बुधवार, 25 मई 2011

मैथिली गजलशास्त्र-१३


हमरा मानसपटलपर मैथिलीक सम्मानित आलोचक श्री रमानन्द झा रमणक ओ वाक्य औखन ओहिना अंकित अछि जाहिमे ओ मैथिलीक वर्तमान गीत-गजलकेँ मंचीय यश एवं अर्थलाभक औजार कहिकऽ एकर महत्वकेँ एकदम्मे नकारि देने रहथि (सन्दर्भ- मिथिला मिहिर, फरबरी-१९८३); ...कोनो आलोचककेँ एहेन गैर जिम्मेदारीवला वक्तव्य देबाक की अधिकार? भारतीय संविधानमे भाषणक स्वतंत्रता एकटा मौलिक अधिकार छैक तेँ?(सियाराम झा सरस, दीपोत्सव, १८/१०/९०; आमुख, लोकवेद आ लालकिला)
वियोगी लोकवेद आ लालकिलाक एकटा दोसर आमुखमे लिखै छथि- छन्दशास्त्रक नियमपर आधारित होयबाक उपरान्तो एहिमे गजलकारकेँ गणना-नियमक स्वातन्त्र्यक अधिकार रहैत छैक।” (!)
गजल कतेको ढंगसँ कतेको बहरमे कतेको छन्दमे लिखल जा सकैए, ई सत्य अछि, मुदा गणना नियमक स्वातन्त्र्यक अधिकार ने मात्रिक गणनामे छैक आ ने वार्णिक गणनामे।
देवशंकर नवीन लिखै छथि –...पुनः डॉ. रामदेव झाक आलेख आएल। एहि निबन्धमे दूटा अनर्गल बात ई भेल, जे गजलक पंक्ति लेल, छन्द जकाँ मात्रा निर्धारण करए लगलाह..
लोकवेद आ लालकिलामे गजल शुरू हेबासँ पहिने कएकटा आलेख अछि, मैथिली गजलपर कोनो सकारात्मक टिप्पणी तँ नै अछि ऐ सभमे, हँ मुदा समीक्षककेँ लाठी हाथे ई सभ मैथिली गजल थिक, गजले टा थिक कहबापर विवश करैत प्रहार सभ अवश्य अछि।
हाइकूमे सिलेबल आ वर्णक मिलानी अंग्रेजी हाइकूक आरम्भिक लेखनमे नै भऽ सकल, देखल गेल जे ५/७/५ सिलेबलमे बहुतरास अल्फाबेट आबि गेल, जापानीमे ओतेक अल्फाबेट ५/७/५ सिलेबलमे नै छल। मैथिलीक आरम्भिक हाइकूमे सेहो ५/७/५ सिलेबलक अनुकरण करैत ज्योति चौधरी अपन कविता संग्रह अर्चिस्मे बेसी वर्णक प्रयोग केलन्हि। तेँ हम सलाह देलहुँ जे मैथिली हाइकू सरल वार्णिक छन्दक आधारपर लिखल जाए जइमे ह्रस्व-दीर्घक विचार नै हुअए। संस्कृतमे १७ सिलेबलबला वार्णिक छन्दमे नोकमे नोक मिला कऽ १७ टा वर्ण होइ छै- जेना शिखरिणी, वंशपत्र पतितम्, मन्दाक्रान्ता, हरिणी, हारिणी, नरदत्तकम्, कोकिलकम् आ भाराक्रान्ता। से ५/७/५ मे १७ सिलेबल लेल १७ टा वर्ण हाइकू लेल गेल, से आब ज्योतिजी सेहो लऽ  रहल छथि, हम सेहो लऽ रहल छी आ मिहिर झा, इरा मल्लिक, उमेश मंडल, रामविलास साहु, सुनील कुमार झा सेहो लऽ रहल छथि। रुबाइमे हमर सलाह छल जे एतए सरल वार्णिक छन्दक प्रयोग सम्भव नै अछि, कारण एकर प्रारम्भ दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ वा दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व सँ होइत अछि से चाहे तँ ह्रस्व-दीर्घक मिलानी खाइत वर्णिक छन्दक प्रयोग करू वा मात्रिक छ्न्दक। रुबाइक चतुष्पदीमे पहिल दोसर आ चारिम पाँती काफिया युक्त होइत अछि; आ मात्रा (वा वार्णिकमे वर्ण)२० वा २१ हेबाक चाही। कारण चारू पाँती चारि तरहक बहर (छन्द) मे लिखल जा सकैए से निअमकेँ आगाँ नमरेबाक आवश्यकता नै छै, हँ ई निर्णय करैए पड़त जे चारू पाँतीमे वार्णिक वा मात्रिक गणना पद्धति जे ली, से एक्के हेबाक चाही।
गजलमे मुदा अहाँ वार्णिक, सरल वार्णिक वा मात्रिक छन्दक प्रयोग कऽ सकै छी, मुदा एक गजलमे दूटा बौस्तु मिज्झर नै करू। बिन छन्द वा बहरक गजल अहाँ कहि सकै छी, समीक्षककेँ लुलुआ कऽ आ लाठी हाथे; मुदा ओ गजल नै हएत, उर्दू/ फारसीमे तँ मुशायरामे अहाँकेँ ढुकैये नै देत। आ आब जखन रोशन झा, प्रवीण चौधरी प्रतीक, आशीष अनचिन्हार, सुनील कुमार झा सन युवा गजलकार अन्तर्जालपर एकटा टिप्पणीक बाद सरल वार्णिक छन्दमे गजलकेँ संशोधित कऽ सकै छथि तँ लालकिलावादी गजलकार लोकनि किए नै कऽ सकै छी? मायानन्द मिश्र गीतल कहि आ गंगेश गुंजन गजल सन किछु मैथिलीमे कहि जे गलत परम्पराकेँ जारी रखबाक निर्णय लेने छथि तकरा बाद अजित आजाद आ आशीष अनचिन्हार जँ बिना छन्द/ बहरक गजल लिखै छथि तँ एकरा हम मायानन्द मिश्र, गंगेश गुंजन आ लालकिलावादी अ-गजलकार लोकनिक दुष्प्रभावे बुझै छी।
लोकवेद आ लालकिला:
आत्ममुग्ध आमुख सभक बाद ऐ संग्रह मे कलानन्द भट्ट, तारानन्द वियोगी, डॉ. देवशंकर नवीन, नरेन्द्र, डॉ. महेन्द्र, रमेश, रामचैतन्य धीरज, रामभरोस कापड़ि भ्रमर, रवीन्द्र नाथ ठाकुर, विभूति आनन्द, सियाराम झा सरस आ सोमदेवक गजल देल गेल अछि।
कलानन्द भट्ट
भोर आनब हम दोसर उगायब सुरुज
करब नूतन निर्माण हम बनायब सुरुज
सरल वार्णिकक अनुसारे गणना- पहिल पाँती-१७ वर्ण दोसर पाँती- १८ वर्ण; जखन सरल वार्णिकेमे गणनाक अन्तर अछि तँ ह्रस्व दीर्घ विचारपर जएबाक मेहनति बचि गेल।
मात्रिक गणनाक अनुसार- पहिल पाँती-२१ मात्रा, दोसर पाँती- २१ मात्रा, मात्रा मिलि गेलसे आब ह्रस्व दीर्घ पर चली। पहिल पाँती दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व (एतए दूटा लगातार ह्रस्वक बदला एकटा दीर्घ दऽ सकै छी, से दोसर पाँतीमे देखब)। दोसर पाँती- ह्रस्व-हस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ- ह्रस्व-हस्व- ह्रस्व-हस्व-दीर्घ- ह्रस्व-हस्व- ह्रस्व-हस्व-ह्रस्व। मुदा एतए गाढ़ कएल अक्षरक बाद क्रमटूटि गेल।
तारानन्द वियोगी
दर्द जँ हद केँ टपल जाए तँ आगि जनमै अछि
बर्फ अंगार बनल जाए तँ आगि जनमै अछि

