो अक्षर नहि होइछ।मुख्य तीनटा बिन्दु यादि राखू-

1.हलंतयुक्त्त अक्षर-0

2.संयुक्त अक्षर-1

3.अक्षर अ सँ ह -1 प्रत्येक।

आब पहिल उदाहरण देखू

ई अरदराक मेघ नहि मानत रहत बरसि के=1+5+2+2+3+3+3+1=20 मात्रा

आब दोसर उदाहरण देखू

पश्चात्=2 मात्रा

आब तेसर उदाहरण देखू

आब=2 मात्रा

आब चारिम उदाहरण देखू

स्क्रिप्ट=2 मात्रा

मुख्य वैदिक छन्द सात अछि-गायत्री,उष्णिक् ,अनुष्टुप् ,बृहती,पङ् क्त्ति,त्रिष्टुप् आ जगती। शेष ओकर भेद अछि अतिछन्द आ विच्छन्द। छन्दकेँ अक्षरसँ चिन्हल जाइत अछि। यदि अक्षर पूरा नहि भेलतँ एक आकि दू अक्षर प्रत्येक पादमे बढ़ा लेल जाइत अछि।य आ

व केर संयुक्ताक्षरकेँ क्रमशः इ आ उ लगा कय अलग केल जाइत अछि।जेना-

वरेण्यम्=वरेणियम्

स्वः= सुवः

गुण आ वृद्धिकेँ अलग कयकेँ सेहो अक्षर पूर कय सकैत छी।

ए= अ + इ

ओ= अ + उ

ऐ= अ/आ + ए

औ= अ/आ + ओ

 

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सोमवार, 18 अप्रैल 2011

रुबाइ

कारी अनहार मेघ आ नै होइए
कत्तौ बलुआ माटि खा नै होइए
दाहीजरती देखि हिलोरै-ए मेघ
भगजोगनी भकरार जा नै होइए


टिप्पणी: रुबाइ:




रुबाइक चतुष्पदीमे पहिल दोसर आ चारिम पाँती काफिया युक्त होइत अछि; आ मात्रा २० वा २१ हेबाक चाही।
रुबाइमे मात्रा २० वा २१ राखू। रुबाइक सभ पाँतीक प्रारम्भ दू तरहे शुरू होइत अछि- १.दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ (मफलु ।।U )सँ वा २.दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व (मफलुन ।।।) सँ। ओना फारसी रुबाइमे पाँती सभ लेल प्रारम्भक आगाँक ह्रस्व-दीर्घ क्रम निर्धारित छै, मुदा मैथिली लेल अहाँ २०-२१ मात्राक कोनो छन्द जे १.दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ (मफलु ।।U )सँ वा २.दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व (मफलुन ।।।) सँ प्रारम्भ होइत हो, तकरा उठा सकै छी। पाँती २० वा २१ मात्राक हेबाक चाही, (मफलु ।।U ) वा (मफलुन ।।।) सँ प्रारम्भ हेबाक चाही।
मुदा एक रुबाइक वाक्य सभक बहर वा छन्द/ लय एकसँ बेशी तरहक भऽ सकैए। चारू पाँतीमे सेहो काफियाक मिलान भऽ सकैए।

आन चतुष्पदी जाइमे पहिल दोसर आ चारिम पाँती काफिया युक्त होइत अछि मुदा मात्रा २०-२१ नै हुअए से रुबाइ नै
मैथिलीमे मुदा "कता"क परिभाषामे अओत जँ प्रारम्भ दीर्घ-दीर्घसँ हुअए मुदा छन्द आगाँ सरल वार्णिक, वार्णिक वा ,मात्रिक हुअए “कता”क प्रारम्भ दीर्घ-दीर्घसँ हुअए मुदा मात्रिक वा वार्णिकमे दुनूमेसँ कोनो एकमे शेर लिख सकै छी,  कमसँ कम दोसर चारिम पाँतीक काफिया मिलबाक चाही।
रुबाइक चतुष्पदीक चारिम पाँती भावक चरम हेबाक चाही।

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