सरल वार्णिकक अनुसारे गणना- पहिल पाँती-१९ वर्ण दोसर पाँती- १८ वर्ण; जखन सरल वार्णिकेमे गणनाक अन्तर अछि तँ ह्रस्व दीर्घ विचारपर जएबाक मेहनति बचि गेल।
मात्रिक गणनाक अनुसार- पहिल पाँती-२५ मात्रा, दोसर पाँती- २५ मात्रा, मात्रा मिलि गेलसे आब ह्रस्व दीर्घ पर चली। दीर्घ (संयुक्ताक्षरकेँ पहिने)-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्र्अस्व-ह्रस्व।(एतए दूटा लगातार ह्रस्वक बदला एकटा दीर्घ दऽ सकै छी, से दोसर पाँतीमे देखब)।  दोसर पाँती- दीर्घ (संयुक्ताक्षरकेँ पहिने)-ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ एतए क्रमभंग भऽ गेल।

देवशंकर नवीन
अँटा लेब समय-चक्र, सहजहि एहि आँखि बीच
नबका प्रभात लेल, क्रान्ति कोनो ठानि लेब
सरल वार्णिकक अनुसारे गणना- पहिल पाँती-१९ वर्ण दोसर पाँती- १६ वर्ण; जखन सरल वार्णिकेमे गणनाक अन्तर अछि तँ ह्रस्व दीर्घ विचारपर जएबाक मेहनति बचि गेल।
मात्रिक गणनाक अनुसार- पहिल पाँती-२५ मात्रा, दोसर पाँती- २५ मात्रा, मात्रा मिलि गेलसे आब ह्रस्व दीर्घ पर चली। ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व-दीर्घ-ह्रस्व (एतए दूटा लगातार ह्रस्वक बदला एकटा दीर्घ दऽ सकै छी, से दोसर पाँतीमे देखब)। दोसर पाँती- ह्रस्व-ह्रस्व-दीर्घ- मुदा एतए गाढ़ कएल अक्षरक बाद क्रमटूटि गेल।

नरेन्द्र
निकलू तँ सजिकऽ सजाकेँ
बासन ली ठोकि बजाकेँ
सरल वार्णिकक अनुसारे गणना- पहिल पाँती-१० वर्ण दोसर पाँती- ९ वर्ण; जखन सरल वार्णिकेमे गणनाक अन्तर अछि तँ ह्रस्व दीर्घ विचारपर जएबाक मेहनति बचि गेल।
मात्रिक गणनाक अनुसार- पहिल पाँती-१३ मात्रा, दोसर पाँती-१४, मात्रा गणनाक अन्तर अछि तँ ह्रस्व दीर्घ विचारपर जएबाक मेहनति बचि गेल।
डॉ महेन्द्र
चलैछ आदमी सदिखन चलैत रहबा लए
जीबैछ आदमी सदिखन कलेस सहबा लए
सरल वार्णिकक अनुसारे गणना- पहिल पाँती-१८ वर्ण दोसर पाँती- १८ वर्ण। मुदा तेसर शेरमे दोसर पाँतीमे १६ वर्ण आबि गेल अछि। मात्रिकमे सेहो उपरका दुनू पाँतीमे क्रमसँ २४ आ २५ वर्ण अछि।
रमेश
जखन-जखन साओनक ओहास पड़ैए
हमर छाती मे गजलक लहास बरैए
सरल वार्णिकक अनुसारे गणना- पहिल पाँती-१६ वर्ण दोसर पाँती- १६ वर्ण। मुदा दोसर शेरक पहिल पाँतीमे १५ वर्ण। मात्रिक मे सेहो उपरका दुनू पाँतीमे २२ वर्ण अछि। मुदा ह्रस्व-दीर्घ गणनामे दोसरे शब्दमे ई मारि खा जाइए।
ई दोष शेष गजलकारमे सेहो देखबामे अबैए।

एकर अतिरिक्त सुरेन्द्रनाथक गजल हमर हथियार थिक , सियाराम झा सरसथोड़े आगि थोड़े पानि”, रमेशक नागफेनीआ तारानन्द वियोगीक अपन युद्धक साक्ष्य मे सँ किछु किताब लाठी हाथे मैथिली साहित्यमे गजल संग्रहक रूपमे साहित्य अकादेमीक सर्वे ऑफ मैथिली लिटेरेचरक उत्तर जयकान्त मिश्र संस्करणमे आबि गेल अछि, किछु ऐ सहित्यक इतिहासक अगिला संस्करणमे आबि जाएत! अरविन्द ठाकुरक गजल सेहो पत्र-पत्रिकामे गजल कहि छपि रहल अछि जे अही परम्पराकेँ आगाँ बढ़बैत अछि।
जँ ई सभ गजल नै छी तँ पद्य तँ छी आ तइ रूपमे एकर विवेचन तँ हेबाके चाही। ऐ क्रममे रवीन्द्रनाथ ठाकुरक लेखनी एक रंग अनेक देखू। मैथिली गजल संग्रहक रूपमे ई पोथी आइसँ २५ बर्ख पूर्व आएल। सोमदेव आ भ्रमरक संग हिनको गजल लालकिलावादक परिभाषामे नै अबैत अछि। गजल नै मुदा पद्यक रूपमे एकर स्थान मैथिली साहित्यमे सुरक्षित छै, मुदा ई आन वर्णित गजलक तथाकथित संकलनक विषयमे नै कहल जा सकैए।
एक छन्द, एक बाँसुरी, एक धुन सुनयबालेऽ
लियौ ई एक गजल, आई गुनगुनयबालेऽ
(रवीन्द्रनाथ ठाकुर लेखनी एक रंग अनेक”)




हमर मैथिली रुबाइ आ मैथिली गजल बहर/ छन्द मे लिखल नीचाँ देल जा रहल अछि: 

रुबाइ

कारी अनहार मेघ आ नै होइए
कत्तौ बलुआ माटि खा नै होइए
दाहीजरती देखि हिलोरै-ए मेघ
भगजोगनी भकरार जा नै होइए

गजल (बहरे मुतकारिब)

अहाँ बूझि लै छी जुआरी अनेरे
जिबै कोन बैबे नियारी अनेरे

हहारो उठेलौं नचारी गबेलौं
सिहाबै किए छी मदारी अनेरे

जतेको नबारी छबारी बुरैए
घुरेबै कियो नै सुतारी अनेरे

घरोमे उपासे बहारो निरासे
दहारे अकाले हियासी अनेरे

चलै छी खटोली उठा ऐ भरोसे
भसाठी अबैए डरै छी अनेरे

 

गजल (बहरे मुतकारिब )


उचरि नरूप अपन लिखैब तखन किने
उतर दछिन डगहर    बहैब तखन किने
                         
कनकन करत बनत सदिखन तलिया यौ
सुअद पैब जौँ अहँ झखैब तखन किने

मनक भूख असगर नुकैब बुझल अछि
अपन बोल-वाणी घुरैब तखन किने

खधाइ गढ़ अछि भरल सभतरि दहारे
जलक धार बिच घर भरैब तखन किने

निमहतासँ निभता निभैब सिखल नहि
नव युग कनिक उगल बुझैब तखन किने

पड़ाइनपर कनैत अछि भाग जँ कतौ
गजेन्द्र मन बूझै हियैब तखन किने

बहरे मुतकारिब मुतकारिब आठरुक्न फ ऊ लुन (U।।) चारि बेर

गजल- (गायत्री गजल)

गुमकी लागै राति बुलैत चान झपाइ छी
घुरि जाइ गाम मुदा बीचे असकताइ छी

चरको परियानि ई बनेलौं कएक बेर
उबेरक बाट ताकी आ सुरुज कहाइ छी

अकास बिच सतरंगा पनिसोखा उगलैए
निराशसँ आगू जाइ बीचेमे लेभराइ छी

जे काज होइए पछता से काज ताकी हम
अगता काज आबैए जान कोना गमाइ छी


ओकरा देखि बुझलहुँ गढ़निक सोपान
बनैत- बनैत बनै मूर्ति अहाँ देखाइ छी


ढङीला छौरा धरैए भेष रूप बदलैत
दोहरी ई नस-नस बुझी हम चिन्हाइ छी

जे संगमे अछि सेहो छोड़ने अहाँ जाइ छी
राखब की लगैए पकड़ै लेल पड़ाइ छी

कानमे ठेकी आँखिमे गेजर मूह दुसैए
लेरचुब्बा नै डिग्गा मदारी जे कहै जाइ छी

बूझी बाजी करतेबता सँ बढ़ू एक्के सुरे
पेटो पानि नै मूह दुसै कनीले हुसाइ छी

छोड़ि कऽ चलि गेल छाह, परात, इजोरिया
ऐरावत दोसराइत अहाँ की कसाइ छी

टिप्पणी:गायत्री: ई चारि प्रकारक होइत अछि- द्विपदी, त्रिपदी, चारि पदी आ पाँचपदी। चारि पदी मे ८-८ अक्षरक पद आ एक पदक बाद अर्द्धविराम आ दू पदक बाद पूर्णविराम दए सकै छी। माने एक गायत्री शेर तैयार।  

गजल



नोर झरैए     मोनक दागनि दगै छी
तराटक लागलए    आ बातो बकै छी

कोनटा बचल नै   एकान्ती ले एकोटा
अन्हरोखे उठै छी  आ गनती गनै छी

अन्हरियासँ बेसी    अन्हार जिनगीमे
ई इजोरिया किए   अहाँ मुँह दुसै छी

पिआ गेलाह देशान्तर      दूरस्त देस
कियो नै घुरै अछि से आसो नै तकै छी

भोरे अहाँ बिनु       दिन फेर बजरल
ऐरावतसँ भारी      ऐ दिनकेँ देखै छी

गजल



गुम्म भेल जे ठाढ़ भेल छी मुनल मूह मटकुरिए नीक
बाट तकै बहार भेल गजर-गजर तकनहिए नीक

धन भेल थोड़ बिपत बड़ जोर प्रेमक राग बिसरलौं
प्रेम दफानि बिसारै से गदह-पचीसी बुझनहिए नीक

जे देखलक बरियारक गाछ कहलक बिरदाबन ईहे
उड़कुस्सी लागै दलानपर छै आब उजड़नहिए नीक

जकरा कतहु ने छै पुछारी से अछि सौराठक नोतिहारी
चन्द्रोगत नै प्रेम अछिञ्जल से आब बिसरनहिए नीक

हाथी अपने पएरे भारी चुट्टी अपने पएरे भारी अछि
ऐरावत प्रेम-जिंजीरसँ छारल तैं ठोकरेनहिए नीक
 

गजल (बिना रदीफक)


छोट-छीन सन बात बहुत अछि
मुँह बिधुऔने ठाढ़ बहुत अछि

ककरा की कहबै के पतिआएत
गह-गहमे अर्थात बहुत अछि

भयौन बनि ओ अछि ठाढ़ सोझाँमे
हाथक गहमे हाथ बहुत अछि

नीक काज देखि गुमसुम छी ठाढ़
चबासी दऽ दियौ बात बहुत अछि

ओकरहि पाछाँ सभ चलू चलै छी
बदलि देत विश्वास बहुत अछि

दोस्तियारी बिना ई राह कठिन अछि
निभरोस रहू तँ काल्हि कठिन अछि

अनठेने नै दै छी कान बात किए यौ
घृणो तँ करू जँ सएह भरल अछि

केलहुँ जखन जे काज सेहो नै हट्ठे
भेल नै होअए से काज केलहुँ अछि

सनेस हमर जे नीक नै लगलनि
प्रेमक दूट आखर केओ सुनै अछि

जे फुलवाड़ी लगा कृपा करै जाइ छी
आपरूपी बूढ़ नेना बनैत अछि

बिसबासी लोक जे जीवनमे हमर
प्रेम लै-दै बला समाजक परिचर

चिन्ताक मोटगर रेख कपारपर
छल छोट से बनल आब छेबगर

जतेक माँगलक देलहुँ बेशिये कऽ
रेख नहि आओल कखनो माथपर

जकरा पदक होश बेहोश बनौने
घृणा चक्कूओसँ बेशी अछि धरगर

दोसराक दर्दसँ दुखी भेलहुँ अछि
नेनोसँ बेशी जे भेलहुँ सुखितगर

खेत-खम्हारक काज कऽ सकलहुँ
सप्पत देल गप्प निमाहि देलहुँ

बिसबास रहए तेँ झगड़ा-झाँटी
पाइ तँ आएल समए गमेलहुँ


झगड़ा करैत छी बहुत अहाँसँ
प्रेम करैत छी बुझा ने सकलहुँ

आकांक्षाक पजरैत अग्निक बिच
पैघ छी तकर चेन्हासी कहलहुँ

देखै छी बजै ने छी कोना ने ई कहू
हमहूँ ओहिना घुरा कऽ कहलहुँ

भय रहित सत्यसँ भेँट भेल
सुरेब सम्पूर्ण छल अविचल

चित्रक रंगक करतब लेल
उद्देश्यक पाछाँ भटकि रहल

बड़का सन काजक छाह अछि
देखल विस्तृत सुन्दर बनल

आजुक बात खतम होएत यौ
भोरुका बसात से बिर्रो बनल

पूछू सभसँ आ छोड़ू नै ककरो
नव विहान किए छल रोकल

दिन-राति बीतल से मोन पड़ल ऐ
अपन आ आनोपर भरोस अछिये

आस्ते सँ जे सिहकि उठल ई बसात
अन्तर्मनक शक्ति बदलि देत सत्ते

विश्वासपर अडिग चलि रहल छी
नवजीवनपथ समस्या ने कोनो ऐ

सिखबाक ई इच्छा खतम भऽ गेने की
मगजक शान्ति भेटत के ई कहै ऐ

ओहि सोचल बुनल असत्य बातक
सत्यक प्रति ई नरम जे भेलहुँ ऐ

मोन पाड़ल नीक खराप बिसरि कऽ
मित्र बढ़ल अछि आ शत्रु कमल ऐ
छातीक धरधड़ी घटि बढ़ल अछि
पएर थाकल बेहोशी थम्हल नहि

प्रेममे पड़ि घुरमि हम रहल छी
साँस फुलल आ उद्वेग कमल नहि

निन्नक मारल अछि आँखि फुलल ई
प्रेमक सभटा आख्यान कहल अछि

कहू किए अछि ई चित घबड़ाएल
स्मृति हँसि सूरति बदलल अछि

माँछ बिनु पानिक उन्टा प्रेम हम्मर
प्रेम पाबि खटबताह बनल अछि

हँसैत ओकर जे मुँह हम देखल
सुन्दर सलिल ई धार बहल अछि

आस बहुत छल क्षणमे से बीतल
आस निराशमे कोनो अन्तर नहि

प्रेम पियासल मोन भेल उचाट ई
ई बिसरि गेने तँ बाट बहुत अछि
बकथोथीसँ काज चलत नै
आत्म प्रशंसे बात बनत नै

भौकीसँ हम नै घबड़ाएब
पथमे प्रतिकार करब नै

भार मिलि- कऽ सभ उठबै छी
उठल नै आ की गुड़कल नै

खतम करू बात बड्ड भेल
ठठा हँसू तँ बात बढ़त नै

देखि छूबि अनुभूतिक क्षण
ई पाँती इतिहास बनत नै
9
अकत तीत प्रेमक जे पथिक अदौकालसँ
धतालबूढ़ प्रेमकेँ बोहेलक दुनू हाथसँ

निर्मल आंगुरसँ छूबै जे ओकर पुठपुरी
फरफैसी पसारै निदरदी अगिलकण्ठ जँ

निमरजना प्रेम जे छलै धपोधप निश्छल
बिदोरै लेल प्रेमीकेँ छलै ओ कड़ेकमान तेँ

अकरतब कर्तव्यमे भेद नै बुझलकै जे
जराउ प्रेमक गप्प नै कहियो नुकेलकै जँ

खञ्जखूहर ऐरावत नै बाटक छेँ बाटमे
धांगि बाट बनेबाक दाम अगूबार पेने छेँ 


10 
अंतहीन अंत ऐ सोचनीक होइए
भासो नै बनैए नै चित्र पूर होइए

ऐ रंग आ तरंगक नै भेटैए बाट
सोचैत भँसियाइत मगज फटैए

नै बाजैए बाट जे छोड़ि चललौं कतऽ
आँखि बाजैए बिनु बजने बुझबैए

आदति जे लागल वेदना सहबाक
गेंठ बनैए से सोहनगर लगैए

ई गुमकी बढ़ल खत्म हएत की
खरचण्डाली प्रेम पिसीमाल भेलैए 

11 

रातिक इजोरिया देखि रहल तारा कहलक
तरेगन छोट तैयो इजोतक खिस्सा कहलक

चन्द्रमाक इजोतक चर्च तँ बड़ होइ छै
एहि पिरौँछ इजोतक खेरहा कहलक

उज्जर दपदप इजोतक ई इजोरिया
देत संग अन्हरियामे फरिछा कहलक

पिरौँछ सरिसव फूल हँसि रहल अछि
ई इजोरिया पिरौंछ किए ने से कहलक

12
जे ई गप अहाँ हमरासँ ने कहितौं
जे फूसि-फटक हमरासँ ने करितौं

मोनमे रखबाक हमरा जे रहितै
तँ कोनो आन बहन्ना नै बना सकितौं

ई ठोढ़क फुफरी चानिपर पसेना
घाम चुबैत सुगन्धि पाबि सुरकितौं

आरि-धूर बाटे चली आ जा कऽ पहुँची
बीच सड़क ठाढ़ छै रोकि ने सकलौं

 13
पिपनी झुकल डिम्हा उठल करजनी सन आँखि छै
की की बीतल नै कहि सकब कहि सकब एखन नै

आ देखल मेघक टिक्कर खसि रहल छै अकासमे
हुलसि ताकल खेत दिस, उल्लास पर्वत चढ़ल ऐ

चढ़ल ई आबि रहल, ई धार बाढ़ि बनि कऽ केहन
बाँचल रहत हमर जलोदीप की गाम हमर ऐ

14
जाऊ कत्तऽ टिटही सेहो इजोरियामे भागल
अन्हरिया राति आ जिनगी झूर-झाम बनल

कते बुझाएब ककरा ई, कते सम्हारब की
जिनगीक प्रयाण संग रस्ता संग्राम बनल

लोथ प्रेत राकश बिच ठाढ़ छी असगर की
मनुक्ख लगैए जे लहास जिनगीक उठल

साँझ अन्हरगर अछि, राति अछि बाँचल की
की भोरक बाट ताकू? फेर साँझ घुरि आएल

इजोरिया छैक कतबो, छै तँ रातिये सगरो
दिनोमे ग्रहण आ सगरो अन्हार पसरल 

15 



तेजगर छी से छद्म ज्ञान छल
खिखिर कटाबै भौकी प्रतिपल

हिल्कोरक संग जाइत बहैत
संग हमर जे घास-फूस छल

अकलबेर मे बिसरि गेल जे
गिरिमाल लेने ठाढ़ ओतै छल


सूर्य-किरिण से मद्धिम-मद्धिम
सेहो गर्दासँ झँपा रहल छल

नटुआ बिपटा बनि हँसै अछि
तोहूँ हमरे सन अछि देखल

जागि अन्हरिया केलहुँ काज जे
सेहो मस्त ओंघाएल सन छल

आन्ही संग झमटगर अछार
बान्ह एखनो अछि सुखा रहल

शान्त भंगिमासँ काज करै जाउ
निराउ वर्षा अछि देखा रहल

मानरि-अबाज रहि कऽ अबैछ
झाँपि बोल ई सुना रहल छल

गप बिच्च ठकुरा दैत रहै छी
काज करू धए कए करिनाल

ताहि मनुख-गाछी भुताहि बिच
ओ मनुक्खगन्ध सूंघि सहै छल

16
बानर पट लैले अछि तैयार
बिरनल सभ करू ने उद्धार

गाएक अर्र-बों सुनि अनठेने
दुहै समऐँ जनताक कपार

पुल बनेबाक समचा छैक नै
अर्थशास्त्र-पोथीक छलै भण्डार

कोरो बाती उबही देबाक लेल
आउ बजाउ बुढ़ानुस - भजार

डरक घाट नहाएल छी हम
से सहब दहोदिश अत्याचार

ऐरावत अछि देखा - देखा कए
सभटा देखैत अछि ओ व्यापार

17

कानैत दुनू बच्चाकेँ देखलहुँ बिछुड़ैत काल
सम्वेदना छै बाँचल जकर चहुँदिस अकाल

बिसरी हँसैत खिलखिलाइ अनमुनाह सन
अछि बुरबक बताह मथसुन्न अछि ई काल

गम्भीर बात विचारेँ ओढ़ल देखल कलुषता
काल सन चंठ अछि सम्वेत ई सुन्ने देखाएल

लाल सूर्यकेँ पीअर कपीश होइतहिँ ओकर
पाँजड़ दबल मनुषता ई-ओ-हे जाइत काल

सुन्न-मसान बोनक मचानपर बैसल छी की
भगजोगनीक बाड़ल भकराड़ ई राति भेल  

ऐरावत देखैत इजोतक बिर्रो- बाढ़ि- दुर्भिक्ष
ग्रहणक ई सूर्य थाकल देखै छी चोन्हराएल 

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अपील - दहेज़ मुक्त मिथिला...



अपार हर्षके संग संपूर्ण मैथिल केँ सूचित कय रहल छी जे मिथिलाके महान्‌ पारंपरिक एवं वैज्ञानिक महत्त्वके द्योतक - विवाह योग्य वर एवं कनियाके जोड़ी मिलान हेतु सुप्रसिद्ध सभागाछी जाहिठाम अनेको सम-सामयिक विषय ऊपर चर्चा सेहो कैल जैछ से जून २०-२९, २०११ में अत्यन्त भव्यता एवं आधुनिकताके संग आयोजन कैल जा रहल अछि। एहि सभामें मिथिला लगायत संपू...र्ण ग्लोबल मैथिल लोकनिक सहभागिता होयत। हलाँकि आजुक युग इन्टरनेटके अछि आ बहुत रास जोड़ी इन्टरनेटके माध्यम सऽ मिलान कैल जैछ - मुदा सौराठके जे गरिमा छैक से प्रत्यक्ष दुनू पक्ष आमने-सामने अपन-अपन पूर्ण वंशावलीके आधारपर पंजीकार, दुतीकार एवं अन्य-अन्य कुटुम्बी पक्षके मध्यस्थता सँ वैवाहिक सम्बन्ध बनयबाक निर्णय सभाकाल (सालाना १० दिन) में करैत छथि - कोनो हाही-बसाती नहि, कतहु रहु निःशंक अपन कार्य में लागल रहू आ सभामें अपन घरके विवाह योग्य वर वा कन्याके लेल उचित जोड़ी मिलान करैक लेल सभागाछी में पहुँचि जाउ।

सौराठ सभा अपन प्रसिद्ध गरिमा के पुनः प्राप्त करैय एहि सदिच्छा संगहि दहेज मुक्त मिथिलाके निर्माण हेतु सेहो आवश्यक पूर्वाधार एवं संगठन बनैक एहि धारणा संग एक विशाल विचार-गोष्ठी - सम्मान - यशगान कार्यक्रम आदि सेहो होयत। अतः अपने लोकनि सँ साग्रह निवेदन जे एहि बेरका सौराठ सभामें अवश्य भाग ली एवं मिथिला के विकास में सहयोग करी। एहि बेरक सभाके द्वारा ‘सौराठ सभाके भारतीय संस्कृतिके धरोहर’ घोषणा हेतु उद्‌घोषणा एवं बिहार सरकार, भारत सरकार तथा नेपाल सरकार के संयुक्त प्रयास सँ एहि ऐतिहासिक स्थलके विकास हेतु आम आह्वान सेहो करी - एहि सभ के लेल अपने लोकनिक विशाल उपस्थिति अनिवार्य अछि। अपन मातृभूमि आ मातृभाषा प्रति कृतज्ञता रखैत अपने लोकनि अवश्य एहि मूहिम के सार्थक बनाबी से हार्दिक अनुरोध अछि।

निष्कलंक अहि पावन धरती, धिया सिया के ई अंगना
जुनी जराऊ दहेजक आईग, अछि एक्तुल्य धिया आ ललना.


आयोजक:
सौराठ विकास समिति
दहेज मुक्त मिथिला

सहयोगी:
मैथिल ब्राह्मण महासभा, मैथिली सेवा समिति, मैथिली लेखक संघ, मैथिल ब्राह्मण समाज नेपाल, लगायत दर्जनों मैथिली-मिथिला सँ सम्बन्धित संघ-संस्था सभ।

स्थल:
सौराठ सभागाछी, सौराठ, मधुबनी, बिहार।

उद्‌घाटन:
समय ४ बजे सायंकाल, २० जून, २०११।

कार्यक्रम:
पारंपरिक वर-कन्या जोड़ी मिलानके संगहि सांस्कृतिक गोष्ठी, विचार गोष्ठी, कवि गोष्ठी, इत्यादि....

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मंगलवार, 24 मई 2011

हम पुछैत छी- कवि‍ता संग्रह‍ (वि‍नी‍त उत्‍पल)- समीक्षा


एक्ैसम शताब्‍दीक दशांशक परि‍समाप्‍ति‍क अवलोकन कएलापर परि‍णाम भेटल जे ऐ अवधि‍मे कि‍छु एहेन तरूण रचनाकारक पदार्पण मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे भेल जनि‍क रचना सभसँ हमर साहि‍त्‍य पुलकि‍त भऽ रहल अछि‍। श्री गजेन्‍द्र ठाकुर ऐ अत्‍याधुनि‍क पि‍रहीक लेल पथ प्रदर्शक छथि‍, जनि‍क कुशल नेतृत्‍वमे श्री वि‍नीत उत्‍पल, श्री उमेश मण्‍डल, श्रीमती ज्‍योति‍ सुनीत चौधरी, श्रीमती प्रीति‍ झा ठाकुर सन रचनाकारक मंडली मैथि‍लीकेँ नवल ज्‍योति‍ प्रदान कऽ रहल।

सन २००९ई.मे वि‍नीत उत्‍पल जीक पहि‍ल कवि‍ता संग्रह हम पुछैत छी‍ श्रुति‍ प्रकाशनक सौजन्‍यसँ प्रकाशि‍त भेल। वि‍नीत जीक जन्‍म मधेपुरा जि‍लाक आनंदपुरा गाममे भेल। प्रारंभि‍क शि‍क्षा दीक्षा मुंगेर आ स्‍नातक भागलपुरमे। व्‍यावसायि‍क पाठ्यक्रम नई लि‍ल्‍लीसँ प्राप्‍त कऽ सम्‍प्रति‍ राष्‍ट्रीय सहारा नोएडामे वरि‍ष्‍ठ उपसंपादक छथि‍। मैथि‍ली-मि‍थि‍लाक सांस्‍कृति‍क गति‍ वि‍धि‍ आ अभि‍व्‍यक्‍ति‍क समायोजनक आधारपर दरभंगा आ सहरसाकेँ मुख्‍य केन्‍द्र भूमि‍ मानल जाइत अछि‍। दरभंगा जि‍लासँ वि‍भक्‍त भेलापर उपेक्षाक जे दंश समस्‍तीपुर जि‍ला वासीकेँ भेटलनि‍, वएह दंश मधेपुराक लोक सेहो अनुभव कऽ रहल छथि‍। कवि‍क जन्‍म मधेपुरामे आ प्रारंभि‍क शि‍क्षा अंग प्रदेशमे, परंच कवि‍ता सभ खॉटी मैथि‍लीमे, अजगुत तँ अवश्‍य लागल मुदा वि‍नीत जीक मातृभाषानुरागसँ तीत-भीज गेलहुँ।

ऐ कवि‍ता संग्रहक भूमि‍का सि‍द्धहस्‍त साहि‍त्‍यकार श्री गंगेश गुंजनजी कवि‍क आत्‍मोक्‍ति‍‍ : कवि‍ताक अएना शीर्षक दऽ लि‍खने छथि‍। गुंजन जीक व्‍यक्‍ति‍त्‍व आ कृति‍त्‍व मैथि‍ली साहि‍त्‍यक लेल कालजयी मुदा कवि‍क आत्‍मोक्‍ति‍क वि‍वेचनमे श्री गुंजनक लेखनी कनेक कंजूस बनि‍ कऽ रहि‍ गेल। हमरा मतेँ कोनो नवतुि‍रया रचनाकारकेँ हृदेसँ प्रोत्‍साहि‍त करबाक चाही। ओहूमे जै भाषामे पाठकक संख्‍या लगातार घटि‍ रहल हुअए।

पचास कवि‍ताक संग्रहमे पहि‍ल कवि‍ता ककर गलती‍ वि‍धवाक अवस्‍थापर व्‍यथि‍त कवि‍क लेखनी मैथि‍ली वर्गक कथाकथि‍त आगाँक जाति‍क मध्‍य प्रश्‍न ठाढ़ करैत अछि‍। ठोप, चानन आ पाग मैथि‍लक सवर्ण समाजमे पुरूष कतेको बेर धारण कऽ सकैत छथि‍ मुदा स्‍त्री तँ अवला....। वि‍वाहक क्षणहि‍ंमे जौं पति‍क मृत्‍यु भऽ जाए तँ जीवन भरि‍ सतीत्‍वक दंश झेलए पड़तनि‍। लार्ड वि‍लि‍यम बेंटि‍क केर सुधारवादी आन्‍दोलनमे बंगालक ब्राह्मण सुधरि‍ गेलाह मुदा मैथि‍ल ब्राह्मण अपन सनातन संस्‍कृति‍क रक्षक छथि‍, अवलाकेँ सबला बनेबामे धर्म नष्‍ट भऽ जेतनि‍। नाओं गौरी दाइ मुदा समाजक लेल डाकि‍नी भऽ गेली-

की करती गौरी दाइ

कि‍ओ हुनका देवी कहतन्‍हि‍

तँ डाइन जोगि‍न कहवासँ

लोक वेद पाछुओ नै‍ रहतन्‍हि‍।

कहबाक लेल तँ हमरा सबहक संस्‍कृति‍मे शक्‍ति‍क उपासना प्रासंगि‍क अछि‍ मुदा हम सभ अपने घरक शक्‍ति‍केँ अपमानि‍त आ मर्दि‍त कऽ रहल छी। मनुक्‍खो नै‍‍ भेल‍ शीर्षक कवि‍तामे भौति‍कता आ बौद्धि‍कताक आड़ि‍मे जीवन अवस्‍थाक अव्‍यवस्‍थि‍त रूपक प्रदर्शन नीक लागल-

राति‍ मे घर मे नहि‍ रहैत छी

जखन कि‍ चि‍ड़ै चुनमुनी सेहो

साँझ पड़ैत घर घुरैत अछि‍

की फर्क पड़ैत अछि‍‍ शीर्षक कवि‍ता बौद्ध संस्‍कृति‍क केन्‍द्र वैशालीसँ तथागतक संदर्भमे लि‍खल गेल। बि‍म्‍ब तँ नीक मुदा वि‍श्‍लेषण स्‍पष्‍ट नै‍‍ भऽ सकल। सभ पाठक तँ इति‍हास वि‍द् आ दार्शनि‍क नै‍‍ छथि‍ तँए कवि‍ताकेँ उपयुक्‍त आ पूर्ण नै‍‍ मानल जा सकैछ। ि‍वनीत जीकेँ कनेक फरि‍छा कऽ लि‍खबाक चाही छल। पहि‍ने समाज दाणवीर कर्णकेँ सुतपुत्र मानैत छल जखन महाबली भऽ गेलाह तँ सूर्यपुत्र मानल गेलाह। वास्‍तवि‍कता जे हुअए मुदा अंग प्रदेशकेँ कर्णक कर्मभूमि‍ मानल जाइत अछि‍। कवि‍क प्रारंभि‍क शि‍क्षा मुंगेरमे भेलनि‍ तँ अपन कर्मभूमि‍क वर्तमान अवस्थासँ मर्माि‍हत छथि‍-

दल मलि‍त होइत अछि‍

अंग प्रदेशक आत्‍मा

आ बजबैत अछि‍

तारणहार केँ...।

अपन संस्‍कृति‍क रक्षाक तादात्‍म्‍यमे हम सभ अनसोहांत काज सेहो करैत छी। धार्मि‍क आडंम्‍बरक एकटा प्रमाण अछि‍- मधुश्रावणी। कहबाक लेल तँ ऐ पर्वकेँ मि‍थि‍लाक संस्‍कार पर्व मानल जाइत अछि‍ मुदा वास्‍तवमे मैथि‍ल ब्राह्मण आ मैथि‍ल कर्ण कायस्‍थक मध्‍य मधुश्रावणी पर्व मनाओल जाइत अछि‍। परीक्षा‍ शीर्षक कवि‍ताक माध्‍यमसँ कवि‍ ऐ पावनि‍मे पति‍ब्रताक प्रमाणपत्र- टेमी प्रथापर‍ प्रहार केलनि‍। पुरूष भेलाक पश्‍चात् सेहो कवि‍ परीक्षासँ डेराइत छथि‍ तखन नारीकेँ अहि‍ल्‍या जकाँ बेर-बेर परीक्षा कि‍ए लेल जाइत अछि‍।

गाम डूबि‍ गेल‍ शीर्षक कवि‍ता बाढ़ि‍क वि‍नाश लीलाक औसत प्रदर्शन मात्र मानल जा सकैछ।

संग्रहक सभसँ कलात्‍मक आ प्रासंगि‍क कवि‍ता- हम पुछैत छी‍केँ मानल जाए। वास्‍तवि‍क सेहो जे जै कवि‍ताक शीर्षककेँ कवि‍ता संग्रहक शीर्षक दऽ देल गेल ओइ कवि‍तामे कवि‍क आंतरि‍क जुआरि‍ अवश्‍य हेतनि‍। ऐ कवि‍ताक माध्‍यमसँ कवि‍ समाजक समीक्षाक लेल उद्यत छथि‍। समाजक सभटा व्‍याधि‍पर कवि‍क लेखनी स्‍वच्‍छन्‍द भऽ वि‍चरण केलक।

सरि‍पहुँ वि‍नीत जी पत्रकार छथि‍ देशकालक दशाक वि‍वेचन नि‍त्‍य करैत छथि‍ तखन रचना झाँपल कोना रहत। मनुख आ माल‍ एवं समाजक ई रूप‍ वर्तमान मनुक्‍खक ओझराएल मानसि‍कताकेँ देखबैत अछि‍। अर्थनीति‍ वि‍लोकि‍त भऽ गेल, भौति‍कता समाजकेँ बॉटि‍ रहल अछि‍, अधि‍क प्राप्‍ति‍क आशमे कुकर्म बढ़ि‍ रहल अछि‍। एवं प्रकारे ऐ दुनू कवि‍ताक दृष्‍टि‍कोण नीक लागल। मरलाक बाद‍ शीर्षक कवि‍तामे दर्शनशास्‍त्रक अनुभूि‍त होइत अछि‍। पुष्‍कर कवि‍तामे भारतीय इति‍हास आ अपन संस्‍कृति‍क शीतल वातसँ गौरवान्‍वि‍त भेलहुँ।

ऐ कवि‍ता संग्रहक सबल पक्ष अछि‍ बि‍म्‍बक चयन आ ि‍वश्‍लेषण। भाषा सेहो सरल आ मैथि‍लीक खाॅटी शब्‍दसँ ओत प्रोत अछि‍। मुदा दुर्बल पक्ष भेटल प्रवाहक कमीक रूपमे। कवि‍ता आशु कवि‍ता हुअए वा अतुकांत- छंदक लेपन आवश्‍यक होइत छैक। ऐ कवि‍ता संग्रहमे छंदक समायोजन समुचि‍त रूपेँ नै कएल गेल कोनो-कोनो कवि‍ता तँ गद्य जकाँ बुझना गेल। कवि‍केँ आगाँ एे बि‍न्‍दुपर धि‍यान राखए पड़तनि‍। नि‍ष्‍कर्षत: तरूण कवि‍क प्रांजल मुदा प्रवीण प्रस्‍तुति‍, वि‍नीत जीकेँ कोटि‍-कोटि‍ साधुवाद.....।

पोथीक नाओं- हम पुछैत छी

प्रकाशक- श्रुति‍ प्रकाशन

मूल्‍य- १६० टाका मात्र

वर्ष- २००९

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मिथिलाक खानपान...

मिथिलाक खानपान-नीलिमा चौधरी आ राखी साह... मखानक खीर सामग्री- दूध-१ १/२ किलो, चिन्नी-१०० ग्राम, मखान कुटल- १०० ग्राम, इलाइची पाउडर- स्वाद अनुसार, काजू- १० टा, किशमिश-२०टा बनेबाक विधि- मखानक पाउडर (कनी दरदरा)क पहिने १/२ किलो ठंढ़ा दूधमे घोरि लिअ, शेष दूध केँ खौला लिअ। आब गर्म दूधमे ई घोड़ल मखानक मिश्रण मिला दियौक आर करौछसँ लगातार चलबैत रहियौक जाहिसँ मिश्रण पेनीमे बैसय नहि। .... (आगाँ पढू)

मिथिलांचलक विकास..

मिथिलांचलक विकास... मिथिलांचल क्षेत्र बिहार मे सबस पिछड़ल मानल जाइत अछि, अगर प्रतिव्यक्ति आय , साक्षरता और प्रसवकाल मे जच्चा-बच्चा के मृत्यु के मापदंड बनायल जाय तो मिथिलांचल देश के सबस गरीब आ पिछड़ल इलाका अछि। एकर किछु कारण त अहि इलाका के भौगोलिक बनावट अछि... (आगाँ पढू)

मिथिला अरिपन....

मिथिला चित्रकला- स्त्री आ पुरुषक दशपात अरिपन / स्वास्तिक अरिपन... स्त्रीगणक दशपात अरिपनकन्याक मुण्डन,कान छेदन आ' विवाहक अवसर पर कुलदेवताक घर आकि मण्डप पर बनाओल जाइत अछि।बनेबाक- विधि। एकर बनेबाक विधि सूक्ष्म अछि।ऊपरमे तीन पातक पुष्प, ,ओकरनीँचा पाँच-पातक कमल-पुष्प,ओकर नीचाँ सात-पात युक्त्त कमल, बीचमे अष्टदल कमल अछि। दश पात चारू दिशि अछि। नौ टा माँछक चित्र सेहो अछि... (आगाँ पढू)

एक विलक्षण प्रतिभा...

एक विलक्षण प्रतिभा जिनका हम सदिखन याद करैत छी (प्रथम कड़ी) - कुसुम ठाकुर..... एक बेर हमारा एक पत्रिका में किछु लिखय लेल कहल गेल छल, ई सन् १९९६ क गप्प थिक। हम बस एतबे लिखी सकलौं "हम की लिखी हमर त लेखनिये हेरा गेल"। मुदा आई बुझना जैत अछि जे नै, हमारा एकटा कर्तव्यक निर्वाहन... (आगाँ पढू),
(दोसर कड़ी), (तेसर कड़ी), (चारिम कड़ी), (पाँचम कड़ी), (छठम कड़ी), (सातम कड़ी), (आठम कड़ी), (नवम कड़ी), (दसम कड़ी), (एग्यारहम कड़ी), (बारहम कड़ी), (तेरहम कड़ी), (चौदहम कड़ी), (पन्द्रहम कड़ी )

चिनबारक दीप...

चिनबारक दीप–उषा किरण खान... समस्तीपुर मे गाड़ी बदली कऽ महेसरी अइमे बैसलि सरिया कऽ। आब घर बेसी लग आयल जाइत छैक। चारि टीसन आ छैक, फे तऽ टीसन सऽ एक कोस जमीन हैतै। चारि-पाँच गोटाक हेंज छैक्। बौआइत-बतियाइत गाम पहुँचि जयतै। आठे दिनुका दिन छैक, की सब करतै? एह, करऽक की छैक? सभटा बस्तुजात तऽ कीननहिं जाइत छैक.... (आगाँ पढू)

बिदेसिया (संकल्पित नाटिका)

विद्यापतिक बिदेसिया (संकल्पित नाटिका).... भोजपुरीक साहित्य मैथिलीसँ कम समृद्ध अछि मुदा से अछि मात्र परिमाणमे, गुणवत्ताक दृष्टिमे ई कतेक क्षेत्रमे आगाँ अछि। भोजपुरीक भिखाड़ी ठाकुरक बिदेसियाक सन्दर्भमे हम ई कहि रहल छी। भिखाड़ी ठाकुर कलकत्तामे प्रवासी... (आगाँ पढू)

पाँच पत्र...

पाँच पत्र-हरिमोहन झा... प्रियतमे अहाँक लिखल चारि पाँती चारि सएबेर पढ़लहुँ तथापि तृप्ति नहि भेल। आचार्यक परीक्षा समीप अछि किन्तु ग्रन्थमे कनेको चित्त नहि लगैत अछि। सदिखन अहींक मोहिनी मूर्ति आँखिमे नचैत रहैत अछि। राधा रानी मन होइत अछि जे अहाँक ग्राम वृन्दावन बनि जाइत, जाहिमे केवल अहाँ आ हम राधा-कृष्ण जकाँ अनन्त काल धरि विहार करैत रहितहुँ... (आगाँ पढू)

कथा- माउगि

कथा- माउगि - विभा रानी.... माउगि, माउगि, गे माउगि, गे माउगि! तों माउगि, हम माउगि, ई माउगि, ऊ माउगि - सभ किओ माउगे-माउगि। ऊँहूँ - सभ किओ भला माउगि हुअए। ई तय कर' बाली तों के? अएं गे? तोरा कहिया स' भेटलौ ई हक? ई सभ काज-धंधा हमरा आओरक अछि - हमरे आओर के करे दें। देख त' कने, तोहरो आओर के कतेक रंग-बिरंगा रूप दिया देलियौ! माउगि, गे माउगि.... (आगाँ पढू)

मातृत्व...

डा. मंजू गीता मिश्राक आलेख : मातृत्व.... नारी जीवनक सबसँ गौरवशाली एवं सुखद अनुभव थिक मातृत्व ।ई नारी जीवनक परिपूर्णताक प्रतीक अछि । पूरा नौ मास अपन गर्भमे फलैत-फूलैत एक शिशुक अपन जान सँ बेसी देखभाल करैत छथि । तत्पश्चात एक फूल सन सुन्दर सुकोमल शिशु जन्म लैत अछि, यैह स्त्रीक सबसँ अनमोल उपहार एवं आनन्ददायक क्षण थिक । एहि नौ मासक दौरान गर्भवतीक भोजन एवं वातावरण पर निर्भर करैत अछि.... (आगाँ पढू)
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मैथिल आर मिथिला
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